शुक्रवार, 21 जुलाई 2017

👉 हारिय न हिम्मत दिनांक: २१

🌹  लगन और श्रम का महत्व   

🔵 लगन आदमी के अंदर हो तो सौ गुना काम करा लेती है। इतना काम करा लेती है कि हमारे काम को देखकर आपको आश्चर्य होगा। इतना साहित्य लिखने से लेकर इतना बड़ा संगठन खड़ा करने तक और इतनी बड़ी क्रान्ति करने से लेकर इतने आश्रम बनाने तक जो काम शुरू किये हैं वे कैसे हो गए? यह लगन और श्रम है।

🔴 यदि हमने श्रम से जी चुराया होता तो उसी तरीके से घटिया आदमी होकर के रह जाते जैसे कि अपना पेट पालना ही जिनके लिए मुश्किल हो जाता है। चोरी से ,, ठगी से ,, चालाकी से जहॉं कहीं भी मिलता पेट भरने के लिए ,, कपड़े पहनने के लिए और अपना मौज- शौक पूरा करने के लिए पैसा इकट्ठा करते रहते पर हमारा यह बड़ा काम संभव न हो पाता।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Lose Not Your Heart Day 21

🌹  The Importance of Hard Work and Desire

🔵 The desire to achieve something is an immensely powerful force. It can drive a person to work a hundred times harder than his normal capacity. You might be surprised at what I have achieved; from writing so much literature to bringing this revolution and creating so many ashrams how did all of this happen? This is the result of hard work and a desire to achieve.

🔴 If i had not applied myself to hard work, I might have remained the type of person for whom it is difficult even to make his own living. I would have accumulated money for my own petty entertainment by whatever means possible, but i would never have been able to accomplish such a Himalayan task.d you will retain your mental equilibrium.

🌹 ~Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 आज का सद्चिंतन 21 July 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 21 July 2017


गुरुवार, 20 जुलाई 2017

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 32)

🌹  समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी और बहादुरी को जीवन का एक अविच्छिन्न अंग मानेंगे।

🔴 सुसंस्कारिता का तीसरा पक्ष है- जिम्मेदारी मनुष्य अनेकानेक जिम्मेदारियों से बँधा हुआ है। यों गैर जिम्मेदार लोग कुछ भी कर गुजरते हैं, किसी भी दिशा में चल पड़ते हैं। अपने किन्हीं भी उत्तरदायित्वों से निर्लज्जतापूर्वक इंकार कर सकते हैं, पर जिम्मेदार लोगों को ही अपने अनेक उत्तरदायित्वों का सही रीति से, सही समय पर निर्वाह करना पड़ता है। स्वास्थ्य को सुरक्षित रखने की, जीवन सम्पदा का श्रेष्ठतम सदुपयोग करने की, लोक परलोक को उत्कृष्ट बनाने की व्यक्तिगत जिम्मेदारी जो निभाना चाहते हैं, वे ही संतोष, यश और आरोग्य का लाभ प्राप्त कर सकते हैं।

🔵 पारिवारिक जिम्मेदारियाँ समझने वाले आश्रितों को स्वावलम्बी, सद्गुणी बनाने में निरत रहते हैं और संतान बढ़ाने के अवसर आने पर फूँक- फूँ क कर कदम रखते हैं। हजार बार सोचते- समझते हैं और विचार करते हैं कि अभ्यागत को बुलाने के लिए उपयुक्त सामग्री, आश्रितों और असमर्थों के प्रति अपने उत्तरदायित्वों का निर्वाह करने में संकीर्ण स्वार्थपरता उन्हें बाधा नहीं डालती।

🔴 पेट और प्रजनन तक ही मनुष्य की सीमा नहीं है। धर्म और संस्कृति के प्रति, विश्व मानवता के प्रति, मनुष्य के सामाजिक एवं सार्वभौम उत्तरदायित्व जुड़े हैं, यहाँ तक कि अन्य प्राणियों एवं वनस्पतियों के प्रति भी। उन सभी के संबंध में दायित्वों एवं कर्तव्यों के निर्वाह की चिंता हर किसी को रहनी चाहिए। यह कार्य तभी संभव है, जब अपनी संकीर्ण स्वार्थपरता पर अंकुश लगाया जाए। औसत व्यावहारिक स्तर का निर्वाह स्वेच्छापूर्वक स्वीकार किया जाए।

🔵 यह लोभ, मोह, अहंकार का, वासना, तृष्णा और संकीर्ण स्वार्थपरता का घटाटोप ऊपर छाया होगा, तो फिर नासमझ बच्चों का मन, न तो उस स्तर का सोचेगा और न सयानों से लोकमंगल के लिए कुछ निकालते बन पड़ेगा। आवश्यकताएँ तो कोई थोड़े श्रम, समय में पूरी कर सकता है, पर वैभव जन्य भौतिक महत्त्वाकाँक्षाएँ तो ऐसी हैं जिन्हें पूरी कर सकना रावण, हिरण्यकश्यपु, सिकंदर आदि तक के लिए संभव नहीं हुआ, फिर सामान्य स्तर के लोगों की तो बात ही क्या है? वे हविश की जलती चिताओं वाली कशमकश में आजीवन विचरण करते रहते हैं। भूत- पलीत की तरह डरते- डराते समय गुजारते और अन्ततः असंतोष तथा पाप की चट्टानों ही सिर पसर लादकर विदा होते हैं। 

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.44

http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v2.7

👉 भगवान शिव और उनका तत्त्वदर्शन (भाग 5)

🔵 शंकर जी का विवाह हुआ तो लोगों ने कहा कि किसी बड़े आदमी को बुलाओ, देवताओं को बुलाओ। उन्होंने कहा नहीं, हमारी बारात में तो भूत-पलीत ही चलेंगे। रामायण का छंद है—‘तनु क्षीन कोउ अति पीत पावन कोउ अपावन तनु धरे।’ शंकर जी ने भूत-पलीतों का, पिछड़ों का भी ध्यान रखा और अपनी बारात में ले गये। आपको भी इनको साथ लेकर चलना है।

🔴 शंकर जी के भक्तों! अगर आप इन्हें साथ लेकर चल नहीं सकते तो फिर आपको सोचने में मुश्किल पड़ेगी, समस्याओं का सामना करना पड़ेगा और फिर जिस आनन्द में और खुशहाली में शंकर के भक्त रहते हैं, आप रह नहीं पाएँगे। जिन शंकर जी के चरणों में आप बैठे हुए हैं, उनसे क्या कुछ सीखेंगे नहीं? पूजा ही करते रहेंगे आप! यह सब चीजें सीखने के लिए ही हैं। भगवान् को कोई खास पूजा की आवश्यकता नहीं पड़ती।

🔵 शंकर भगवान की सवारी क्या थी? बैल। वह बैल पर सवार होते हैं। बैल उसे कहते हैं, जो मेहनतकश होता है, परिश्रमी होता है। जिस आदमी को मेहनत करनी आती है वह चाहे भारत में हो, इंग्लैण्ड, फ्रांस या कहीं का भी रहने वाला क्यों न हो—वह भगवान की सवारी बन सकता है। भगवान सिर्फ उनकी सहायता किया करते हैं जो अपनी सहायता आप करते हैं। बैल हमारे यहाँ शक्ति का प्रतीक है, हिम्मत का प्रतीक है।

🔴 आपको हिम्मत से काम लेना पड़ेगा और अपनी मेहनत तथा पसीने के ऊपर निर्भर रहना पड़ेगा, अपनी अक्ल के ऊपर निर्भर रहना पड़ेगा, आपके उन्नति के द्वार और कोई नहीं खोल सकता, स्वयं खोलना होगा। भैंसे के ऊपर कौन सवार होता है—देखा आपने शनीचर। भैंसा वह होता है जो काम करने से जी चुराता है। बैल-हमेशा से शंकर जी का बड़ा प्यारा रहा है। वह उस पर सवार रहे हैं, उसको पुचकारते हैं, खिलाते-पिलाते, नहलाते-धुलाते, और अच्छा रखते हैं। हमको और आपको बैल बनना चाहिए, यह शंकर जी की शिक्षा है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 मैं नारी हूँ (भाग 2)

🔴 गर्वित पुरुष जब सिंह, व्याघ्र आदि हिंस्र प्राणियों की अपेक्षा और भी अधिक हिंस्र हो जाता है, कठोरता के साथ मिलते मिलते उसकी कोमल वृत्तियाँ जब सूख जाती हैं। जब वह राक्षसी वृत्तियों का सहारा लेकर जगत को चूर चूर कर डालने के लिए उतारू हो जाता है। तब उस शुष्क मरुभूमि में जल की सुशीतल धारा कौन बहाती है ? मैं ही, उसकी सहधर्मिणी ही। उसको, अपने पास बैठाकर अपना अपनत्व उसमें मिलाकर मैं उसे कोमल करती हूँ। मेरी शक्ति अप्रतिहत है। प्रयोग करने की कला जानने पर वह कभी व्यर्थ नहीं जाती।

🔵 बाहर के जगत में मेरे कर्तव्य का विस्तार होते हुए भी मैं अपने घर को नहीं भूलती। वह मेरे पिता, पति, भाई और पुत्र की आश्रय भूमि हैं उन्हें यहाँ मेरी सुशीतल छाया नहीं मिलेगी, तो वे विश्रान्ति कहाँ पाएंगे। उनका समूचा अस्तित्व मेरी गोद में अनायास समा जाता है। यही कारण है कि मेरी कर्मभूमि उनकी कर्मभूमि से कहाँ विशाल है। पुरुष जिस काम को नहीं कर सकता, उसको मैं अनायास ही कर सकती हूँ प्रमाण, पुरुष के अभाव में संसार चल सकता है परन्तु मेरे अभाव में अचल हो जाता है सब रहने पर भी कुछ नहीं रहता।

🔴 मैं पढ़ती हूँ, सन्तान को शिक्षा देने के लिए , पति के थके मन को शान्ति देने के लिए। मेरा ज्ञान मानव जीवन में विवेक का प्रकाश फैलाने के लिए है। मैं गाना बजाना सीखती हूँ - शौकीनों की लालसा पूर्ण करने के लिए नहीं, नर हृदय को कोमल बनाकर उसमें पूर्णता लाने के लिए, पुरुष की सोयी संवेदना जगाने के लिए। मैं स्वयं नहीं नाचती, वरन् जगत को नचाती हूँ।

🔵 मैं सीखती हूँ - सिखाने के लिए। शिक्षा के क्षेत्र में मेरा जन्मगत अधिकार है। मैं गुलाम नहीं पैदा करती। मैं प्रकट करती हूँ आदर्श, सृजन करती हूँ मानव, महामानव। महात्मा गाँधी, लोकमान्य तिलक, दयानन्द, विवेकानन्द, अरविन्द सब मेरी ही देन है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 अखण्ड ज्योति- सितम्बर 1996 पृष्ठ 8
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1996/September/v1.8

👉 हारिय न हिम्मत दिनांक :: २०

🌹  भटकना मत   

🔵 लोभों के झोंके, मोहों के झोंके, नामवरी के झोंके, यश के झोंके, दबाव के झोंके ऐसे हैं कि आदमी को लंबी राह पर चलने के लिए मजबूर कर देते हैं और कहॉं से कहॉं घसीट कर ले जाते हैं। हमको भी घसीट ले गये होते। ये सामान्य आदमियों को घसीट ले जाते हैं। बहुत से व्यक्तियों में जो सिद्धान्तवाद की राह पर चले इन्हीं के कारण भटक कर कहॉं से कहॉं जा पहुँचे।

🔴 आप भटकना मत। आपको जब कभी भटकन आये तो आप अपने उस दिन की उस समय कीमन:स्थिति को याद कर लेना, जब कि आपके भीतर से श्रद्धा का एक अंकुर उगा था। उसी बात को याद रखना कि परिश्रम करने के प्रति जो हमारी उमंग और तरंग होनी चाहिए उसमें कमी तो नहीं आ रही।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Lose Not Your Heart Day 20

🌹  Do Not Stray

🔵 The desire to survive can quickly give way to the desire for wealth, fame, and material success, each of which is so powerful that an ordinary person can be easily swept away. Only those with their sights set on higher ideals can remain firm against the tide.

🔴 When you feel lost, remember when determination first took root in your heart. Make sure that your commitment to your cause is not ebbing away.

🌹 ~Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 आज का सद्चिंतन 20 July 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 20 July 2017


👉 खुशी की वजह.....

🔴 मैं एक घर के करीब से गुज़र रहा था की अचानक से मुझे उस घर के अंदर से एक बच्चे की रोने की आवाज़ आई। उस बच्चे की आवाज़ में इतना दर्द था कि अंदर जाकर वह बच्चा क्यों रो रहा है, यह मालूम करने से मैं खुद को रोक ना सका।

🔵 अंदर जा कर मैने देखा कि एक माँ अपने दस साल के बेटे को आहिस्ता से मारती और बच्चे के साथ खुद भी रोने लगती। मैने आगे हो कर पूछा बहनजी आप इस छोटे से बच्चे को क्यों मार रही हो? जबकि आप खुद भी रोती हो।

🔴 उसने जवाब दिया भाई साहब इसके पिताजी भगवान को प्यारे हो गए हैं और हम लोग बहुत ही गरीब हैं, उनके जाने के बाद मैं लोगों के घरों में काम करके घर और इसकी पढ़ाई का खर्च बामुश्किल उठाती हूँ और यह कमबख्त स्कूल रोज़ाना देर से जाता है और रोज़ाना घर देर से आता है।

🔵 जाते हुए रास्ते मे कहीं खेल कूद में लग जाता है और पढ़ाई की तरफ ज़रा भी ध्यान नहीं देता है जिसकी वजह से रोज़ाना अपनी स्कूल की वर्दी गन्दी कर लेता है। मैने बच्चे और उसकी माँ को जैसे तैसे थोड़ा समझाया और चल दिया।

🔴 इस घटना को कुछ दिन ही बीते थे की एक दिन सुबह सुबह कुछ काम से मैं सब्जी मंडी गया। तो अचानक मेरी नज़र उसी दस साल के बच्चे पर पड़ी जो रोज़ाना घर से मार खाता था। मैं क्या देखता हूँ कि वह बच्चा मंडी में घूम रहा है और जो दुकानदार अपनी दुकानों के लिए सब्ज़ी खरीद कर अपनी बोरियों में डालते तो उनसे कोई सब्ज़ी ज़मीन पर गिर जाती थी वह बच्चा उसे फौरन उठा कर अपनी झोली में डाल लेता।

🔵 मैं यह नज़ारा देख कर परेशानी में सोच रहा था कि ये चक्कर क्या है, मैं उस बच्चे का चोरी चोरी पीछा करने लगा। जब उसकी झोली सब्ज़ी से भर गई तो वह सड़क के किनारे बैठ कर उसे ऊंची ऊंची आवाज़ें लगा कर वह सब्जी बेचने लगा। मुंह पर मिट्टी गन्दी वर्दी और आंखों में नमी, ऐसा महसूस हो रहा था कि ऐसा दुकानदार ज़िन्दगी में पहली बार देख रहा हूँ ।

🔴 अचानक एक आदमी अपनी दुकान से उठा जिसकी दुकान के सामने उस बच्चे ने अपनी नन्ही सी दुकान लगाई थी, उसने आते ही एक जोरदार लात मार कर उस नन्ही दुकान को एक ही झटके में रोड पर बिखेर दिया और बाज़ुओं से पकड़ कर उस बच्चे को भी उठा कर धक्का दे दिया।

🔵 वह बच्चा आंखों में आंसू लिए चुप चाप दोबारा अपनी सब्ज़ी को इकठ्ठा करने लगा और थोड़ी देर बाद अपनी सब्ज़ी एक दूसरे दुकान के सामने डरते डरते लगा ली। भला हो उस शख्स का जिसकी दुकान के सामने इस बार उसने अपनी नन्ही दुकान लगाई उस शख्स ने बच्चे को कुछ नहीं कहा।

🔴 थोड़ी सी सब्ज़ी थी ऊपर से बाकी दुकानों से कम कीमत। जल्द ही बिक्री हो गयी, और वह बच्चा उठा और बाज़ार में एक कपड़े वाली दुकान में दाखिल हुआ और दुकानदार को वह पैसे देकर दुकान में पड़ा अपना स्कूल बैग उठाया और बिना कुछ कहे वापस स्कूल की और चल पड़ा। और मैं भी उसके पीछे पीछे चल रहा था।

🔵 बच्चे ने रास्ते में अपना मुंह धोकर स्कूल चल दिया। मै भी उसके पीछे स्कूल चला गया। जब वह बच्चा स्कूल गया तो एक घंटा लेट हो चुका था। जिस पर उसके टीचर ने डंडे से उसे खूब मारा। मैने जल्दी से जाकर टीचर को मना किया कि मासूम बच्चा है इसे मत मारो। टीचर कहने लगे कि यह रोज़ाना एक डेढ़ घण्टे लेट से ही आता है और मै रोज़ाना इसे सज़ा देता हूँ कि डर से स्कूल वक़्त पर आए और कई बार मै इसके घर पर भी खबर दे चुका हूँ।

🔴 खैर बच्चा मार खाने के बाद क्लास में बैठ कर पढ़ने लगा। मैने उसके टीचर का मोबाइल नम्बर लिया और घर की तरफ चल दिया। घर पहुंच कर एहसास हुआ कि जिस काम के लिए सब्ज़ी मंडी गया था वह तो भूल ही गया। मासूम बच्चे ने घर आ कर माँ से एक बार फिर मार खाई। सारी रात मेरा सर चकराता रहा।

🔵 सुबह उठकर फौरन बच्चे के टीचर को कॉल की कि मंडी टाइम हर हालत में मंडी पहुंचें। और वो मान गए। सूरज निकला और बच्चे का स्कूल जाने का वक़्त हुआ और बच्चा घर से सीधा मंडी अपनी नन्ही दुकान का इंतेज़ाम करने निकला। मैने उसके घर जाकर उसकी माँ को कहा कि बहनजी आप मेरे साथ चलो मै आपको बताता हूँ, आप का बेटा स्कूल क्यों देर से जाता है।

🔴 वह फौरन मेरे साथ मुंह में यह कहते हुए चल पड़ीं कि आज इस लड़के की मेरे हाथों खैर नही। छोडूंगी नहीं उसे आज। मंडी में लड़के का टीचर भी आ चुका था। हम तीनों ने मंडी की तीन जगहों पर पोजीशन संभाल ली, और उस लड़के को छुप कर देखने लगे। आज भी उसे काफी लोगों से डांट फटकार और धक्के खाने पड़े, और आखिरकार वह लड़का अपनी सब्ज़ी बेच कर कपड़े वाली दुकान पर चल दिया।

🔵 अचानक मेरी नज़र उसकी माँ पर पड़ी तो क्या देखता हूँ कि वह  बहुत ही दर्द भरी सिसकियां लेकर लगातार रो रही थी, और मैने फौरन उसके टीचर की तरफ देखा तो बहुत शिद्दत से उसके आंसू बह रहे थे। दोनो के रोने में मुझे ऐसा लग रहा था जैसे उन्हों ने किसी मासूम पर बहुत ज़ुल्म किया हो और आज उन को अपनी गलती का एहसास हो रहा हो।

🔴 उसकी माँ रोते रोते घर चली गयी और टीचर भी सिसकियां लेते हुए स्कूल चला गया। बच्चे ने दुकानदार को पैसे दिए और आज उसको दुकानदार ने एक लेडी सूट देते हुए कहा कि बेटा आज सूट के सारे पैसे पूरे हो गए हैं। अपना सूट लेलो, बच्चे ने उस सूट को पकड़ कर स्कूल बैग में रखा और स्कूल चला गया।

🔵 आज भी वह एक घंटा देर से था, वह सीधा टीचर के पास गया और बैग डेस्क पर रखकर मार खाने के लिए अपनी पोजीशन संभाल ली और हाथ आगे बढ़ा दिए कि टीचर डंडे से उसे मार ले। टीचर कुर्सी से उठा और फौरन बच्चे को गले लगाकर इस क़दर ज़ोर से रोया कि मैं भी देख कर अपने आंसुओं पर क़ाबू ना रख सका।

🔴 मैने अपने आप को संभाला और आगे बढ़कर टीचर को चुप कराया और बच्चे से पूछा कि यह जो बैग में सूट है वह किसके लिए है। बच्चे ने रोते हुए जवाब दिया कि मेरी माँ अमीर लोगों के घरों में मजदूरी करने जाती है और उसके कपड़े फटे हुए होते हैं कोई जिस्म को पूरी तरह से ढांपने वाला सूट नहीं और और मेरी माँ के पास पैसे नही हैं इसलिये अपने माँ के लिए यह सूट खरीदा है।

🔵 तो यह सूट अब घर ले जाकर माँ को आज दोगे ? मैने बच्चे से सवाल पूछा। जवाब ने मेरे और उस बच्चे के टीचर के पैरों के नीचे से ज़मीन ही निकाल दी। बच्चे ने जवाब दिया नहीं अंकल छुट्टी के बाद मैं इसे दर्जी को सिलाई के लिए दे दूँगा। रोज़ाना स्कूल से जाने के बाद काम करके थोड़े थोड़े पैसे सिलाई के लिए दर्जी के पास जमा किये हैं।

🔴 टीचर और मैं सोच कर रोते जा रहे थे कि आखिर कब तक हमारे समाज में गरीबों और विधवाओं के साथ ऐसा होता रहेगा उनके बच्चे त्योहार की खुशियों में शामिल होने के लिए जलते रहेंगे आखिर कब तक।

🔵 क्या हम अपनी खुशियों के मौके पर अपनी ख्वाहिशों में से थोड़े पैसे निकालकर अपने समाज मे मौजूद गरीब और बेसहारों की मदद नहीं कर सकते।
🔴 आप सब भी ठंडे दिमाग से एक बार जरूर सोचना !!!!

बुधवार, 19 जुलाई 2017

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 31)

🌹  समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी और बहादुरी को जीवन का एक अविच्छिन्न अंग मानेंगे।

🔴 दूरदर्शिता, विवेकशीलता, उस अनुभवी किसान की गतिविधियों जैसी हैं, जिनके अनुसार खेत जोतने, बीज बोने खाद- पानी देने, रखवाली करने में आरंभिक हानि उठाने और कष्ट सहने को शिरोधार्य किया जाता है। दूरदर्शिता उसे बताती है कि इसका प्रतिफल उसे समयानुसार मिलने ही वाला है। एक बीज के दाने के बदले सौ दाने उगने ही वाले हैं और समय पर उस प्रयास के प्रतिफल कोठे भरे धन धान्य के रूप में मिलने ही वाले हैं। संयम और सत्कार्य ऐसे ही बुद्धिमत्ता है। पुण्य परमार्थ में भविष्य को उज्ज्वल बनाने वाली संभावनाएँ सन्निहित है।

🔵 संयम का प्रतिफल वैभव और पौरुष के रूप में दृष्टिगत होने वाली है। दूरबीन के सहारे दूर तक की वस्तुओं को देखा जा सकता है। और उस जानकारी के आधार पर अधिक बुद्धिमत्ता पूर्ण निर्णय लिया जा सकता है। अध्यात्म की भाषा में इसी को तृतीय नेत्र खुलना भी कहते हैं, जिसके आधार पर विपत्तियों से बचना और उज्ज्वल भविष्य की संभावनाओं का सृजन संभव हो सकता है।

🔴 सुसंस्कारिता का दूसरा चिह्न है- ईमानदारी कथनी और करनी को एक- सा रखना ईमानदारी है। आदान- प्रदान में प्रामाणिकता को इसी सिद्धांत के सहारे अक्षुण्ण रखा जाता है। विश्वसनीयता इसी आधार पर बनती है। सहयोग और सद्भाव अर्जित करने के लिए ईमानदारी ही प्रमुख आधार है। इसे अपने व्यवसाय में अपनाकर कितनों ने छोटी स्थिति से उठकर बड़े बनने में सफलता पाई है। बड़े उत्तरदायित्वों को उपलब्ध करने और उसका निर्वाह करने में ईमानदार ही सफल होते हैं।

🔵 इस सद्गुण को सुसंस्कारिता का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष माना गया है। उसे अपनाने वाले ईमानदारी और परिश्रम की कमाई से ही अपना काम चला लेते हैं। उनकी गरीबी भी ऐसी शानदार होती है, जिस पर अमीरी के भंडार को निछावर किया जा सके। 

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.43

http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v2.7

👉 मैं नारी हूँ (भाग 1)

🔴 मैं नारी हूँ। मैं अपने पति की सहधर्मिणी हूँ और अपने पुत्र की जननी हूँ। मुझ सा श्रेष्ठ संसार में और कौन है, तमाम जगत् मेरा कर्मक्षेत्र है, मैं स्वाधीन हूँ, क्योंकि मैं अपनी इच्छानुरूप कार्य कर सकती हूँ। मैं जगत में किसी से नहीं डरती। मैं महाशक्ति की अंश हूँ। मेरी शक्ति पाकर ही मनुष्य शक्तिमान है।

🔵 मैं स्वतंत्र हूँ, परन्तु उच्छृंखल नहीं हूँ। मैं शक्ति का उद्गम स्थान हूँ, परंतु अत्याचार के द्वारा अपनी शक्ति को प्रकाशित नहीं करती। मैं केवल कहती ही नहीं करती भी हूँ। मैं काम न करूं, तो संसार अचल हो जाए। सब कुछ करके भी मैं अहंकार नहीं करती। जो कर्म करने का अभिमान करते हैं, उनके हाथ थक जाते हैं।

🔴 मेरा कर्मक्षेत्र बहुत बड़ा है। वह घर के बाहर है और घर के अन्दर भी। घर में मेरी बराबरी की समझ रखने वाला कोई है ही नहीं। मैं जिधर देखती हूँ, उधर ही अपना अप्रतिहत कर्तव्य पाती हूँ। मेरे कर्तव्य में बाधा देने वाला कोई नहीं है, क्योंकि मैं वैसा सुअवसर किसी को देती ही नहीं। पुरुष मेरी बात सुनने के लिए बाध्य है - आखिर मैं गृहस्वामिनी जो हूँ। मेरी बात से गृह संसार उन्नत होता है। इसलिए पति के सन्देह का तो कोई कारण ही नहीं है और पुत्र, वह तो मरा है ही, उसी के लिए तो हम दोनों व्यस्त हैं। इन दोनों को , पति को और पुत्र को अपने वश में करके मैं जगत् में अजेय हूँ। डर किसको कहते हैं, मैं नहीं जानती। मैं पाप से घृणा करती हूँ। अतएव डर मेरे पास नहीं आता। मैं भय को नहीं देखती इसी से कोई दिखाने की चेष्टा नहीं करता।

🔵 संसार में मुझसे बड़ा और कौन है ? मैं तो किसी को भी नहीं देखती और जगत में मुझसे बढ़कर छोटा भी कौन है ? उसको भी तो कहीं नहीं खोज पाती। पुरुष दम्भ करता है कि मैं जगत में प्रधान हूँ, बड़ा हूँ, मैं किसी की परवाह नहीं करता। वह अपने दम्भ और दर्प से देश को कंपाना चाहता है। वह कभी आकाश में उड़ता है, कभी सागर में डुबकी मारता है और कभी रणभेरी बजाकर आकाश वायु को कंपाकर दूर दूर तक दौड़ता है, परन्तु मेरे सामने तो वह सदा छोटा ही है, क्योंकि मैं उसकी माँ हूं। उसके रुद्र रूप को देखकर हजारों लाखों काँपते हैं, परन्तु मेरे अंगुली हिलाते ही वह चुप हो जाने के लिए बाध्य है। मैं उसकी माँ - केवल असहाय बचपन में ही नहीं सर्वदा और सर्वत्र हूँ। जिसके स्तनों का दूध पीकर उसकी देह पुष्ट हुई है, उसका मातृत्व के इशारे पर सिर झुकाकर चलने के लिए वह बाध्य है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 अखण्ड ज्योति- सितम्बर 1996 पृष्ठ 8
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1996/September/v1.8

👉 आत्मचिंतन के क्षण 19 July

🔴 अनेक प्रलोभन तेजी से हमें वश में कर लेते हैं, हम अपनी आमदनी को भूल कर उनके वशीभूत हो जाते हैं। बाद में रोते चिल्लाते हैं। जिह्वा के आनन्द, मनोरंजन आमोद प्रमोद के मजे हमें अपने वश में रखते हैं। हम सिनेमा का भड़कीला विज्ञापन देखते ही मन को हाथ से खो बैठते हैं और चाहे दिन भर भूखे रहें, अनाप-शनाप व्यय कर डालते हैं। इन सभी में हमें मनोनिग्रह की नितान्त आवश्यकता है। मन पर संयम रखिये। वासनाओं को नियंत्रण में बाँध लीजिये, पॉकेट में पैसा न रखिये। आप देखेंगे कि आप इन्द्रियों को वश में रख सकेंगे।

🔵 प्रलोभन एक तेज आँधी के समान है जो मजबूत चरित्र को भी यदि वह सतर्क न रहे, गिराने की शक्ति रखती है। जो व्यक्ति सदैव जागरुक रहता है, वह ही संसार के नाना प्रलोभनों आकर्षणों, मिथ्या दंभ, दिखावा, टीपटाप से मुक्त रह सकता है। यदि एक बार आप प्रलोभन और वासना के शिकार हुए तो वर्षों उसका प्रायश्चित करने में लग जायेंगे।

🔴 सदा अपनी आमदनी पर दृष्टि रखिये। आमदनी से अधिक व्यय करना नितान्त मूर्खता और दिवालियापन की निशानी है। जैसे-2 आमदनी कम होती जाये, वैसे-2 व्यय भी उसी अनुपात में कम करते जाइये। व्यय में से विलासिता और आराम की वस्तुओं को क्रमशः हटाते चलिये, व्यसन छोड़ दीजिये, सस्ता खाइये, एक समय खाइये, सस्ता पहनिये। मामूली मकान में रह जाइये, नौकरों को छुड़ाकर स्वयं काम किया कीजिये, धोबी का काम खुद कर लीजिये, चाहे बर्तन तक खुद साफ कर लीजिये किन्तु आमदनी के बाहर पाँव न रखिये।।
                                        
🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 भगवान शिव और उनका तत्त्वदर्शन (भाग 4)

🔵 भगवान शंकर के मस्तिष्क के ऊपर चन्द्रमा लगा हुआ है। चन्द्रमा शांति का प्रतीक है, जो बताता है कि हमारे मस्तिष्क को संतुलित होना चाहिए, ठंडा होना चाहिए, बलिष्ठ होना चाहिए। हम पर मुसीबतें आती हैं, संकट के, कठिनाई के दिन आते हैं। हर हालत में हमें अपनी हिम्मत बना करके रखनी चाहिए कि हम हर मुसीबत का सामना करेंगे। इनसानों ने बड़ी-बड़ी मुसीबतों का सामना किया है। जो घबरा जाते हैं, उनका मस्तिष्क संतुलित नहीं रहता, गर्म हो जाता है। जिस व्यक्ति का दिमाग ठंडा है, वही सही ढंग से सोच सकता है और सही काम कर सकता है पर जिसका दिमाग गरम हो जाता है, असंतुलित हो जाता है, तो वह काम करता है जो नहीं करना चाहिए और वह सोचता है कि जो नहीं सोचना चाहिए।

🔴 मुसीबत के वक्त आज जब घटाएँ चारों ओर से हमारी ओर घुमड़ती हुई आ रही हैं, तब सबसे जरूरी बात है हम शंकर भगवान के चरणों में जाएँ। आरती उतारने के बाद मस्तक झुकाएँ और यह कहें कि आपके मस्तक पर शांति का प्रतीक, संतुलन का प्रतीक, विभेद का प्रतीक चन्द्रमा लटक रहा है। क्या आप हमको धीरज देंगे नहीं? संतुलन देंगे नहीं? क्या शांति नहीं देंगे? हिम्मत नहीं देंगे? क्या आप इतनी भी कृपा नहीं कर सकते? अगर हमने यह प्रार्थना की होती तो मजा आ जाता, फिर हम शांति ले करके आते और शंकर जी के भक्तों के तरीके से रहते।

🔵 शंकर भगवान के गले में पड़े हुए हैं काले साँप और मुण्डों की माला। काले विषधरों का इस्तेमाल इस तरीके से किया है, उन्होंने कि उनके लिए ये फायदेमन्द हो गए, उपयोगी हो गए और काटने भी नहीं पाए। शंकर जी इस शिक्षा को हर शंकर-भक्त को अपनी फिलॉसफी में सम्मिलित करना ही चाहिए कि विषैले लोगों से किस तरीके से ‘डील’ करना चाहिए, किस तरीके से उन्हें गले से लगाना चाहिए और किस तरीके से उनसे फायदा उठाना चाहिए?

🔴 शंकर जी के गले पर पड़ी मुण्डों की माला भी यह कह रही है कि जिस चेहरे को हम बीस बार शीशे में देखते हैं, सजाने-सँवारने के लिए रंग-पावडर पोतते हैं, वह मुण्डों की हड्डियों का टुकड़ा मात्र है। चमड़ी, जिसे ऊपर से सुनहरी चीजों से रंग दिया गया है और जिस बाहरी टुकड़े के रंग को हम देखते हैं, उसे उघाड़कर देखें तो मिलेगा कि इनसान की जो खूबसूरती है, उसके पीछे सिर्फ हड्डी का टुकड़ा जमा हुआ पड़ा है। हड्डियों की मुण्डमाला की यह शिक्षा है, नसीहत है मित्रो! जो हमको शंकर भगवान के चरणों में बैठकर सीखनी चाहिए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हारिय न हिम्मत दिनांक :: १९

🌹  पुरूषार्थ की शक्ति 

🔵 सुधारवादी तत्वों की स्थिति और भी उपहासास्पद है। धर्म, अध्यात्म, समाज एवं राजनीतिक क्षेत्रों में सुधार एवं उत्थान के नारे जोर- शोर से लगाये जाते हैं। पर उन क्षेत्रों में जो हो रहा है, जो लोग कर रहे हैं, उसमें कथनी और करनी के बीच जमीन आसमान जैसा अंतर देखा जा सकता है। एंसी दशा में उज्जवल भविष्य की आशा धूमिल ही होती चली जा रही है।

🔴 क्या हम सब ऐसे ही समय की प्रतिक्षा में,, ऐसे ही हाथ पर हाथ रखकर बैठे रहें। अपने को असहाय,, असमर्थ अनुभव करते रहें और स्थिति बदलने के लिए किसी दूसरे पर आशा लगाये बैठे रहें। मानवी पुरुषार्थ कहता है ऐसा नहीं होना चाहिए।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Lose Not Your Heart Day 19

🌹  The Power of Valor

🔵 Contemporary reformers are practically laughable. These false preachers shout down from rooftops that they will bring about religious, social, and political change. However, the differences between their words and actions are glaring. In these situations any sense of hope seems dimmed.

🔴 We do not need to wait quietly for a bright future, nor do we need to feel helpless and dependent on others to usher it in. We have the power to create it ourselves.

🌹 ~Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 आज का सद्चिंतन 19 July 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 19 July 2017


मंगलवार, 18 जुलाई 2017

👉 भगवान प्रेम स्वरूप हैं। (भाग 2)

🔴 मनुष्य अपने आपको नहीं पहचान पाता है वास्तव में जो कुछ वह किया करता है उसी से कार्यानुसार दंड व यश का भागी बनता है। अब सब कुछ मनुष्य मात्र पर ही रह जाता है। यदि मनुष्य स्वतः को सुधार लेता है तो वह सबको सुधार सकता है परन्तु जब वह स्वतः नहीं सुधरेगा तो दूसरों को कैसे सुधार सकता है। नियमों का विधान पालन करने के लिए ही बनाया जाता है। जब उन विचारों का उल्लंघन किया जाता है तब मनुष्य अपने कर्त्तव्य से च्युत हो जाता है तब उसे उस अवस्था में दंड प्राप्त होता है।

🔵 यहाँ प्रधानता मनुष्य के कर्मों की ही है वह कर्मानुसार ही फल को प्राप्त होता है। भगवान सबसे प्रेम करते हैं। भगवान की मान्यता ही मानवता का आधार है। चाहे कितनी ही बाधाएं सामने क्यों न खड़ी हों, यदि मनुष्य प्रेमपूर्वक उनका अभिनन्दन कर, प्रेम स्वरूप प्रभु का मंगल विधान समझ अपने पथ पर दृढ़ होकर डटा रहता है तो उसका विकास सदैव सही मार्ग से ही होता है। मनुष्य के लिए कर्त्तव्य की जो सीमा निर्धारित की गई है उसके पालन के लिए न तो कोई विशेष प्रयत्न ही आवश्यक है और न कोई साधना की, सीधा पथ है-उस प्रभु का आधार।

🔴 सब कठिनाइयों का प्रेमपूर्वक स्वागत करें तो आप उन्हें अवश्य जीत सकेंगे। भारी से भारी विपत्ति क्यों न हो हमें उसका प्रेमपूर्वक अभिनन्दन करना चाहिए। भगवान के प्रत्येक विधान में हमारा मंगल भरा है। आज जो विपत्ति व बाधाएं हमारे सामने हैं उनसे मुँह मोड़ने व भागने की आवश्यकता नहीं है। उनका आविर्भाव तो हमारे कल्याण के लिए ही हुआ है। हो सकता है हमारे पूर्व जन्म के कर्मों के कारण उपलक्ष के ही वे हमें प्राप्त हो रही हों। हमें कब और किस समय कौन सी वस्तु की आवश्यकता होती है यह वे अंतर्यामी परम प्रभु स्वतः जानते हैं।

🔵 परम पिता हमें कितना अपार स्नेह देते हैं यदि वह रहस्य हम समझ जाए तो सुख और दुख, शाँति अशाँति दोनों ही हमारे लिए समान हो जाएंगे। तथा यश व दंड का भेद ही न रह जायगा। अपने परम शुभ चिंतक मंगलमय भगवान के प्रत्येक विधान में हमें सदा प्रसन्न रहना चाहिए तथा सबसे प्रेम का व्यवहार कर प्रेम स्वरूप प्रभु को समझने का प्रयत्न करना चाहिए। प्रेम ही परमात्मा है और परमात्मा ही प्रेम है।

🌹 समाप्त
🌹 श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Lose Not Your Heart Day 18

🌹  The Call of Time

🔵 Courage calls to us. The current era and its responsibilities call to us. We cannot ignore them. To uplift ourselves and our society, we will endure paths that are filled with thorns. We will not worry about what others say or do; we will be guided only by our own conscience.

🔴 Let those who wander aimlessly in the darkness do so, but we will take refuge in the light of our wisdom and move forward. We will not look for support from others. We will always be guided by our soul and our conscience, and we will have the courage to carry out our tasks as wise people should.

🌹 ~Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 हारिय न हिम्मत दिनांक :: १८

🌹  पौरूष की पुकार 

🔵 साहस ने हमें पुकारा है। समय ने, युग ने,, कर्तव्य ने,, उत्तरदायित्व ने,, विवेक ने,, पौरूष ने हमें पुकारा है। यह पुकार अनसुनी न की जा सकेगी। आत्म निर्माण के लिए,, नव निर्माण के लिए हम काँटों से भरे रास्तों का स्वागत करेंगे और आगे बढ़ेंगे। लोग क्या कहते हैं और क्या करते हैं, इसकी चिंता कौन करे। अपनी आत्मा ही मार्गदर्शन के लिए पर्याप्त है। 

🔴 लोग अंधेरे में भटकते है, भटकते रहें । हम अपने विवेक के प्रकाश का अवलंबन कर स्वत: आगे बढ़ेंगे। कौन विरोध करता है, कौन समर्थन? इसकी गणना कौन करे । अपनी अंतरात्मा,, अपना साहस अपने साथ है और वही करेंगे, जो करना अपने जैसे सजग व्यक्तियों के लिए उचित और उपयुक्त है।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

सोमवार, 17 जुलाई 2017

👉 हारिय न हिम्मत दिनांक :: १७

🌹  बोलिए कम, करिए अधिक

🔵  ‘हमारी कोई सुनता नहीं, कहते कहते थक गए पर सुनने वाले कोई सुनते नहीं अर्थात् उन पर कुछ असर ही नहीं होता’- मेरी राय में इसमें सुनने वाले से अधिक दोष कहने वाले का है। कहने वाले करना नहीं चाहते। वे अपनी ओर देखें। आत्म निरीक्षण कार्य की शून्यता की साक्षी दे देगा। वचन की सफलता का सारा दारोमदार कर्मशीलता में है।

🔴 आप चाहे बोले नहीं, थोड़ा ही बोलें पर कार्य में जुट जाइये। आप थोड़े ही दिनों में देखेंगे कि लोग बिना कहे आपकी ओर खिंचे आ रहे हैं। अत: कहिए कम,, करिए अधिक। क्योंकि बोलने का प्रभाव तो क्षणिक होगा और कार्य का प्रभाव स्थाई होता है।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Lose Not Your Heart Day 17

🌹  Speak Less, Do More
🔵 Many people complain that no one listens to them. They say that their comments go unheeded and their thoughts unappreciated, and that they are tired of being ignored. The fault here lies in the speaker and not the listener. This is a demonstration of ignorance. Such people should first find their own faults by introspection. This will make their terrible lack of knowledge clear.

When you know how to carry out your work and lead by example, your instructions will be followed. Speak little, if at all, but above all involve yourself in your work, and your work will speak for you and call others to follow your example. Therefore speak less, do more: the effect pf speech is fleeting, whereas the effect of your work will be long-lasting.

🌹 ~Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 आत्मचिंतन के क्षण 17 July

🔴 आकांक्षाओं के अनुरूप परिस्थितियाँ उपलब्ध कर लेना हर किसी के लिए संभव नहीं, ऐसे सुयोग तो किसी विरलों को ही मिलते हैं। आकाँक्षाओं पर कोई प्रतिबंध नहीं, एक गरीब आदमी बे रोक टोक राजा बनने के सपने देख सकता है। पर इसके लिए जिस योग्यता, परिस्थिति, एवं साधना सामग्री की जरूरत है उसे जुटा लेना कठिन है, हमारी आकाँक्षाएं बहुधा ऐसी होती हैं जिनका वर्तमान परिस्थितियों से मेल नहीं खाता इसलिए उनका पूरा होना प्रायः बहुत कठिन होता है। ऐसे बुद्धिमान लोग विरले ही होते हैं जो अपनी वर्तमान परिस्थितियों के अनुरूप आकाँक्षाएं करते हैं और उनके पूर्ण होने पर सफलता एवं प्रसन्नता का सुख अनुभव करते हैं।

🔵 दुख और क्लेशों की आग में जलने से बचने की जिन्हें इच्छा है उन्हें पहला काम यह करना चाहिए कि अपनी आकाँक्षाओं को सीमित रखें। अपनी वर्तमान परिस्थिति में प्रसन्न और संतुष्ट रहने की आदत डालें। गीता के अनासक्त कर्मयोग का तात्पर्य वही है कि महत्वाकांक्षायें वस्तुओं की न करके केवल कर्तव्य पालन की करें। यदि मनुष्य किसी वस्तु की आकाँक्षा करता है और उसे प्राप्त भी कर लेता है तो उस प्राप्ति के समय उसे बड़ी प्रसन्नता होती है। इसी प्रकार यदि कोई व्यक्ति सर्वांगीण आत्मोन्नति के प्रयत्न कर कर्तव्य पालन करने की आकाँक्षा करे तो उसे सफलता मिलते समय मिलने वाले आनन्द की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती, वरन् जिस क्षण में कर्तव्य पालन आरम्भ करता है उसी समय से आकाँक्षा की पूर्ति आरम्भ हो जाती है और साथ ही सफलता का आनन्द भी मिलता चलता है।

🔴 वही दुःखी है जिसकी तृष्णा विशाल है, जो नित्य नई-नई चीजों, विलास सामग्रियों की कामना किया करता है रुपये की प्राप्ति की दुर्दमनीय इच्छा की पूर्ति के लिए दिन रात कोल्हू के बैल की तरह जुता रहता है। तृष्णा दुःख का मूल है। गरीब वह नहीं है, जिसके पास कम है, बल्कि वह जो अधिक चाहता है। धनवान होते हुए भी जिसकी धनेच्छा दूर नहीं हुई, वह सबसे अधिक अभागा है। वह भी एक प्रकार के नर्क में निवास करता है। जिसने अपनी कामनाओं और वासनाओं का दमन करके मन को जीत लिया है, उसने स्वर्ग पाया है।
                                        
🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 लज्जा ही नारी का सच्चा आभूषण है

🔴 मगध की सौंदर्य साम्राज्ञी वासवदत्ता उपवन विहार के लिये निकली। आज का साज-शृंगार उस राज-वधू की तरह था जो पहली बार ससुराल जाती हैं।

🔵 एकाएक दृष्टि उपवन-ताल के किनारे स्फटिक शिला पर बैठे तरुण संन्यासी उपगुप्त पर गई। दीवारी ने बाह्य सौन्दर्य को अनिर्दिष्ट कर लिया था और उस आनन्द में कुछ ऐसा निमग्न हो गया कि उसे बाह्य जगत् की कोई सुध न रही थी।

🔴 हवा में पायल की स्वर झंकृति और सुगन्ध की लहरें पैदा करती वासवदत्ता समीप जा खड़ी हुई। भिक्षु के नेत्र खोले। वासवदत्ता ने चपल-भाव से पूछा-महामहिम बतायेंगे नारी का सर्वश्रेष्ठ आभूषण क्या है?”

🔵 “जो उसके सौंदर्य को सहज रूप से बड़ा दे-तपस्वी ने उत्तर दिया।

🔴 सहज का क्या अर्थ है? चंचल नेत्रों को उपगुप्त पर डालती वासवदत्ता ने फिर प्रश्न दोहराया।

🔵 उपगुप्त ने सौम्य मुस्कान के साथ कहा-देवि आत्मा जिन गुणों को बिना किसी बाह्य इच्छा, आकर्षण, भय, या छल के अभिव्यक्त करे, उसे ही सहज भाव कहते हैं, सौंदर्य को जो बिना किसी कृत्रिम साधन के बढ़ाता हो, नारी का वह भाव ही सच्चा आभूषण है।”

🔴 किन्तु वह भी वासवदत्ता समझ न सकी। उसने कहा-मैं स्पष्ट जानना चाहती हूँ, यों पहेलियों में आप मुझे न उलझायें।”

🔵 उपगुप्त अब कुछ गम्भीर हो गये और बोले-भद्रे यदि आप और स्पष्ट जानना चाहती हैं तो इन कृत्रिम सौंदर्य परिधान और आभूषणों को उतार फैकिये।”

🔴 पैरों की थिरकन के साथ वासव ने एक-एक आभूषण उतार दिये। संन्यासी निर्निमेष वह क्रीड़ा देख रहा था, निश्छल, मौन, विचार-मग्न वासवदत्ता ने अब परिधान उतारने भी प्रारम्भ कर दिये। साड़ी, चुनरी, लहंगा और कंचुकी सब उत्तर गये। शुभ्र निर्वसन देह के अतिरिक्त शरीर पर कोई पट-परिधान शेष नहीं रहा। तपस्वी ने कहा-देवि किंचित् मेरी ओर तो देखिये।” किन्तु इस बार वासवदत्ता लज्जा से आविर्भूत ऊपर को सिर न उठा सकी। तपस्वी ने कहा-देवि यही, लज्जा ही नारी का सच्चा आभूषण है।” और जब तक उसने वस्त्राभूषण पुनः धारण किये, उपगुप्त वहाँ से जा चुके थे।

🌹 अखण्ड ज्योति- अप्रैल 1969 पृष्ठ 7

👉 भगवान शिव और उनका तत्त्वदर्शन (भाग 3)

🔵 भगवान शंकर का अंतरंग रूप क्या है? उसकी फिलॉसफी क्या है? भगवान शंकर का रूप गोल बना हुआ है। गोल क्या है—ग्लोब। यह सारा विश्व ही तो भगवान् है। अगर विश्व को इस रूप में मानें तो हम उस अध्यात्म के मूल में चले जाएँगे जो भगवान राम और कृष्ण ने अपने भक्तों को दिखाया था। गीता के अनुसार जब अर्जुन मोह में डुबा हुआ था, तब भगवान ने अपना विराट् रूप दिखाया और कहा—यह सारा विश्व-ब्रह्माण्ड जो कुछ भी है, मेरा ही रूप है। एक दिन यशोदा कृष्ण को धमका रही थी कि तैने मिट्टी खाई है। वे बोले—नहीं, मैंने मिट्टी नहीं खाई और उन्होंने मुँह खोलकर सारा विश्व-ब्रह्माण्ड दिखाया और कहा—यह मेरा असली रूप है।

🔴 भगवान राम ने भी यही कहा था। रामायण में वर्णन आता है कि माता-कौशल्या और काकभुशुण्डि जी को उन्होंने अपना विराट् रूप दिखाया था। इसका मतलब यह है कि हमें सारे विश्व को भगवान की विभूति, भगवान का स्वरूप मानकर चलना चाहिए। शंकर की गोल पिंडी उसी का छोटा-सा स्वरूप है जो बताता है कि यह विश्व-ब्रह्माण्ड गोल है, एटम गोल है, धरती माता-विश्वमाता गोल है। इसको हम भगवान का स्वरूप मानें और विश्व के साथ वह व्यवहार करें जो हम अपने लिए चाहते हैं दूसरों से, तो मजा आ जाए। फिर हमारी शक्ति, हमारा ज्ञान, हमारी क्षमता वह हो जाए जो शंकर भक्तों की होनी चाहिए।

🔵 भगवान शंकर के स्वरूप का कैसा-कैसा सुन्दर चित्रण मिलता है? शिवजी की जटाओं में से गंगा प्रवाहित हो रही है। गंगा का मतलब है—ज्ञान की गंगा। पानी बालों में से प्रवाहित नहीं होता, यदि होगा तो आदमी डूब जाएगा, पैदल नहीं चल सकेगा। इसका मतलब यह है कि शंकर-भक्त के मस्तिष्क में से ज्ञान की गंगा प्रवाहित होनी चाहिए, उसकी विचारधारा उच्चकोटि की और उच्चस्तरीय होनी चाहिए। घटिया किस्म के आदमी जिस तरीके से विचार करते हैं, जिनकी जिंदगी का मकसद केवल एक ही है कि किसी तरीके से पेट भरना चाहिए और औलाद पैदा करनी चाहिए, शंकर जी के भक्त को उस तरह के विचार करने वाला नहीं होना चाहिए।

🔴 जो कोई ऊँची बात सोच नहीं सकते, देश की, समाज की, धर्म की, लोक-परलोक की बात, कर्तव्य-फर्ज की बात जिनकी समझ में नहीं आती, उनको इनसान नहीं हैवान कहेंगे और ज्ञान की गंगा जिन लोगों के मस्तिष्क में से प्रवाहित होती है, उनका नाम शंकर का भक्त होता है। हमारे और आपके मस्तिष्क में से भी ज्ञान की गंगा बहनी चाहिए, जो हमारी आत्मा को शांति और शीतलता दे सकती है और पड़ोस के लोगों को, समीपवर्ती लोगों को उसमें स्नान कराकर पवित्र बना सकती है। यदि हमारा मस्तिष्क ऐसा व्यवहार करता हो तो जानना चाहिए कि शंकर जी की छवि आपने घरों में टाँग रखी है, उसके मतलब को, उसकी फिलॉसफी को जान लिया और समझ लिया है।  

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 30)

🌹  समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी और बहादुरी को जीवन का एक अविच्छिन्न अंग मानेंगे।

🔴 सुसंस्कारिता के लिए चार आधारों को प्रमुख माना गया है— (1) समझदारी, (२) ईमानदारी, (३) जिम्मेदारी, (४) बहादुरी। इन्हें आध्यात्मिक- आंतरिक वरिष्ठता की दृष्टि में उतना ही महत्त्वपूर्ण माना जाना चाहिए जितना कि शरीर के लिए अन्न, जल, वस्त्र और निवास को अनिवार्य समझा जाता है।

🔵 समझदारी का तात्पर्य है- दूरदर्शी विवेकशीलता का अपनाया जाना। आमतौर से लोग तात्कालिक लाभ को ही सब कुछ मानते हैं और उसके लिए अनाचार भी अपना लेते हैं। इससे भविष्य अंधकारमय बनता है और व्यक्तित्व का स्तर एक प्रकार से हेय ही बन जाता है। अदूरदर्शिता तुर्त- फुर्त अधिक सुविधा सम्पादन के लिए लालायित रहती है और इस उतावली में ऐसे काम करने में भी नहीं झिझकती, जिनकी भावी परिणति बुरे किस्म की हो सकती है। मूर्ख चिड़ियाँ और मछलियाँ इसी दुर्बुद्धि के कारण तनिक से प्रलोभन में अपनी जिंदगी देती देखी गई हैं।

🔴 चटोरे व्यक्ति इसी ललक में अपनी स्वास्थ्य संपदा को तहस- नहस कर लेते हैं। यौनाचार में अतिवाद बरतने वाले लोग, जवानी में ही बूढ़े खोखले होकर अकाल मृत्यु के मुँह में चले जाते हैं। अपराधी तत्त्वों में से अधिकांश लोग इसी मनोवृत्ति के होते हैं। पढ़ने का समय आवारागर्दी में गुजार देने वाले व्यक्ति जवानी में ही दर- दर की ठोकरें खाते हैं। नशेबाजी भी इसी मूर्खता को अपना कर धीमी आत्म हत्या करने में बेधड़क लगे रहते हैं। ऐसी नासमझी के रहते आज का, अभी का लाभ ही सब कुछ दीख पड़ता है और भविष्य की संभावनाओं की संदर्भ में सोचने तक की फुर्सत नहीं मिलती।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 125)

🌹  चौथा और अंतिम निर्देशन

🔵 चौथी बार गत वर्ष पुनः हमें एक सप्ताह के लिए हिमालय बुलाया गया। सन्देश पूर्ववत् सन्देश रूप में आया। आज्ञा के परिपालन में विलम्ब कहाँ होना था। हमारा शरीर सौंपे हुए कार्यक्रमों में खटता रहा है, किन्तु मन सदैव दुर्गम हिमालय में अपने गुरु के पास रहा है। कहने में संकोच होता है, पर प्रतीत ऐसा ही होता है कि गुरुदेव का शरीर हिमालय में रहता है और मन हमारे इर्द-गिर्द मँडराता रहता है। उनकी वाणी अन्तराल में प्रेरणा बनकर गूँजती रहती है। उसी चाबी के कसे जाने पर हृदय और मस्तिष्क का पेण्डुलम धड़कता और उछलता रहता है।

🔴 यात्रा पहली तीनों बार की ही तरह कठिन रही। इस बार साधक की परिपक्वता के कारण सूक्ष्म शरीर को आने का निर्देश मिला था। उसी काया को एक साथ तीन परीक्षाओं को पुनः देना था। साधना क्षेत्र में एक बार उत्तीर्ण हो जाने पर पिसे को पीसना भर रह जाता है। मार्ग देखा भाला था। दिनचर्या बनी बनाई थी। गोमुख से साथ मिल जाना और तपोवन तक सहज जा पहुँचना यही क्रम पुनः चला। उनका सूक्ष्म शरीर कहाँ रहता है, क्या करता है यह हमने कभी नहीं पूछा। हमें तो भेंट का स्थान मालूम है, मखमली गलीचा। ब्रह्मकमल की पहचान हो गई थी। उसी को ढूँढ़ लेते और उसी को प्रथम मिलन पर गुरुदेव के चरणों पर चढ़ा देते।

🔵 अभिवन्दन-आशीर्वाद के शिष्टाचार में तनिक भी देर न लगती और काम की बात तुरन्त आरम्भ हो जाती। यही प्रकरण इस बार भी दुहराया गया। रास्ते में मन सोचता आया कि जब भी जितनी बार भी बुलाया गया है तभी पुराना स्थान छोड़कर अन्यत्र छोड़कर अन्यत्र जाना पड़ा है। इस बार भी सम्भवतः वैसा ही होगा। शान्तिकुञ्ज छोड़ने के उपरान्त सम्भवतः अब इसी ऋषि प्रदेश में आने का आदेश मिलेगा और इस बार कोई काम पिछले अन्य कामों की तुलना में बड़े कदम के रूप में उठाना होगा। रास्ते के संकल्प विकल्प थे। अब तो प्रत्यक्ष भेंट हो रही थी।
  
🔴 अब तक के कार्यों पर उनने अपनी प्रसन्नता व्यक्त की। हमने इतना ही कहा-‘‘काम आप करते हैं और श्रेय मुझ वानर जैसे को देते हैं। समग्र समर्पण कर देने के उपरान्त यह शरीर और मन दीखने भर के लिए ही अलग हैं, वस्तुतः यह सब कुछ आपकी ही सम्पदा है। जब जैसा चाहते हैं, तब वैसा तोड़-मोड़कर आप ही उपयोग कर लेते हैं।’’

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v4.19

👉 भगवान प्रेम स्वरूप हैं। (भाग 1)

🔵 कुछ लोगों की धारणा है कि भगवान ही दंड दिया करते हैं परन्तु वास्तव में भगवान किसी को दंड नहीं देते। मनुष्य स्वयं ही कर्मवश अपने आपको दंड देता है। जब कभी यह कोई बुरा कार्य अपनी इन्द्रियों के वशीभूत होकर बिना विचारे किया करता है तब उसे उसका फल मिला करता है। यदि कार्य बुरा होता है तो फल भी दंड रूप में मिलता है और यदि कर्म अच्छा होता है तो फल यश रूप में प्राप्त होता है।

🔴 भगवान प्रेम स्वरूप है। सारा संसार उन प्रभु की रचित माया ही है। जब भगवान प्रेम स्वरूप हैं तब दंड कैसे दे सकते हैं? भगवान कदापि दंड नहीं देते। विश्व-कल्याण के लिए विश्व का शासन कुछ सनातन नियमों द्वारा होता है जिन्हें हम धर्म का रूप देते हैं तथा धर्म के नाम से पुकारते हैं। धर्म किसे कहते हैं?-”जो धारण करे” यानी जिसके धारण करने से किसी वस्तु का अस्तित्व बना रहे वही धर्म है।

🔵 अग्नि का धर्म प्रकाश व उष्णता देना है। परन्तु यदि वह प्रकाश व उष्णता नहीं दे तो वह तो राख अथवा कोयले का ढेर मात्र ही रह सकता है क्योंकि वह अपने को छोड़ चुकी है। ठीक यही दशा मानव की है। वह भी धर्म रजु द्वारा बंधा रहता है। जब कभी वह अपना धर्म त्यागता है उसे अवश्य ही हानि उठानी पड़ती है और वह दंड विधान बन कर उसे आगाह करती है। मनुष्य मार्ग की मानवता का आधार धर्म ही है। जब जानबूझकर अथवा असावधानी वश सनातन नियमों का उल्लंघन किया जाता है। तब अवश्य ही दंड का भागी बनना पड़ता है। भगवान को व्यर्थ ही दोषी ठहराना अनुचित है।

🔴 भगवान कल्याणमय हैं तथा उनके नियम भी कल्याणमय हैं। जब उन नियमों का उचित प्रकार पालन नहीं किया जाता तब ही दंड चेतावनी के रूप में मिला करते हैं परन्तु मूर्खता व अज्ञानवश मनुष्य इतने पर भी नहीं संभलता और एक के बाद दूसरा नियम भी खंडित करता जाता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 श्रीराम शर्मा आचार्य

रविवार, 16 जुलाई 2017

👉 आज का सद्चिंतन 17 July 2017


👉 मुठ्ठी खोलो बंधन मुक्त हो जाओ:-

🔴 एक बार एक संत अपनी कुटिया में शांत बैठे थे, तभी उन्हें कुछ शोर सुनाई दिया जा कर देखा तो एक बंदर ज़ोर-ज़ोर से चिल्ला रहा था. उसका एक हाथ एक घड़े के अंदर था और वह बंदर अपना हाथ छुड़ाने के लिए चिल्ला रहा था।

🔵 संत को देख वह बंदर संत से आग्रह करने लगा के महाराज कृपया कर के मुझे इस बंधन से मुक्त करवाए संत ने बंदर को कहा के तुमने घड़े के अंदर हाथ डाला तो वह आसानी से उसमे चला गया....

🔴 परन्तु अब इसलिए बाहर नहीं निकल रहा है क्यूंकी तुमने अपने हाथ में लड्डू पकड़ा हुआ है जो की उस घड़े के अंदर है, अगर तुम वह लड्डू हाथ से छोड़ दो तो तुम आसानी से मुक्त हो सकते हो।

🔵 बंदर ने कहा के महाराज, लड्डू तो मैं नहीं छोड़ने वाला, अब आप मुझे बिना लड्डू छोड़े ही मुक्त होने की कोई युक्ति सुझाए।

🔴 संत मुस्कुराए और कहा के या तो लड्डू छोड़ दो अन्यथा तुम कभी भी मुक्त नही हो सकते।

🔵 हज़ार कोशिशों के बाद बंदर को इस बात का एहसास हुआ कि बिना लड्डू छोड़े मेरा हाथ इस घड़े से बाहर नही निकल सकता और मैं मुक्त नही हो सकता।

🔴 आख़िरकार बंदर ने वो लड्डू छोड़ा और सहजता से ही उस घड़े से मुक्त हो गया।

🔵 यह कहानी सिर्फ़ उस बंदर की ही नहीं बल्कि आज के हर उस इंसान की है जो की उस घड़े में (संसार में) फँसा बैठा है।

🔴 लड्डू (संसारिक वस्तुओं) को छोड़ना भी नहीं चाहता और उस घड़े (84 के फेरे से) से मुक्त भी होना चाहता है।

🔵 संत (सदगुरु) ने समझानें का कार्य कर दिया...... अब किसे कब समझ आए और वह कब मुक्त होगा यह उसकी समझ है।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 17 July 2017


👉 अपनी स्थिति के अनुसार साधना चाहिए।

🔴 साधु, संत और ऋषियों ने लोगों को अपने-अपने ध्येय पर पहुँचने के अनगिनत साधन बतलाये हैं। हर एक साधन एक दूसरे से बढ़कर मालूम होता है, और यदि वह सत्य है, तो उससे यह मालूम होता है कि ये सब साधन इतनी तरह से समझाने का अर्थ यह है कि ज्यादातर एक कोई भी साधन उपयोग में आ सकता है। और यह है भी स्वाभाविक ही कि वह किसी एक के लिए उपयोगी हो।

🔵 परन्तु बहुधा ऐसा होता है कि बहुत से साधन अपने अनुकूल नहीं होते। कठिनाई यह है कि हम लोगों में वह शक्ति नहीं है कि उस साधन को खोज निकालें जिसके कि हम सचमुच योग्य हैं। इसके विपरीत हम दूसरे ऐसे साधन अनिश्चित समय के लिए अपनाते हैं जो हमारी शारीरिक और मानसिक स्थिति के अनुकूल नहीं होते। आज ऐसे अनुभवी पथ-प्रदर्शकों की भी भारी कमी है जो अपनी सूक्ष्म दृष्टि से यह जान लें कि किस व्यक्ति के अनुकूल क्या साधन ठीक होगा।

🔴 जो व्यक्ति जिस साधना का अधिकारी है, उसी के अनुकूल कार्यक्रम उसके सामने रखा जाना चाहिए। बालकों का शिक्षण और अध्ययन भी इसी आधार पर होना चाहिए। रुचि के अनुकूल दिशा में शिक्षा मिलने पर बालक थोड़े ही समय में आश्चर्यजनक उन्नति कर लेता है। इसके विपरीत जो कार्यक्रम उसकी रुचि न होते हुए भी लादा जाता है वह बड़ी कठिनाई से जैसे-तैसे पार पड़ता है।

🔵 हमें चाहिए कि अपना एक ध्येय निर्धारित करें और उस लक्ष्य को पूरा करने के लिए ऐसे साधन चुनें जो निर्धारित उद्देश्य की ओर तेजी से हमें बढ़ा ले चलें, साथ ही उन साधनों का अपनी रुचि, प्रकृति और स्थिति के अनुकूल होना भी आवश्यक है। यदि ऐसा न हुआ तो उत्साह थोड़े ही समय में शिथिल हो जाता है और दुर्गम मार्ग पर चलने का अभ्यास न होने से बीच में ही यात्रा तोड़ने को विवश होना पड़ता है।

🔴 लक्ष्य-लक्ष्य के अनुकूल, साधन-साधन के अनुकूल, अपनी स्थिति- इन तीन बातों का जहाँ समन्वय हो जाता है यहाँ सफलता मिलने में संशय नहीं रहता। हमें अपना विवेक इतना जाग्रत करना चाहिए जो इस दिशा में समुचित ज्ञान रखता हो और अपने उज्ज्वल प्रकाश में हमें अभीष्ट लक्ष्य की ओर अग्रसर कर सके।

🌹 श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आपत्कालीन धर्म

 🔴 श्रावस्ती में भयंकर अकाल पड़ा। निर्धन लोग भूख मरने लगे। भगवान् बुद्ध ने संपन्न लोगों को बुलाकर कहा- भूख से पीड़ितों को बचाने के लिए कुछ उपाय करना चाहिये। संपन्न व्यक्तियों की कमी नहीं थी, पर कोई कह रहा था- मुझे तो घाटा हो गया, फसल पैदा ही नहीं हुई आदि।

🔵 उस समय सुप्रिया नामक लड़की खड़ी हुई और बोली- मैं दूँगी, सबको अन्न। लोगों ने कहा- लड़की तू! तू तो भीख माँगकर खाती है, दूसरों को क्या खिलाएगी? सुप्रिया ने कहा- हाँ मैं आज से इन पीड़ितों के लिए घर- घर जाकर भीख माँगकर लाऊँगी, पर किसी को मरने नहीं दूँगी। उसकी बात सुनकर दर्शक स्तब्ध रह गए और सबने उसे धन एवं अन्न देना प्रारंभ कर दिया।

👉 हारिय न हिम्मत दिनांक :: १६

👉 हारिय न हिम्मत दिनांक :: १६
🌹  सुख- दु:खों के ऊपर स्वामित्व

🔵 तुम सुख, दु:ख की अधीनता छोड़ उनके ऊपर अपना स्वामित्व स्थापन करो और उसमें जो कुछ उत्तम मिले उसे लेकर अपने जीवन को नित्य नया रसयुक्त बनाओ। जीवन को उन्नत करना ही मनुष्य का कर्तव्य है इसलिए तुम भी उचित समझो सो मार्ग ग्रहण कर इस कर्तव्य को सिद्ध करो। 

🔴 प्रतिकूलताओं से डरोगे नहीं और अनुकूलता ही केा सर्वस्व मान कर बैठे रहोगे तो सब कुछ कर सकोगे। जो मिले उसी से शिक्षा ग्रहण कर जीवन को उच्च बनाओ। यह जीवन ज्यों- ज्यों उच्च बनेगा त्यों- त्यों आज जो तुम्हें प्रतिकूल प्रतीत होता है वह सब अनुकूल दिखने लगेगा और अनुकूलता आ जाने पर दु:ख मात्र की निवृत्ति हो जावेगी।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://awgpskj.blogspot.in/2017/07/blog-post_31.html


👉 Lose Not Your Heart Day 16
🌹  Control over Happiness and Unhappiness

🔵 Instead of being controlled by happiness and unhappiness, establish your mastery over them. This will render your life more interesting and meaningful. It is every person's responsibility to uplift himself and better his life, and you should fully involve yourself in this task.

🔴 You can achieve a great deal if you take full advantage of favorable circumstances, and are not afraid of adverse ones. Learn from every circumstance and move forward. As you progress, whatever seemed adverse will seem favorable, and then when that time comes you will be free from your sadness.

🌹 ~Pt. Shriram Sharma Acharya
http://awgpskj.blogspot.in/2017/07/lose-not-your-heart-day-16.html

👉 Lose Not Your Heart Day 16

🌹  Control over Happiness and Unhappiness

🔵 Instead of being controlled by happiness and unhappiness, establish your mastery over them. This will render your life more interesting and meaningful. It is every person's responsibility to uplift himself and better his life, and you should fully involve yourself in this task.

🔴 You can achieve a great deal if you take full advantage of favorable circumstances, and are not afraid of adverse ones. Learn from every circumstance and move forward. As you progress, whatever seemed adverse will seem favorable, and then when that time comes you will be free from your sadness.

🌹 ~Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 हारिय न हिम्मत दिनांक :: १६

🌹  सुख- दु:खों के ऊपर स्वामित्व

🔵 तुम सुख, दु:ख की अधीनता छोड़ उनके ऊपर अपना स्वामित्व स्थापन करो और उसमें जो कुछ उत्तम मिले उसे लेकर अपने जीवन को नित्य नया रसयुक्त बनाओ। जीवन को उन्नत करना ही मनुष्य का कर्तव्य है इसलिए तुम भी उचित समझो सो मार्ग ग्रहण कर इस कर्तव्य को सिद्ध करो। 

🔴 प्रतिकूलताओं से डरोगे नहीं और अनुकूलता ही केा सर्वस्व मान कर बैठे रहोगे तो सब कुछ कर सकोगे। जो मिले उसी से शिक्षा ग्रहण कर जीवन को उच्च बनाओ। यह जीवन ज्यों- ज्यों उच्च बनेगा त्यों- त्यों आज जो तुम्हें प्रतिकूल प्रतीत होता है वह सब अनुकूल दिखने लगेगा और अनुकूलता आ जाने पर दु:ख मात्र की निवृत्ति हो जावेगी।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

शनिवार, 15 जुलाई 2017

👉 आत्मचिंतन के क्षण 15 July

🔴 इच्छा और आवश्यकता में यथेष्ट अन्तर है, यद्यपि अनेक व्यक्ति एक ही अर्थ में इनका प्रयोग करते हैं। इच्छा का क्षेत्र अत्यन्त विस्तृत है। हम नाना प्रकार की वस्तुएं देखते हैं और लुभा कर उनकी इच्छा करने लगते हैं। ऐसी ही एक इच्छा हमारी आवश्यकता भी है। आवश्यकता केवल ऐसी इच्छा है जिसके बिना हम रह नहीं सकते, जिसके लिए हमारे पास पर्याप्त साधन हैं और जिसे प्राप्त करने से हमारी तृप्ति हो सकती है। कुछ आवश्यकताएं रुपये पैसे से, और कुछ उसके बिना भी पूर्ण हो सकती हैं। अनेक बार रुपये पैसे की कमी श्रम द्वारा पूर्ण हो जाती है।

🔵 महंगाई से बचने का एक उपाय है। आप अपनी आवश्यकताओं का अध्ययन करें। जो आराम, विलास, या फैशन की वस्तुएं हैं, उन्हें तुरन्त त्याग दें। अनावश्यक टीपटाप, दिखावा, सौंदर्य प्रतियोगिता, मिथ्या आडंबर, टायलेट का सामान, मादक द्रव्यों का सेवन छोड़ दें। नौकर छुड़ा दें और स्वयं उनका कार्य करें। अपने छोटे मोटे कार्य-कमरे की सफाई, जूता पालिश, साधारण कपड़े धोना, बाजार से सब्जी लाना, बच्चों या पत्नी को पढ़ाना, अपनी गाय भैंस की देख रेख-स्वयं कर लिया करें।

🔴 आवश्यकताओं को मर्यादा से बढ़ा देने का नाम अतृप्ति और दुःख है उन्हें कम कर पूर्ति करने से सुख और सन्तोष प्राप्त होता है। मनुष्य एक ही प्रकार के सुख से तृप्त नहीं रहता। अतः असंतोष सदैव बना रहता है। वह असंतोष निंदनीय है जिसमें किसी वस्तु की प्राप्ति के लिए मनुष्य दिन रात हाय-हाय करता रहे और न पाने पर असंतुष्ट, अतृप्त, और दुःखी रहे। तृष्णाएं एक के पश्चात् दूसरी बढ़ेगी। एक आवश्यकता की पूर्ति होगी, तो दो नई आवश्यकताएं आकर उपस्थित हो जायेंगी। अतः विवेकशील पुरुष को अपनी आवश्यकताओं पर कड़ा नियंत्रण रखना चाहिए। इस प्रकार आवश्यकताओं को मर्यादा के भीतर बाँधने के लिए एक विशेष शक्ति-मनोनिग्रह की जरूरत है।
                                        
🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 नारी का उत्तरदायित्व (अंतिम भाग)

🔴 नई सभ्यता के संस्पर्श से दिनों दिन नारी जाति अपने मूल कर्त्तव्य गृहस्थ-जीवन की जिम्मेदारियों और कार्यों में अरुचि अनुभव करने लगी हैं। घर का काम एक बला और बोझ-सा लगता है। जिन कामों को उन्हें स्वयं करना चाहिए, उनको नौकरों या पतियों से कराना चाहती हैं। इससे वह पुरुष की सहयोगिनी न होकर भार रूप बनती जा रही है। इससे पति-पत्नी के सम्बन्ध में भी खटास पैदा होने लगती है। आजकल ऐसे भाग्यशाली दंपत्ति बहुत ही कम हैं जिनका जीवन सब तरह से शान्त, सुखी और सन्तुष्ट माना जा सके।

🔵 उन परिवारों में पति-पत्नी के बीच का संघर्ष और भी तेज होता है, जहाँ नारियाँ बाहर कमाने जाती हैं। इससे घर के काम ठीक-ठीक नहीं हो पाते। बच्चों का शिक्षण और निर्माण भी भली प्रकार नहीं हो पाता। स्त्री पुरुष दोनों ही अपने-अपने काम से थके माँदे रहते हैं। परस्पर दाम्पत्य जीवन की तृप्ति, सुख, सन्तोष वहाँ नहीं रहता जहाँ नारी को आर्थिक स्रोतों का भी साधन बनना पड़ता है। वस्तुतः नारी का कार्य-क्षेत्र घर है। वह घर की रानी है। घर की सुव्यवस्था, सफाई, भोजन, पानी का सुप्रबन्ध, घर के कामों की पूर्णता आदि नाम के कार्य हैं। घर का स्वर्ग बनाने का काम नाम का है। इसी काम को नारियाँ भली-भाँति कर सकती हैं, यह उनकी प्राकृतिक और स्वाभाविक जिम्मेदारी है।

🔴 नारी का व्यवहार, स्वभाव, बोलचाल का संयत मधुर और शिष्ट होना आवश्यक है क्योंकि अनेकों परिवार अनेकों व्यक्तियों की संगम है। नारी के माध्यम से कई परिवार एक सम्बन्ध सूत्र में बँधते हैं। अतः नारी के व्यवहार की तनिक सी गड़बड़ी, इधर की उधर लगाने, एक घर की बात दूसरे घर में कहने की आदत से परिवारों के सम्बन्ध कटु और खराब हो जाते हैं। इसी तरह परिवार तथा बाहर के अनेकों व्यक्ति शरीर के सम्बन्ध में आते है। सास, ससुर, पति रिश्तेदार, पड़ौसी आदि भिन्न-भिन्न व्यक्तियों को तृप्त और सन्तुष्ट रखना नारी का ही महत्वपूर्ण उत्तरदायित्व है।

🌹 समाप्त
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति- जुलाई 1963 पृष्ठ 38
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1963/July/v1.38

👉 भगवान शिव और उनका तत्त्वदर्शन (भाग 2)

🔵 अठारह पुराणों का अनुवाद मैंने संस्कृत से हिन्दी में किया है। उसमें से शिवपुराण की एक कथा मुझे याद आई, जिसने हमारी शंका का समाधान कर दिया कि भगवान शंकर सहायता क्यों नहीं करते हमारी? क्यों नहीं उनकी शक्ति का लाभ मिलता? क्यों उनके चमत्कार हमें दिखाई नहीं पड़ते? जबकि शंकर भगवान के भक्त जिन्होंने क्या से क्या अनुदान प्राप्त किए हैं, जो भी तप करने के लिए खड़ा हो गया वह न जाने क्या से क्या प्राप्त करता चला गया?

🔴 हम और आप जैसे शिव-उपासक उस शक्ति को प्राप्त न कर सकते हों सो ऐसी बात नहीं, पर कहीं न नहीं चूक रह जाती है, कहीं न कहीं भूल रह जाती है। उस भूल को हमें निकालना ही पड़ेगा और निकालना ही चाहिए। इसके बिना अध्यात्म का पूरा लाभ नहीं मिल सकेगा और दुनिया के सामने हम सिर ऊँचा उठा कर यह नहीं कह सकेंगे कि हम ऐसी शक्ति के उपासक हैं जो अपनी उँगली के इशारे से सारी दुनिया को हिला सकती है तो गलती और चूक कहाँ हो गई? चूक और गलती वहाँ हो गई जहाँ भगवान शिव और पार्वती का असली स्वरूप हमको समझ में नहीं आया। उसके पीछे जो फिलॉसफी है वह समझ में नहीं आई, मात्र उसका बाहरी स्वरूप समझ में आ गया।

🔵 भगवान शंकर का भी एक कलेवर है और एक प्राण, एक बहिरंग स्वरूप है और एक अंतरंग स्वरूप। जब हम दोनों को मिला देंगे तब पॉजिटिव और निगेटिव दोनों तारों को मिलाकर जिस तरीके से स्पार्क उठते हैं और करेंट चालू हो जाता है, उसी प्रकार से भगवान का करेंट चालू हो जाएगा। बहिरंग रूप के बारे में आप जानते हैं और जिस तक आप सीमित हो गए हैं, वह कलेवर है जो मंदिर में बैठा हुआ है। जिसके चरणों में हम मस्तक झुकाते हैं, जल चढ़ाते हैं, पूजा करते हैं, प्रार्थना करते हैं, आरती उतारते हैं और जय-जयकार करते हैं—वह बहिरंग कलेवर है जिसकी भी सख्त जरूरत है, परन्तु यही सब कुछ नहीं है। हमें अंतरंग रूप के बारे में भी जानना चाहिए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 29)

🌹  मर्यादाओं को पालेंगे, वर्जनाओं से बचेंगे, नागरिक कर्तव्यों का पालन करेंगे और समाजनिष्ठ बने रहेंगे।

🔴 भाषण करना है तो हमें ठीक समय पर पहुँचना और नियमित समय में ही पूरा करना चाहिए। समय का ध्यान न रखना, सुनने वालों के साथ बेइन्साफी है। दावत जिस समय की रखी है, उसी समय आरंभ कर देनी चाहिए। मेहमानों को घंटों प्रतीक्षा में बिठाए रहना, एक प्रकार से उनका समय बर्बाद करना है। जिसे धन की बर्बादी के समान ही हानिकारक समझा जाना चाहिए।

🔵 वस्तु का मूल्य और स्वरूप जो बताया गया है वही वस्तुतः होना चाहिए। असली में नकली की मिलावट कर देना, दामों में घिसा-पिटी करके कमीवेशी करना, व्यापार करने वालों के लिए सर्वथा अशोभनीय है। घिस-घिस कर कमी करना लिए सर्वथा अशोभनीय है। घिस-घिस कर कमी करना अपनी विश्वसनीयता तथा प्रामाणिकता पर कलंक लगाना है। असली और नकली वस्तुएँ अलग-अलग बेची जाएँ और उनके दाम वैसे ही महँगे, सस्ते स्पष्ट किए जाएँ तो व्यापारी की साख बढ़ेगी और ग्राहकों का समय बचेगा तथा संतोष होगा। ईमानदारी घाटे का सौदा नहीं है। वह प्रामाणिकता एवं विश्वसनीयता की परीक्षा भर चाहती है। इस कसौटी पर सही होना हर व्यवसायी का नागरिक कर्तव्य है। यह कर्तव्य पालन व्यक्ति का सम्मान भी बढ़ाता है और व्यवसाय भी।

🔴 दूसरों की असुविधा को ध्यान में रखते हुए अपनी सुविधा को सीमाबद्ध रखना, शिष्टता और सभ्यता भरा मधुर व्यवहार करना, मीठे वचन बोलना, वचन का पालन करना, प्रामाणिकता और विश्वस्तता की रीति-नीति अपनाना, समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को हम में से प्रत्येक को सीखना और पूरा करना ही चाहिए। चाहिए ताकि समाज में शिष्ट नागरिकों की तरह हम ठीक तरह से जी सकें और दूसरों को जीने दे सकें।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.41

👉 Lose Not Your Heart Day 15

🌹  Forget Painful Memories

🔵 When you find yourself recalling painful memories, the best thing to do is forget and ignore them. The way to preserve your emotional stability is to replace your unpleasant memories with pleasant ones. If you wish to keep your physical, mental, and emotional health, then learn to remove unhealthy memories in this way.

🔴 Even if someone close to you has caused you grief, will you keep obsessing over your pain? Lose yourself in purposeful work and forget these painful experiences. The best way to free yourself from worry is to forget your misery.

🌹 ~Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 हारिय न हिम्मत दिनांक :: १५

🌹  दुःखद स्मृतियों को भूलो  
🔵 जब मन में पुरानी दु:खद स्मृतियाँ सजग हों तो उन्हें भूला देने में ही श्रेष्टता है। अप्रिय बातों को भुलाना आवश्यक है। भुलाना उतना ही जरूरी है जितना अच्छी बात का स्मरण करना। यदि तुम शरीर से,, मन से और आचरण से स्वस्थ होना चाहते हो तो अस्वस्थता की सारी बातें भूल जाओ।

🔴 माना कि किसी ‘अपने ’ ने ही तुम्हें चोट पहुँचाई है,, तुम्हारा दिल दुखाया है, तो क्या तुम उसे लेकर मानसिक उधेड़बुन में लगे रहोगे। अरे भाई! उन कष्टकारक अप्रिय प्रसंगों को भूला दो, उधर ध्यान न देकर अच्छे शुभ कर्मों से मन को केंद्रीभूत कर दो।

चिंता से मुक्ति पाने का सर्वोत्तम उपाय दु:खों को भूलना ही है।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आज का सद्चिंतन 15 July 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 15 July 2017


👉 जीवन में सुख चाहिए

🔴 एक व्यक्ति था. उसके पास नौकरी, घर-परिवार, रुपया-पैसा, रिश्तेदार और बच्चे सभी कुछ था कहने का सार यह है उस व्यक्ति के पास किसी चीज़ की कोई कमी नही थी अब जीवन है तो कुछ परेशानियां भी थी उसके जीवन में, जिससे हर पल वह जूझता ही रहता था वह किसी भी तरह अपनी परेशानियों से मुक्ति चाहता था, कि जीवन में सुख-शांति से रह सके।

🔵 एक बार किसी ने उसे बताया की नगर सीमा पर कोई बहुत बड़े संत ठहरे हुए है, जिनके पास हर समस्या और प्रश्न का हल है
इतना सुनते ही वह व्यक्ति भागा-भागा संत की कुटिया में पहुँचा. वहाँ भीड़ बहुत होने के कारण उसकी बारी आते-आते रात हो गई उसने संत से पूछा, बाबा, मेरे जीवन की परेशानियां कैसे ख़त्म होगी? मैं भी सुख-शांति से जीवन जीना चाहता हूँ।

🔴 संत ने कहा, ”इसका उत्तर मैं कल सुबह दूंगा
तब तक तुम एक काम करो. मेरे साथ जो ऊँटों का रखवाला आया था वो बीमार हो गयातुम आज की रात ऊँटों की देखभाल का जिम्मा ले लो. जब यह सभी ऊँट सो जायें, तब तुम भी सो लेना।

🔵 सुबह वह व्यक्ति संत के पास पहुँचा और कहने लगा, मैं तो रात भर जगा रहा, सो ही नही पाया. कभी कोई ऊँट खड़ा हो जाता है तो कभी कोई. एक को बिठाने का प्रयास करता हूँ तो दूसरा खड़ा हो जाता है
कई ऊँट तो बैठना ही नही चाहते तो कई ऊँट थोड़ी देर में अपने आप बैठ जाते है कुछ ऊँटों ने तो बैठने में बहुत ही समय लिया मैं तो सारी रात भाग-दौड़ ही करता रहा।

🔴 संत ने मुस्कुराहट के साथ कहा, यही तुम्हारे कल के प्रश्नों का उत्तर है. कल पूरी रात का घटनाक्रम तुम्हारा जीवन है
अगर ऊँटों को परेशानियां मान ली जायें, तो समझना आसान होगा कि जीवन में कभी भी किसी भी क्षण सारी परेशानियां ख़त्म नही हो सकती कुछ ना कुछ हमेशा लगा ही रहेगा. लेकिन इसका अर्थ यह बिल्कुल नही है कि हम जीवन का आनंद ही ना ले हमें समस्याओं के बीच रहते हुए भी सुख के पल खोजने होंगे।

🔵 संत ने आगे कहा, अगर तुम्हारें जीवन में समस्याओं का ताँता लगा हुआ है तो उन्हें सुलझाने का प्रयास करना चाहिए, लेकिन हर पल उनके पीछे ही नही भागना चाहिए. ऊँटों के व्यवहार से तुम जान गये होंगे कि कुछ समस्याएं कोशिशों से ख़त्म हो जाती है, तो कुछ अपने आप सुलझ जाती है, कुछ पे कोई असर नही होगा और कुछ समय के साथ धीरे-धीरे सुलझ जाएंगी।

🔴 लेकिन इस बीच कुछ नई समस्याएं भी जन्म लेगी, जिनका सामना भी ऐसे ही करना पड़ेगा और इस तरह जीवन चलता ही रहेगा
अब यह तुम पर निर्भर करता है कि तुम इस बीच जीवन में आनंद लेते हो या समस्याओं के पीछे हैरान-परेशान व दुखी होकर भागते रहते हो।

👉 हारिय न हिम्मत दिनांक: २१

🌹  लगन और श्रम का महत्व    🔵 लगन आदमी के अंदर हो तो सौ गुना काम करा लेती है। इतना काम करा लेती है कि हमारे काम को देखकर आपको आश्चर्य ह...