सोमवार, 20 नवंबर 2017

👉 अनोखा फैसला

🔷 एक साधु वर्षा के जल में प्रेम और मस्ती से भरा चला जा रहा था... कि इस साधु ने एक मिठाई की दुकान को देखा जहां एक कढ़ाई में गरम दूध उबला जा रहा था तो मौसम के हिसाब से दूसरी कढ़ाई में गरमा गरम जलेबियां तैयार हो रही थी

🔶 साधु कुछ क्षणों के लिए वहाँ रुक गया..... शायद भूख का एहसास हो रहा था या मौसम का असर था.... साधु हलवाई की भट्ठी को बड़े गौर से देखने लगा साधु कुछ खाना चाहता था लेकिन साधु की जेब ही नहीं थी तो पैसे भला कहां से होते....

🔷 साधु कुछ पल भट्ठी से हाथ सेंकने के बाद चला ही जाना चाहता था..... कि नेक दिल हलवाई से रहा न गया और एक प्याला गरम दूध और कुछ जलेबियां साधु को दें दी...

🔶 साधु ने गरम जलेबियां गरम दूध के साथ खाई और फिर हाथों को ऊपर की ओर उठाकर हलवाई के लिऐ प्रार्थना की..... फिर आगे चल दिया..... साधु बाबा का पेट भर चुका था दुनिया के दु:खों से बेपरवाह वे फिर इक नए जोश से बारिश के गंदले पानी के छींटे उड़ाता चला जा रहा था.......

🔷 वह इस बात से बेखबर था कि एक युवा नव विवाहिता जोड़ा भी वर्षा के जल से बचता बचाता उसके पीछे चला आ रहें है ...... एक बार इस मस्त साधु ने बारिश के गंदले पानी में जोर से लात मारी..... बारिश का पानी उड़ता हुआ सीधा पीछे आने वाली युवती के कपड़ों को भिगो गया उस औरत के कीमती कपड़े कीचड़ से लथपथ हो गये.....

🔶 उसके युवा पति से यह बात बर्दाश्त नहीं हुई..... इसलिए वह आस्तीन चढ़ाकर आगे बढ़ा और साधु के कपड़ो से पकड़ कर कहने लगा अंधा है...... तुमको नज़र नहीं आता तेरी हरकत की वजह से मेरी पत्नी के कपड़े गीले हो गऐ हैं और कीचड़ से भर गऐ हैं.....

🔷 साधु हक्का-बक्का सा खड़ा था.... जबकि इस युवा को साधु का चुप रहना नाखुशगवार गुजर रहा था..... महिला ने आगे बढ़कर युवा के हाथों से साधु को छुड़ाना भी चाहा.... लेकिन युवा की आंखों से निकलती नफरत की चिंगारी देख वह भी फिर पीछे खिसकने पर मजबूर हो गई.....

🔶 राह चलते राहगीर भी उदासीनता से यह सब दृश्य देख रहे थे लेकिन युवा के गुस्से को देखकर किसी में इतनी हिम्मत नहीं हुई कि उसे रोक पाते और आख़िर जवानी के नशे मे चूर इस युवक ने एक जोरदार थप्पड़ साधु के चेहरे पर जड़ दिया बूढ़ा मलंग थप्पड़ की ताब ना झेलता हुआ.... लड़खड़ाता हुऐ कीचड़ में जा पड़ा.....

🔷 युवक ने जब साधु को नीचे गिरता देखा तो मुस्कुराते हुए वहां से चल दिया.. बूढे साधु ने आकाश की ओर देखा और उसके होठों से निकला वाह मेरे भगवान कभी गरम दूध जलेबियां और कभी गरम थप्पड़....

🔶 लेकिन जो तू चाहे मुझे भी वही पसंद है........यह कहता हुआ वह एक बार फिर अपने रास्ते पर चल दिया.... दूसरी ओर वह युवा जोड़ा अपनी मस्ती को समर्पित अपनी मंजिल की ओर अग्रसर हो गया.....

🔷 थोड़ी ही दूर चलने के बाद वे एक मकान के सामने पहुंचकर रुक गए......वह अपने घर पहुंच गए थे.... वे युवा अपनी जेब से चाबी निकाल कर अपनी पत्नी से हंसी मजाक करते हुए ऊपर घर की सीढ़ियों तय कर रहा था....

🔶 बारिश के कारण सीढ़ियों पर फिसलन हो गई थी अचानक युवा का पैर फिसल गया और वह सीढ़ियों से नीचे गिरने लगा.... महिला ने बहुत जोर से शोर मचा कर लोगों का ध्यान अपने पति की ओर आकर्षित करने लगी जिसकी वजह से काफी लोग तुरंत सहायता के लिये युवा की ओर लपके.....

🔷 लेकिन देर हो चुकी थी युवक का सिर फट गया था और कुछ ही देर मे ज्यादा खून बह जाने के कारण इस नौजवान युवक की मौत हो चुकी थी कुछ लोगों ने दूर से आते साधु बाबा को देखा तो आपस में कानाफुसी होने लगीं कि निश्चित रूप से इस साधु बाबा ने थप्पड़ खाकर युवा को श्राप दिया है....

🔶 अन्यथा ऐसे नौजवान युवक का केवल सीढ़ियों से गिर कर मर जाना बड़े अचम्भे की बात लगती है..... कुछ मनचले युवकों ने यह बात सुनकर साधु बाबा को घेर लिया एक युवा कहने लगा कि आप कैसे भगवान के भक्त हैं जो केवल एक थप्पड़ के कारण युवा को श्राप दे बैठे......

🔷 भगवान के भक्त मे रोष व गुस्सा हरगिज़ नहीं होता ....आप तो जरा सी असुविधा पर भी धैर्य न कर सकें..... साधु बाबा कहने लगा भगवान की क़सम मैंने इस युवा को श्राप नहीं दिया....

🔶 अगर आप ने श्राप नहीं दिया तो ऐसा नौजवान युवा सीढ़ियों से गिरकर कैसे मर गया?

🔷 तब साधु बाबा ने दर्शकों से एक अनोखा सवाल किया कि आप में से कोई इस सब घटना का चश्मदीद गवाह मौजूद है? एक युवक ने आगे बढ़कर कहा..... हाँ मैं इस सब घटना का चश्मदीद गवाह हूँ

🔶 साधु ने अगला सवाल किया.....मेरे क़दमों से जो कीचड़ उछला था क्या उसने युवा के कपड़े को दागी किया था? युवा बोला..... नहीं.... लेकिन महिला के कपड़े जरूर खराब हुए थे

🔷 मलंग ने युवक की बाँहों को थामते हुए पूछा.. फिर युवक ने मुझे क्यों मारा? युवा कहने लगा...... क्योंकि वह युवा इस महिला का प्रेमी था और यह बर्दाश्त नहीं कर सका कि कोई उसके प्रेमी के कपड़ों को गंदा करे..... इसलिए उस युवक ने आपको मारा....

🔶 युवा बात सुनकर साधु बाबा ने एक जोरदार ठहाका बुलंद किया और यह कहता हुआ वहाँ से विदा हो गया..... तो भगवान की क़सम मैंने श्राप कभी किसी को नहीं दिया लेकिन कोई है जो मुझ से प्रेम रखता है....

🔷 अगर उसका यार सहन नहीं कर सका तो मेरे यार को कैसे बर्दाश्त होगा कि कोई मुझे मारे और... वह इतना शक्तिशाली है कि दुनिया का बड़े से बड़ा राजा भी उसकी लाठी से डरता है ....

🔶 उस परमात्मा की लाठी दीख़ती नही और आवाज भी नही करती लेकिन पडती हैं तों बहुत दर्द देंती हैं।

🔷 हमारें कर्म ही हमें उसकी लाठ़ी से बचातें हैं बस़ कर्म अच्छें होंने चाहीये.....

👉 आज का सद्चिंतन 21 Nov 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 21 Nov 2017


👉 दोष-दृष्टि को सुधारना ही चाहिए (अन्तिम भाग)

🔶 बुद्धिमान व्यक्ति अपने लाभ और हित के लिये हर बात के अच्छे-बुरे दो पहलूओं में से केवल गुण पक्ष पर ही दृष्टि डालता है। क्योंकि वह जानता है, कि विपक्ष पर ध्यान देने, उसको ही देखते रहने से मन को अशाँति के अतिरिक्त और कुछ हाथ न लगेगा, दोष-दृष्टि रखने और दोषान्वेषक करने से घृणा तथा द्वेष का ही प्रादुर्भाव होता है, जिसका परिणाम कलह-क्लेश अथवा अशाँति असन्तोष के सिवाय और कुछ नहीं होता। इससे वस्तु अथवा व्यक्ति की तो कुछ हानि होती नहीं अपना हृदय कलुषित और कलंकित होकर रह जाता है।

🔷 अपने दृष्टि-दोष के कारण प्रायः अच्छी चीजें भी बुरी और गुण भी अवगुण होकर हानिकारक बन जाते हैं। जैसे स्वाँति-जल का ही उदाहरण ले लीजिये। स्वाँति की बूँद जब सीप के मुख में पड़ जाती है, तब मोती बन कर फलीभूत होती है और यदि वही बूँद साँप के मुख में पड़ जाती है तो विष का रूप धारण कर लेती हैं। वस्तु एक ही है किन्तु वह उपयोग और संपर्क के गुण दोष के कारण सर्वथा विपरीत परिणाम में फलीभूत हुई।

🔶 किसी में गुण की कल्पना न कर सकने के कारण दोषदर्शी अविश्वासी भी होता है। वह किसी की सद्भावना एवं सहानुभूति में भी कान खड़े करने लगता है। प्रेम एवं प्रशंसा में भी स्वार्थपूर्ण चाटुकारिता का दोष देखता है। इसलिये संपर्क में आने और स्नेहपूर्ण बरताव करने वाले हर व्यक्ति से भयाकुल और शंकाकुल रहा करता है। उसे विश्वास ही नहीं होता कि संसार में कोई निःस्वार्थ और निर्दोष-भाव से मिल कर हितकारी सिद्ध हो सकता है। विश्वास, आस्था, श्रद्धा, सराहना से रहित व्यक्ति का खिन्न असंतुष्ट और व्यग्र रहना स्वाभाविक ही है, जैसा कि दोष-दर्शी रहता भी है।

🔷 यदि आपको अपने अन्दर इस प्रकार की दुर्बलता दिखी हो तो तुरन्त ही उसे निकालने के लिए और उसके स्थान पर गुण-ग्राहकता का गुण विकसित कीजिये। इस दशा में आपको हर व्यक्ति, वस्तु और वातावरण में आनंद, प्रशंसा अथवा विनोद की कुछ-न-कुछ सामग्री मिल ही जायेगी। दूसरों के गुण-दोषों में से उस हंस की तरह केवल गुण ही ग्रहण कर सकेंगे, जोकि पानी मिले हुए दूध में से केवल दूध-दूध ही ग्रहण कर लेता है और पानी छोड़ देता है।

🔶 दूसरों की अच्छाइयों को खोजने, उनको देख-देख प्रसन्न होने और उनकी सराहना करने का स्वभाव यदि अपने अन्दर विकसित कर लिया जाये तो आज दोष-दर्शन के कारण जो संसार, जो वस्तु और जो व्यक्ति हमें काँटे की तरह चुभते हैं, वे फूल की तरह प्यारे लगने लगें। जिस दिन यह दुनिया हमें प्यारी लगने लगेगी, इसमें दोष, दुर्गुण कम दिखाई देंगे, उस दिन हमारे हृदय से द्वेष एवं घृणा का भाव निकल जायेगा और हमें हर दिशा और हर वातावरण में प्रसन्नता ही आने लगेगी। दुःख, क्लेश और क्षोभ, रोष का कोई कारण ही शेष न रह जायेगा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति, मई 1968, पृष्ठ 24

👉 आत्मचिंतन के क्षण 21 Nov 2017

🔶 जो दूसरों को कष्ट में देखकर दया से द्रवित हो जाता है, जो असहायों की सहायता के लिए सदा तत्पर रहता है, जो संसार के सुख में अपना सुख अनुभव करता है, दूसरों को हानि पहुँचाने की जिसे कभी इच्छा नहीं होती, जिसे पर स्त्री माता के तुल्य है, इन्द्रियों को जो मर्यादा से बाहर नहीं जाने देता, चुगली, निन्दा, ईर्ष्या, एवं कुढ़न से जो दूर रहता है, संयम जिसका व्रत है, प्रेम करना जिसका स्वभाव है, मधुरता जिसके होठों से टपकती है, स्नेह एवं सज्जनता से जिसकी आँखें भरी रहती हैं, जिसके मन में केवल सद्भाव ही निवास करते हैं, ऐसे पवित्र आत्मा व्यक्ति इस लोक के देवता हैं।    

🔷 हर मनुष्य में अपने प्रति पक्षपात करने की दुर्बलता पाई जाती है। आँखें बाहर को देखती हैं, भीतर का कुछ पता नहीं। कान बाहर के शब्द सुनते हैं, अपने हृदय और फेफडों से कितना अनवरत ध्वनि प्रवाह गुंजित होता है, उसे सुन ही नहीं पाते। इसी प्रकार दूसरों के गुण-अवगुण देखने में रुचि भी रहती है और प्रवीणता भी, पर ऐसा अवसर कदाचित ही आता है जब अपने दोषों को निष्पक्ष रूप से देखा और स्वीकारा जा सके। आमतौर से अपने गुण ही गुण दीखते हैं, दोष तो एक भी नजर नहीं आता। कोई दूसरा बताता है तो वह शत्रुवत् प्रतीत होता है। आत्म समीक्षा कोई कब करता है। वस्तुतः दोष दुर्गुणों के सुधर के लिए अपने आपसे संघर्ष करने के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं।

🔶 जीवन ताश के खेल की तरह है। हमने खेल का आविष्कार नहीं किया है और न ताश के पत्तों के नमूने ही हमने बनाये हैं। हमने इस खेल के नियम भी खुद नहीं बनाये और न हम ताश के पत्तों के बँटवारे पर ही नियंत्रण रख सकते हैं। पत्ते हमें बाँट दिये जाते हैं, चाहे वे अच्छे हों या बुरे। इस सीमा तक नियतिवाद का शासन है। परन्तु हम खेल को बढ़िया ढंग से या खराब ढंग से खेल सकते हैं। हो सकता है कि किसी कुशल खिलाड़ी के पास खराब पत्ते आये हों और फिर भी वह खेल में जीत जाये। यह भी संभव है कि किसी खराब खिलाड़ी के पास अच्छे पत्ते आये हों और फिर भी वह खेल का नाश करके रख दे। हमारा जीवन परवशता और स्वतंत्रता, दैवयोग और चुनाव का मिश्रण है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 What is Love?

🔶 To love is to find happiness in making others happy. It is to understand what others think and feel and need. It is to say and do the things that make them eager to be with us and to do these things not in hope of gaining some good, but because doing them is natural for us.

🔷 It is to know their weaknesses yet see them as strong and, because of our high vision and our unfailing faith, to inspire them to be stronger than they are while inspiring us to be stronger too.

🔶 It is to accept others as they are and, if they should fail our aspirations for them or spurn our outstretched hands, to keep open the “door” of our hearts.

🔷 It is to appreciate the importance of others and to help them appreciate their own importance.

🔶 It is to grow into the hearts of others and to become a part of their lives yet not bind their hearts nor limit their lives.

🔷 It is to loose ourselves in something greater, as a small spark loses itself in other sparks and becomes a star.

🔶 Love is like the Sun. It gives out of its own substance and its own self and, by giving itself, becomes a source of life and light.

✍🏻 James Dillet Freeman

👉 युग-मनीषा जागे, तो क्रान्ति हो (भाग 4)

🔶 सुकरात ने अपने समय में अपने समाज को एक ही दिशा देना शुरू किया, जिसका ताम था ‘दर्शन’। विचार नहीं। विचार तो अखबारों में, गन्दी किताबों में रोज छपते रहते हैं। कितना भ्रामक अज्ञान फैलाने वाले अख़बार रोज निकलते रहते हैं। इनकी बाबत मैं आपसे नहीं कहता। मैं आपसे कहता हूँ—‘दर्शन’ की बाबत। सुकरात का दर्शन जिन दिनों पैदा होने लगा और विद्यार्थियों को पढ़ाया जाने लगा तो हुकूमत काँप उठी। हुकुम दिया गया कि यह आदमी बागी है। इस आदमी को जहर पिला देना चाहिए। डाकू-चोर एक या दो पूरे समाज को हिलाकर रख देता है। दार्शनिक दुनिया को उलट-पलट देता है। ईसा सन्त थे, नहीं दार्शनिक थे।
             
🔷 सन्त तो समाज में ढेर सारे हैं, जो एक पाँव पर खड़े रहते हैं, पानी नहीं पीते, दूध नहीं पीते। बाबाजी की बात नहीं कह रहा मैं। ईसा कौन थे? दार्शनिक थे। उन्होंने अपने समय को बदलने वाला दर्शन दिया था। दर्शन वह, जो आदमी के अन्तरंग को छूने वाला दर्शन जब कभी आता है तो गजब करके रख देता है। लेखक भी, कवि भी ढेर सारे हैं, मालदार आदमी बहुत हुए हैं परन्तु दार्शनिक जब भी कभी हुए हैं तो मजा आ गया है। गजब हो गया हैं, समाज को हिला दिया गया है।
 
🔶 कुछ हवाले दूँ आपको। रूसो नाम का एक दार्शनिक हुआ है, जिसने सबसे पहले एक विचार दिया, अन्तरंग को छूने वाला, आदमी के मस्तिष्क को छूने वाला, समाज की व्यवस्था पर असर डालने वाला। दर्शन दिया रूसो ने जिसे डेमोक्रेसी नाम दिया गया। डेमोक्रेसी के बारे में मजाक उड़ाया गया था। जिन दिनों यह दर्शन प्रस्तुत किया गया, कहा गया कि यह पागलों की बातें हैं। लेकिन पागलों की बात आप देखते हैं? सारी दुनिया में घुमा-फिरा के डेमोक्रेसी आ गई है। यह विचार एक दार्शनिक ने दिया था और उसने सारी दुनिया को हिलाकर रख दिया और हवाले दूँ आपको। एक नाम है नीत्से। उसका वह हिस्सा तो नहीं बताऊँगा जिसमें उसने यह कहा था कि खुदा खत्म हो गया, खुदा को हमने जमीन में गाड़ दिया पर यह वह आदमी था जिसने कहा था कि आदमी को सुपरमैन बनना चाहिए।

🔷 आदमी को गई-गुजरी स्थिति में नहीं रहना चाहिए। अपने आपका विकसित करना चाहिए और दूसरों को ऊँचा उठाने की अपनी सामर्थ्य एकत्रित करनी चाहिए। यह किसकी फिलॉसफी है? नीत्से की। आपको मैं इतिहास इसीलिए बता रहा हूँ कि आप समझें कि दर्शन कितनी जबर्दस्त चीज है? दर्शन उस चीज का नाम है जो कौमों को बदलकर रख देता है, बिरादरियों को, मुल्कों को, परिस्थितियों को बदल देता है। दर्शन बड़े शानदार होते हैं। वे भले हों अथवा बुरे हों, कितनी ताकत होती है उनमें, यह आपको जानना चाहिए। मैं आपको अपने जीवन की एक घटना सुना दूँ दर्शन की बाबत।

....क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 उदारता और कठोरता

🔷 दूसरों के साथ उदारता का व्यवहार केवल वे कर सकते है जो अपने प्रति कठोर होते है। जो अपने साथ रियायत चाहते है उन्हें दूसरों के साथ कठोर बनना पड़ता है। तराजू का एक पलड़ा ही झुक सकता है और वह भी तब, जब दूसरा ऊपर उठता है। यदि मनुष्य अपने लिए अधिक सुविधायें चाहेगा तो स्वभावतः उसे दूसरों की उपेक्षा करनी पड़ेगी दूसरों के प्रति जितनी अधिक ममता और करुणा होगी उतनी ही अपनी जरूरतें घटाकर, अपनी सुविधाएँ हटा कर उन्हें जरूरतमन्दों के लिए लगाने का भाव जागेगा उदार हृदय व्यक्ति अन्ततः बिल्कुल खाली हाथ और निरन्तर सेवा परायण हो जाता है। इसलिए उसकी महानता है।

🔶 जब तक आक्रमण की, प्रतिहिंसा की, बदला लेने की या किसी को चोट पहुँचाकर सन्तुष्ट होने की इच्छा जीवित है तब तक हमारे अन्दर असुरता एवं दुष्टता विद्यमान है यह मानना होगा। जब इस दिशा में उत्पन्न होने वाला उत्साह उपेक्षा में बदलने लगे तो समझना चाहिये वह दुष्टता शांत होती जाती है। जब दूसरों की भूलों के प्रति क्षमा का, दूसरों के प्रति करुणा का, और दूसरों के अभावों के प्रति सहानुभूति का भाव उदय होने लगे तो समझना चाहिए कि मानवता विकसित हो रही है। यह विकास इस सीमा तक पहुँच जाय कि हानि पहुँचाने और शत्रुता रखने वालों को भी सुख पहुँचाने का प्रयत्न किया जाय तो समझना चाहिए कि साधुता प्रकट होने लगी।

📖 अखण्ड ज्योति जून 1961

👉 गुड़िया

🔷 मैं एक दुकान में खरीददारी कर रहा था, तभी मैंने उस दुकान के कैशियर को एक 5-6 साल की लड़की से बात करते हुए देखा।

🔶 कैशियर बोला :~ "माफ़ करना बेटी, लेकिन इस गुड़िया को खरीदने के लिए तुम्हारे पास पर्याप्त पैसे नहीं हैं।" फिर उस छोटी सी लड़की ने मेरी ओर मुड़ कर मुझसे पूछा:~ "अंकल, क्या आपको भी यही लगता है कि मेरे पास पूरे पैसे नहीं हैं?''

🔷 मैंने उसके पैसे गिने और उससे कहा:~ "हाँ बेटे, यह सच है कि तुम्हारे पास इस गुड़िया को खरीदने के लिए पूरे पैसे नहीं हैं"।

🔶 वह नन्ही सी लड़की अभी भी अपने हाथों में गुड़िया थामे हुए खड़ी थी। मुझसे रहा नहीं गया। इसके बाद मैंने उसके पास जाकर उससे पूछा कि यह गुड़िया वह किसे
देना चाहती है?

🔷 इस पर उसने उत्तर दिया कि यह वो गुड़िया है, जो उसकी बहन को बहुत प्यारी है। और वह इसे, उसके जन्मदिन के लिए उपहार में देना चाहती है।

🔶 बच्ची ने कहा यह गुड़िया पहले मुझे मेरी मम्मी को देना है, जो कि बाद में मम्मी जाकर मेरी बहन को दे देंगी"।

🔷 यह कहते-कहते उसकी आँखें नम हो आईं थी मेरी बहन भगवान के घर गयी है...

🔶 और मेरे पापा कहते हैं कि मेरी मम्मी भी जल्दी-ही भगवान से मिलने जाने वाली हैं। तो, मैंने सोचा कि क्यों ना वो इस गुड़िया को अपने साथ ले जाकर, मेरी बहन को दे दें...।"

🔷 मेरा दिल धक्क-सा रह गया था। उसने ये सारी बातें एक साँस में ही कह डालीं और फिर मेरी ओर देखकर बोली - "मैंने पापा से कह दिया है कि मम्मी से कहना कि वो अभी ना जाएँ।

🔶 वो मेरा, दुकान से लौटने तक का इंतजार करें।

🔷 फिर उसने मुझे एक बहुत प्यारा- सा फोटो दिखाया जिसमें वह खिलखिला कर हँस रही थी।

🔶 इसके बाद उसने मुझसे कहा:~ "मैं चाहती हूँ कि मेरी मम्मी, मेरी यह फोटो भी अपने साथ ले जायें, ताकि मेरी बहन मुझे भूल नहीं पाए।

🔷 मैं अपनी मम्मी से बहुत प्यार करती हूँ और मुझे नहीं लगता कि वो मुझे ऐसे छोड़ने के लिए राजी होंगी, पर पापा कहते हैं कि मम्मी को मेरी छोटी बहन के साथ रहने के लिए जाना ही पड़ेगा क्योंकि वो बहुत छोटी है, मुझसे भी छोटी है। उसने धीमी आवाज मैं बोला।

🔶 इसके बाद फिर से उसने उस गुड़िया को ग़मगीन आँखों-से खामोशी-से देखा।

🔷 मेरे हाथ जल्दी से अपने बटुए ( पर्स ) तक पहुँचे और मैंने उससे कहा:~

🔶 "चलो एक बार और गिनती करके देखते हैं कि तुम्हारे पास गुड़िया के लिए पर्याप्त पैसे हैं या नहीं?''

🔷 उसने कहा-:"ठीक है। पर मुझे लगता है शायद मेरे पास पूरे पैसे हैं"।

🔶 इसके बाद मैंने उससे नजरें बचाकर कुछ पैसे उसमें जोड़ दिए और फिर हमने उन्हें गिनना शुरू किया।

🔷 ये पैसे उसकी गुड़िया के लिए काफी थे यही नहीं, कुछ पैसे अतिरिक्त बच भी गए थे।

🔶 नन्ही-सी लड़की ने कहा:~ "भगवान का लाख-लाख शुक्र है मुझे इतने सारे पैसे देने के लिए!

🔷 फिर उसने मेरी ओर देख कर कहा कि मैंने कल रात सोने से पहले भगवान् से प्रार्थना की थी कि मुझे इस गुड़िया को खरीदने के लिए पैसे दे देना, ताकि मम्मी इसे
मेरी बहन को दे सकें। और भगवान् ने मेरी बात सुन ली।

🔶 इसके अलावा मुझे मम्मी के लिए एक सफ़ेद गुलाब खरीदने के लिए भी पैसे चाहिए थे, पर मैं भगवान से इतने ज्यादा पैसे मांगने की हिम्मत नहीं कर पायी थी पर भगवान् ने तो मुझे इतने पैसे दे दिए हैं कि अब मैं गुड़िया के साथ-साथ एक सफ़ेद गुलाब भी खरीद सकती हूँ ! मेरी मम्मी को सफेद गुलाब बहुत पसंद हैं|

🔷 "फिर हम वहा से निकल गए। मैं अपने दिमाग से उस छोटी- सी लड़की को निकाल नहीं पा रहा था।

🔶 फिर, मुझे दो दिन पहले स्थानीय समाचार पत्र में छपी एक घटना याद आ गयी जिसमें एक शराबी ट्रक ड्राईवर के बारे में लिखा था।

🔷 जिसने नशे की हालत में मोबाईल फोन पर बात करते हुए एक कार-चालक महिला की कार को टक्कर मार दी थी, जिसमें उसकी 3 साल की बेटी की घटनास्थल पर ही मृत्यु हो गयी थी और वह महिला कोमा में चली गयी थी। अब एक महत्वपूर्ण निर्णय उस परिवार को ये लेना था कि, उस महिला को जीवन रक्षक मशीन पर बनाए रखना है अथवा नहीं?

🔶 क्योंकि वह कोमा से बाहर आकर, स्वस्थ हो सकने की अवस्था में नहीं थी। दोनों पैर, एक हाथ,आधा चेहरा कट चुका था। आॅखें जा चुकी थी। "क्या वह परिवार इसी छोटी-
लड़की का ही था?"

🔷 मेरा मन रोम-रोम काँप उठा। मेरी उस नन्ही लड़की के साथ हुई मुलाक़ात के 2 दिनों बाद मैंने अखबार में पढ़ा कि उस महिला को बचाया नहीं जा सका, मैं अपने आप को रोक नहीं सका और अखबार में दिए पते पर जा पहुँचा, जहाँ उस महिला को अंतिम दर्शन के लिए रखा गया था वह महिला श्वेत धवल कपड़ों में थी- अपने हाथ में एक सफ़ेद गुलाब और उस छोटी-सी लड़की का वही हॅसता हुआ फोटो लिए हुए और उसके सीने पर रखी हुई थी वही गुड़िया।

🔶 मेरी आँखे नम हो गयी। दुकान में मिली बच्ची और सामने मृत ये महिला से मेरा तो कोई वास्ता नही था लेकिन हूं तो इंसान ही। ये सब देखने के बाद अपने आप को सभांलना एक बडी चुनौती थी मैं नम आँखें लेकर वहाँ से लौटा।

🔷 उस नन्ही-सी लड़की का अपनी माँ और उसकी बहन के लिए जो बेपनाह अगाध प्यार था, वह शब्दों में बयान करना मुश्किल है।

🔶 और ऐसे में, एक शराबी चालक ने अपनी घोर लापरवाही से क्षण-भर में उस लड़की से उसका सब कुछ छीन लिया था....!!!

🔷 ये दुख रोज कितने परिवारों की सच्चाई बनता है हमें पता नहीं!!!!  शायद ये मार्मिक घटना सिर्फ एक पैग़ाम देना चाहती है कि:::::::::::::

🔶 कृपया~ कभी भी शराब पीकर और मोबाइल पर बात करते समय वाहन ना चलायें क्यूँकि आपका आनन्द किसी के लिए श्राप साबित हो सकता है।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 20 Nov 2017


👉 आज का सद्चिंतन 20 Nov 2017


👉 दोष-दृष्टि को सुधारना ही चाहिए (भाग 4)

🔶 किसी मित्र सम्बन्धी अथवा आत्मीयजन ने मानिये जन्म-दिन अथवा किसी अन्य शुभ अवसर पर अपनी योग्यता एवं समाज के अनुसार कोई उपहार दिया अथवा भेजा। कोई भी व्यक्ति इस सम्मान और स्नेह से पुलकित हो उठता और आभार भरा धन्यवाद देते-देते न अघाता। किन्तु दोषदर्शी तो अपने रोग से मजबूर ही रहता है। यद्यपि वह आभार एवं धन्यवाद न प्रकट करने की असभ्यता नहीं करता तथापि और कुछ नहीं उसमें इतना ही शामिल कर देता कि आपने बेकार यह चीज भेजी। यह तो मेरे पास पहले से ही थी और मुझे ऐसा रंग यह डिजाइन पसन्द नहीं है। यह रंग और प्रकार उपहार के रूप में बहुत आम और सस्ते हो गये हैं। इससे अच्छा यह होता कि आप सद्भावना और बधाई के ही दो शब्द दे देते। बात भले ही सही रही हो। किन्तु इस भावना ने, इस दोष-दृष्टि ने उसको स्वयं तो प्रसन्न नहीं ही होने दिया साथ ही अपने मित्र और स्वजन की प्रसन्नता भी छीन ली।

🔷 यही बात नहीं कि दोष-दृष्टा केवल दूसरों में ही बुराई और कमियाँ देखता हो। स्वयं अपने प्रति भी उसका यही अत्याचार रहा करता है। उदाहरण के लिये वह बाजार से अपने लिये कोई वस्तु खरीदने जाती है। पहले तो वह कितनी ही प्रकार की चीजें क्यों न दिखलाई जायें, उसे पसन्द ही नहीं आती, सबमें कोई-न-कोई दोष दिखलाई देता है। वस्तु के निर्दोष होने पर भी वह अपनी और से किसी दोष का आरोपण कर ही लेगा। अपनी इस प्रक्रिया से थक जाने के बाद जब चीज लेकर घर आता है। तब भी उसका पेट अप्रशंसा से भरा नहीं होता। चीज डाली और कहना आरम्भ कर दिया- ‘‘खरीदने को खरीद तो अवश्य लाया लेकिन कुछ पसन्द नहीं आई। यदि पत्नी इस बात को नहीं मानती और चुनाव की प्रशंसा करती है, तो झूठी प्रशंसा का करने का आरोप पाती है। जब तक वह अपनी पसन्द, बाजारदारी, चीज की पहचान के विषय में आलोचना नहीं कर लेता, बुराई नहीं निकाल लेता, अपनी अकल और अनुभव को कोस नहीं लेता चैन नहीं पड़ता। इस प्रकार वह इस प्रसन्नता के छोटे अवसर को भी खिन्नता से कडुआ बना ही लेता है।

🔶 तात्पर्य यह है कि दोष-दर्शी कितने ही सुन्दर स्थान, वस्तु और व्यक्ति के संपर्क में क्यों न आये अपने अवगुण के प्रभाव से उससे मिलने वाले आनन्द से वंचित ही रहता है। निदान इस लम्बे-चौड़े संसार में उसे न तो कहीं आनन्द दीखता है और न किसी वस्तु में सामंजस्य का सुख प्राप्त होता है। उसे हर व्यक्ति, हर वस्तु और हर वातावरण अपनी रुचि के साथ असमंजस उत्पन्न करती ही दीखती है। जबकि गुण-ग्राहक हर व्यक्ति, हर वस्तु और हर वातावरण में सामंजस्य और सुन्दरता ही खोज निकालता है। यही कारण है कि गुण-ग्राहक सदैव प्रसन्न और दोषान्वेषक सदा खिन्न बना रहता है।

🔷 वस्तुतः बात यह है कि संसार की प्रत्येक वस्तु गुण-दोषमय ही है। कोई भी वस्तु एवं व्यक्ति ऐसा नहीं हो सकता कि जिसमें या तो गुण-ही-गुण भरे हों अथवा दोष-ही-दोष। अपनी दृष्टि के अनुसार हर व्यक्ति उसमें गुण या दोष देख कर प्रसन्न अथवा खिन्न हुआ करता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति, मई 1968, पृष्ठ 23
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1968/May/v1.23

http://literature.awgp.org

👉 आत्मचिंतन के क्षण 20 Nov 2017

🔶 यदि हम क्रोध, चिन्ता, ईर्ष्या, लोभ आदि असंगत मानसिक दोषों के शिकार होते हुए भी उन्नति पूर्ण स्वस्थ जीवन की कल्पना करते हैं तो यह असम्भव बात का स्वप्र देखना मात्र है। यदि हम वास्तव में अपने जीवन को सुखी एवं उन्नतिशील देखना चाहते हैं तो क्रोध, चिन्ता, ईर्ष्या आदि कुविचारों को घटाने और हटाने के लिए प्रयत्न करना होगा।        

🔷 गलती करना बुरा नहीं है; बल्कि गलती को न सुधारना बुरा है। संसार के महान् पुरुषों ने अनेक प्रकार की गलतियाँ की हैं। रावण जैसा विद्वान् अपने दुष्कृत्यों से राक्षस जैसा बन गया। वाल्मीकि डकैत रहे हैं। सुर, तुलसी, कबीर, मीरा, रसखान आदि सांसारिक जीवन में गलती करते रहे थे, लेकिन इन्होंने गलती को सुधारा और आगे बढ़कर महापुरुष बने। स्मरण रखिए कि एक गलती को सुधारकर आप किसी न किसी क्षेत्र में आगे बढ़ जाते हैं।  

🔶 इस संसार का यह विचित्र नियम है कि बाजार में वस्तुओं की कीमत दूसरे लोग निर्धारित करते हैं, पर मनुष्य अपना मूल्यांकन स्वयं करता है और वह अपना जितना मूल्यांकन करता है उससे अधिक सफलता उसे कदापित नहीं मिल पाती। प्रत्येक व्यक्ति जो आगे बढ़ने की आकांक्षा रखते हैं, उन्हें यह मानकर चलना चाहिए कि परमात्मा ने उसे मनुष्य के रूप में इस पृथ्वी पर भेजते समय उसकी चेतना में समस्त सम्भावनाओं के बीज डाल दिये हैं। इतना ही नहीं, उसके अस्तित्व में सभी सम्भावनाओं के बीज डालने के साथ-साथ उनके अंकुरित होने की क्षमताएँ भी भर दी है। लेकिन प्रायः देखने में यह आता है कि अधिकांश व्यक्ति अपने प्रति ही अविश्वास से भरे होते हैं तथा उन क्षमताओं और सम्भावनाओं के बीजों को विकसित तथा अंकुरित करने की चेष्टा तो दूर रही, उनके सम्बन्ध में विचार तक नहीं करना चाहते।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 युग-मनीषा जागे, तो क्रान्ति हो (भाग 3)

🔶 आज आदमी की सभ्यता सिर्फ एक है। उसका नाम है दर्शन की भ्रष्टता। उसके पास चीजों की कमी नहीं है। आदमी के पास जरूरत से ज्यादा चीजें हैं, पर मुझे ये लगता है कि आदमी इनको खा भी सकेगा कि नहीं, हजम भी कर सकेगा कि नहीं। आदमी का दर्शन घिनौना हो जाने की वजह से इतनी ज्यादा चीजें होते हुए भी मालूम पड़ता है कि बहुत कम है। गरीबी उसके ऊपर हावी हो गई है। परिस्थितियाँ, दरिद्रता, मुसीबतें उसके दर्शन के कारण उस पर हावी हो गई हैं। दर्शन सारे व्यक्तियों का, सारे समाज का, सारे विश्व का भ्रष्ट होता चला गया है और आदमी दुष्ट होता चला गया है। दुष्टों को पकड़ना, रोकना व मारकर ठीक करना चाहिए। मच्छरों को मारना चाहिए पर एक-एक मच्छर को मारने के पहले उस गन्दगी से निपटना चाहिए जो मच्छर पैदा करती है।
            
🔷 हम मच्छर-मक्खी पर नहीं सकते। हम समस्याओं को कैसे मार पाएँगे? समस्याएँ आदमी के सड़े हुए दिमाग में से पैदा होती हैं, सड़े हुए दिल से पैदा होती हैं। पैसे वाले बड़ी-बड़ी योजनाएँ बनाते हैं कि हम गृह-उद्योग बढ़ाएँगे, नहरें खोदेंगे, बाँध बनाएँगे, ये सब ठीक है। आदमी को साक्षर बनाएँगे, हर आदमी को मालदार बनाएँगे। कोई कहता है कि आदमी को पहलवान बनाएँगे, पर इतना सब करने के बाद फिर होगा क्या? जरा विश्लेषण, पोस्टमार्टम करके देखिए कि इस सबके बावजूद विचारों की, दर्शन की भ्रष्टता यदि बनी रही तो वह करता क्या है? वह खुद जलता है, दूसरों को जलाता है। दियासलाई अपने आपको जला के खत्म कर देती है, दूसरों को जला देती है। आज हमारी आपकी जिन्दगियाँ दियासलाई के तरीके से जल रहीं हैं और अनेक को जला रही हैं।
 
🔶 आपने ब्याह कर लिया। बीबी आ गई। हाँ तो ठीक है, अब आप क्या करेंगे उसको जला दीजिए। नहीं साहब बीबी तो बहुत अच्छी मालूम पड़ती है। इसलिए तो कहते हैं कि फुलझड़ी बहुत अच्छी मालूम पड़ती तो आप दियासलाई लेकर के खत्म क्यों नहीं करते? हर चीज को आदमी आज जला रहा है। जिन्दगी को जला रहा है, समाज को जला रहा है। देश को जला रहा है, बच्चों को जला रहा है। भाइयो! आज सारा समाज जिस तरीके से भ्रष्ट-चिन्तन व दुष्ट आचरण करता चला जा रहा है इस सबका मूल कहीं खोजना हो तो एक ही जगह है, वह है आदमी के सोचने व ऊँचा उठाने वाली शैली, तरीका, विद्या जिसे ‘दर्शन’ कहते हैं।

....क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 Misers are Unfit for God's Kindness

🔶 This is a story of the times when saint Chedember was famous for granting wishes. One day a woman approached him to bless her with a son. The saint gave him some roasted peanuts and said, "You have come from very far. Have some peanuts and rest in the courtyard. The woman started eating the peanuts. Little children, who were playing there, looked at her and wanted some peanuts too. But, she turned her face away and continued eating. When she went to the saint to receive blessings, he said grimly, "When you can't share some peanuts with the children, how can the God give you the priceless gift of a child?" We must develop generosity to receive God's kindness.

📖 From Pragya Puran

रविवार, 19 नवंबर 2017

👉 शोभा


🔶 सुकरात ज्ञान चर्चा में लगे हुए थे कि एक उजड्ड ईर्ष्यालु ने उनकी पीठ पर लात मारी और वे औंधे मुँह गिर पड़े।

🔷 अपने को सँभाल कर सुकरात उठे और बात जहाँ से छूटी थी वहीं से फिर कहानी आरंभ कर दी।

🔶 अपमान का कुछ भी ख्याल न करते देख- उपस्थित लोगों ने कहा - इस दुष्ट को सजा क्यों न दी जाय?

🔷 सुकरात ने कहा- कोई गधा हमें लात मार दे तो क्या हमारे लिए यह शोभा की बात होगी कि हम भी उसे लात मारें ?

👉 हृदय का संस्कार

🔷 बुद्धि का संस्कार करना उचित है। पर हृदय का संस्कार करना तो नितान्त आवश्यक है। बुद्धिमान और विद्वान बनने से मनुष्य अपने लिए धन और मान प्राप्त कर सकता है। पर नैतिक दृष्टि से वह पहले दर्जे का पतित भी हो सकता है। आत्मा को ऊँचा उठाना और मानवता के आदर्शों पर चलने के लिए प्रकाश प्राप्त करना हृदय के विकास पर ही निर्भर है। बुद्धि हमें तर्क करना सिखाती है और आवश्यकताओं की पूर्ति का साधन खोजती है। जैसी आकाँक्षा और मान्यता होती है उसके अनुरूप दलील खोज निकालना भी उसका काम है पर धर्म कर्तव्यों की ओर चलने की प्रेरणा हृदय से ही प्राप्त होती है।

🔶 जब कभी बुद्धि और हृदय में मतभेद हो, दोनों अलग अलग मार्ग सुझाते हो तो हमें सदा हृदय का सम्मान और बुद्धि का तिरस्कार करना चाहिए। बुद्धि धोखा दे सकता है पर हृदय के दिशासूचक यंत्र (कुतुबनुमा) की सुई सदा ठीक ही दिशा के लिए मार्ग दर्शन करेगी।

📖 अखण्ड ज्योति जून 1961

👉 युग-मनीषा जागे, तो क्रान्ति हो (भाग 2)

🔶 क्या किताब ने यह क्रान्ति की? अरे किताब नहीं, दर्शन। किताब की बात नहीं कहता मैं आपसे। मैं कहता हूँ दर्शन। दर्शन अलग चीज है। विचार बेहूदगी का नाम है जो अखबारों में, नॉवेलों में, किताबों में छपता रहता है। विचार हमेशा आदमी के दिमाग पर छाया रहता है। कभी खाने-कमाने का, कभी खेती-बाड़ी का, कभी बदला लेने का यही विचार मन पर छाया रहता है और दर्शन, वह आदमी के अन्तरंग से ताल्लुक रखता है। जो सारे समाज को एक दिशा में कहीं घसीट ले जाने का काम करता है, उसको दर्शन कहते हैं। आदमी की जिन्दगी में, उसकी संस्कृति में सबसे मूल्यवान चीज का नाम है—दर्शन।
            
🔷 हिन्दुस्तान की तारीख में जो विशेषता है आदमी के भीतर का भगवान् क्या जिन्दा है, यह किसने पैदा किया? दर्शन ने। इतने ऋषि, इतने महामानव, इतने अवतार किसने पैदा कर दिए? यह है दर्शन जो आदमी को हिला देता है, ढाल देता है, गला देता है, बदल देता है। हमारी दौलत नहीं, दर्शन शानदार रहा है। हमारी आबो-हवा नहीं, शिक्षा नहीं, दर्शन बड़ा शानदार रहा है। इसी ने आदमियों को ऐसा शानदार बना दिया कि यह मुल्क देवताओं का देश कहलाया जाने लगा। दूसरी उपमा स्वर्ग से दी जाने लगी। स्वर्ग कहाँ रहेगा? जहाँ देवता रहेंगे। देवता ही स्वर्ग पैदा करते हैं।
 
🔶 इमर्सन ने बहुत सारी किताबें लिखी हैं और प्रत्येक किताब के पहले पन्ने पर लिखा है ‘‘मुझे नरक में भेज दो मैं वहीं स्वर्ग बनाकर दिखा दूँगा।’’ यह है दर्शन। आज की स्थिति हम क्या कहें मित्रो! हम सबके दिमाग पर एक घिनौना तरीका, छोटा वाला तरीका, नामाकूल तरीका हावी हो गया है। हमारे सोचने का तरीका इतना वाहियात कि सारी जिन्दगी को हमने, हीरे-मोती जैसी जिन्दगी को हमने खत्म कर डाला। आदमी की ताकत, विचारों की ताकत को हमने तहस-नहस कर दिया। हमें कोढ़ी बना दिया। कसूर किसका है? सिर्फ एक ही कमी है, वह है आदमी का दर्शन। वह कमजोर हो गया है।

....क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 दोष-दृष्टि को सुधारना ही चाहिए (भाग 3)

🔶 अब दोष-दृष्टा को ले लीजिये। उसकी स्थिति बिल्कुल विपरीत होती है। जहाँ अन्य लोग उक्त महात्मा में गुण ही देख सके वहाँ उसे केवल दोष ही दिखाई दिये। उसका हृदय महात्मा के प्रशंसकों के बीच, उनकी कुछ खामियों के रखने के लिये बेचैन हो जाता। जब अवकाश अथवा अवसर न मिलता तो प्रशंसा में सम्मिलित होकर उनके बीच बोलने का अवसर निकाल कर कहना प्रारम्भ कर देता- ‘‘हाँ, महात्मा जी का व्याख्यान था तो अच्छा- लेकिन उतना प्रभावोत्पादक नहीं था, जितना कि लोग प्रभावित हुए अथवा प्रशंसा कर रहे हैं। कोई मौलिकता तो थी नहीं। यही सब बातें अमुक नेता ने अपनी प्रचार-स्पीच में शामिल करके देशकाल के अनुसार उसमें धार्मिकता का पुट दे दिया था। अजी साहब क्या नेता, क्या महन्त सबके-सब अपने रास्ते जनता पर नेतृत्व करने के सिवाय और कोई उद्देश्य नहीं रखते। यह सब पूजा, प्रतिष्ठा व पेट का धन्धा है।”

🔷 यदि लोग सच्चाई से विमुख होकर उससे सहमत न हुए तब तो वह वाद-विवाद के लिये मैदान पकड़ लेता है और अन्त में अपना दोषदर्शी चित्र दिखा कर लोगों की हीन दृष्टि का आखेट बन कर प्रसन्नता खो कर और विषण्ण होकर लौट आता है। जहाँ गुण ग्राहकों ने उस दिन महीनों काम आने वाली प्रसन्नता प्राप्त की, वहाँ दोष-दृष्टा ने जो कुछ टूटी-फूटी प्रसन्नता उस समय पास में थी वह भी गवाँ दी।

🔶 दोष-दर्शन की प्रक्रिया जोर पकड़ ही चुकी थी, उसकी सखी-सहेली झल्लाहट, खीझ, कुढ़न, कुण्ठा, अरुचि आदि सब साथ ही लगी हुई थीं। निदान घर आकर भोजन अच्छा न लगा पत्नी निहायत बेसऊर दिखाई देने लगी। बच्चे यदि सोते मिले तो नालायक हैं। शाम से ही सो जाते हैं। और यदि जगते मिले तो लापरवाह और तन्दुरुस्ती का ध्यान न रखने वाले बन गये। तात्पर्य यह कि उस दिन जहाँ अन्य सब लोग अधिक-से-अधिक प्रसन्नता के अधिकारी बने वहाँ दोषदर्शी के लिये हर बात खेदजनक और दुःखदायी बन गई।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति, मई 1968, पृष्ठ 23
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1968/May/v1.23

http://literature.awgp.org

👉 आज का सद्चिंतन 19 Nov 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 19 Nov 2017


शनिवार, 18 नवंबर 2017

👉 युग-मनीषा जागे, तो क्रान्ति हो (भाग 1)

गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ,
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।
देवियो! भाइयो!!

🔶 अब्राहम लिंकन ने पार्लियामेण्ट की मेज पर एक बौनी-सी महिला को खड़ा कर परिचय देते हुआ कहा—‘‘यह महिला वह है, जिसने मेरे संकल्प को पूरा करके दिखा दिया।’’ अब्राह लिंकन ने अपनी आत्मा व अपने भगवान् के सामने कसम खाई थी कि हम अमेरिका पर से एक कलंक हटाकर रहेंगे। कौन-सा कलंक? कलंक यह कि अमेरिका के दक्षिणी भाग में नीग्रो-लोगों को गुलाम बनाकर उनसे जानवर के तरीके से काम लिया जाता था। कानून मात्र गोरों की हिमायत करता था। ऐसी स्थिति में एक महिला लिंकन की कसम को पूरा करने उठ खड़ी हुई। उसका नाम था हैरियट स्टो। लिंकन ने पार्लियामेंट के मेम्बरों से कहा—‘‘यही वह महिला है जिसकी लिखी किताब ने अमेरिका में तहलका मचा दिया। लाखों आदमी फूट-फूट कर रोए हैं। लोगों ने कह दिया जो लोग ऐसे कानून का चलाते हैं, इस तरह जुल्म करते हैं, हम उनसे लड़ेंगे।’’
            
🔷 आप क्या समझते हैं नीग्रो व नीग्रो की लड़ाई की बात लिंकन कह रहे थे? नहीं। नीग्रोज के पास न हथियार थे, न ताकत। उनके पास तो आँसू ही आँसू थे। वे तो रो भर सकते थे। लड़ाई गोरों व गोरों में हुई। उत्तरी व दक्षिणी अमेरिका में गृहयुद्ध हो गया। इतना खौफनाक युद्ध हुआ कि व्यापक संहार हुआ पर इसका परिणाम यह हुआ कि कालों को उनके अधिकार मिल गए। इतना बड़ा काम, इतना बड़ा विस्फोट करा देने वाली महिला थी—हैरियट स्टो जिसने किताब लिखी थी—‘अंकल टाम्स कैबिन’ ‘टाम काका की कुटिया’।
 
🔶 एक छोटी-सी महिला के अन्तःकरण की पुकार से लिखी गई इस किताब ने जन-जन के मर्म को, अन्तःकरण को छुआ और अमेरिका ही नहीं, सारे विश्व में तहलका मचा दिया। हर आदमी ने इसे पढ़ा और कहा कि जहाँ ऐसे जुल्म होते हैं, इनसान, इनसान पर अत्याचार करता है, हम उसे बर्दाश्त नहीं करेंगे और उसे उखाड़ फेकेंगे। लिंकन ने कसम तो खाई थी पर वे अकेले कुछ कर नहीं सकते थे, क्योंकि उनके पास गोरों का शासन तन्त्र था। कालों का कोई हिमायती नहीं था। उनका हुकुम किस पर चलता? पर उस महिला की लिखी उस किताब ने हर नागरिक के दिल में ऐसी आग पैदा कर दी, ऐसी टीस पैदा कर दी कि आदमी कानून को अपने हाथ में लेकर दूसरे आदमियों को ठीक करने पर आमादा हो गया। गृहयुद्ध तब समाप्त हुआ, जब वह कानून खत्म हो गया और सबको समान अधिकार दिला दिए गए।

....क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 'परमवीर' मेजर शैतान सिंह की वीरता का कर्जदार रहेगा देश

1962 में भारत-चीन युद्ध को भारत के इतिहास के सबसे भीषण युद्ध के तौर पर जाना जाता है। इस युद्ध में हजारों भारतीय सैनिक शहीद हुए, बंदी बनाए गए और कई लापता हो गए। मगर इसी युद्ध में लड़ने वाले कुछ वीरों की कहानियां अक्सर सुनने को मिल जाती हैं, उन्हीं में से बहादुरी की एक अमरगाथा 'परमवीर' मेजर शैतान सिंह और उनकी सैन्य टुकड़ी की भी है। आज ही के दिन 18 नवंबर 1962 को मेजर शैतान सिंह वीरगति को प्राप्त हुए थे।

🔷 5000 चीनी सैनिकों के सामने थे केवल 123 भारतीय सैनिक

1962 के युद्ध के दौरान 13वीं कुमाऊं रेजिमेंट के जवान रणनीतिक तौर पर अहम चुशुल सेक्टर के पास हवाईपट्टी की सुरक्षा में तैनात थे। तभी करीब 5000 चीनी सैनिकों ने रेजांग ला दर्रे के पास हमला कर दिया। चीन की ओर से हजारों की संख्या में सैनिक और इधर मेजर शैतान सिंह के नेतृत्व में सिर्फ 123 सैनिक मोर्चा ले रहे थे।

🔶 दिखाया अदम्य साहस और पराक्रम

रेजांग ला दर्रे के युद्ध को मेजर शैतान सिंह के पराक्रम की वजह से जाना जाता है। युद्ध के दौरान मेजर शैतान सिंह ने अपनी जान की परवाह किए बिना अपने सैनिकों का हौसला बनाए रखा और गोलियों की बौछार के बीच एक प्लाटून से दूसरी प्लाटून जाकर सैनिकों का नेतृत्व किया। इसी दौरान उनके कई गोलियां लग गईं।

🔷 मरते दम तक नहीं छोड़ी बंदूक
 
ज्यादा खून बह जाने पर उनके दो साथी जब उन्हें उठाकर ले जा रहे थे तभी चीनी सैनिकों ने उन पर मशीन गन से हमला कर दिया। मेजर को लगा कि उन सैनिकों की जान भी खतरे में है, इसलिए उन दोनों को पीछे जाने का आदेश दिया। मगर उन सैनिकों ने उन्हें एक पत्थर के पीछे छिपा दिया। बाद में इसी जगह पर उनका पार्थिव शरीर मिला। जिस वक्त उन्हें ढूंढा गया, उस वक्त भी उनके हाथ में उनकी बंदूक थी और पकड़ ढीली नहीं हुई थी।

🔶 चीन को हटना पड़ा था पीछे

रेजांग ला युद्ध में चीनी सैनिकों से लोहा लेने के बाद जब भारतीय सैनिकों के हथियार खत्म हो गए, तो उन्होंने हाथों से लड़ना शुरू कर दिया और 1300 चीनी सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया। 123 में से 114 सैनिक शहीद हो गए, इन्हीं में मेजर शैतान सिंह भी थे। बाकी 9 सैनिक बंदी बना लिए गए थे। भारतीय सैनिकों के इस पराक्रम के आगे चीनी सेना को भी झुकना पड़ा और अंततः 21 नवंबर को उसने सीजफायर का ऐलान कर दिया।

🔷 मरणोपरांत मिला सर्वोच्च वीरता सम्मान

मेजर शैतान सिंह के पार्थिव शरीर को जोधपुर स्थित उनके पैतृक गांव ले जाया गया, जहां पूरे सैनिक सम्मान के साथ उन्हें अंतिम विदाई दी गई। उनकी इस बहादुरी के लिए सरकार ने उन्हें मरणोपरांत देश के सर्वोच्च वीरता सम्मान परमवीर चक्र से सम्मानित किया। उनका पराक्रम आज भी भारतीय सेना के इतिहास का गौरवशाली हिस्सा है।






👉 Possible in the mist of Impossible

🔶 The life is filled so much with uncertainty, doubt and obstructions that it appears almost impossible to overcome these roadblocks. Every moment, a person has to wage a Mahabharat-like war within himself.

🔷 In Srimad Bhagwadgita, Kurukshetra (the battlefield of Mahabharat) has been called Dharmakshetra (the field of righteousness), because it is here that the battle for the victory of the divine over the devil, light over darkness and love over hate has to be accomplished. In the war of Mahabharat, the army of Yadavas – Sri Krishna’s clan lost in sensual indulgence and hence instruments of evil - was with the Kauravas (symbol of evil). Krishna (The Divine Incarnate) alone, that too weaponless, was with Pandavas (chosen instruments of the Divine). Life too is like that. All the powers of the physical world (rhetorically the mighty army of Yadavas) are allies of Adharma. A sadhak has to choose between the Divine and his mighty army.

🔶 It is not that Krishna was the charioteer of Arjun alone; He is eternally sitting in the heart of everyone of us and controlling our chariots of life. However, when we as sadhaks face the legions of devilish tendencies of greed, selfishness, cunningness, etc in our surroundings and evil traditions in the society, our nervousness is but natural. Arjun, too, was initially nervous and unsure of victory but he did win, once he unconditionally offered himself to serve as an instrument of the Divine Charioteer – in response to the Divine Teacher’s assurance – Ma ekam sharanam vrij.-----. Similarly, when a sadhak puts aside all ego-based self-effort and surrenders to the Divine alone and trusts His sole guidance with all his soul, mind and body, he is sure to overcome all the obstacles of the path and reach the ultimate goal. It is such sadhaks who can make possible all the impossible –looking tasks.

👉 आत्मचिंतन के क्षण 18 Nov 2017

🔶 अपने सुधार के बिना परिस्थितियाँ नहीं सुधर सकतीं। अपना दृष्टिकोण बदले बिना जीवन की गतिविधियाँ नहीं बदली जा सकतीं। इस तथ्य को मनुष्य जितना जल्दी समझ ले उतना ही अच्छा है। हम दूसरों को सुधारना चाहते हैं, पर इसके लिए समर्थ वही हो सकता है, जो पहले सुधार के प्रयोग को अपने ऊपर आजमाकर अपनी योग्यता की परीक्षा दे। दूसरे लोग अपना कहना न मानें यह हो सकता है; पर हम अपनी बात स्वयं ही न माने इसका क्या कारण है? अपनी मान्यताओं को यदि हम स्वयं ही कार्यरूप में परिणत न करें, तो फिर सभी स्त्री-बच्चों से, मित्र-पड़ोसियों से या सारे संसार से यह आशा कैसे करेंगे कि वे अपनी बुरी आदतों को छोड़कर उस उत्तम मार्ग पर चलने लगें, जिसकी कि आप शिक्षा देते हैं।         

🔷 हम भारतीय संस्कृति को मेज पर खड़ा करके यह कहना चाहते हैं कि यह वह संस्कृति है, जिसने दुनिया का कायाकल्प कर दिया। आज भी यह पूरी तरह से मार्गदर्शन देने में सक्षम है। मनीषी इसने ही पैदा किए। यदि मनीषी जाग जाएँ, तो देश, समाज, संस्कृति व सारे विश्व का कल्याण होगा। भगवान् करे मनीषी जगे, जागे, जगाए व जमाना बदले-हमारा यह संकल्प है।   

🔶 भगवान् के द्वार निजी प्रयोजनों के लिए अनेकों खटखटाते पाये जाते हैं; पर अब की बार भगवान् ने अपना प्रयोजन पूरा करने के लिए साथी-सहयोगियों को पुकारा है। जो इसके लिए साहस जुटायेंगे, वे लोक और परलोक की, सिद्धियों, विभूतियों से अलंकृत होकर रहेंगे। शांतिकुंज के संचालकों ने यही सम्पन्न किया और अपने को अति सामान्य होते हुए भी अत्यन्त महान् कहलाने का श्रेय पाया है। जाग्रत आत्माओं से भी इन दिनों ऐसा अनुकरण करने की अपेक्षा की जा रही है।      

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 यूपी के एक आईपीएस अफसर ने सरकारी स्कूल को बना दिया कॉन्वेंट

गोरखपुर के पिपरौली ब्लॉक के जीतपुर प्राथमिक व पूर्व माध्यमिक विद्यालय को देखकर सरकारी और कॉन्वेंट स्कूल में अंतर करना मुश्किल है। स्कूल में छात्र-छात्राओं के पढ़ने के लिए बेहतरीन क्लासरूम, बेंच, चारों ओर हरियाली और साफ-सुथरे टॉइलट। कक्षा 8 तक के इस विद्यालय की सूरत बदली है, गोरखपुर के आईजी मोहित अग्रवाल ने।

आईजी मोहित अग्रवाल ने इस विद्यालय को जून-2017 में गोद लिया था। महज 4 महीने में न सिर्फ स्कूल की इमारत का कायाकल्प हुआ है बल्कि पढ़ाई-लिखाई का पूरा सिस्टम ही बदल गया है। कॉन्वेंट स्कूलों की तरह छात्र-छात्राओं को यलो, ग्रीन, रेड व ब्लू हाउसों में बांटा गया है। हर महीने टेस्ट लिया जाता है।

🔷 बदला माहौल तो बढ़ गए बच्चे
स्कूल को आईजी के गोद लेने के पहले कक्षा एक से पांच तक के बच्चों की संख्या 275 थी। वर्तमान में बच्चों की कुल संख्या 304 है। वहीं कक्षा छह से आठ तक बच्चों की पहले संख्या पहले 120 थी। जो कि वर्तमान में बढ़कर 174 हो गयी है। आईजी मोहित अग्रवाल कहते हैं कि इस स्कूल को पूरी तरह से 'हैपी स्कूल' बनाना है। छात्र-छात्राओं को खुद की सुरक्षा के लिए सेल्फ डिफेंस का कोर्स भी करवाया जाएगा।

🔶 शनिवार को नो बैग डे
स्कूल में हर शनिवार को नो बैग डे होता है। इस दिन खेल-कूद, निबंध, वाद-विवाद और नैतिक शिक्षा की प्रतियोगिताएं भी आयोजित की जाती हैं, ताकि विद्यार्थियों के व्यक्तित्व का भी विकास हो।

🔷 हफ्ते में दो दिन पढ़ाते भी हैं आईजी
आईजी मोहित अग्रवाल खुद मंगलवार और शुक्रवार को एक-एक घंटे बच्चों को पढ़ाते हैं। इसके लिए वह बाकायदा नोट्स भी बनाते हैं, ताकि बच्चों को विषय ठीक से समझाया जा सके और उन्हें रटना न पड़े। छात्र-छात्राओं का हर महीने टेस्ट लिया जाता है। आईजी स्वयं इन बच्चों का पेपर सेट करते हैं। अटेंडेंस व नंबर के आधार पर हर महीने अव्वल आने वाले छात्र-छात्राओं को 'स्टार ऑफ द मंथ' चुना जाता है। दो माह लगातार अव्वल आने वाले बच्चे को 'सुपरस्टार ऑफ द मंथ' का तमगा दिया जाता है।

🔶 मेधावियों को इंटर तक फ्री शिक्षा
इस स्कूल से कक्षा आठ पास कर निकलने वाले टॉप पांच बच्चों को कॉन्वेंट स्कूल में इंटरमीडिएट तक मुफ्त शिक्षा दिलवाई जाएगी। इसके लिये शहर के एलएफस स्कूल (लिटिल फ्लावर स्कूल) ने हाथ बढ़ाया है। स्कूल का प्रबंधन टॉप पांच बच्चों की इंटरमीडिएट तक की पढ़ाई की जिम्मेदारी लेगा। 
 
 

👉 दोष-दृष्टि को सुधारना ही चाहिए (भाग 2)

🔶 देखिये और जरा ध्यान से देखिये कि आपके अन्दर ‘दोष-दर्शन’ करने की दुर्बलता, तो नहीं घर पर बैठी है। क्योंकि ‘दोष-दर्शन’ का दृष्टिकोण भी जीवन को कुछ-कुछ ऐसा ही बना देता है। दोष-दर्शन और संतोष, दोष-दर्शन और प्रसन्नता, दोष-दर्शन तथा सामंजस्य का नैसर्गिक विरोध है। दोष-दृष्टि मनुष्य के हृदय पर उसके मानस पर एक ऐसा आवरण है, जो न हो बाहर की प्रसन्न- किरणों को भीतर प्रतिबिम्बित होने देता है और न भीतर का उल्लास बाहर ही प्रकट होने देता है। इसे मनुष्य एवं आनन्द के बीच एक लौह दीवार ही समझना चाहिये। लीजिये दोषदर्शी व्यक्तियों की दशा से अपना मिलान कर लीजिये और यदि अपने में दोष पायें तो तुरन्त सुधार कर डालिये, जिससे, अगले दिनों में आप भी उस प्रकार प्रसन्न रह सकें, जिस प्रकार लोग रहते हैं और उन्हें रहना ही चाहिये।

🔷 दोष-दर्शन से दूषित व्यक्ति जब किसी व्यक्ति के संपर्क में आता है, तब अपने मनोभाव के अनुसार उसके अन्दर बुराइयाँ ढूँढ़ने लगता है और हठात् कोई न कोई बुराई निकाल ही लेता है। फिर चाहे वह व्यक्ति कितना ही अच्छा क्यों न हो। उदाहरण के लिये किसी विद्वान महात्मा को ही ले लीजिये। लोग उसे बुलाते, आदर सत्कार करते और उसके व्याख्यान से लाभ उठाते हैं। महात्मा जी का व्याख्यान सुन कर सारे लोग पुलकित, प्रसन्न व लाभान्वित होते हैं।

🔶 उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा करते और अपने उतने समय को बड़ा सार्थक मानते। अनेक दिनों, सप्ताहों तथा मासों तक उस सुखद घटना का स्मरण करते और ऐसे संयोग की पुनरावृत्ति चाहने लगते। अधिकाँश लोग उस व्याख्यान का लाभ उठा कर अपना ज्ञान बढ़ाते, कोई गुण ग्रहण करते और किसी दुर्गुण से मुक्ति पाते हैं। वह उनके लिए एक ऐसा सुखद संयोग होता है जो गहराई तक अपनी छाप छोड़ जाता है, ऐसे ही सुव्यक्ति गुणाग्राही कहे जाते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति, मई 1968, पृष्ठ 22

👉 आज का सद्चिंतन 18 Nov 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 18 Nov 2017


👉 दूसरों के दुख को समझो

🔷 “तुम्हारे पाँव के नीचे दबी चींटी का वही हाल होता है, जो यदि तुम हाथी के नीचे दब जाओ तो तुम्हारा हो। दूसरे के दुख को अपने दुख से तुलना किये बिना, हम उसकी प्रकृत अवस्था का ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकते।”

🔶 किसी बादशाह को भयंकर रोग था। कई यूनानी हकीमों ने मिल कर यह राय ठहराई कि एक खास तरह के आदमी के खून के सिवाय इस बीमारी का और इलाज नहीं है। बादशाह ने इस तरह के आदमी की तलाश करने का हुक्म दिया। लोगों ने एक किसान के लड़के में वह सब गुण मौजूद पाये। बादशाह ने उस लड़के के माँ-बाप को बुलवाया और उन्हें बहुत सा इनाम देकर राजी कर लिया। काजी ने यह फैसला किया कि बादशाह को बीमारी से आराम करने के लिए एक रिआया का खून बहाना न्याय संगत है।

🔷 जब जल्लाद ने उसे मारने की तैयारी की, तब वह बालक आकाश की ओर देख कर हँसा। बादशाह ने उस बालक से पूछा, “इस अवस्था में ऐसी क्या बात हुई, जिससे तुझे खुशी हुई? “उसने जवाब दिया “बालक माँ-बाप के प्रेम पर निर्भर रहते हैं, मुकदमों का समावंश काजी करता है। मेरे माता-पिता की मति थोथे साँसारिक लोभ से भ्रष्ट हो गई है कि मेरा खून बहाने पर राजी हो गये हैं। काजी ने मुझे प्राण दण्ड की सजा दे दी है और बादशाह, अपनी स्वास्थ्य-रक्षा के लिये, मेरी मृत्यु पर राजी हो गये हैं। ऐसी दशा में, अब ईश्वर के सिवाय किसकी शरण जाऊं?

🔶 “बादशाह इस बात को सुनकर बहुत ही दुखी हुये और आंखों में आंसू भर कर बोला, “निर्दोष मनुष्य का खून बहाने की अपेक्षा मेरा ही मर जाना अच्छा है।” बादशाह ने उस बालक के सिर और आंखें चूम कर गले से लगाया और उसको बहुत सा इनाम देकर छोड़ दिया।

🔷 लोग कहते हैं, कि बादशाह उसी सप्ताह रोग मुक्त हो गया।

🔶 “अगर तुम्हें अपने पैर के नीचे दबी हुई चींटी की अवस्था का ज्ञान हो, तो तुमको समझना चाहिए कि चींटी की वैसी हालत है जैसी हाथी के पैर के नीचे दबने पर तुम्हारी हो।”

🔷 तात्पर्य यह है कि हमें सब जीवों को अपने समान समझना चाहिये। दूसरों को कष्ट न पहुँचाते समय इस बात का ख्याल रखना चाहिये, कि यदि हमें कोई ऐसा ही कष्ट दे तो हमें कैसा दुख होगा।

🌹 अखण्ड ज्योति मई 1951

गुरुवार, 16 नवंबर 2017

👉 पाप का प्रलोभनः-

🔷 एक ब्राह्मण देवता दरिद्रता के कारण बहुत दुखी होकर राजा के यहाँ धन याचना करने के लिए चल दिये। कई दिन की यात्रा पार करके वे राजधानी पहुँचे और राजमहल में प्रवेश करने की चेष्टा करने लगे।

🔶 उस नगर का राजा बहुत चतुर था। वह दृढ़ निश्चयी और सच्चे ब्राह्मणों को ही दान दिया करता था। सुपात्र कुपात्र की परीक्षा के लिए राजमहल के चारों दरवाजों पर उसने समुचित व्यवस्था कर रखी थी।

🔷 ब्राह्मण देवता ने महल के पहले दरवाजे में प्रवेश किया ही था कि एक वेश्या निकल कर सामने आई। उसने राज महल में प्रवेश करने का कारण ब्राह्मण से पूछा। देवता जी ने उत्तर दिया, धन याचना के लिए राजा के पास जाना चाहते हैं। वेश्या ने कहा इस दरवाजे से आप तब अन्दर जा सकते हैं जब मुझसे रमण कर लें। अन्यथा दूसरे दरवाजे से जाइए। ब्राह्मण को वेश्या की शर्त स्वीकार न हुई, अधर्माचरण करने की अपेक्षा दूसरे द्वार से जाना उन्हें पसंद आया। यहाँ से वे लौट आये और दूसरे दरवाजे पर जाकर प्रवेश करने लगें।

🔶 दो ही कदम भीतर पड़े होंगे कि एक प्रहरी सामने आया। उसने कहा इस दरवाजे से घुसने वालो को पहले माँसाहार करना पड़ता हैं चलिए माँस भोजन तैयार है उसे खाकर आप प्रसन्नतापूर्वक भीतर जा सकते हैं। ब्राह्मण ने माँसाहार करना उचित न समझा, और वहाँ से लौट कर तीसरे दरवाजे में होकर जाने का निश्चय किया।

🔷 तीसरे दरवाजे में जैसे ही वह ब्राह्मण घुसने लगा वैसे ही मद्य की बोतल और प्याली लेकर पहरेदार सामने आया और कहा लीजिए मद्य पीजिए, और भीतर जाइए, इस दरवाजे से आने वालों को मद्यपान करना ही पड़ता है। ब्राह्मण ने मद्यपान नहीं किया और उलटे पाँव चौथे दरवाजे की ओर चल दिया।

🔶 चौथे दरवाजे पर पहुँच कर ब्राह्मण ने देखा कि वहाँ जुआ हो रहा है। जो लोग जुआ खेलते हैं वे ही भीतर घुस पाते हैं। जुआ खेलना भी धर्म विरुद्ध है। ब्राह्मण बड़े सोच विचार में पड़ा, अब किस तरह भीतर प्रवेश हो, चारों दरवाजों पर धर्म विरोधी शर्तें हैं। पैसे की मुझे बहुत जरूरत है। एक ओर धर्म दूसरी ओर धन दोनों का घमासान युद्ध उसके मस्तिष्क में होने लगा।

🔷 ब्राह्मण जरा सा फिसला, उसने सोचा जुआ छोटा पाप है, इसको थोड़ा सा कर लें तो तनिक सा पाप होगा। मेरे पास मार्ग व्यय से बचा हुआ एक रुपया है, क्यों न इस रुपये से जुआ खेल लूँ और भीतर प्रवेश पाने का अधिकारी हो जाऊँ।

🔶 विचारों को विश्वास रूप में बदलते देर न लगी। ब्राह्मण जुआ खेलने लगा। एक रुपये के दो हुए, दो के चार, चार के आठ, जीत पर जीत होने लगी। ब्राह्मण राजा के पास जाना भूल गया और दत्त चित्त होकर जुआ खेलने लगा। जीत पर जीत होने लगी। शाम तक हजारों रुपयों का ढेर जमा हो गया। जुआ बन्द हुआ। ब्राह्मण ने रुपयों की गठरी बाँध ली।

🔷 दिन भर से खाया कुछ न था। भूख जोर से लग रही थी। पास में कोई भोजन की दुकान न थी। ब्राह्मण ने सोचा रात का समय है कौन देखता है चलकर दूसरे दरवाजे पर माँस भोजन मिलता है वही क्यों न खा लिया जाए। स्वादिष्ट भोजन मिलता है और पैसा भी खर्च नहीं होता, दुहरा लाभ है। जरा सा पाप करने में कुछ हर्ज नहीं। ब्राह्मण के पैर तेजी से उधर बढ़ने लगे। भोजन तैयार था, माँस मिश्रित स्वादिष्ट भोजन को खाकर देवता जी संतुष्ट हो गये।

🔶 अस्वाभाविक भोजन को पचाने के लिये अस्वाभाविक पाचक पदार्थों की जरूरत पड़ती है। गरिष्ठ, तामसी, विकृत भोजन करने वाले अकसर पान, बीड़ी, चूरन, चटनी की शरण लिया करते हैं। देवता जी के पेट में जाकर माँस अपना करतब दिखाने लगा। अब उन्हें मद्यपान की आवश्यकता प्रतीत हुई। आगे के दरवाजे की ओर चले और मद्य की कई प्यालियाँ चढ़ाई।

🔷 धन का, माँस का, मद्य का, तिहरा नशा उन पर चढ़ रहा था। काँचन के बाद कुच का, सुरा के बाद सुन्दरी का, ध्यान आना स्वाभाविक है। देवता जी पहले दरवाजे पर पहुँचे और वेश्या के यहाँ जा विराजे। वेश्या ने उन्हें संतुष्ट किया और पुरस्कार स्वरूप जुए में जीता हुआ सारा धन ले लिया।

🔶 एक पूरा दिन चारों द्वारों पर व्यतीत करके दूसरे दिन प्रातःकाल ब्राह्मण महोदय उठे। वेश्या ने उन्हें घृणा के साथ देखा और शीघ्र घर से निकाल देने के लिए अपने नौकरों को आदेश दिया। उन्हें घसीटकर घर से बाहर कर दिया गया। राजा को सारी सूचना पहुँच चुकी थी। आज वे फिर चारों दरवाजों पर गये और शर्तें पूरी करने के लिए कहने लगे पर किसी ने उन्हें भीतर न घुसने दिया। सब जगह से उन्हें दुत्कार दिया गया। ब्राह्मण दोनों ओर से भ्रष्ट होकर सिर धुन धुन कर पछताने लगे।

🔷 हम लोग उपरोक्त ब्राह्मण के पतन की निन्दा करेंगे क्योंकि वह “जरा सा” पाप करने में विशेष हानि न समझने की भूल कर बैठा था। हमें विचार करना चाहिए कि कही ऐसी ही गलतियाँ हम भी तो नहीं कर रहे है। किसी पाप को छोटा समझकर उसमें एक बार फँस जाने से फिर छुटकारा पाना कठिन होता है। एक कदम नीचे की ओर गिरने से फिर पतन का प्रवाह तीव्र होता जाता है और अन्त में बड़े से बड़े पापों के करने में भी हिचक नहीं होती। इसलिए आरम्भ से ही सावधानी रखनी चाहिए। छोटे पापों से भी वैसे ही बचना चाहिए जैसे अग्नि की छोटी चिंगारी से सावधान रहते है।

🔶 "सम्राटों के सम्राट परमात्मा के दरबार में पहुँचकर अनन्त रूपी धन की याचना करने के लिए जीव रूपी ब्राह्मण जाता है। प्रवेश द्वार काम, क्रोध लोभ, मोह के चार पहरेदार बैठे हुए हैं। वे जीव को तरह-तरह से बहकाते हैं और अपनी ओर आकर्षित करते हैं। यदि जीव उनमें फँस गया तो पूर्व पुण्यों रूपी गाँठ की कमाई भी उसी तरह दे बैठता है जैसे कि ब्राह्मण अपने घर का एक रुपया भी दे बैठा था। जीवन इन्हीं पाप जंजालों में व्यतीत हो जाता है और अन्त में वेश्या रूपी ममता के द्वार से दुत्कारा जाकर रोता पीटता इस संसार से विदा होता है।*

🔷 देखना कही आप भी उस ब्राह्मण की नकल तो नहीं कर रहे हैं।

🌹 अखण्ड ज्योति Feb 1944

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 17 Nov 2017

👉 आज का सद्चिंतन 17 Nov 2017


👉 दोष-दृष्टि को सुधारना ही चाहिए (भाग 1)

🔶 क्या कभी अपने यह सोचा कि आप पग-पग पर खिन्न, असंतुष्ट, उद्विग्न अथवा उत्तेजित क्यों रहते हैं? क्यों आपको समाज, संसार मनुष्यों, मित्रों, वस्तुओं, परिस्थितियों यहाँ तक अपने से भी शिकायत रहती है? आप सब कुछ करते, बरतते और भोगते हुए भी वह मजा, आनन्द और प्रसन्नता नहीं पाते, जो मिलनी चाहिये और संसार के अन्य असंख्यों लोग पा रहे हैं। आप विचारक, आलोचक, शिक्षित, और सभ्य भी हैं, किन्तु आपकी यह विशेषता भी आपको प्रसन्न नहीं कर पाती। स्त्री-बच्चे, घर, मकान सब कुछ आपको उपलब्ध है। फिर भी आप अपने अन्दर एक अभाव और एक असंतोष अनुभव ही करते रहते हैं। घर, बाहर, मेले-ठेले, सफर, यात्रा, सभा-समितियों, भाषणों, वक्तव्यों- किसी में भी कुछ मजा ही नहीं आता। हर समय एक नाराजी, नापसन्दी एवं नकारात्मक ध्वनि परेशान ही रखती है। संसार की किसी भी बात, वस्तु और व्यक्ति से आपका तादात्म्य ही स्थापित हो पाता है।

🔷 साथ ही आप पूर्ण स्वस्थ हैं। मस्तिष्क का कोई विकार आपमें नहीं है। आपका अन्तःकरण भी सामान्य दशा में है और आस-पास में ऐसी कोई घटना भी नहीं घटी है, जिससे आपकी अभिरुचिता एवं प्रसादत्व विक्षत हो गया हो। ऐसा भी नहीं हुआ कि विगत दिनों में ही किसी ऐसे अप्रिय संयोग से सामंजस्य स्थापित करना है, जिसकी अनुभूति आज भी आपको विषाण बनाये हुए हैं।

🔶 वास्तव में बात बड़ी ही विचित्र और अबूझ-सी मालूम होती है। जब प्रत्यक्ष में इस स्थायी अप्रियता का कोई कारण नहीं दिख पड़ा, फिर ऐसा कौन-सा चोर, कौन-सा ठग आपके पीछे अप्रत्यक्ष रूप से लगा हुआ है, जो हर बात के आनन्द से आपको वंचित किए हुये आपके जन्म-सिद्ध अधिकार प्रसन्नता का अपहरण कर लिया करता है। इसको खोजिये, गिरफ्तार करिये और अपने पास से मार भगाइये। जीवन में सदा दुःखी और खिन्नावस्था में रहने का पाप न केवल वर्तमान ही बल्कि आगामी शत-शत जीवनों तक को प्रभावित कर डालता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति, मई 1968, पृष्ठ 22
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1968/May/v1.22


http://literature.awgp.org

👉 आत्मोन्नति के चार आधार (अन्तिम भाग)

🔶 चौथा कार्य सेवा का है। मनुष्य समाज का ऋणी है, क्योंकि वह सामाजिक प्राणी है। भगवान् ने उसको इसीलिए जन्म दिया है कि वह उसके इस विश्व-उद्यान की सेवा करे। उसकी जीवात्मा का विकास और जीवन का लक्ष्य प्राप्त करने के लिए सेवा से बड़ा तप और सेवा से बड़ा पुण्य कुछ भी नहीं हो सकता। हमको सेवा करने के लिए समय निकालते रहना चाहिए। सारे का सारा समय अपने लिए ही न खर्च की दें, वरन् देश, धर्म, समाज और संस्कृति की सेवा करने के लिए भी कुछ लगाएँ। हमारा धर्म होना चाहिए कि हम अपनी शक्तियों का एक अंश दुखियारों के लिए और पीड़ितों के लिए, पतितों के लिए लगाएँ। हमारे लिए सबसे बड़ी सेवा का कार्य क्या हो सकता है? ज्ञानयज्ञ से बड़ा काई और दूसरा पुण्य नहीं हो सकता। इसको ब्रह्मदान भी कहा गया है।
           
🔷 यह सर्वोत्तम धर्म है, क्योंकि ज्ञानयज्ञ से हम मनुष्यों को दिशा दे सकते हैं, जिससे वे बुराइयों से बच सकें और उन्नति के मार्ग पर ऊँचे उठ सकें। ज्ञान, विचारणा, भावना—यही तो है शक्ति का अंश ।। इसलिए ब्राह्मण और साधु हमेशा से ज्ञानयज्ञ को ही सर्वोत्तम सेवा मान करके उसमें संलग्न रहे हैं और यह प्रयत्न करते रहे हैं कि हम स्वयं अच्छे बनें और अपनी अच्छाई दूसरों पर बिखेरें। इसके लिए हमको अंशदान करना चाहिए। सेवा के लिए हमको एक घण्टा समय और दस पैसे नित्य का जो न्यूनतम कार्यक्रम दिया गया था ज्ञानयज्ञ-विचारक्रान्ति के लिए, उस पर हमको मुस्तैदी से अमल करता चाहिए। कोई भी आदमी हममें से ऐसा न हो जो कि सेवा के लिए एक घण्टा समय और दस पैसे जैसी न्यूनतम शर्त को पूरा न करता हो। इससे ज्यादा ही हम करें, ज्यादा ही उत्साह दिखाएँ।
 
🔶 हम केवल भौतिक जीवन ही न जिएँ। आध्यात्मिक जीवन भी जिएँ। हमारी क्षमताओं का उपयोग, हमारे समय का उपयोग पेट पालने तक ही सीमित न रहे, बल्कि लोकमंगल और लोकहित के लिए भी खर्च हो। इस तरीके से हम चार आधार जीवन में अपनाए रहकर के आत्मिक उन्नति के मार्ग पर चल सकते हैं। अपना परिष्कार और परिवर्तन कर सकते हैं। यदि हमने अपना परिष्कार और परिवर्तन किया तो समाज का परिवर्तन और समाज का परिष्कार स्वाभाविक और सरल हो जायेगा। युग का परिवर्तन व्यक्ति परिवर्तन और समाज के परिवर्तन के साथ जुड़ा हुआ है। अपनी छोटी-सी प्रयोगशाला में हम इसी का प्रयोग करते हैं और अपनी प्रयोगशाला में सम्मिलित रहने वाले, अपने परिवार में शामिल रहने वाले हर व्यक्ति से प्रार्थना करते हैं कि आपको आत्मिक उन्नति के लिए अभी बताए गए इन चार आधारों को मजबूती के साथ ग्रहण करता चाहिए और अपने दैनिक जीवन में समन्वित रखना चाहिए। साधना, स्वाध्याय, संयम, और सेवा दैनिक जीवन में न्यूनतम मात्रा में भले ही हों, पर सम्मिलित अवश्य और अनिवार्य रूप से रहने चाहिए।

🌹 आज की बात समाप्त।
🌹 ॐ शान्ति।
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 आत्मचिंतन के क्षण 17 Nov 2017

🔶 सद्विचार तब तक मधुर कल्पना भर बने रहते हैं, जब तक उन्हें कार्य रूप में परिणित नहीं किया जाता। विचारों और कार्यों का समन्वय ही संस्कार बनता है। सामर्थ्य संस्कारों में ही होती है। उन्हीं के सहारे व्यक्तित्व बनता है और वे ही भविष्य निर्धारण की प्रमुख भूमिका निभाते हैं। संस्कार अर्थात् चिन्तन और चरित्र का अभ्यस्त ढर्रा। जहाँ तक सुसंस्कारिता की उपलब्धि का सम्बन्ध है, वह सत्प्रवृत्तियों के सम्बन्ध में निःस्वार्थ भाव से निरत हुए बिना और किसी प्रकार सम्भव ही नहीं हो सकती।

🔷 प्रगति का अर्थ है- ऊर्ध्वगमन, उत्कर्ष, अभ्युदय। यह विभूतियाँ अन्तः क्षेत्र की हैं। दृष्टिकोण और लक्ष्य ऊँचा रहने पर इच्छा और आकांक्षा का स्तर ऊँचा उठता है। आत्म गौरव का ध्यान रहता है। अपना मूल्य गिरने न पाये यह सतर्कता जिसमें जितनी पाई जाती है, वह उतना ही प्रगतिशील है।

🔶 आप जीवन के प्रति अपनी धारणा बदल डालिए। विश्वास तथा ज्ञान में ही अपना जीवन भवन निर्माण कीजिए। यदि वर्तमान आपत्तिग्रस्त है, तो उसका यह अर्थ नहीं है कि भविष्य भी अन्धकारमय है। आपका भविष्य उज्ज्वल है। विचारपूर्वक देखिए कि जो कुछ आपके पास है, उसका सबसे अच्छा उपयोग कर रहे हैं अथवा नहीं? क्योंकि यदि प्रस्तुत साधनों का दुरुपयोग करते हैं, तो चाहे वह कितनी ही तुच्छ और सारहीन क्यों न हो, आप उसके भी अधिकारी न रहेंगे। वह भी आपसे दूर भाग जायेंगे या छीन लिए जावेंगे।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Serve Man as God

🔶 The only way of getting our divine nature manifested is by helping others to do the same. If there is inequality in nature, still there must be equal chance for all – or if greater for some and for some less  - the weaker should be given more chance than the strong. In other words, a Brahmana is not so much in need of education as a Chandala. If the son of a Brahmana needs one teacher, that of a Chandala needs ten. For greater help must be given to him whom nature has not endowed with an acute intellect from birth. It is a madman who carries coals to Newcastle. The poor, the downtrodden, the ignorant - let these be your god.

🔷 This is the gist of all worship - to be pure and to do good to others. He who sees Siva in the poor, in the weak, and in the diseased, really worships Siva; and if he sees Siva only in the image, his worship is but preliminary.

🔶 The life of Buddha shows that even a man who has no metaphysics, belongs to no sect, and does not go to any church, or temple, and is a confessed materialist, even he can attain to the highest. …. He was the only man who was ever ready to give up his life for animals, to stop a sacrifice. He once said to a king: ‘If the sacrifice of a lamb helps you to go to heaven, sacrificing a man will help you better; so sacrifice me.’ The king was astonished.

🔷 ‘The good live for others alone. The wise man should sacrifice himself for others.’ I can secure my own good only by doing your good. There is no other way, none whatsoever.

🔶 Go from village to village; do good to humanity and to the world at large. Go to hell yourself to buy salvation for others… ‘When death is so certain, it is better to die for a good cause.’

🔷 Throughout the history of the world, you find great men make great sacrifices and the mass of mankind enjoy the benefit. If you want to give up everything for your own salvation, it is nothing. Do you want to forgo even your own salvation for the good of the world? You are God, think of that.

✍🏻 Swami Vivekananda

👉 आत्मोन्नति के चार आधार (भाग 7)

🔶 तीसरी बात जो आत्मिक उन्नति के लिए आवश्यक है, उसका नाम है संयम। संयम का अर्थ है— रोकथाम। अगर हम रोकथाम करें तो जो हमारी शक्तियों का घोर अपव्यय होता रहता है, उसको बचा सकते हैं। हम अपनी अधिकांश शारीरिक और मानसिक शक्तियों को अपव्यय में नष्ट कर देते हैं, कुमार्ग पर नष्ट कर देते हैं। यदि उनको रोका जा सका होता और उपयोगी मार्ग पर लगाया गया होता तो निश्चित रूप से उन शक्तियों के चमत्कार हमको देखने को मिल सकते थे, जो हमारे पास थीं। पर हम बर्बादी से कुछ बचा नहीं सके। चार तरह के संयम-निग्रह रूप में बताये गये हैं— इन्द्रिय-निग्रह, मनोनिग्रह, संयम-निग्रह, अर्थ-निग्रह। इन्द्रिय-निग्रह में जिव्हा और कामेन्द्रिय का संयम प्रमुख है। ये इन्द्रियाँ हमारी कितनी सारी शक्तियों को नष्ट करती हैं और स्वास्थ्य को किस बुरी तरीके से खोखला करती हैं, यह सभी जानते हैं।
           
🔷 इन्द्रिय-निग्रह का महत्त्व बताने की जरूरत नहीं है। शारीरिक दृष्टि से जिनको समर्थ बनना हो, नीरोग और दीर्घजीवी बनना हो, उनको इन्द्रिय-निग्रह का महत्त्व समझना और अपने आपको संयम का अभ्यासी बनाना चाहिए। दूसरा संयम मनोनिग्रह है। मन में कितने सारे विचार उठते हैं, लेकिन वे असंगत, असंयमित, बुराइयों एवं मनोविकारों से भरे होते हैं। इनसे हमारा मस्तिष्क विकृत होता है और बुरी तरह की आदतें पड़ती हैं। मनःशक्तियाँ निग्रहीत करके किसी कार्य में लगाई गई होतीं तो हम वैज्ञानिक बन गए होते, साहित्यकार बन गए होते। जिस भी कार्य में हमने मन लगाया होता, सफलता की उच्च श्रेणी तक जा पहुँचे होते, पर अस्त-व्यस्त मन होने के कारण से कोई सफलता सम्भव न हो सकी। मनोनिग्रह करके एकाग्रता की शक्ति और एक दिशा में चलने की सामर्थ्य प्राप्त कर सकें, तो उससे हमारी सफलताओं का द्वार खुल सकता है।
 
🔶 तीसरा है— समय का निग्रह। हम समय को आलस्य और प्रमाद में पड़े-पड़े बर्बाद करते रहते हैं। कोई योजनाबद्ध कार्य नहीं करते, जब जो आया मनमर्जी से काम कर लिया, मन नहीं हुआ तो नहीं किया। इस तरीके से अस्त-व्यस्तता में हमारा जीवन नष्ट हो जाता है, जबकि समय का थोड़ा-थोड़ा भी उपयोग करते तो न जाने कितना लाभ उठा सकते थे। चौथा निग्रह-अर्थ-निग्रह भी ऐसा ही महत्त्वपूर्ण है। पैसे को विलासिता से लेकर न जाने किस-किस काम में, व्यसनों में, अनाचारों में हम खर्च करते हैं। अगर उसको फिजूलखर्ची से हम बचा सके होते और उस धन को हमने किसी उपयोगी काम में लगाया होता तो भौतिक और आत्मिक उन्नति की दिशा में हम कहीं आगे बढ़ गए होते। अर्थ-निग्रह, इन्द्रिय-निग्रह, मनोनिग्रह, समय-निग्रह— इन चारों निग्रहों को हम करें तो संयमशील हो सकते हैं। हमको संयम बरतना चाहिए, अस्वाद व्रत का, ब्रह्मचर्य का अभ्यास करना चाहिए। ऐसे-ऐसे असंख्य संयम हैं, जिनको अपनाने से हम तपस्वी बनते हैं और अपनी शक्ति का बहुत बड़ा भाग बचा करके अच्छे काम में लगाते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 आचरण की टोकरी:-

(सत्संग सॆ मन की मैल की धुलाई)
  
🔶 एक युवक प्रतिदिन संत का सत्संग सुनता था। एक दिन जब सत्संग समाप्त हो गए, तो वह संत के पास गया और बोला:-

🔷 ‘महाराज! मैं काफी दिनों से आपके सत्संग सुन रहा हूं, किंतु यहां से जाने के बाद मैं अपने गृहस्थ जीवन में वैसा सदाचरण नहीं कर पाता, जैसा यहां से सुनकर जाता हूं। इससे सत्संग के महत्व पर शंका भी होने लगती है। बताइए, मैं क्या करूं?’

🔶 संत ने युवक को बांस की एक टोकरी देते हुए उसमें पानी भरकर लाने के लिए कहा। युवक टोकरी में जल भरने में असफल रहा।

🔷 संत ने यह कार्य निरंतर जारी रखने के लिए कहा। युवक प्रतििदन टोकरी में जल भरने का प्रयास करता, किंतु सफल नहीं हो पाता। कुछ दिनों बाद संत ने उससेे पूछा, ‘इतने दिनों से टोकरी में लगातार जल डालने से क्या टोकरी में कोई फर्क नजर आया ?’

🔶 युवक बोला. ‘एक फर्क जरूर नजर आया है। पहले टोकरी के साथ मिट्टी जमा होती थी, अब वह साफ दिखाई देती है। कोई गंदगी नहीं दिखाई देती और इसके छेद पहले जितने बड़े नहीं रह गए, वे बहुत छोटे हो गए हैं।’

🔶 तब संत ने उसे समझाया, ‘यदि इसी तरह उसे पानी में निरंतर डालते रहोगे, तो कुछ ही दिनों में ये छेद फूलकर बंद हो जाएंगे और टोकरी में पानी भर पाओगे।

🔷 इसी प्रकार जो लगातर सत्संग जाते हैं, उनका मन एक दिन अवश्य निर्मल हो जाता है, अवगुणों के छिद्र भरने लगते हैं और गुणों का जल भरने लगता है।’ युवक ने संत से अपनी समस्या का समाधान पा लिया।

🔶 निरंतर सत्संग से दुर्जन भी सज्जन हो जाते हैं। क्योंकि महापुरुषों की पवित्र वाणी उनके मानसिक विकारों को दूर कर उनमें सदविचारों का आलोक प्रसारित कर देती है।

👉 आज का सद्चिंतन 16 Nov 2017


👉 अनोखा फैसला

🔷 एक साधु वर्षा के जल में प्रेम और मस्ती से भरा चला जा रहा था... कि इस साधु ने एक मिठाई की दुकान को देखा जहां एक कढ़ाई में गरम दूध उबला...