शनिवार, 20 जनवरी 2018

👉 परमात्मा और किसान

🔶 एक बार एक किसान परमात्मा से बड़ा नाराज हो गया ! कभी बाढ़ आ जाये, कभी सूखा पड़ जाए, कभी धूप बहुत तेज हो जाए तो कभी ओले पड़ जाये! हर बार कुछ ना कुछ कारण से उसकी फसल थोड़ी ख़राब हो जाये! एक दिन बड़ा तंग आ कर उसने परमात्मा से कहा, देखिये प्रभु, आप परमात्मा हैं, लेकिन लगता है आपको खेती बाड़ी की ज्यादा जानकारी नहीं है, एक प्रार्थना है कि एक साल मुझे मौका दीजिये, जैसा मै चाहू वैसा मौसम हो, फिर आप देखना मै कैसे अन्न के भण्डार भर दूंगा! परमात्मा मुस्कुराये और कहा ठीक है, जैसा तुम कहोगे वैसा ही मौसम दूंगा, मै दखल नहीं करूँगा!

🔷 किसान ने गेहूं की फ़सल बोई, जब धूप चाही, तब धूप मिली, जब पानी तब पानी ! तेज धूप, ओले, बाढ़, आंधी तो उसने आने ही नहीं दी, समय के साथ फसल बढ़ी और किसान की ख़ुशी भी, क्योंकि ऐसी फसल तो आज तक नहीं हुई थी! किसान ने मन ही मन सोचा अब पता चलेगा परमात्मा को, की फ़सल कैसे करते हैं, बेकार ही इतने बरस हम किसानो को परेशान करते रहे।

🔶 फ़सल काटने का समय भी आया, किसान बड़े गर्व से फ़सल काटने गया, लेकिन जैसे ही फसल काटने लगा, एकदम से छाती पर हाथ रख कर बैठ गया! गेहूं की एक भी बाली के अन्दर गेहूं नहीं था, सारी बालियाँ अन्दर से खाली थी,  बड़ा दुखी होकर उसने परमात्मा से कहा, प्रभु ये क्या हुआ?

🔷 तब परमात्मा बोले, ये तो होना ही था, तुमने पौधों को संघर्ष का ज़रा सा भी मौका नहीं दिया ना तेज धूप में उनको तपने दिया, ना आंधी ओलों से जूझने दिया, उनको किसी प्रकार की चुनौती का अहसास जरा भी नहीं होने दिया, इसीलिए सब पौधे खोखले रह गए, जब आंधी आती है, तेज बारिश होती है ओले गिरते हैं तब पोधा अपने बल से ही खड़ा रहता है, वो अपना अस्तित्व बचाने का संघर्ष करता है और इस संघर्ष से जो बल पैदा होता है वोही उसे शक्ति देता है, उर्जा देता है, उसकी जीवटता को उभारता है.सोने को भी कुंदन बनने के लिए आग में तपने, हथौड़ी से पिटने, गलने जैसी चुनोतियो से गुजरना पड़ता है तभी उसकी स्वर्णिम आभा उभरती है, उसे अनमोल बनाती है!

🔶 उसी तरह जिंदगी में भी अगर संघर्ष ना हो, चुनौती ना हो तो आदमी खोखला ही रह जाता है, उसके अन्दर कोई गुण नहीं आ पाता! ये चुनोतियाँ ही हैं जो आदमी रूपी तलवार को धार देती हैं, उसे सशक्त और प्रखर बनाती हैं, अगर प्रतिभाशाली बनना है तो चुनोतियाँ तो स्वीकार करनी ही पड़ेंगी, अन्यथा हम खोखले ही रह जायेंगे. अगर जिंदगी में प्रखर बनना है, प्रतिभाशाली बनना है, तो संघर्ष और चुनोतियो का सामना तो करना ही पड़ेगा!

शुक्रवार, 19 जनवरी 2018

👉 पाप का गुरु

🔶 एक पंडित जी कई वर्षों तक काशी में शास्त्रों का अध्ययन करने के बाद अपने गांव लौटे। गांव के एक किसान ने उनसे पूछा, पंडित जी आप हमें यह बताइए कि पाप का गुरु कौन है? प्रश्न सुन कर पंडित जी चकरा गए, क्योंकि भौतिक व आध्यात्मिक गुरु तो होते हैं, लेकिन पाप का भी गुरु होता है, यह उनकी समझ और अध्ययन के बाहर था। पंडित जी को लगा कि उनका अध्ययन अभी अधूरा है, इसलिए वे फिर काशी लौटे। फिर अनेक गुरुओं से मिले। मगर उन्हें किसान के सवाल का जवाब नहीं मिला।

🔷 अचानक एक दिन उनकी मुलाकात एक वेश्या से हो गई। उसने पंडित जी से उनकी परेशानी का कारण पूछा, तो उन्होंने अपनी समस्या बता दी। वेश्या बोली, पंडित जी..! इसका उत्तर है तो बहुत ही आसान, लेकिन इसके लिए कुछ दिन आपको मेरे पड़ोस में रहना होगा। पंडित जी के हां कहने पर उसने अपने पास ही उनके रहने की अलग से व्यवस्था कर दी। पंडित जी किसी के हाथ का बना खाना नहीं खाते थे, नियम-आचार और धर्म के कट्टर अनुयायी थे। इसलिए अपने हाथ से खाना बनाते और खाते। इस प्रकार से कुछ दिन बड़े आराम से बीते, लेकिन सवाल का जवाब अभी नहीं मिला।

🔶 एक दिन वेश्या बोली, पंडित जी…! आपको बहुत तकलीफ होती है खाना बनाने में। यहां देखने वाला तो और कोई है नहीं। आप कहें तो मैं नहा-धोकर आपके लिए कुछ भोजन तैयार कर दिया करूं। आप मुझे यह सेवा का मौका दें, तो मैं दक्षिणा में पांच स्वर्ण मुद्राएं भी प्रतिदिन दूंगी। स्वर्ण मुद्रा का नाम सुन कर पंडित जी को लोभ आ गया। साथ में पका-पकाया भोजन। अर्थात दोनों हाथों में लड्डू। इस लोभ में पंडित जी अपना नियम-व्रत, आचार-विचार धर्म सब कुछ भूल गए। पंडित जी ने हामी भर दी और वेश्या से बोले, ठीक है, तुम्हारी जैसी इच्छा। लेकिन इस बात का विशेष ध्यान रखना कि कोई देखे नहीं तुम्हें मेरी कोठी में आते-जाते हुए। वेश्या ने पहले ही दिन कई प्रकार के पकवान बनाकर पंडित जी के सामने परोस दिया।

🔷 पर ज्यों ही पंडित जी खाने को तत्पर हुए, त्यों ही वेश्या ने उनके सामने से परोसी हुई थाली खींच ली। इस पर पंडित जी क्रुद्ध हो गए और बोले, यह क्या मजाक है?
वेश्या ने कहा, यह मजाक नहीं है पंडित जी, यह तो आपके प्रश्न का उत्तर है। यहां आने से पहले आप भोजन तो दूर, किसी के हाथ का भी नहीं पीते थे, मगर स्वर्ण मुद्राओं के लोभ में आपने मेरे हाथ का बना खाना भी स्वीकार कर लिया। यह लोभ ही पाप का गुरु है।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 20 Jan 2018


👉 आज का सद्चिंतन 20 Jan 2018


👉 आत्मचिंतन के क्षण 20 Jan 2018

🔶 अपनी प्रसन्नता को जब अपनी मुट्ठी में रखा जा सकता है और हर घड़ी आनन्दित रहने का नुस्खा मालूम है तो क्यों न उसी का प्रयोग किया जाय? फिर क्यों इस बात पर निर्भर रहा जाय कि जब कभी सफलता मिलेगी, अभीष्ट वस्तु प्राप्त होगी तब कहीं प्रसन्न होंगे? इस प्रतीक्षा में मुद्दतें गुजर सकती हैं और यह भी हो सकता है कि सफलता न मिलने पर वह प्रतीक्षा ही प्रतीक्षा जीवन भर हाथ रहे। इसलिये गीताकार ने यह सहज नुस्खा हमें बताया है कि फल की प्रतीक्षा मत करो, उस पर बहुत ध्यान भी मत दो, न तो सफलता के लिए आतुरता दिखाओ और न सफलता मिलने पर परेशान होओ। चित्त को शान्त और स्वस्थ रखकर अपने कर्तव्य को एक पुरुषार्थी व्यक्ति की तरह ठीक तरह पालन करो। ऐसा करने से तुम्हें लोक में भी शान्ति मिलेगी और परलोक भी सुधरेगा।

🔷 विचारणीय बात यही है कि जब हम अपनी जीवन समस्याओं में से अधिकांश को, अपना भीतरी सुधार करके, अपनी विचार शैली में थोड़ा परिवर्तन करके हल कर सकते हैं तो फिर उलझन भरा जीवन क्यों व्यतीत करें? मनुष्य बहुत चतुर है, विभिन्न क्षेत्रों में असाधारण चातुर्य का परिचय देता है, उसकी बुद्धिमत्ता की जितनी सराहना की जाय उतना ही कम है। पर इतना होते हुए भी जब वह अपने दृष्टिकोण को सुधारने की आवश्यकता को नहीं समझ पाता और उस पर समुचित ध्यान नहीं दे पाता तो उसकी बुद्धिमत्ता पर सन्देह होने लगता है। वह प्रयत्न पूर्वक बड़े-बड़े महान् कार्य पूरे करता है तब यह बात उसके लिए क्यों कठिन होनी चाहिये कि अपनी मनोगत, भावनागत त्रुटियों पर विचार करे और उन्हें सुधारने के लिए तैयार हो जाय।

🔶 आत्मचिन्तन, आत्मशोधन एवं आत्मनिर्माण का कार्य उतना ही सरल है जितना शरीर को सर्वांगासन, मयूरासन, शीर्षासन आदि आसनों के लिए अभ्यस्त कर लेना। आरम्भ में इस झंझट में पड़ने से मन आनाकानी करता है, पुराने अभ्यास को छोड़कर नया अभ्यास डालना अखरता है, कुछ कठिनाई एवं परेशानी भी होती है, यदि अभ्यासी इन बातों से डर कर अभ्यास न करें या छोड़ दें तो आसनों के द्वारा होने वाले सत्परिणामों से लाभान्वित होना संभव न होगा। इसी प्रकार यदि आत्म-निरीक्षण करने में, अपने दोष ढूंढ़ने में उत्साह न हो, जो कुछ हम करते या सोचते हैं सो सब ठीक है, ऐसा दुराग्रह हो तो फिर न तो अपनी गलतियां सूझ पड़ेगी और न उन्हें छोड़ने की उत्साह होगा। वरन् साधारण व्यक्तियों की तरह अपनी बुरी आदतों का भी समर्थन करने के लिये दिमाग कुछ तर्क और कारण ढूंढ़ता रहेगा जिससे दोषी होते हुए भी अपनी निर्दोषिता प्रमाणित की जा सके।  

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 अपने आपको जानो, समझो और सुधारो

🔷 परमात्मा अपनी विशाल दुनिया का मालिक है, पर आत्मा को भी अपने सत्ता क्षेत्र में पूर्ण आधिपत्य प्राप्त है। मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता स्वयं है। अपनी दुर्बुद्धि से उसे बिगाड़ सकता है और सत्प्रवृत्तियाँ अपनाकर बना भी सकता है। अपने कमरे में सूर्य की धूप एवं पवन देव अपनी मर्जी के बिना प्रवेश नहीं कर सकते। यदि दरवाजे, खिड़कियाँ बन्द कर दिये जाएँ, तो प्रचण्ड धूप एवं तेज हवा का प्रवेश भी भीतर न हो सकेगा। केवल वही स्टेशन अपने रेडियो पर सुना जाता है, जिस पर हम सुई लगाते हैं। अन्य स्टेशनों के ब्राडकास्ट हमारे कानों तक नहीं आ सकते, भले ही वे कितने ही जोरदार प्रसारण चला रहे हों।
    
🔶 इतिहास के पृष्ठ ऐसे उदाहरणों से भरे पड़े हैं, जिनसे सिद्ध होता है कि आंतरिक प्रखरता के बल पर लोगों ने अभावग्रस्त एवं विपरीत परिस्थितियों को चीरते हुए प्रगति के पथ-प्रशस्त किये हैं और अनेकानेक अवरोधों को पार करते हुए उन्नति के उच्च शिखर तक पहुँचे हैं। इसके विपरीत हर प्रकार की सुविधाएँ होते हुए भी ऊपर उठने की बात तो दूर उल्टे नीचे ही गिरते चले गये हैं।
    
🔷 एक साधक अपनी श्रद्धा के बल पर धातु और  पत्थर से बनी प्रतिमाओं से चमत्कारी प्रतिक्रिया उत्पन्न कर लेता है, दूसरा अपनी अनास्था के कारण जीवन्त देव मानवों के अति समीप रहने पर भी कोई लाभ नहीं ले पाता। एकलव्य ने मिट्टी से बनी द्रोणाचार्य की प्रतिमा से वह अनुदान प्राप्त कर लिया था, जो पाण्डव सचमुच के द्रोणाचार्य से भी प्राप्त नहीं कर सके थे। मीरा के ‘गिरधर गोपाल’ और रामकृष्ण परमहंस की ‘काली’ में जो चमत्कारी शक्ति थी, वह उनके श्रद्धारोपण से ही उत्पन्न हुई थी और उन्हीं के लिए फलप्रद सिद्ध होती रही। उन्हीं प्रतिमाओं से अन्य लोग वैसा लाभ नहीं उठा सकते। यंत्र-तंत्रों की सिद्धि में विधि-विधानों की इतनी भूमिका नहीं होती, जितनी साधक के श्रद्धा, विश्वास की। भूतप्रेतों से लेकर देवी-देवताओं तक के जो परिचय सामने आते हैं, उनमें व्यक्ति के अपने विश्वास ही फलित हुए पाये जाते हैं। अमुक चिकित्सा से लाभ होना अथवा अमुक चिकित्सक का सफल होना अथवा अमुक चिकित्सक का असफल होना बहुत करके रोगी के विश्वास पर निर्भर रहता है।
    
🔶 विपुल वर्षा होने पर भी पत्थर की चट्टाने एक बूँद पानी भी नहीं सोख पातीं। इसके विपरीत रेगिस्तानी गर्मी में हरे रहने वाले पेड़-पौधे कहीं से भी अपने निर्वाह के लिए आवश्यक नमी उसी उष्ण वातावरण में से उपलब्ध करते रहते हैं। स्वाति की वर्षा से केवल वे ही सीपें लाभ उठा पाती हैं, जिनके मुँह खुले होते हैं। सरकारी छात्र-वृत्ति उन्हीं को मिलती है, जो परिश्रमपूर्वक पढऩे और अच्छे नम्बरों से उत्तीर्ण होते हैं। बाहरी सहायता उपलब्ध होना न होना उतना महत्त्वपूर्ण नहीं, जितना कि व्यक्ति की निजी पात्रता एवं प्रखरता का होना।
    
🔷 आत्मबोध का तात्पर्य है, अपने से सन्निहित शक्ति एवं सम्भावना से परिचित होना। आत्मिक प्रगति का अर्थ है- आंतरिक दोष-दुर्गुणों को निरस्त करके सद्ïभावनाओं और सत्प्रवृत्तियों को समुन्नत बनाने के उपक्रम में निरन्तर निरत रहना। इन सत्प्रयत्नों से मानवीय और दैवी दोनों प्रकार की सहायताएँ अनायास ही उपलब्ध होती रहती हैं।
    
🔶 ब्रह्म विद्या का सबसे महत्त्वपूर्ण निर्देश यह है कि अपने आपको जानो, अपने को समझो और अपने को सुधारो। ‘आत्मा वाऽरे श्रोतव्य: निदिध्यासितव्य:’ की उक्ति में यही उद्बोधन भरा पड़ा है। गीता कहती है - ‘अपना उद्धार आप करो’ अपने आप को गिराओ मत। ‘उद्धरेत् आत्मनात्मानं नात्मानं अवसादयेत्’ की सूक्ति में यही ब्रह्मïवाक्य गूँजता है। मित्रों को ढूँढऩे और शत्रुओं को भगाने के लिए अन्यत्र कहीं जाने की आवश्यकता नहीं है, वे अपने ही भीतर डेरा डाले बैठे हैं- ‘आत्मैव आत्मना बन्धु: आत्मैव रिपुरात्मन:’ का गीता कथन अक्षरश: सत्य है। अपने पौरुष- पुरुषार्थ से अपनी विवेकशीलता और दूरदर्शिता से ही प्रगति के द्वार खुलते हैं। अपनी ही अकर्मण्यता, अदूरदर्शिता और अनास्था ही हमें ले डूबती है। अपने उत्थान-परिष्कार की तथा पतन-पराभव की कुंजियाँ अपने ही हाथों में हैं, दोनों में से चाहे जिसका द्वार स्वेच्छापूर्वक खोला जा सकता है। यह तथ्य समझ में आ सके, तो प्रतीत होगा कि अपना आपा ही कल्पवृक्ष है, जिसकी जिस कामना से उपासना की जाय, उसी के अनुरूप वरदान मिलते चले जाएँगे। अन्य किसी देवता की उपासना भले ही निष्फल चली जाए, पर जीवन- देवता की, आत्म-निर्माण साधना निश्चित रूप से अभीष्ट सिद्धि देकर ही रहती है।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी प्रगति उत्कृष्टता की दिशा में हो (भाग 3)

🔷 जीवन-निर्माता धर्म का आधार है सत्य और ईमानदारी। मनुष्य जो कुछ कहे, करे और सोचे उसका आधार सत्य ही होना चाहिये। जिसने आत्म-निर्माण के लिये धनाढ्यता को आदर्श बनाया है उसे चाहिये कि वह धन के लिये जिस व्यवसाय को अपनाता है उसमें पूरी तरह ईमानदार रहे। यदि दुकानदारी करता है तो पूरा तोले, उचित मूल्य ले। खरा माल दे, ठीक पैसे बतलाये। वस्तु, मूल्य तथा उसके गुण बतलाते समय सच बोले। जिस कीमत में किसी एक ग्राहक को वस्तु दे उसी कीमत में दूसरे को। मुनाफा कमाने के लिये वस्तुएं छिपाकर न रखे। होते हुए किसी से इनकार न करे। आबाल वृद्ध सभी के साथ उसकी इसी प्रकार की एक जैसी ही नीति रहनी चाहिए। किसी अनजान, अबोध अथवा निर्बल से चीज होते हुए भी इनकार कर देना अथवा ज्यादा दाम लेकर देना और किसी जानकार, बुद्धिमान अथवा बलवान व्यक्ति को अलभ्य वस्तुएं भी ठीक दामों पर दे देना, व्यापार जैसे पवित्र काम में एक बड़ा कलंक है।

🔶 व्यापारियों और कारखानेदारों को चाहिए कि वे खरा माल बेचे-बनायें, नकली अथवा निकृष्ट माल बाजार में न भेजें, अधिक मुनाफाखोरी से बचें। लागत के अनुसार कीमत लें। मजदूरों तथा कर्मचारियों को उचित पारिश्रमिक दें। शोषण, मुनाफाखोरी और कालाबाज़ारी की नीति से बचें। इन सब आदर्शों के साथ धनाढ्यता का लक्ष्य पाने वाले ही उस दिशा में अपने निर्माता माने जाएंगे।

🔷 जिसका लक्ष्य एक अच्छा श्रमिक बनना हो वह किसी भी काम को पूरे तन-मन के साथ पूरे समय भर करे। पारिश्रमिक की मात्रा के अनुसार अपने श्रम की मात्रा घटाने-बढ़ाने के बजाय हर स्थिति में पूरी ईमानदारी बरतें अर्थात् पारिश्रमिक भले ही कम हो लेकिन अपने श्रमदान की मात्रा पूरी रखें। कर्मचारियों को चाहिए कि वे अपने कर्तव्य और उत्तरदायित्व का निर्वाह पूरी ईमानदारी के साथ करें। उनके काम पर आने का जो नियत समय हो, अकारण ही उससे देर न करें। पूरे समय पर एकनिष्ठ भाव से काम करें। समय पूरा होने से पहले काम न छोड़ें। कामचोरी, रहस्योद्घाटन, चुगली, पिशुनता आदि से बचे रहें। इस प्रकार अपने साधारण कामों में भी पूरी ईमानदारी और सत्य का निर्वाह करके आत्म-निर्माण किया जा सकता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- अक्टूबर 1970 पृष्ठ 17
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1970/October/v1.17

http://literature.awgp.org/book/sukh_shanti_ki_sadhana_/v1.11

👉 Amrit Chintan 20 Jan 2018

🔷 To achieve success in all the sections of Yug Nirman Yojna. I need talented people as volunteers. We will find talents from every field of their actions. Because this is the time when talents must engage themselves for a new creation of humanity is this world.

🔶 If our children learn the object of life from the very beginning, they will be able to control the impronts of bad habits, which spolk the entire life. Imprints of previous lives and the social atmosphere which effect our haracters and makes us more selfish and materialistic in life. But if object of life is always in front of you, you will be on righteous path.

🔷 All rituals of worship, sadhana, Contemplation, yog exercises are to develop “Shraddha” i.e. love for ideality life. Shraddha is based on your true sincerity. Love and service to all who are needy. In the script of ‘Ramayan’ written by Goswami Tulsidas ji Shraddha and Vishwas(Firm believe) is compressed with Lord Shiva and Mata Parvati. So the object of life is ideality and all other rituals are stepping stones to achieve ‘Shraddha’.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 गायत्री परिवार का उद्देश्य — पीड़ा और पतन का निवारण (भाग 3)

🔷 अच्छा बेटे, यह बता कि कुछ काम भी करेगा या नहीं करेगा? माता जी! काम पर तो नहीं जाऊँगा। तो फिर क्या करेगा? बस यहीं पर आपका सत्संग सुनूँगा और आपकी रोटी खाया करूँगा। रोटी से पेट भर जायेगा, तो भी खाऊँगा और खाता रहूँगा। बेटे, तब तो तेरा पेट फट जायेगा और तू बीमार हो जायेगा। नहीं साहब! सत्संग किया करूँगा और बाबा जी के यहाँ रहा करूँगा और रामायण पढ़ा करूँगा और भागवत् पढ़ा करूँगा। बेटे, तूने भागवत् पढ़ ली और सुन ली, दवा भी खाली और इंजेक्शन भी ले लिया। अब तू काम करने के लिए चल। नहीं साहब! हम तो काम नहीं करेंगे। जिन्दगी भर स्कूल में पढ़ा करेंगे। बेटे, पढ़ने के बाद नौकरी करेगा या नहीं? महाराज जी! नौकरी तो नहीं करूँगा, खेती तो नहीं करूँगा। मैं तो स्कूल में पाँचवें दर्जे में भर्ती हो गया हूँ और जब तक मेरी नौकरी नहीं लग जायेगी, मैं रोजाना रामायण और महाभारत पढ़ा करूँगा। क्यों पढ़ेगा? पढ़ने की वजह क्या है?

🔶 मित्रो! सत्संग की कोई वजह भी तो होनी चाहिए। आप किसके लिए सत्संग करेंगे। नहीं साहब! सत्संग करूँगा। बेटे, तू बता तो सही कि सत्संग क्यों करेगा? नहीं साहब! मैं तो सत्संग करूँगा? बेटे, तू पागल आदमी नहीं है, जिसे यह पता ही नहीं है कि सत्संग क्यों किया जाता है। मित्रो! सत्संग करने का उद्देश्य मनुष्यों के अंदर जीवट पैदा करना होता है। सत्संग का उद्देश्य मनुष्यों के अंदर क्रियाशीलता उत्पन्न करना होता है। क्रियाशीलता अगर हमारे अंदर उत्पन्न हो गयी है, भावना हमारे अंदर उत्पन्न हो गयी है, तो भावना को कार्यक्षेत्र में चलना चाहिए और कार्यक्षेत्र में उसका समावेश होना चाहिए। अगर हमने ऐसा करना शुरू नहीं किया और ऐसा करना हमारे लिए संभव नहीं हुआ, तो बहुत भारी मुश्किल हो जायेगी और बहुत दिक्कत खड़ी हो जायेगी, बड़ी कठिनाई पैदा हो जायेगी।

🔷 मित्रो! आपको जो सत्संग दिया गया, जो शिक्षण दिया गया है, उस सत्संग और प्रशिक्षण का उद्देश्य एक होना चाहिए। और वह उद्देश्य यह होना चाहिए कि हमारे दिये हुए विचार और हमारे दिये हुए क्रियाकलाप किसी कार्यक्षेत्र में परिणत हो सकें। भगवान बुद्ध ने यही किया। अपने पास लोगों को थोड़े समय तक रखने के पश्चात् सबको कार्यक्षेत्र के लिए भेज दिया। आप लोगों को जो क्रियाकलाप बताये गये हैं और जो सत्संग सुनाये गये हैं, उसमें जो आपको सीखना है, वह इसलिए सीखना है कि संसार में जहाँ कहीं भी आपको पतन मालूम पड़े, जहाँ कहीं भी आपको असुविधा मालूम पड़े, जहाँ कहीं भी आपको पीड़ा मालूम पड़े, उस पीड़ा के स्थान पर और पतन के स्थान पर आपको चले जाना चाहिए। भगवान बुद्ध ने यही किया था।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 21)

👉 समर्पण-विसर्जन-विलय

🔷 गुरुगीता के महामंत्रों में साधना जीवन का परम सत्य निहित है। इनमें वह परम रहस्य सँजोया है, जिसके आचरण का स्पर्श पारसमणि की भाँति है। जो छूने भर से साधक के अनगढ़ जीवन और कुसंस्कारों को आमूल-चूल बदल देता है। गुरुकृपा से मानवीय कमियाँ-कमजोरियाँ ईश्वरीय विभूतियों व उपलब्धियों में बदल जाती हैं। गुरु निष्ठा से क्या नहीं हो सकता? इस प्रश्न चिह्न का एक ही उत्तर है सब कुछ सम्भव है-सब कुछ सम्भव है। इसलिए हानि में-लाभ में, यश में-अपयश में, जीवन में-मरण में, किसी भी स्थिति में सद्गुरु का आश्रय नहीं छोड़ना चाहिए; क्योंकि परम कृपालु सद्गुरु का प्रत्येक अनुदान उनकी कृपा ही है। ये अनुदान सुख भरे हों या फिर दुःख से सने हों, साधक के साधनामय जीवन के लिए कल्याणकारी ही हैं। परम रहस्य सद्गुरु की कृपा भी बड़ी ही रहस्यमय होती है। इसका बौद्धिक विवेचन किसी भी तरह सम्भव नहीं। इसे तो बस सजल भावनाओं में ग्रहण किया जा सकता है।
  
🔶 गुरु गीता के उपर्युक्त मंत्रों में इसके धारण-ग्रहण की कतिपय विधियों का उल्लेख किया गया है। गुरुदेव की छवि का स्मरण, उनके नाम का जप, जीवन की विपरीतताओं में भी गुरुवर की आज्ञा का निष्ठापूर्वक पालन साधक को गुुरुकृपा का सहज अधिकारी बनाता है। गुरु के मुख में तो ब्रह्म का वास है, वे जो भी बोलें—वह शिष्य के लिए ब्रह्मवाक्य  है। गुरुकृपा ही साधक को ब्रह्मानुभूति का वरदान देती है। परम पतिव्रता स्त्री जिस तरह से हमेशा ही अपने पति का ध्यान करती है, ठीक उसी तरह से साधक को अपने गुरु का ध्यान करना चाहिए। यह ध्यान इतना प्रगाढ़ हो कि उसे अपना आश्रय, जाति, कुल, गोत्र सभी कुछ भूल जाए। गुरु के अलावा कोई अन्य भावना उसे न भाये।
  
इस भक्ति कथा में नई कड़ी जोड़ते हुए भगवान् महादेव माता पार्वती को समझाते हैं-

अनन्यश्चिन्तयन्तो मां सुलभं परमं पदम्। तस्मात् सर्वप्रयत्नेन गुरोराराधनं कुरु॥ २१॥
त्रैलोक्ये स्फुटवक्तारो देवाद्यसुरपन्नगाः। गुरुवक्त्रस्थिता विद्या गुरुभक्त्या तु लभ्यते॥ २२॥
गुकारस्त्वन्धकारश्च रुकारस्तेज उच्यते। अज्ञानग्रासकं ब्रह्म गुरुरेव न संशयः॥ २३॥
गुकारः प्रथमो वर्णो मायादिगुणभासकः। रुकारो द्वितीयो ब्रह्म मायाभ्रान्ति विनाशनम्॥ २४॥
एवं गुरुपदं श्रेष्ठं देवानामपि दुर्लभं। हाहाहूहू गणैश्चैव गन्धर्वैश्च प्रपूज्यते॥ २५॥
  
🔶 शिष्य को यह तथ्य भलीभाँति आत्मसात् कर लेना चाहिए कि सद्गुरु का अनन्य चिंतन मेरा ही (भगवान् सदाशिव) चिंतन है। इससे परमपद की प्राप्ति सहज, सुलभ होती है। इसलिए कल्याण कामी साधक को प्रयत्नपूर्वक  गुरु आराधना करनी चाहिए॥ २१॥ तीनों लोकों के देव-असुर एवं नाग आदि सभी इस सत्य को बड़ी स्पष्ट रीति से बताते हैं कि ब्रह्मविद्या गुरुमुख में ही स्थित है। गुरुभक्ति से ही इसे प्राप्त किया जा सकता है॥ २२॥ ‘गुरु’ शब्द में ‘गु’ अक्षर अन्धकार का वाचक है और ‘रु’ का अर्थ है  प्रकाश। इस तरह गुरु ही अज्ञान का नाश करने वाले ब्रह्म है। इसमें तनिक भी संशय नहीं है॥ २३॥ शास्त्र वचनों से यह प्रमाणित होता है कि ‘गुरु’ शब्द के प्रथम वर्ण ‘गु’ से माया आदि गुण प्रकट होते हैं और इसके द्वितीय वर्ण ‘रु’ से ब्रह्म प्रकाशित होता है। जो माया की भ्रान्ति को विनष्ट करता है॥ २४॥ इसलिए गुरुपद सर्वश्रेष्ठ है, यह देवों के लिए भी दुर्लभ है। हाहाहूहू गण और गन्धर्व आदि भी इसकी पूजा करते हैं॥ २५॥

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 37

गुरुवार, 18 जनवरी 2018

👉 अपनापन

🔶 कॉलबेल की आवाज़ सुनकर जैसे ही सुबह सुबह शांतनु ने दरवाजा खोला सामने एक पुराना से ब्रीफकेस लिए गांव के मास्टर जी और उनकी बीमार पत्नी खड़ी थीं। मास्टर जी ने चेहरे के हाव भाव से पता लगा लिया कि उन्हें सामने देख शांतनु को जरा भी खुशी का अहसास न हुआ है। जबरदस्ती चेहरे पर मुस्कुराहट लाने की कोशिश करते हुए बोला "अरे सर आप दोनों बिना कुछ बताए अचानक से चले आये!अंदर आइये।"

🔷 मास्टर साहब ब्रीफकेस उठाये अंदर आते हुए बोले" हाँ बेटा, अचानक से ही आना पड़ा मास्टरनी साहब बीमार हैं पिछले कुछ दिनों से तेज फीवर उतर ही नहीं रहा, काफी कमजोर भी हो गई है। गाँव के डॉक्टर ने AIIMS दिल्ली में अविलंब दिखाने की सलाह दी। अगर तुम आज आफिस से छुट्टी लेकर जरा वहाँ नंबर लगाने में मदद कर सको तो..."

🔶 "नहीं नहीं, छुट्टी तो आफिस से मिलना असंभव सा है "बात काटते हुए शांतनु ने कहा। थोड़ी देर में प्रिया ने भी अनमने ढंग से से दो कप चाय और कुछ बिस्किट उन दोनों बुजुर्गों के सामने टेबल पर रख दिये। सान्या सोकर उठी तो मास्टर जी और उनकी पत्नी को देखकर खूब खुशी से चहकते हुए "दादू दादी"बोलकर उनसे लिपट गयी दरअसल छः महीने पहले जब शांतनु एक सप्ताह के लिए गाँव गया था तो सान्या ज्यादातर मास्टर जी के घर पर ही खेला करती थी। मास्टर जी निःसंतान थे और उनका छोटा सा घर शांतनु के गाँव वाले घर से बिल्कुल सटा था। बूढ़े मास्टर साहब खूब सान्या के साथ खेलते और मास्टरनी साहिबा बूढ़ी होने के बाबजूद दिन भर कुछ न कुछ बनाकर सान्या को खिलातीं रहतीं थीं। बच्चे के साथ वो दोनों भी बच्चे बन गए थे।

🔷 गाँव से दिल्ली वापस लौटते वक्त सान्या खूब रोई उसके अपने दादा दादी तो थे नहीं मास्टर जी और मास्टरनी जी में ही सान्या दादा दादी देखती थी। जाते वक्त शांतनु ने घर का पता देते हुए कहा कि "कभी भी दिल्ली आएं तो हमारे घर जरूर आएं बहुत अच्छा लगेगा।" दोनों बुजुर्गों की आँखों से सान्या को जाते देख आँसू गिर रहे थे और जी भर भर आशीर्वाद दे रहे थे।

🔶 कुल्ला करने जैसे ही मास्टर जी बेसिन के पास आये प्रिया की आवाज़ सुनाई दी "क्या जरूरत थी तुम्हें इनको अपना पता देने की दोपहर को मेरी सहेलियाँ आती हैं उन्हें क्या जबाब दूँगी और सान्या को अंदर ले आओ कहीं बीमार बुढ़िया मास्टरनी की गोद मे बीमार न पड़ जाए"

🔷 शांतनु ने कहा "मुझे क्या पता था कि सच में आ जाएँगे रुको किसी तरह इन्हें यहाँ से टरकाता हूँ"

🔶 दोनों बुजर्ग यात्रा से थके हारे और भूखे आये थे सोचा था बड़े इत्मीनान से शांतनु के घर चलकर सबके साथ आराम से नाश्ता करेंगे। इस कारण उन्होंने कुछ खाया पिया भी न था। आखिर बचपन में कितनी बार शांतनु ने भी तो हमारे घर खाना खाया है। उन्होंने जैसे अधिकार से उसे उसकी पसंद के घी के आलू पराठे खिलाते थे इतना बड़ा आदमी बन जाने के बाद भी शांतनु उन्हें वैसे ही पराठे खिलायेगा।

🔷 " सान्या!!" मम्मी की तेज आवाज सुनकर डरते हुए सान्या अंदर कमरे में चली गयी। थोड़ी देर बाद जैसे ही शांतनु हॉल में उनसे मिलने आया तो देखा चाय बिस्कुट वैसे ही पड़े हैं और वो दोनों जा चुके हैं।

🔶 पहली बार दिल्ली आए दोनों बुजुर्ग किसी तरह टैक्सी से AIIMS पहुँचे और भारी भीड़ के बीच थोड़ा सुस्ताने एक जगह जमीन पर बैठ गए। तभी उनके पास एक काला सा आदमी आया और उनके गाँव का नाम बताते हुए पूछा" आप मास्टर जी और मास्टरनी जी हैं ना। मुझे नहीं पहचाना मैं कल्लू। आपने मुझे पढ़ाया है।"

🔷 मास्टर जी को याद आया "ये बटेसर हरिजन का लड़का कल्लू है बटेसर नाली और मैला साफ करने का काम करता था। कल्लू को हरिजन होने के कारण स्कूल में आने पर गांववालो को ऐतराज था इसलिए मास्टर साहब शाम में एक घंटे कल्लू को चुपचाप उसके घर पढ़ा आया करते थे।"

🔶 " मैं इस अस्पताल में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी हूँ। साफ सफाई से लेकर पोस्टमार्टम रूम की सारी जिम्मेवारी मेरी है।"

🔷 फिर तुरंत उनका ब्रीफकेस सर पर उठाकर अपने एक रूम वाले छोटे से क्वार्टर में ले गया। रास्ते में अपने साथ काम करने वाले लोगों को खुशी खुशी बता रहा था मेरे रिश्तेदार आये हैं मैं इन्हें घर पहुँचाकर अभी आता हूँ घर पहुँचते ही पत्नी को सारी बात बताई पत्नी ने भी खुशी खुशी तुरंत दोनों के पैर छुए फिर सब मिलकर एक साथ गर्मा गर्म नाश्ता किए। फिर कल्लू की छोटी सी बेटी उन बुजुर्गों के साथ खेलने लगी।

🔶 कल्लू बोला "आपलोग आराम करें आज मैं जो कुछ भी हूँ आपकी बदौलत ही हूँ फिर कल्लू अस्पताल में नंबर लगा आया। "कल्लू की माँ नहीं थी बचपन से ही।

🔷 मास्टरनी साहब का नंबर आते ही कल्लू हाथ जोड़कर डॉक्टर से बोला "जरा अच्छे से इनका इलाज़ करना डॉक्टर साहब ये मेरी बूढ़ी माई है "सुनकर बूढ़ी माँ ने आशीर्वाद की झड़ियां लगाते हुए अपने काँपते हाथ कल्लू के सर पर रख दिए। वो बांझ औरत आज सचमुच माँ बन गयी थी उसे आज बेटा मिल गया था और उस बिन माँ के कल्लू को भी माँ मिल गयी थी....

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 19 Jan 2018


👉 आज का सद्चिंतन 19 Jan 2018


👉 कुसंगत में मत बैठो!

🔶 पानी जैसी जमीन पर बहता है, उसका गुण वैसा ही बदल जाता है। मनुष्य का स्वभाव भी अच्छे बुरे लोगों के अनुसार बदल जाता है। इसलिए चतुर मनुष्य बुरे लोगों का साथ करने से डरते हैं, लेकिन अच्छे व्यक्ति बुरे आदमियों के साथ घुल−मिल जाते हैं और अपने को भी वैसा ही बना लेते हैं। मनुष्य की बुद्धि तो मस्तिष्क में रहती है, परन्तु कीर्ति उस स्थान पर निर्भर रहती है जहाँ वह उठता बैठता है। आदमी का घर चाहे कहीं भी हो, पर असल में उसका निवास स्थान वह है जहाँ वह उठता बैठता है और जिन लोगों की सोहबत पसन्द करता है। आत्मा की पवित्रता मनुष्य के कार्यों पर निर्भर है और उसके कार्य संगति के ऊपर निर्भर है। बुरे लोगों के साथ रहने वाला अच्छे काम करे यह बहुत कठिन है। धर्म से स्वर्ग की प्राप्ति होती है, लेकिन धर्माचरण करने की बुद्धि सत्संग से ही उत्पन्न होती है। याद रखो कुसंग से बढ़कर कोई हानि नहीं और सत्संगति से बढ़ कर कोई लाभ नहीं।  

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- दिसम्बर 1942 पृष्ठ 1

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1942/December/v1.1

👉 अपने अन्दर के भगवान् को जगाइये

🔶 संसार के छोटे कहे जाने वाले प्राणी एक निश्चित प्रकृति लेकर जन्मते हैं और प्राय: अंत तक उसी स्थिति में बने रहते हैं। इतना स्वार्थी मनुष्य ही था, जिसे अपने साधनों से तृप्ति नहीं हुई और उसने दूसरों के स्वत्व का अपहरण करना प्रारंभ किया। न्यायाधीश बनकर आया था; पर स्वयं अन्याय करने लगा। ऐसी स्थिति में परमात्मा के अनुदान भला उसका कब तक साथ देते; क्योंकि परमात्मा ने ही आत्मा को आच्छादित कर रखा है। आत्मा मेें जो भी शक्ति और प्रकाश है, वह सब परमात्मा का ही स्वरूप है। परमात्मा आत्मा से विलग कहाँ?
  
🔷 सम्पूर्ण देव शक्तियाँ इसमें समायी हुई हैं। जब अग्रि देव जाग्रत् होते हैं, तो भूख लगती है, वरुण देवता को जल की जरूरत पड़ती है। किसी को निद्रा की, तो किसी को जागृति की। सबकी अपनी दिशा-अपना काम है।
  
🔶 इनमें पारस्परिक प्रतिद्वन्द्विता न होती रहे और उनका नियंत्रण बराबर किया जाता रहे। इस दृष्टि से एक जबरदस्त नियामक सत्ता की आवश्यकता जान पड़ी, तो परमात्मा स्वयं उसमें आत्मा के रूप में समा गया। इस तरह इस अद्ïभुत मनुष्य जीवन का प्रादुर्भाव इस सृष्टि में हुआ। तब से लेकर आज तक मनुष्य निरन्तर एक प्रयोग के रूप में चलता आ रहा है। कभी वह गलती करता है, तो उस अपराध के बदले सजा मिलती है और यदि वह अधिक कर्तव्यशील होता है, तो उसे अधिक बड़े ईनाम और अधिकार दिये जाते हैं। गलती का परिणाम दु:ख और भलाई का परिणाम सुख। सुख और दु:ख का यह अंतद्र्वन्द्व आदिकाल से चलता आ रहा है।
  
🔷 जब मनुष्य के अन्तर का असुर-भाग बलवान हो जाता है, तो दु:खों में बढोत्तरी होती है। वर्तमान समय इस स्थिति की पराकाष्ठा है, यह कहें तो अतिशयोक्ति न होगी। मनुष्य का यह पतन देखकर विश्वास नहीं होता कि उसके अंदर परमात्मा जैसी महत्त्वपूर्ण शक्ति का विकास हो सकता है। दुर्बल मनुष्य में सर्वशक्तिमान् परमात्मा ओत-प्रोत हो सकता है, इसकी इन दिनों कल्पना भी नहीं की जा सकती।
  
🔶 मनुष्य की इस दयनीय दशा का एक ही कारण है और वह यह है कि उसने अपनी मनोभूमि इतनी गंदी बना ली है, जहां परमात्मा का प्रखर प्रकाश पहँुचना सम्भव नहीं है। यदि सचेत रहकर उसने अपनी भलाई की शक्ति को जीवन्त रखा होता, तो वह जिन साधनों को लेकर इस धरती पर आया था, वे अचूक ब्रह्म अस्त्र है। उनकी शक्ति वज्र से भी प्रबल सिद्ध होती है। सृष्टिï का अन्य कोई भी प्राणी उसका सामना करने में समर्थ नहीं हो सकता। वह युवराज बनकर आया था। विजय, सफलतायें, उत्तम सुख, शक्ति, शौर्य-साहस, निर्भयता उसे उत्तराधिकार में मिले थे। इनसे वह चिरकाल तक सुखी रह सकता था। भ्रम, चिन्ता, शंका, संदेह आदि का कोई स्थान उसके जीवन में नहीं, पर अभागे मनुष्य ने अपनी दुरवस्था अपने आप उत्पन्न की। अंत:करण की-ईश्वरीय सत्ता की उपेक्षा करने के कारण ही उसकी यह दु:खद स्थिति बनी। अपने पैरों में कुल्हाड़ी मारने का अपराधी मनुष्य स्वयं है, इसका दोष परमात्मा को नहीं।
  
🔷 ईश्वरीय गुणों से पथ-भ्रष्टï मनुष्य की जो दुर्दशा होनी चाहिए थी, वह हुई। दु:ख की खेती उसने स्वयं बोई और उसका फल भी उसे ही चखना पड़ा। परमात्मा हमारे अति समीप रहकर प्रेम का संदेश देता है, पर मनुष्य अपनी वासना से (कुबुद्धि से) उसे कुचल देता है। वह अपनी सादगी, ताजगी और प्राण शक्ति से हमें सदैव अनुप्राणित रखने का प्रयत्न करता है, पर मनुष्य आडम्बर, आलस्य और अकर्मण्यता के द्वारा उस शक्ति को छिन्न-भिन्न कर देता है। कालान्तर में जब आंतरिक प्रकाश की शक्ति क्षीण पड़ जाती है, तो दु:ख और द्वन्द्व के बखेड़े बढ़ जाते हैं। तब मनुष्य को औरों की भलाई करना तो दूर, अपना ही जीवन भार रूप हो जाता है। परमात्मा की अंत:करण से विस्मृति ही कष्टï और क्लेश के बंधन का कारण है।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी प्रगति उत्कृष्टता की दिशा में हो (भाग 2)

🔶 निर्माण निर्माण है। वह कैसा भी हो—आखिर वह निर्माण ही है—इस उक्ति को मान्यता नहीं दी जा सकती। यदि निकृष्ट निर्माण को भी मान्यता दी जाने लगेगी, तो संसार में उत्कृष्टता एवं श्रेष्ठता का कोई मूल्य, महत्व ही न रह जायेगा। निर्माण संज्ञा का वास्तविक अधिकारी उत्कृष्ट निर्माण ही हो सकता है, निकृष्ट निर्माण नहीं। अपने को धनवान् अथवा विद्वान् निर्माण करने में जिसने अयोग्य तथा अनुचित उपायों का प्रयोग किया है उसे यदि धनवान और विद्वान् मान लिया जायेगा तो फिर चोर, धूर्त अथवा ठग किसे कहा जाएगा और इस तथाकथित धनवान तथा विद्वान् में क्या अन्तर रह जायेगा। जिसने परिश्रम, पुरुषार्थ, अध्यवसाय एवं तपस्या के आधार पर अपना निर्माण किया है।

🔷 शिव और अशिव के दो विरोधी उपायों से अर्जित उपलब्धियों को समान श्रेय नहीं दिया जा सकता। यदि कोई ऐसा करता अथवा मानता है तो वह या तो अज्ञानी है अथवा अधम प्रकृति का व्यक्ति। उत्कृष्ट निर्माण ही निर्माण है और निकृष्ट निर्माण मिथ्या क्रियाकलाप। अस्तु, उचित यही है कि वह जिस क्षेत्र में अपना निर्माण करे तो उत्कृष्ट रीति से ही करे, नहीं तो कंचन के रूप में पापों की गठरी बांधने से कहीं अच्छा है कि वह निर्धन और गरीब बना रहे।

🔶 उत्कृष्ट निर्माण का आधार धर्म है। धर्म का अर्थ अधिकतर लोग पूजा-पाठ, जप, उपासना, कीर्तन, भक्ति आदि ही मानते हैं। इसीलिये जीवन के अन्य कार्यक्रमों के साथ एक छोटा-सा धार्मिक कार्यक्रम और जोड़कर समझते हैं कि दुनियादारी के साथ-साथ धर्म का भी निर्वाह करते हैं। पूजा-पाठ आदिक कार्यक्रम को धर्म मानने वाले यह नहीं समझ पाते कि संसार का हर काम का एक धर्म होता है। उसके कुछ आदर्श और नियम होते हैं। पूजा-पाठ के कार्यक्रम के साथ जीवन क्रम के हर काम के आदर्श और नियम निर्वाह करने वाले को ही सच्चा धार्मिक कहा जा सकता है।

🔷 केवल मात्र पूजा-पाठ, जप-तप तक ही सीमित रहकर यदि कोई चाहे कि वह अपना उत्कृष्ट निर्माण कर लेगा, तो उसे निराश ही रहना होगा। उत्कृष्ट निर्माण तभी सम्भव होगा जब जीवन की प्रत्येक गतिविधि का धर्म-निर्वाह किया जायेगा। कोई पूजा-पाठ तो करता रहे, साथ ही कार-रोजगार, आचार-व्यवहार में असत्य, मिथ्या और बेईमान बना रहे तो उसका निर्माण निकृष्ट कोटि का ही हो सकेगा। जीवन क्रम में पग-पग पर ईमानदार, सत्यपरायण और आदर्शवान बने रहने पर यदि कोई पूजा-पाठ वाले धर्म के लिये समय नहीं दे पाता तो भी उसका निर्माण उत्कृष्ट ही होगा। उस छोटी-सी कमी के कारण उसकी जीवन तपस्या असफल नहीं हो सकती।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- अक्टूबर 1970 पृष्ठ 16
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1970/October/v1.16

http://literature.awgp.org/book/sukh_shanti_ki_sadhana_/v1.11

👉 Amrit Chintan 19 Jan

🔷 What is known as illusion a Maya in our scripts of ancient time is nothing but it is human shortsightedness weaknesses and ignorances in life. We put blame to God or luck that everything is God planned no. is not so. Our weaknesses must be overpowered your own self control and hard sincere work. If we will not control our-self we will ruin our life.

🔶 Body and mind are one for the life mind controls body. The whole life of a man is governed by the nature of mind he has. It is all his thinking which is translated in action. This is the reason that any evil in our thinking will also affect body.

🔷 It is Brahmvarchas Sadhana – that is self-restraint and self-discipline, which will to solve our worldly problems and to develop the self, but for that continuous practice and devotion to realize that effect.

🔶 There are some basic concepts to have a cheerful life. They are so simple that you don’t need any training in any institute. You need not to find any Guru in the caves. The difference between the people of good and bad nature can always be seen easily the handsome look of a boy or a beauty of a girl is not by color of skin or so but happiness and good character radiates the beauty.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 गायत्री परिवार का उद्देश्य — पीड़ा और पतन का निवारण (भाग 2)

🔷 मित्रो! जंगली लोगों के लिए शिक्षा की आवश्यकता थी, त्याग की आवश्यकता थी और न जाने किस-किस चीज की आवश्यकता थीं। बहुत सारी चीजों की आवश्यकता थी। उन आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए सुयोग्य व्यक्ति वहाँ चले गये। हिन्दुस्तान में उन दिनों शिक्षा की बहुत सुविधाएँ थीं, बहुत श्रम था, बहुत सारे ऋषि थे। गंगा, जमुना में बहुत निर्मल जल था। यहाँ साधनों की कमी नहीं थी। जहाँ साधन हैं, वहीं पर संत को रोककर रखा जाय, यह भी कोई तुक है? जहाँ पर साधन हैं, सुविधा है, वहाँ किनको रहना चाहिए? बीमारों को रहना चाहिए, बुजुर्गों को रहना चाहिए। वहाँ थके हुए लोगों को रहना चाहिए। शान्तिकुंज में हमें उन्हीं लोगों को रखना चाहिए, काली कमली वाले के यहाँ उन्हीं लोगों को रखना चाहिए, जो थक गये हों, जो टूट गये हों, मरे-मराये से हों, जिनके शरीरों में अब दम नहीं रहा और उनके मन में कोई उत्साह नहीं रहा। उत्साह जिनका खत्म हो गया, आँखों का प्रकाश जिनका खत्म हो गया, जीवट जिनका खत्म हो गया। अब हम उनको कहाँ रखें? अब हम उनको काली कमली वाले बाबा की झोपड़ी में रखेंगे। बस वह वहीं बैठा रहा करेगा। टट्टी-पेशाब कर आया करेगा। कुल्ला कर लिया करेगा, मुँह धो लिया करेगा। गंगा जी नहा लिया करेगा और शांतिपूर्वक रहा करेगा।

🔶 मित्रो! हम उनको वहीं रखेंगे, क्योंकि वे और आगे चल नहीं सकते। अब उनकी जिन्दगी खत्म हो गयी। अब उनका जीवन खत्म हो गया। अब उनका जोश खत्म हो गया। अब उनकी भावनायें खत्म हो गयीं। अब जिनकी भावनायें खत्म हो गयी हैं, जो थक गये हैं, जो टूट गये हैं, जो मर गये हैं, उनको अब हम कहाँ से भेज सकते हैं? उनको अब हम श्मशान भूमि की तैयारी के लिए उचित स्थान पर रखेंगे। डेड बॉडी को पोस्टमार्टम करने के बाद बड़े अस्पतालों में, मुर्दाघरों में रख देते हैं, ताकि उनके खानदान वाले आयें और लाश को उठाकर ले जा सकें। फिर उसको मरघट में ले जाकर या उसको कब्रिस्तान में ले जाकर दफन कर दें। ऐसे लोगों को हम कहाँ रखेंगे, जिनका जीवट खत्म हो गया है, जो भुस्स गये हैं। इन्हें तो बस काली कमली वाले बाबाजी के आश्रम में रखेंगे, स्वर्गाश्रम में रखेंगे और उनको हम परमार्थ आश्रम में रखेंगे। क्यों? क्योंकि वे कुछ काम नहीं कर सकते, चल नहीं सकते। उनके भीतर चलने वाली वस्तु नहीं है, माद्दा नहीं है और उनके अंदर क्रियाशीलता जैसी कोई वस्तु नहीं है। और जीवट जैसी वस्तु नहीं हैं। आप ही बताइये? उनको हम कहाँ रख सकते हैं।

🔷 इसलिए मित्रो! उन लोगों के लिए कोई स्थान विशेष में निवास करने के लिए कोई गुंजाइश नहीं है। लेकिन जिनके अंदर जीवट है, जिनके अंदर जीवन है, जिनके अंदर प्रकाश है, जिनके अंदर प्रेरणा विद्यमान है, उनको हम कार्यक्षेत्र में भेजेंगे। अब उनको कार्यक्षेत्र में भेजे बिना काम बनेगा नहीं। भगवान बुद्ध ने यही किया था। प्रत्येक जीवन्त व्यक्ति को, जिसके अंदर आध्यात्मिकता का थोड़ा-बहुत प्रकाश मौजूद था, उन्होंने उनको अपने विहारों में रखा ही नहीं। उन्होंने कहा कि हम आपके विहार में रहेंगे और आपका सत्संग करेंगे। भगवान बुद्ध ने कहा कि बहुत लम्बे समय तक सत्संग करना आवश्यक नहीं है। बहुत लम्बे समय तक दवाइयाँ खाना आवश्यक नहीं है। व्यायाम करना आवश्यक है, पर सारे समय रोटी खाना आवश्यक नहीं है। उन्होंने कहा कि गुरुजी! हम तो आपके पास रहा करेंगे और रोटी खाया करेंगे। माता जी आप बनाती जायँ और हम खाते जायँ। बेटे, कितने दिन खायेगा? माता जी आपका चौका सबेरे छः बजे से चलता है, उस वक्त से खाया करूँगा। कब तक खायेगा? तब तक खाऊँगा, जब तक रात के दस बजे तब बंद नहीं हो जाता।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 20)

👉 स्वयं से कहो-शिष्योऽहम्
🔷 सद्गुरु के मुख में ब्रह्म का वास होता है। उनकी वाणी ब्रह्म वाणी है। उनके द्वारा बोले गए वचन ब्रह्म वाक्य हैं। महान् दार्शनिक योगी भगवान् शंकराचार्य ने कहा है- मंत्र वही नहीं है, जो वेद और तन्त्र ग्रन्थों में लिखे हैं। मंत्र वे भी हैं, जिन्हें गुरु कहते हैं। सद्गुरु के वचन महामंत्र हैं। इनके अनुसार साधना करने वाला जीवन के परम लक्ष्य को पाए बिना नहीं रहता। पतिव्रता स्त्री की भाँति मन, वाणी और कर्म की सम्पूर्ण निष्ठा को नियोजित करके गुरुदेव भगवान् का ध्यान करना चाहिए। भावना हो या चिन्तन अथवा फिर क्रिया, सभी कुछ सम्मिलित रूप से एक ही दिशा में- सद्गुरु के चरणों की ओर प्रवाहित होना चाहिए।

🔶 ध्यान रहे इस महासाधना में अपना कोई बड़प्पन आड़े न आए। अपना कोई क्षुद्र स्वार्थ इसमें बाधा न  बने। श्री रामकृष्णदेव कभी-कभी हँसते हुए अपने भक्तों से कहते थे- कुछ ऐसे हैं, जिनके मन में तो भगवान् के प्रति और गुरु के प्रति भक्ति है; परन्तु उन्हें लाज लगती है, शरम आती है कि लोग क्या कहेंगे? आश्रम एवं कुल की झूठी मर्यादा, अपनी जाति का अभिमान, यश-प्रतिष्ठा का लोभ उन्हें गुरु की सेवा करने में बाधा बनता है। परमहंस देव जब यह कह रहे थे, तो उनके एक भक्त शिष्य मास्टर महाशय ने पूछा, तो फिर मार्ग क्या है? परमहंस देव ने कहा—इन सबको छोड़ दो, त्यागो इन्हें, तिनके की तरह। सद्गुरु की आज्ञापालन में जो भी बाधाएँ सामने आएँ, उनका सामना करने में कभी कोई संकोच नहीं करना चाहिए।

🔷 स्वामी विवेकानन्द महाराज कहा करते थे- तुम अपने से पूछो- कोऽहम्? मैं कौन हूँ? देखो तुम्हें क्या उत्तर मिलता है। हो सकता है तुम्हें उत्तर मिले मैं पुत्र हूँ, पिता हूँ, पति हूँ अथवा पत्नी हूँ, माँ हूँ, पुत्री हूँ। ऐसे उत्तर मिलने पर और गहराई में उतरो- गुरुचरणों में और ज्यादा नेह बढ़ाओ। फिर तुम्हें एक और सिर्फ एक उत्तर मिलेगा- ‘शिष्योऽहम्’ मैं शिष्य हूँ। सारे रिश्ते-नाते इस एक सम्बन्ध में विलीन हो जाएँगे। ध्यान रहे जो शिष्य है, वही साधक हो सकता है। उसी में जीवन की समस्त सम्भावनाएँ साकार हो सकती हैं और जो सच्चा शिष्य है- उसके सभी कर्त्तव्य अपने गुरु के लिए हैं। ऐसे कर्त्तव्यनिष्ठ शिष्य को सद्गुरु कृपा किस रूप में फलती है, इसका बोध भगवान् भोलेनाथ ने गुरुगीता के अगले मंत्रों में कराया है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 36

👉 भाग्य और कर्म

🔶 एक बार देवर्षि नारद जी वैकुंठधाम गए, वहां उन्होंने भगवान विष्णु का नमन किया। नारद जी ने श्रीहरि से कहा,
'प्रभु! पृथ्वी पर अब आपका प्रभाव कम हो रहा है। धर्म पर चलने वालों को कोई अच्छा फल नहीं मिल रहा, जो पाप कर रहे हैं उनका भला हो रहा है।'

🔷 तब श्रीहरि ने कहा, 'ऐसा नहीं है देवर्षि, जो भी हो रहा है सब नियति के जरिए हो रहा है।'

🔶 नारद बोले, मैं तो देखकर आ रहा हूं, पापियों को अच्छा फल मिल रहा है और भला करने वाले, धर्म के रास्ते पर चलने वाले लोगों को बुरा फल मिल रहा है।

🔷 भगवान ने कहा, कोई ऐसी घटना बताओ। नारद ने कहा अभी मैं एक जंगल से आ रहा हूं, वहां एक गाय दलदल में फंसी हुई थी। कोई उसे बचाने वाला नहीं था।
तभी एक चोर उधर से गुजरा, गाय को फंसा हुआ देखकर भी नहीं रुका, वह उस पर पैर रखकर दलदल लांघकर निकल गया। आगे जाकर चोर को सोने की मोहरों से भरी एक थैली मिली।

🔶 थोड़ी देर बाद वहां से एक वृद्ध साधु गुजरा। उसने उस गाय को बचाने की पूरी कोशिश की। पूरे शरीर का जोर लगाकर उस गाय को बचा लिया लेकिन मैंने देखा कि गाय को दलदल से निकालने के बाद वह साधु आगे गया तो एक गड्ढे में गिर गया।

🔷 प्रभु! बताइए यह कौन सा न्याय है?

🔶 नारद जी की बात सुन लेने के बाद प्रभु बोले, 'यह सही ही हुआ। जो चोर गाय पर पैर रखकर भाग गया था, उसकी किस्मत में तो एक खजाना था लेकिन उसके इस पाप के कारण उसे केवल कुछ मोहरें ही मिलीं।'

🔷 वहीं, उस साधु को गड्ढे में इसलिए गिरना पड़ा क्योंकि उसके भाग्य में मृत्यु लिखी थी लेकिन गाय के बचाने के कारण उसके पुण्य बढ़ गए और उसे मृत्यु एक छोटी सी चोट में बदल गई।

🔶 इंसान के कर्म से उसका भाग्य तय होता है।

संक्षेप में
🔷 इस दुनिया में कर्म को मानने वाले लोग कहते हैं भाग्य कुछ नहीं होता।
🔶 और भाग्यवादी लोग कहते हैं किस्मत में जो कुछ लिखा होगा वही होके रहेगा।
🔷 यानी इंसान कर्म और भाग्य इन दो बिंदुओं की धूरी पर घूमता रहता है।
🔶 और एक दिन इस जग को अलविदा कहकर चला जाता है। इंसान को कर्म करते रहना चाहिए, क्योंकि कर्म से भाग्य बदला जा सकता है।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 18 Jan 2018


👉 आज का सद्चिंतन 18 Jan 2018


👉 प्रगति के पाँच आधार

अरस्तू ने एक शिष्य द्वारा उन्नति का मार्ग पूछे जाने पर उसे पाँच बातें बताई।

🔶 (1) अपना दायरा बढ़ाओ, संकीर्ण स्वार्थ परता से आगे बढ़कर सामाजिक बनो।   

🔷 (2) आज की उपलब्धियों पर संतोष करो और भावी प्रगति की आशा करो।   

🔶 (3) दूसरों के दोष ढूँढ़ने में शक्ति खर्च न करके अपने को ऊँचा उठाने के प्रयास में लगे रहो।
  
🔷 (4) कठिनाई को देख कर न चिन्ता करो न निराश होओ वरन् धैर्य और साहस के साथ उसके निवारण का उपाय करने में जुट जाओ।
  
🔶 (5) हर किसी में अच्छाई खोजो और उससे कुछ सीख कर अपना ज्ञान और अनुभव बढ़ाओ। इन पाँच आधारों पर ही कोई व्यक्ति उन्नति के उच्च शिखर पर पहुँच सकता है।

📖 अखण्ड ज्योति- अप्रैल 1973 पृष्ठ 1


http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1973/April/v1

👉 आपका मूल्य क्या है?

🔶 एक प्रसिद्ध चित्रकार के जीवन की एक घटना हैं। उसके पास एक धनी कलाप्रेमी चित्र खरीदने आया। उसने एक चित्र को देखकर उसका दाम पूछा। चित्रकार ने उसकी कीमत 50 गिन्नी बताई। कला प्रेमी ने छोटे से चित्र की अधिक कीमत पर आश्चर्य जताया। इस पर कलाकार ने कहा- पूरे तीन साल निरंतर परिश्रम करने के बाद मैं इस योग्य बना हूं कि ऐसे चित्र को चार दिनों में बना सकता हूँ। इसके पीछे मेरा वर्षों का अनुभव, साधना और योग्यता छिपी हुई है। कला प्रेमी उत्तर से संतुष्ट हुआ और उसने चित्र खरीद लिया। यदि चित्रकार अपनी कला का मूल्य कम लगाता तो निश्चय ही उसे कम मूल्य मिलता, पर उसके आत्म विश्वास और कला साधना की जीत हुई।
  
🔷 चित्रकार ने अपने को जितना मूल्यवान समझा, संसार ने उतना ही महत्व स्वीकार किया। हमें उतना ही सम्मान, यश, प्रतिष्ठा प्राप्त होती है, जितना हम स्वयं अपने व्यक्तित्व का लगाते हैं। शांत चित्त से कभी-कभी अपने चरित्र की अच्छाइयों, श्रेष्ठताओं और उत्तम गुणों पर विचार करें। आप जितनी देर तक अपनी अच्छाइयों पर मन एकाग्र करेंगे, उतना वे आपके चरित्र में विकसित होंगी। बुराइयों को त्यागने का अमोघ उपाय यह है कि हम एकान्त में अपने चरित्र, स्वभाव और श्रेष्ठ गुणों का चिन्तन करें और इससे दिव्यताओं की अभिवृद्धि करते रहें। मनुष्य के मन में ऐसी अद्ïभूत गुप्त चमत्कारी शक्तियां दबी पड़ी रहती हैं कि वह जिन गुणों का चिन्तन करता है, गुप्त रूप से वे दिव्य गुण उसके चरित्र में बढ़ते-पनपते रहते हैं। आत्म निरीक्षण के माध्यम से आप अपने दैवीय विशिष्ट गुण को बखूबी मालूम कर सकते हैं अथवा किसी योग्य चिकित्सक की सहायता ले सकते हैं। अब्राहम लिंकन की उन्नति का गुर यही था। उसने निरंतर ध्यान और मनोवैज्ञानिक अध्ययन द्वारा अपने छिपे हुए गुणों को खोज निकाला। वह उसी दिशा में निरंतर उन्नति करता गया। एक चिरप्रचलित उक्ति है- ‘मनुष्य अपने मन में स्वयं को जैसा मान बैठा है, वस्तुत: वह वैसा ही है।’

🔶 प्राय: हम देखते हैं कि अनेक अभिभावक दूसरों के बच्चों की मुक्त कंठ से प्रशंसा करते हैं और अपने बच्चे की बुराई। वे बच्चों को  डांटते-फटकारते हैं। नतीजतन उनके बच्चे बड़े होकर घर से भाग जाते हैं या घर पर नहीं टिकते। अभिभावक अपने बच्चों का कम मूल्य लगाते हैं, फलस्वरूप समाज भी उन्हें घटिया दर्जे का ही मानता है। आप कभी-कभी अपने गुणों, अपनी विलक्षण प्रतिभा, अपनी विशेष ईश्वरीय देन के बारे में खूब सोचिए। त्रुटियों की उपेक्षा कर श्रेष्ठताओं की सूची बनाइए। उन्हीं पर विचार और क्रियाएं एकाग्र कीजिए। यह अपनी श्रेष्ठताएं विकसित करने का मनोवैज्ञानिक मार्ग है। प्रिय पाठक, आपको अपनी शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक, आध्यात्मिक और अनेक शक्तियों का ज्ञान नहीं है। आप नेत्रों पर पट्टी बांधे अन्धा-धुन्ध आगे मार्ग टटोल रहे हैं। यदि आप अपनी गुप्त शक्तियों के सहारे आगे बढऩे लगें, मन को सृजनात्मक रूप में शिक्षित कर लें तो जीवन फूलों की सेज प्रतीत होगा और अनेक कार्य आप पूर्ण करने लगेंगे।

🔷 आप ताकत की दवाइयां खाते हैं। पौष्टिक अन्न लेते हैं। डंड, मुद्ïगर और तरह-तरह की कसरतें करते हैं। पर सच तो यह है कि शक्ति कहीं बाहर से नहीं आती, वह स्वयं हमारे अन्दर ही मौजूद है। जो हमारे मन की अवस्था के अनुसार घटती-बढ़ती रहती है। डेढ़ पसली के महात्मा गांधी के शरीर में एक दृढ़ निश्चयी मन की ही ताकत थी। उस मन की शक्ति से ही उन्होंने विदेशी राष्ट्र की जड़ें खोखली कर दी थीं। आप में भी असीम शक्तियाँ भरी पड़ी हैं। उनकी खोज की जाय, तो निश्चय ही आप संसार को चमत्कृत कर सकते हैं। अब आज से आप नए सिरे से अपने व्यक्तित्व का मूल्यांकन कीजिए।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी प्रगति उत्कृष्टता की दिशा में हो (भाग 1)

🔶 मनुष्य अपना शिल्पी आप है। प्रारम्भ में वह एक चेतन-पिण्ड के रूप में ही उत्पन्न होता है। अपने जन्म के साथ न तो वह गुणी होता है, न बुद्धिमान, न विद्वान और न किसी विशेषता का अधिकारी। परमात्मा उसे मानव-मूर्ति के रूप में जन्म देता है और बीज रूप में उपयोगी शक्तियों को उसके साथ कर देता है। इसके बाद का सारा काम स्वयं मनुष्य को करना होता है। अपने इस उत्तरदायित्व के अनुसार वह स्वतन्त्र है कि अपनी रचना योग्यतापूर्वक करे अथवा अयोग्यतापूर्वक। जो अपनी रचना योग्यतापूर्वक करते हैं पुरस्कार रूप में वे परम पद पाकर चिदानन्द के अधिकारी होते हैं और जो अपनी रचना में असफल होते हैं वे जन्म-मरण के चक्र में चौरासी लाख योनियों की यातना सहते हैं।

🔷 मानव-पिण्ड के रूप में आया प्रारम्भिक मनुष्य अपने वंश के अनुसार विकसित होता हुआ अपना निर्माण प्रारम्भ कर देता है। अपनी सूझ-बूझ और निर्णय के अनुसार कोई धनवान बनता है, कोई विद्वान् बनता है, कोई व्यापारी बनता है तो कोई श्रमिक। कोई पापी बनता है तो कोई पुण्यात्मा। मनुष्य अपना निर्माण अनेक प्रकार का कर सकता है। मानव-निर्माण का कोई एक स्वरूप नहीं, असंख्य स्वरूप एवं प्रकार हैं। किन्तु उन सबको बांटकर दो प्रकारों में किया जा सकता है। एक उत्कृष्ट निर्माण दूसरा निकृष्ट निर्माण।

🔶 मनुष्य कुछ भी बने, किसी क्षेत्र अथवा किसी दिशा में बढ़े, विकास करे, यदि उसमें उसने श्रेष्ठता का समावेश किया हुआ है तो उसका निर्माण उत्कृष्ट निर्माण ही कहा जायेगा और यदि वह उसमें अधमता का समावेश करता है तो उसका निर्माण निकृष्ट ही माना जायेगा। उदाहरणार्थ यदि वह धन के क्षेत्र में बढ़कर अपना निर्माण धनाढ्य के रूप में करता है किन्तु इसकी सिद्धि में दुष्ट साधनों तथा उपायों का प्रयोग करता है, तो कहना होगा कि वह अपना निर्माण निकृष्ट कोटि का कर रहा है। यदि वह इसकी सिद्धि में सत्य, शिव और सुन्दर से सुशोभित साधनों तथा उपायों का अवलम्बन करता है तो कहना होगा कि वह अपना निर्माण उत्कृष्ट कोटि का कर रहा है। इस प्रकार मनुष्य का कोई भी आत्म निर्माण या तो उत्कृष्ट कोटि का होता है अथवा निकृष्ट कोटि का।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- अक्टूबर 1970 पृष्ठ 16

👉 Meaningful Utilization of Time

🔷 There is not a single moment of life that may be called ordinary. Every moment is extraordinary and unique. It was some moment which gave life to us. It is also some moment which makes us feel good or bad, gives the blessing of success or the bane of failure. Every moment brings with it a unique experience. True wisdom lies in proper utilization of that moment. Time is full of boons. Awakened persons fully live in the present moment and utilize their time wisely. But most of us go through life unconsciously and aimlessly. Thus nothing worthwhile is gained.

🔶 On the other hand, whatever is already available also gets wasted. If one searches the cause of failures, one will easily find it to be the laziness that has unconsciously crept into the psyche. This vice burns time like a firework. Therefore there is need to cultivate the habit of learning new techniques that save time and make the tasks easy. It requires making disorganized lifestyle orderly and moulding the thoughts according to the task at hand. Then only will it be possible to utilize the time in a meaningful way. The present moment is the only moment we have and we must utilize it wisely.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 गायत्री परिवार का उद्देश्य — पीड़ा और पतन का निवारण (भाग 2)

🔶 मित्रो! भगवान बुद्ध ने यही मुनासिब समझा। उन्होंने यह नहीं किया कि अपने शिष्यों को एक स्थान पर बैठाकर और उनको योगाभ्यास करा करके और संत बना करके और एक आश्रम बना करके, शान्त कुटीर बना करके वहीं उनको निवास करने के लिए कहें। उन्हें ध्यान करने के लिए, जप करने के लिए और पूजा करने के लिए कहें और गंगा स्नान करने के लिए कहें। उन्होंने यह मुनासिब नहीं समझा। उन्होंने कहा कि अब तुम्हारा योगाभ्यास कर्मक्षेत्र में होगा, स्थान विशेष में नहीं होगा। इसलिए चलो, कर्मक्षेत्र में उतरो। प्रत्येक शिष्य से उन्होंने यही कहा कि तुम्हें तीन दिन से अधिक किसी एक स्थान पर नहीं रहना चाहिए। क्यों? क्योंकि स्थान विशेष से मोह हो जाता है और व्यक्ति विशेष से मोह हो जाता है। व्यक्ति विशेष से, जिस आदमी के अंदर लगाव हो गया है, मोह हो गया है, वह आदमी उसका हिमायती, उसका पक्षधर हो जाता है। गलत काम के लिए भी उसका समर्थन करता है। उसी आदमी को शिष्य बनाने के लिए न जाने क्या-से करता चला जाता है।

🔷 पुराने जमाने में लोग तीन-चार दिन के लिए थोड़े-थोड़े समय के लिए घर से निकल जाते थे। क्योंकि हमारा घर में और व्यक्ति विशेष में इतना ज्यादा मोह हो जाता है, इतना ज्यादा पक्षपात हो जाता है कि हम उनकी उचित और अनुचित-दोनों ही तरह की आवश्यकताओं को-माँगों को पूरा करने के लिए अपने आपको खपाते रहते हैं। इसमें हम यह अनुभव करते हैं कि हम जो कर रहे हैं, सही कर रहे हैं। हम जो कर रहे हैं, मुनासिब कर रहे हैं। इसमें गलत और सही का फर्क हमें मालूम नहीं हो पाता। मालूम होने के लिए यह अत्यन्त आवश्यक है कि उन स्थानों में, जिनमें हमारा मोह अत्यधिक बढ़ा हुआ है, थोड़े समय के लिए, वहाँ से बाहर निकल जाना चाहिए। प्राचीनकाल में गृहस्थ जीवन के लिए भी यह आवश्यक समझा जाता था। तीर्थयात्राओं के लिए, परिक्रमाओं के लिए समय-समय पर सामान्य गृहस्थ भी बाहर निकल जाते थे और वहाँ चले जाते थे, जहाँ शान्ति की वर्षा होती थी, अमृत की वर्षा होती थी। वहाँ ज्ञान का प्रकाश हमें मिलता था।

🔶 मित्रो! तब उच्च उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए चलते रहना ही मनुष्य की नियति थी। ‘‘चरैवेति-चरैवेति’’—चलते रहो-चलते रहो, यही शिक्षण संतों ने हमेशा अपने परिव्राजकों को दिया है, भावनाशील लोगों को दिया है। शिक्षकों के लिए दिया गया है और योगाभ्यास करने वाले तप करने वाले लोगों को हमेशा यही उपदेश दिया गया हैं। भगवान बुद्ध ने भी अपने शिष्यों को यही उपदेश दिया और कहा कि जहाँ कहीं भी पीड़ा और पतन दिखाई देता हो, वहाँ सबसे पहले चले जाना। जहाँ कहीं भी पीड़ा और पतन दिखाई पड़ा, बुद्ध के शिष्य वहाँ चले गये, उन-उन स्थानों को चले गये। मध्य एशिया के उन स्थानों में चले गये, जहाँ रेगिस्तानी प्रदेश था। जहाँ खाना भी नसीब नहीं होता था। उन स्थानों पर उन सबको भेज दिया। वहाँ भेज दिया जहाँ जंगल पड़े हुए थे। कौन से वाले क्षेत्र में? जावा से लेकर सुमात्रा तक, इण्डोनेशिया से लेकर मलाया तक, सारे-के देश-जिसमें पूर्वी देश भी सम्मिलित थे। जहाँ जंगली लोग, अशिक्षित लोग रहते थे।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 19)

👉 स्वयं से कहो-शिष्योऽहम्

🔷 इस कृपा के धारण व ग्रहण की विधि बताते हुए भगवान् सदाशिव माता पार्वती से कहते हैं-

    गुरुमूॄत स्मरेन्नित्यं गुरुनाम सदा जपेत्।
    गुरोराज्ञां प्रकुर्वीत गुरोरन्यन्न भावयेत्॥ १८॥
    गुरुवक्त्रस्थितं ब्रह्म प्राप्यते तत्प्रसादतः।
    गुरोर्ध्यानं सदा कुर्यात् कुलस्त्री स्वपतेर्यथा॥ १९॥
    स्वाश्रमं च स्वजातिं च स्वकीॄत पुष्टिवर्धनम्।
    एतत्सर्वं परित्यज्य गुरोन्यन्न भावयेत्॥ २०॥

🔶 सद्गुरु कृपा से अपने जीवन में भौतिक, आध्यात्मिक, लौकिक-अलौकिक समस्त विभूतियों को पाने की चाहत रखने वाले साधक को सदा ही गुरुदेव की छवि का स्मरण करना चाहिए। उनके नाम का प्रति पल, प्रति क्षण जप करना चाहिए। साथ ही गुरु आज्ञा का जीवन की सभी विपरीतताओं के बावजूद सम्पूर्ण निष्ठा से पालन करना चाहिए। अपने जीवन में कल्याण कामना करने वाले साधक को गुरुदेव के अतिरिक्त अन्य कोई भावना नहीं रखनी चाहिए॥ १८॥ गुरु के मुख में ब्रह्मा का वास है। इस कारण उनके मुख से बोले हुए शब्द ब्रह्म वाक्य ही हैं। गुरु कृपा प्रसाद से ही ब्रह्म की प्राप्ति होती है। परम पतिव्रता स्त्री जिस तरह से सदा ही अपने पति का ध्यान करती है, ठीक उसी तरह अध्यात्म तत्त्व के अभीप्सु साधक को अपने गुरु का ध्यान करना चाहिए॥ १९॥ साधक में इस ध्यान की प्रगाढ़ता कुछ इस कदर होनी चाहिए कि उसे अपना आश्रम, अपनी जाति, अपनी कीर्ति का पोषण, वर्धन, सभी कुछ भूल जाए। गुरु के अलावा अन्य कोई भावना उसे न व्यापे॥२०॥

🔷 इन महामंत्रों का मनन और इनका आचरण साधकों के लिए राजमार्ग है। साधना का यह पथ बड़ा ही सरल, सुगम और निरापद है। श्री रामकृष्ण परमहंस देव के अनेक शिष्य थे। उनमें से कई बहुत पढ़े-लिखे, विद्वान् और तपस्वी थे। स्वामी विवेकानन्द जी महाराज की अलौकिक प्रतिभा से तो समूची दुनिया चमत्कृत रह गयी। इन शिष्यों में एक लाटू महाराज भी थे। निरे अपढ़-गँवार, विद्या-बुद्धि का कोई चमत्कार उनमें नहीं था। बस हृदय में भक्ति थी। न वे शास्त्र चर्चा के गाम्भीर्य में डूब सकते थे और न ही किसी से शास्त्रार्थ कर सकते थे। पश्चिमी ज्ञान-विज्ञान तो उन्हें छू भी नहीं गया था। अपनी इस स्थिति पर विचार कर उन्होंने परमहंस देव से कहा- ठाकुर! मेरा कैसे होगा? श्री श्री ठाकुर ने उन्हें आश्वस्त करते हुए कहा- तेरे लिए मैं हूँ न। बस मेरा नाम स्मरण करने से मेरा ध्यान करने से, सब कुछ हो जाएगा।
  
🔶 तब से लाटू महाराज का नियम बन गया- अपने गुरुदेव श्री रामकृष्ण परमहंस का नाम स्मरण, उन्हीं का ध्यान और उनकी सेवा। ठाकुर की आज्ञा ही उनके लिए सर्वस्व हो गयी। यह सब करते हुए उनके जीवन में आश्चर्यजनक आध्यात्मिक परिवर्तन हुए। अनेकों दैवी घटनाएँ एवं चमत्कारों ने उनकी साधना को धन्य किया। उनके अद्भुत आध्यात्मिक जीवन और योग शक्तियों के अद्भुत विकास को देखकर स्वामी विवेकानन्द ने उन्हें अद्भुतानन्द नाम दिया। श्री रामकृष्ण संघ में वह इसी नाम से विख्यात हुए। स्वामी विवेकानन्द उनके बारे  में कहा करते थे- लाटू ठाकुर का चमत्कार है। वह इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि गुरु स्मरण, गुरुसेवा और गुरु की आज्ञापालन से सब कुछ सम्भव हो सकता है। जो जन्म-जन्मान्तरों के तप से सम्भव नहीं, वह सद्गुरु  कृपा से सहज ही साकार हो जाता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 34

बुधवार, 17 जनवरी 2018

👉 सच्चा लाभ:-


🔶 एक आदमी के पास बहुत से पशु-पक्षी थे। उसने सुना था कि गांव के बाहर एक संत आए हुए हैं, जो पशु-पक्षियों की भाषा समझते हैं। वह उनके पास गया और उनसे उस कला को सीखने की हठ करने लगा। संत ने शुरुआत में कई बार टालने की कोशिश भी की, पर वह आदमी संत की सेवा में जुटा रहा। अंत में प्रसन्न होकर संत ने व्यक्ति को वह कला सिखा दी। उसके बाद से वह व्यक्ति पशु-पक्षियों की बातें सुनने लगा।

🔷 एक दिन मुर्गे ने कुत्ते से कहा कि ये घोड़ा शीघ्र मर जाएगा। यह सुनकर उस व्यक्ति ने घोडे को बेच दिया। इस तरह वह नुकसान से बच गया।

🔶 कुछ दिनों के बाद उसने उसी मुर्गे को कुत्ते से कहते हुए सुना कि जल्द ही खच्चर भी मरने वाला है। उसने नुकसान से बचने की आशा में वह खच्चर भी बेच दिया।

🔷 फिर मुर्गे ने कहा कि अब नौकर की मृत्यु होने वाली है। बाद में उसके परिवार को कुछ न देना पड़े, इसलिए उस व्यक्ति ने नौकर को नौकरी से हटा दिया।

🔶 वह बहुत खुश हो रहा था कि उसे उसके ज्ञान का इतना फल प्राप्त हो रहा है। तब एक दिन उसने मुर्गे को कुत्ते से कहते सुना कि यह आदमी भी मर जाने वाला है।

🔷 अब वह भय से कांपने लगा। वह दौड़ता हुआ संत के पास गया। पूछा कि अब क्या करूं?

🔶 संत ने कहा, ‘जो अब तक कर रहे थे।’

🔷 व्यक्ति ने कहा, ‘आप क्या कह रहे हैं, मैं समझा नहीं?’

🔶 संत ने कहा, ‘जाओ और स्वयं को भी बेच डालो।’

🔷 व्यक्ति ने कहा, ‘आप मजाक क्यों कर रहे हैं? मैं परेशान हूं और आपसे पूछ रहा हूं कि क्या करूं?

🔶 संत ने कहा, ‘जो तुम्हारे अपने थे, तुमने उनका अंत जानकर उन्हें बेच दिया। उनके प्रति अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ा। तुम खुश हुए कि हानि से बच गए। तर्क के हिसाब से अभी भी वही करो, जो अब तक किया है। अब तक तुम भौतिक हानि से बचने के लिए सब कर रहे थे। फिर अब भय क्यों? अभी समय है, खुद को बेच लो। जो भी मिल जाए, बचा लो, लाभ कर लो। बाद में तो वो भी नहीं मिलेगा।

🔷 तुमने कभी मुर्गे से जानने की कोशिश नहीं की कि मैं कब मरूंगा? अगर यह जानते तो जीवन को इस तरह न बिताते, जैसे बिता रहे थे। अपने अंत को जानने वाले व्यर्थ के लाभ में नहीं पड़ते। वे असली लाभ कमाने में लगे रहते हैं।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 17 Jan 2018


👉 आज का सद्चिंतन 17 Jan 2018

👉 अनेकता में एकता-देव - संस्कृति की विशेषता

🔶 यहाँ एक बात याद रखनी चाहिए कि संस्कृति का माता की तरह अत्यंत विशाल हृदय है। धर्म सम्प्रदाय उसके छोटे-छोटे बाल-बच्चों की तरह हैं, जो आकृति-प्रकृति में एक-दूसरे से अनमेल होते हुए भी माता की गोद में समान रूप से खेलते और सहानुभूति, स्नेह, सहयोग पाते हैं। भारत एक विचित्र देश है। इसमें धर्म, सम्प्रदायों की, जाति विरादरियों की, प्रथा परम्पराओं की बहुलता है। भाषाएँ भी ढेरों बोली जाती हैं। इनके प्रति परम्परागत रुझान और प्रचलनों का अभ्यास बना रहने पर भी सांस्कृतिक एकता में कोई अन्तर नहीं आता। इसीलिए एक ही धर्म संस्कृति के लोग मात्र प्रान्त, भाषा, सम्प्रदाय, प्रथा-प्रचलन जैसे छोटे कारणों को लेकर एक-दूसरे से पृथक् अनुभव करें, उदासीनता बरतें और असहयोग दिखाएँ, तो इसे दुर्भाग्यपूर्ण ही कहा जा सकता है।
  
🔷 यह एक शोचनीय बात है कि देवसंस्कृति की गरिमा को उसके उत्तराधिकारी ही उपेक्षा के गर्त में धकेलते चले जा रहे हैं, जबकि अन्यत्र धर्म-संस्कृतियों में वैसी अवमानना दृष्टिगोचर नहीं होती। संस्कृति को प्रथा प्रचलन की परिपाटी भर मान बैठना भूल है। उसके साथ एक महान परम्परा की दिव्यधारा प्रवाहित होती है। उसे यदि सही रूप से समझाया और अपनाया जा सके, तो अतीत जैसे गौरव, वातावरण और वैभव का पुनर्जीवित हो उठना सुनिश्चित है। अस्तु, प्रयत्न यह होना चाहिए कि देवसंस्कृति के दर्शन, स्वरूप, प्रचलन, प्रतिपादन को जानने, अपनाने के अवसर संसार भर के मनुष्य समुदाय को मिलता रहे। यदि वर्तमान परिस्थितियों में वैसा न बन पड़े, तो कम से कम इतना तो होना चाहिए कि जो लोग भारतीय संस्कृति पर विश्वास करते हैं, वे उसके स्वरूप को भली प्रकार समझें और जितना संभव हो, उतना अपनाए रहने का सच्चे मन से प्रयास करें।
  
🔶 यह आवश्यकता भारत व बाहर बसे प्रत्येक देव-संस्कृति के अनुयायी को अनुभव करनी चाहिए कि मध्यकालीन कुरीतियों, अन्धविश्वासों एवं धर्म क्षेत्र में घुस पड़ी अनेकानेक विकृतियों को बुहारने के उपरांत जो शाश्वत और सत्य बच जाता है, उसे न केवल मान्यता देने का, वरन् जन-जन को अवगत कराने तथा व्यवहार में सुस्थिर बनाये रहने का भाव भरा प्रसास किया जाय।
  
🔷 सुदुर बसे भारतीयों को भिन्न परिस्थितियों, भिन्न वातावरण में एवं भिन्न प्रकार के व्यक्तियों के बीच निर्वाह करना पड़ता है। स्वभावत: बहुसंख्यक लोगों का प्रभाव अल्पसंख्यकों पर पड़ता है। इन दिनों भारतीय संस्कृति की अवहेलना उसके अनुयायियों द्वारा ही की जाने के कारण अन्य देशों में उनका पक्ष और भी अधिक कमजोर पड़ता है। स्थिरता एवं प्रोत्साहन का आधार न मिलने और भिन्न-भिन्न प्रचलनों का दबाव पडऩे से गाड़ी स्वभावत: उसी पटरी पर घूमने लगती है। प्रवासी भारतियों को हर पीढ़ी अपने पूर्वजों की तुलना में देवसंस्कृति के लिये कम रुचि दिखाती और अधिक उपेक्षा बरतती देखी जा सकती है। प्रवाह इसी दिशा में बहता रहा, तो वह दिन दूर नहीं, जब प्रवासी भारतीय अपनी सांस्कृतिक आस्थाओं से विरत होते-होते किसी दिन उसे पूर्णतया तिलाञ्जलि दे बैठेंगे।
  
🔶 होना यह चाहिए था कि प्रवासी भारतीय अपने-अपने देशों में अपने राष्ट्र के प्रति पूरी निष्ठा रखते हुए वहाँ भारतीय संस्कृति के प्रतिनिधि बनकर रहते-अपनी स्थिति संगठित एवं प्रभावोत्पादक बनाते अपरिचित लोगों को इस गरिमा से परिचित एवं प्रभावित करते। ऐसा बन पड़ा होता, तो शताब्दियों से बसे प्रवासी भारतीय उन-उन देशों में से असंख्य लोगों को इस महान् परम्परा का अनुयायी बनाने में सफल हो चुके होते। किन्तु हो उलटा रहा है। बढ़ाना तो दूर, वे घटे ही हैं, जबकि सर्वत्र जनसंख्या वृद्धि की बाढ़ सी आयी है।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 न तो हिम्मत हारे ओर न हार स्वीकार करें (अन्तिम भाग)

🔶 परिस्थितियों की अनुकूलता और प्रतिकूलताओं से इनकार नहीं किया जा सकता। शारीरिक संकट उठ खड़ा हो कोई अप्रत्याशित रोग घेर ले यह असम्भव नहीं। परिवार के सरल क्रम में से कोई साथी बिछुड़ जाय और शोक संताप के आँसू बहाने पड़े यह भी कोई अनहोनी बात नहीं है। ऐसे दुर्दिन हर परिवार में आते हैं और हर व्यक्ति को कभी न कभी सहन करने पड़ते हैं। मन चाही सफलताएँ किसे मिली है। मनोकामनाओं को सदा पूरी करते रहने वाला कल्पवृक्ष किसके आँगन में उगा है? ऐसे तूफान आते ही रहते हैं जो संजोई हुई साध के घोंसले उड़ाकर कहीं से कहीं फेंक दे और एक-एक तिनका बीन कर बनाये गये उस घरौंदे का अस्तित्व ही आकाश में छितरा दें, ऐसे अवसर पर दुर्बल मनः स्थिति के लोग टूट जाते हैं।

🔷 नियति क्रम से हर वस्तु का-हर व्यक्ति का अवसान होता है। मनोरथ और प्रयास भी सर्वदा सफल कहाँ होते हैं। यह सब अपने ढंग से चलता रहे पर मनुष्य भीतर से टूटने न पाये इसी में उसका गौरव है। समुद्र तट पर जमी हुई चट्टानें चिरअतीत से अपने स्थान पर जमी अड़ी बैठी है। हिलोरों ने अपना टकराना बन्द नहीं किया सो ठीक है, पर यह भी कहाँ गलत है कि चट्टान ने हार नहीं मानी।

🔶 न हमें टूटना चाहिए और न हार माननी चाहिए। नियति की चुनौती स्वीकार करना और उससे दो-दो हाथ करना ही मानवी गौरव को स्थिर रख सकने वाला आचरण है।

.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- मार्च 1973 पृष्ठ 48
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1973/March/v1.48

👉 मानसिक सुख-शांति के उपाय (अन्तिम भाग)

🔶 मन के दमन के सम्बन्ध में पाश्चात्य मनोवेत्ताओं की शंका है कि—मन का दमन करने से भले ही उसकी कोई तात्कालिक प्रतिक्रिया न हो पर उसकी भावना मनुष्य के अवचेतन में दबे-दबे जीवित रहती है और अनुकूल अवसर की प्रतीक्षा करती रहती है। ज्यों ही उसे कोई अनुकूल परिस्थिति मिलती है वह सक्रिय होकर विविध प्रकार के उपद्रव उत्पन्न कर देती है। मनुष्य के मानसिक उपद्रवों के पीछे अधिकांश में दमन किये गये मन की वह अतृप्ति ही रहती है जो मनुष्य के अन्तर्मन में दबी पड़ी रहती है। सम्भव है पाश्चात्यों की इस शंका में सत्य का कोई अंश हो। किन्तु इस प्रकार का उपद्रव तभी सम्भव है जब मन का दमन अवैज्ञानिक ढंग से किया जाता है।

🔷 विषयों में अनुरक्ति रखते हुए मन की इच्छाओं का हनन अवैज्ञानिक है। इसका उचित मार्ग यही है कि विषय सेवन की हानियों पर विवेक द्वारा विचार किया जाये। ऐसा करने से विषयों से घृणा उत्पन्न होने लगेगी जिसका परिपाक वैराग्य में होगा। विषयों के प्रति वैराग्य होते ही मन उनसे स्वभावतः विमुख हो जायेगा। इस वैज्ञानिक विधि से वश में किए हुए मन की कोई ऐसी वासना न रहेगी जो अवचेतन में दबी पड़ी रहे और अवसर पाकर उपद्रव उपस्थित करे।

🔶 संसार में विषयों और उनके प्रति वांछाओं की कमी नहीं। उनसे हटाया हुआ मन, सम्भव है चतुर्दिक् वातावरण से प्रभावित होकर कभी फिर विपथी हो उठे—इस शंका से बचने के लिये विषयों से विरक्त मन को भी भगवान् अथवा उनके क्रियात्मक रूप परोपकार एवं परमार्थ में नियुक्त करना चाहिये क्योंकि मन निराधार नहीं रह सकता, उसको टिकने के लिये आधार चाहिये ही। परमात्मात्मक आधार से शुभ एवं निरापद, मन की एकाग्र स्थिति के लिये अन्य आधार नहीं हो सकता। वह परम है, उसी से सब कुछ का उदय है और उसमें सब कुछ का समाधान है और फिर परमात्मक रूप में एकाग्र किए हुए मन में जिस सुख-शांति एवं सन्तुष्टि का प्रस्फुरणा होगा, वह सुख होगा जो शाश्वत, अक्षय एवं स्थायी होता है उससे बढ़कर कोई भी सुख नहीं है। इस शाश्वत सुख को पाकर फिर कुछ पाना शेष न रह जायेगा। आज का विषयी एवं चंचल मन सदा सर्वदा के लिए सन्तुष्ट होकर स्थिर, एकाग्र तथा परिपूर्ण हो जायेगा। मन की यही दशा तो वह सुख शांति है जिसे पाने के लिये मनुष्य रूप जीवन जन्म-जन्मान्तर से भटकता चला आ रहा है किन्तु पा नहीं रहा है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- अप्रैल 1967 पृष्ठ 10
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1967/April/v1.10

http://literature.awgp.org/book/sukh_shanti_ki_sadhana_/v1.9

👉 King Dileep and Nandini

🔷 After his retirement King Dileep went for spiritual pursuits along with his wife to stay at saint Vasishtha's monastery. The saint assigned him to look after the sacred cow Nandini. Dileep would follow Nandini wherever she went for grazing. He kwpt his bow and arrow ready for her protection. One day Nandini went deep in the woods and Dilep followed her. All of a sudden a ferocious Lion attacked the sacred cow. Dileep immediately got ready to shoot the arrow, but the Lion said, "O king! I am no ordinary lion. I belong to Lord Shiva, your arrows cannot harm me a bit."

🔶 "Whoever you are", replied Dileep, "I shall protect my Guru's cow by all means." The Lion said, "Alright, I will let Nandini go, if you provide me your own flesh to satiate my hunger." "I am gladly ready for this deal" replied Dileep. And he set aside his bow and arrow. He then sat down with eyes closed, waiting for the lion to attack. But there was no sign of any activity for quite sometime. Dileep opened his eyes, and behold! In place of the lion saint Vasishtha himself was smiling at him. "The test of your credibility is over. You truly deserve to learn the science of spirituality", said Vasishtha, and took him back to the monastery.

📖 From Pragya Puran

👉 गायत्री परिवार का उद्देश्य — पीड़ा और पतन का निवारण (भाग 1)

गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ-
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

🔶 देवियो, भाइयो! आज हमारा प्रारंभिक शिक्षण समाप्त हुआ। अब हम आपको उसी तरह से कार्यक्षेत्र में भेजना चाहेंगे, जैसे कि भगवान बुद्ध ने अपने सारे शिष्यों को योगाभ्यास और तप करने के लिए भेज दिया था। कुछ समय तक अपने समीप रखने के बाद भगवान बुद्ध ने यह आवश्यक समझा था कि जो उनको सिखाया गया है और जो उन्होंने सीखा है, उसको परिपक्व और परिपुष्ट बनाने के लिए, उनके क्रियाकलापों को परखने के लिए कार्यक्षेत्र में भेज दिया जाय। बुद्ध के शिष्य थोड़े दिन तप करने के बाद निकल गये, चले गये। कहाँ चले गये? हिन्दुस्तान के कोने-कोने में चले गये, जहाँ पर अज्ञान का अंधकार था। मित्रो! सूरज कहाँ चला गया? वहाँ चला गया, जहाँ अंधकार ने उसको बुलाया था। जहाँ अँधेरा छुपा हुआ था। वहाँ से वह हटता हुआ चला गया और सूरज आगे बढ़ता हुआ चला गया। सूरज के पास अंधकार नहीं आया था। सूरज ही गया था, अंधकार को दूर करने के लिए।

🔷 मित्रो! बादलों के पास जमीन नहीं आयी, खेत नहीं आये, पेड़ नहीं आये। कोई नहीं आया बादलों के पास, बादल ही चले गये। कहाँ चले गये? खेतों के पास, खलिहानों के पास, पेड़ों के पास। जहाँ लोग बीमार पड़े हुए थे, कॉलरा फैला हुआ पड़ा था, तपेदिक फैला हुआ पड़ा था, ऐसे मरीज डॉक्टर के पास नहीं आ सके, वहाँ डॉक्टर चले गये, कहाँ चले गये? वहाँ चले गये, जिन गाँवों में कॉलरा फैला हुआ था, हैजा फैला हुआ था, तपेदिक फैैला हुआ था। भूकम्प से पीड़ित, अकाल से पीड़ित, दुर्भिक्ष से पीड़ित, दुःख से पीड़ित लोग मालदारों के दरवाजे पर खड़े हुए हैं, क्योंकि हम भूकम्प से पीड़ित हैं, क्योंकि हम बाढ़ से पीड़ित हैं, क्योंकि हम अभावग्रस्त हो गये हैं और हमारे घर वाले पानी में डूबे हुए पड़े हैं। इसलिए आप चलिए और हमारी सहायता कीजिए। वे लोग नहीं आयें। फिर कौन आये सहायता देने के लिए? वे आदमी गये, जिनके पास दिल था, जिनके पास भावनायें थीं, जिनके पास श्रम था और जिनके पास सहानुभूति थी।

🔶 मित्रो! वे लोग वहाँ चले गये, जहाँ पतन और पीड़ा ने उन्हें बुलाया था। जहाँ भूकम्प से पीड़ित, बाढ़ में डूबे हुए आदमी थे और अभाव में और बाढ़ में भरे हुए आदमी थे। वे वहाँ चले गये। कौन चले गये? वे आदमी, जिनको हम स्वयंसेवक कह सकते हैं, भावनाशील कह सकते हैं और दिलवाले कह सकते हैं। तो क्या उन्हें जाना चाहिए? हाँ बेटे, उन्हीं को जाना चाहिए, अन्यथा पीड़ा और पतन का निवारण कैसे होगा? छप्पर जल रहा है, तो जलता हुआ छप्पर किस तरह से आपके पास आयेगा कि आप हमारे ऊपर पानी डाल दीजिए। आपको ही भागना पड़ेगा और पानी डालने के लिए वहाँ जाना पड़ेगा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

सोमवार, 15 जनवरी 2018

👉 नोक वाली पेंसिल

🔶 शिवांगी शहर के प्रतिष्ठित विद्यालय में कक्षा तृतीय की छात्रा है। वह भी अन्य बच्चियों की तरह चंचल, हंसमुख शरारती बच्ची है। दशहरे के बाद विद्यालय खुलने और नये गणित के टीचर आने के बाद से सबके लिये सबकुछ पहले की तरह सामान्य है, किन्तु शिवांगी के लिये उसका प्यारा स्कूल एक भयावह जगह बन गई है।

🔷 आज करीब एक माह से वो मासूम एक नारकीय कष्ट सह रही थी, जिस दिन से उसके गणित के सर ने खेल के लिये निर्धारित पीरियड में अकेले बुलाया। उसे गणित पढ़ाने पर पढ़ाने के बजाये बच्ची को एक नर्क से परिचय करा दिया साथ ही धमकी दी की किसी से कहा तो फेल कर स्कूल से निकाल देंगे, मासूम के लिये यह धमकी काफी थी। आज फिर वही हुआ वह रोती हुई बस में चढ़ी आश्चर्य किसी ने उसके रोने का कारण नहीं पूछा।

🔶 बस से उतर घर आने पर भी किसी ने उसके उदासी का कारण नही पूछा। पड़ोस वाले भैया आये थे जिद करके शिवांगी के तीन साल के भाई को उसकी मर्जी के खिलाफ गोदी में उठा बाहर ले जा रहे थे, बच्चे ने उनकी मनमानी के विरोध में हाथ में रखी पेंसिल उनकी आँख मे डाल दी। परिणाम जो हुआ अच्छा नहीं था सब उन भैया को लेकर अस्पताल भागे माँ और पिता दोनो ने भाई एक एक थप्पड़ मार कर उसे रोता छोड़ उन भैया के परिवार के साथ हो लिये। शिवांगी शायद अपने भाई के दर्द को समझ गई उसने उसे अपने से लिपटा लिया नन्ही दीदी कछ ही पल के लिये माँ बन गई।

🔷 आज सबेरे फिर स्कूल है, गणित के पिरियड में सर ने शिवांगी को फिर बुलाया है गणित समझाने। आज खाने की छुट्टी में शिवांगी ने टिफिन खाने से ज्यादा जरूरी समझा अपनी दोनों पेंसिल की नोक तेज धार करना। खेल के पीरियड में जब गणित के सर ने बुलाया वह गई पर आज की नन्ही शिवांगी और दिनों की तरह सहमी हुई नही थी आज वह आत्भविश्वास से भरी हुई थी, हाँ वह अपनी पेंसिल साथ लेना नही भूली। कुछ ही देर में गेम्सरूम से एक भयानक दिल दहलाने वाली चीख सुनाई दी, सारे शिक्षक गेम्स रूम की तरफ भागे आश्चर्य आज सबने चीख सुनी इतने दिन बच्ची की चीख किसी ने नही सुनी थी खैर।

🔶 गेम्स रूम का दृष्य चीख से भी भयावह था, गणित के सर अर्धनग्न अवस्था में अपने दोनों हाथ अपनी आँखों पर रखे चीख रहे थे जिनसे तेजी से खून बह रहा था, और उनके ठीक सामने नन्ही शिवांगी अपने फटे हुये यूनिफाॅर्म के साथ साक्षात शिव की अर्धांगिनी बन आँखों से आंसू की जगह अंगारे बरसाती अपनी पेंसिल रूपी रक्त से भरी त्रिशूल लिये गर्व से खड़ी थी।

🔷 सर गिरफ्तार हो गये अदालत मे किसी सबूत की जरूरत नहीं पड़ी, जज नया क्या न्याय करते। नन्ही शिवांगी स्वयं साक्षी, साक्ष्य और न्याय करता बन अदालत में खड़ी थी, उसने तो न्याय कर ही दिया था जज ने और दस साल की सजा सुना दी।

🔶 अब शिवांगी निश्चिंत होकर स्कूल जाती है पर साथ में दो अतिरिक्त तेज नोक वाली पेंसिल रखना नही भूूलती

🔷 हाँ उस विद्यालय की सभी छात्राओं की मायें अपनी बेटियों के पेंसिल बाॅक्स में तेज धार की हुई दो पेंसिल याद से रख देती है इस सीख के साथ कि यह सिर्फ पेंसिल नहीं वक्त आने पर तुम्हें दुर्गा बना खुद त्रिशूल बन जायेंगी।

👉 वेश्या से तपस्विनी

🔷 आम्रपाली नामक एक वेश्या भगवान् बुद्ध को भोजन का निमन्त्रण देने गई। उनने स्वीकार कर लिया, थोड़ी देर बाद वैशाली राजवंश के लिच्छवि राजकुमार आये और उनने राजमहल में चलकर भोजन करने के लिए प्रार्थना की तो उनने कहा- मैं अम्वपानी के यहाँ भोजन की स्वीकृति दे चुका हूँ। उनने मीठे चावल और रोटी की भिक्षा प्रेम पूर्वक ग्रहण की। कुछ समय बाद वह वेश्या भी बुद्ध भगवान् के उपदेशों से प्रभावित होकर बौद्ध भिक्षुणी बन गई।

🔶 पाप से घृणा करते हुए भी पापी से प्यार करके उसे सुधारा जा सकता है।

👉 आज का सद्चिंतन 16 Jan 2018


👉 न तो हिम्मत हारे ओर न हार स्वीकार करें

🔶 आगत कठिनाइयों को देखकर निठाल हो बैठना और रोते कलपते समय गँवाना, विपत्ति को दूना करने के समान है। हमें यह मानकर ही चलना पड़ेगा कि जीवन आरोह अवरोध के ताने-बाने से बुना गया है। धूप, छाँह की तरह सफलताओं और असफलताओं की उभयपक्षीय हलचलें होती ही रहती है और होती ही रहेगी। सर्वथा सुख-सुविधाओं से भरा जीवन क्रम कदाचित् ही कोई जीता है। ज्वार-भाटों की तरह उठाने और गिराने वाली परिस्थितियाँ अपने ढंग से आती और अपनी राह चली जाती है। वट पर बैठकर उतार-चढ़ाव का आनन्द लेने वाले ही जीवन नाटक के अनुभवी कलाकार कहे जा सकते हैं।

🔷 सदा दिन ही बना रहे रात कभी आये ही नहीं भला यह कैसे हो सकता है? जन्मोत्सव ही मनाये जाते रहे, मरण का रुदन सुनने को न मिले यह कैसे सम्भव है। सुख की घड़ियाँ ही सामने रहें, दुःख के दिन कभी न आयें यह मानकर चलना यथार्थता की ओर से आंखें मूँद लेने के समान है। बुद्धिमान वे है जो सुखद परिस्थितियों का समुचित लाभ उठाते हैं और दुःख की घड़ी आने पर उसका सामना करने के लिए आवश्यक धैर्य और साधन इकट्ठा करते रहते हैं।

🔶 ऐसे ईर्ष्यालु इस दुनिया में कम नहीं जो किसी का सुख सन्तोष फूटी आँखों नहीं देख सकते। जिनके अन्धेर अनाचार में बाधा पड़ती है वे भी शत्रु बन बैठते हैं। अनुचित लाभ उठाने के उत्सुक भी शोषण एवं आक्रमण से बाज़ कहाँ आते हैं और अनन्त काल तक रहेगा। उनसे बच निकलना कठिन है। हाँ, इतना हो सकता है कि अपना शौर्य साहस इतना विकसित कर लिया जाय कि उन्हें छेड़-छाड़ करने का साहस ही न हो। व्यक्तिगत समर्थता के अतिरिक्त आपने साथी सहकारी बढ़ाकर भी आततायी की गति विधियों पर अंकुश किया जा सकता है। प्रतिरोध और प्रतिकार की शक्ति बढ़ाकर ही आक्रमणकारियों से अपनी आँशिक सुरक्षा हो सकती है। उनका सामना ही न करना पड़े, कुछ अनुचित अवांछनीय सामने आये ही नहीं, ऐसा सोचना आकाश कुसुम पाने जैसी बात-कल्पना है। अवरोधों से जूझने और संघर्षों के बीच अपना रास्ता बनाने के अतिरिक्त यहाँ और कोई रास्ता है ही नहीं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- मार्च 1973 पृष्ठ 48
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1973/March/v1.48

👉 अहंता का परिवर्तन

🔶 जैसे कुआँ खोदने पर जमीन में मिट्टियों के कई पर्त निकलते हैं, वैसे ही मनोभूमि की स्थिति है। उनके कार्य, गुण और क्षेत्र भिन्न-भिन्न हैं। ऊपर वाले पर्त- मन और बुद्धि हैं। मन में इच्छाएँ, वासनाएँ, कामनाएँ पैदा होती हैं, बुद्धि का काम विचार करना, मार्ग ढूँढऩा और निर्णय करना है।

🔷 स्थूल मन के प्रमुख भाग दो हैं- चित्त, अहंकार। चित्त में संस्कार, आदत, रुचि, स्वभाव, गुण की जड़ें रहती हैं। अहंकार ‘‘अपने सम्बन्ध में मान्यता’’ को कहते हैं। अपने को जो व्यक्ति धनी-दरिद्र, पापी-पुण्यात्मा, स्त्री-पुरुष, जीव-ब्रह्म आदि जैसा भी कुछ मान लेता है, वह वैसे ही अहंकार वाला माना जाता है। आत्मा के अहम् के सम्बन्ध में मान्यता का नाम ही अहंकार है। इन मन, बुद्धि, अहंकार के अनेकों भेद-उपभेद हैं और उनके गुण, कर्म, अलग-अलग हैं।
  
🔶 जैसे मन और बुद्धि का जोड़ा है, वैसे ही चित्त और अहंकार का जोड़ा है। मन में नाना प्रकार की इच्छाएँ-कामनाएँ रहती  हैं, पर बुद्धि उनका निर्णय करती है कि कौन-सी इच्छा प्रकट करने योग्य है, कौन-सी दबा देने योग्य है? इसे बुद्धि जानती है और वह सभ्यता, लोकाचार, सामाजिक नियम, धर्म, कत्र्तव्य, असम्भव आदि का ध्यान रखते हुए अनुपयुक्त इच्छाओं को भीतर दबाती रहती है। जो इच्छा कार्य रूप में लाये जाने योग्य जँचती है, उन्हीं के लिये बुद्धि अपना प्रयत्न आरम्भ करती है। इस प्रकार यह दोनों मिलकर मस्तिष्क क्षेत्र में अपना ताना-बाना बुनत रहते हैं।
  
🔷 अन्त:करण क्षेत्र में चित्त और अहंकार का जोड़ा अपना कार्य करता है। जीवात्मा अपने को जिस श्रेणी का, जिस स्तर का अनुभव करता है, चित्त में उस श्रेणी के, उसी स्तर के पूर्व संस्कार सक्रिय और परिपुष्ट रहते हैं। कोई व्यक्ति अपने को किसी वर्ग विशेष या समाज के निम्र वर्ग का मानता है, तो उसका यह अहंकार उसके चित्त को उसी जाति के संस्कारों की जड़ जमाने और स्थिर रखने के लिये प्रस्तुत रखेगा। जो गुण, कर्म, स्वभाव इस श्रेणी के लोगों के होते हैं, वे सभी उसके चित्त में संस्कार रूप से जड़ जमाकर बैठ जायेंगे। यदि उसका अहंकार अपराधी या शराबी की मान्यता का परित्याग करके लोकसेवी, महात्मा, सच्चरित्र एवं उच्च होने की अपनी मान्यता स्थिर कर ले, तो अति शीघ्र उसकी पुरानी आदतें, आकांक्षाएँ, अभिलाषाएँ बदल जायेंगी और वह वैसा ही बन जाएगा, जैसा कि अपने सम्बन्ध में उसका विश्वास है। अन्त:करण की एक ही पुकार से, एक ही हुंकार से, एक ही चीत्कार से जमे हुए कुसंस्कार उखड़ कर एक ओर गिर पड़ते हैं और उनके स्थान पर नये, उपयुक्त, आवश्यक, अनुरूप संस्कार कुछ ही समय में जम जाते हैं। जो कार्य मन और बुद्धि द्वारा अत्यन्त कष्ट-साध्य मालूम पड़ता था, वह अहंकार परिवर्तन की एक चुटकी में ठीक हो जाता है।
  
🔶 अहंकार तक सीधी पहुँच साधना के अतिरिक्त और किसी मार्ग से नहीं हो सकती। मन और बुद्धि को शान्त, मूर्छित अवस्था में छोडक़र सीधे अहंकार तक प्रवेश पाना ही साधना का उद्देश्य है। गायत्री साधना का विधान भी इसी प्रकार का है। उसका सीधा प्रभाव अहंकार पर पड़ता है। ‘‘मैं ब्राह्मी शक्ति का आधार हूँ, ईश्वरीय स्फुरणा गायत्री मेरे रोम-रोम में ओतप्रोत हो रही है, मैं उसे अधिकाधिक मात्रा में अपने अन्दर धारण करके ब्राह्मी-भूत हो रहा हूँ।’’ यह मान्यताएँ मानवीय अहंकार को पाशविक स्तर से बहुत ऊँचा उठा ले जाती हैं और उसे देवभाव में अवस्थित करती हैं। गायत्री साधना अपने साधक को दैवी आत्म-विश्वास, ईश्वरीय अहंकार प्रदान करती है और वह कुछ ही समय में वस्तुत: वैसा ही हो जाता है। जिस स्तर पर उसकी आत्म-मान्यता है, उसी स्तर पर चित्त-प्रवृत्तियाँ रहेंगी। वैसी आदतें, इच्छाएँ, रुचियाँ, प्रवृत्तियाँ क्रियाएँ उसमें दीख पड़ेंगी। जो दिव्य मान्यता से ओत-प्रोत है- निश्चय ही उसकी इच्छाएँ, आदतें और क्रियाएँ वैसी ही होंगी। यह साधना प्रक्रिया मानव अन्त:करण का कायाकल्प कर देती है।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य