शनिवार, 26 मई 2018

👉 हिंसा का बीज़

🔶 कस्बे में एक महात्मा थे। सत्संग करते और लोगों को धैर्य, अहिंसा, सहनशीलता, सन्तोष आदि के सदुपदेश देते। उनके पास सत्संग मे बहुत बड़ी संख्या में भक्त आने लगे। एक बार भक्तों ने कहा महात्मा जी आप कस्बे में अस्पताल, स्कूल आदि भी बनवाने की प्रेरणा दीजिए। महात्मा जी ने ऐसा ही किया। भक्तों के अवदान और परिश्रम से योजनाएं भी बन गई। योजनाओं में सुविधा के लिए भक्तों नें, कस्बे के नेता को सत्संग में बुलाने का निर्णय किया।

🔷 नेताजी सत्संग में पधारे और जनसुविधा के कार्यों की जी भरकर सराहना  की और दानदाताओं की प्रशंसा भी। किन्तु महात्मा जी की विशाल जनप्रियता देखकर, अन्दर ही अन्दर जल-भुन गए। महात्मा जी के संतोष और सहनशीलता के उपदेशों के कारण कस्बे में समस्याएं भी बहुत कम थी। परिणाम स्वरूप नेता जी के पास भीड कम ही लगती थी।

🔶 घर आकर नेताजी सोच में डूब गए। इतनी अधिक जनप्रियता मुझे कभी भी प्राप्त नहीं होगी, अगर यह महात्मा अहिंसा आदि सदाचारों का प्रसार करता रहा। महात्मा की कीर्ती भी इतनी सुदृढ थी कि उसे बदनाम भी नहीं किया जा सकता था। नेता जी अपने भविष्य को लेकर चिंतित थे।आचानक उसके दिमाग में एक जोरदार विचार कौंधा और निश्चिंत होकर आराम से सो गए।

🔷 प्रातः काल ही नेता जी पहूँच गए महात्मा जी के पास। थोडी ज्ञान ध्यान की बात करके नेताजी नें महात्मा जी से कहा आप एक रिवाल्वर का लायसंस ले लीजिए। एक हथियार आपके पास हमेशा रहना चाहिए। इतनी पब्लिक आती है पता नहीं कौन आपका शत्रु हो? आत्मरक्षा के लिए हथियार का पास होना बेहद जरूरी है।

🔶 महात्मा जी नें कहा, “बंधु! मेरा कौन शत्रु?  शान्ति और सदाचार की शिक्षा देते हुए भला  मेरा कौन अहित करना चाहेगा। मै स्वयं अहिंसा का उपदेश देता हूँ और अहिंसा में मानता भी हूँ।” नेता जी नें कहा, “इसमें कहाँ आपको कोई हिंसा करनी है। इसे तो आत्मरक्षा के लिए अपने पास रखना भर है। हथियार पास हो तो शत्रु को भय रहता है, यह तो केवल सावधानी भर है।” नेताजी ने छूटते ही कहा, “महात्मा जी, मैं आपकी अब एक नहीं सुनूंगा। आपको भले आपकी जान प्यारी न हो, हमें तो है। कल ही मैं आपको लायसंस शुदा हथियार भैंट करता हूँ।”

🔷 दूसरे ही दिन महात्मा जी के लिए चमकदार हथियार आ गया। महात्मा जी भी अब उसे सदैव अपने पास रखने लगे। सत्संग सभा में भी वह हथियार, महात्मा जी के दायी तरफ रखे ग्रंथ पर शान से सजा रहता। किन्तु अब पता नहीं, महाराज जब भी अहिंसा पर प्रवचन देते, शब्द तो वही थे किन्तु श्रोताओं पर प्रभाव नहीं छोडते थे। वे सदाचार पर चर्चा करते किन्तु लोग आपसी बातचित में ही रत रहते। दिन प्रतिदिन श्रोता कम होने लगे।

🔶 एक दिन तांत्रिकों का सताया, एक विक्षिप्त सा  युवक सभा में हो-हल्ला करने लगा। महाराज नें उसे शान्त रहने के लिए कहा। किन्तु टोकने पर उस युवक का आवेश और भी बढ़ गया और वह चीखा, “चुप तो तूँ रह पाखण्डी” इतना सुनना था कि महात्मा जी घोर अपमान से क्षुब्ध हो उठे। तत्क्षण क्रोधावेश में निकट रखा हथियार उठाया और हवाई फायर कर दिया। लोगों की जान हलक में अटक कर रह गई।

🔷 उसके बाद कस्बे में महात्मा जी का सत्संग वीरान हो गया और नेताजी की जनप्रियता दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ने लगी।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 27 May 2018



👉 आज का सद्चिंतन 27 May 2018


👉 यह अच्छी आदतें डालिए (भाग 5)

जागरुकता :-

🔶 जो जीवन में जागरुक रहता है, उन्मत्त होता रहता है। जो तन्द्रा आलस्य या विलास में सोया रहता है, क्षय और पतन को प्राप्त होता है। जागरुक व्यक्ति अपने चारों ओर, संसार में देश तथा समाज में होने वाले क्रम तथा घटनाओं पर तीखी दृष्टि रखता है और उनसे लाभ उठाता है।

🔷 जागरुकता वह स्थिति है जिसमें व्यक्ति मानसिक तथा शारीरिक दृष्टि से चौकना रहता है। उसका मन संसार की प्रगति को देखता रहता है। उसमें शैथिल्य और आलस्य नहीं रहता। सतर्क पहरेदार की भाँति वह अपने इर्द गिर्द के परिवर्तनों को देखता और उनसे लाभ उठाता है। डाक्टर को देखिए, सिपाही या मल्लाह को देखिए, वे कैसे चुस्त, सतर्क, जागरुक रहते हैं। अपने काम पर तीखी दृष्टि लगाये रहते हैं। आध्यात्मिक जगत् के पथिक के लिए जागरुकता अतीव आवश्यक गुण है।

🔶 जीवन में अपने कर्त्तव्यों, उत्तरदायित्वों, आगे आने वाली जिम्मेदारियों, व्ययों के प्रति जागरुक रहिये। आपकी प्रगति कैसी हो रही है, आर्थिक, सामाजिक, बौद्धिक, शारीरिक सभी रूपों में आप कितना आगे बढ़ रहे हैं, अथवा नीचे सरके आ रहे हैं?—यह चौकन्ने हो कर नापते रहिये। चौकन्ना व्यक्ति आने वाले खतरों से मार नहीं खाता। जरासा खतरा देखते ही वह गिलहरी की तरह जागरुक हो उठता है और बच निकलता है।

🔷 वे ही व्यक्ति अधिक वेतन प्राप्त करते हैं, जिनमें जागरुकता की अधिक आवश्यकता होती है। एंजिन तथा हवाई जहाज के चालक, बम चलाने वाले, मोटर ड्राइवर, डाक्टर, इंजीनियर, मजिस्ट्रेट इत्यादि सब ही को जिस गुण की अतीव आवश्यकता है, वह सतत् चेतनशीलता है।

🔶 शरीर में रोगों की ओर से सतर्क रहिये। तनिक सी लापरवाही से इन रोगों का अत्यधिक विकास हो सकता है। तनिक सी अशिष्टता से लड़ाई, झगड़ा, मुकदमेबाजी तक की नौबत आ सकती है। चारों ओर से आक्रमण आ सकते हैं पर जागरुकता सबसे हमारी रक्षा कर सकती है। अच्छा सेनापति सब जरूरतों के लिए तैयार रहता है।

📖 अखण्ड ज्योति, अप्रैल 1955 पृष्ठ 20
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1955/April/v1.20

👉 Truthfulness (Last Part)

🔶 Personnel of the armed forces and intelligence agencies have strict instructions to gather information from others but not to divulge facts about themselves. This appears to be a clear encouragement to falsehood. But behind it is the exalted aim of national security and crime investigation. Hence, in such cases recourse to apparent lies can in no way be considered unbecoming or demeaning. Dharmaraj Yudhishthira, While confirming the death of Ashwathama, simply added in a low tone, ‘naro wa Kunjro wa’ (Either a man of this name or an elephant).

🔷 Many an elephant had died in the Mahabharat war. Yudhisthir instead of clarifying the position took recourse to a half truth. Even Lord Krishna, sensing that Arjun might have to die instead of Jayadratha, created the mirage of a sunset with the help of his ‘Sudarshan Chakra’. Thus, Arjuna’s life was saved and instead Arjun was able to kill Jayadrath to fulfill his vow. The seemingly deceptive trick played by Krishna served the cause of truth by serving the life of the greates warrior of the age fighting against the forces of evil.

🔶 All these epochal episodes are not meant to encourage falsehood, nor to paint truth as impractical. Honesty and truthfulness are indeed the basic moral and ethical values to be practiced in our lives.

🔷 We must not indulge in adulteration, or profiteering; must use correct weights and measures, and have transparent book keeping. But by the same token, it is not at all necessary to play Harishchandra before a thief or a ‘thug’, reveal to him details of one’s money and valuables and thus facilitate and encourage theft and dacoity.

📖 Akhand Jyoti- Feb 2001

👉 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिये (भाग 3)

🔶 बात यहीं तक समाप्त नहीं होती। हमारे दाम्पत्य जीवन के आदर्श भी अब वही होते जाते हैं जो पाश्चात्य देशों के हैं। पतिव्रत और पत्नीव्रत पश्चिम में भी विदा करने की तैयारी हो चुकी है। सम्मिलित कुटुम्ब प्रथा उस संस्कृति में बेकार मानी जाती है, हम भी सम्मिलित परिवारों को समाप्त कर रहे हैं। विवाह होते ही पति पत्नी सारे कुटुम्ब से अलग रहने की बात सोचते हैं और वही करते हैं। पश्चिम में आहार की स्वच्छता रहती है पर पवित्रता को व्यर्थ माना जाता है। हम भी जिस तिस के हाथ का बना भक्ष अभक्ष का विचार छोड़कर चाहे जो खाने लगे हैं।

🔷 पश्चिम वासियों का दृष्टिकोण खाओ पीओ मजा करो है। हम भी ऊंचे आदर्शवाद का कष्ट साध्य जीवन व्यतीत करने की आकांक्षा को त्याग कर विलासी जीवन की ओर अग्रसर हो रहे हैं और जिस प्रकार भी नीति अनीति से सम्भव हो उसके साधन जुटाने में कटिबद्ध हो रहे हैं। ईसाइयत हमें प्यारी लगती है। हिन्दुत्व, बेवकूफी का चिन्ह प्रतीत होता है। शेक्सपियर और मिल्टन हमें विद्वान दीखते हैं, कालिदास और भवभूति का नाम भी याद नहीं होता।

🔶 क्या हमारे लिए यह उचित होगा कि अपनी महान जाति को इस सांस्कृतिक पराधीनता के चंगुल में फंसते हुए देखते रहें और चुपचाप आंसू बहाते रहें। नहीं, इतने से काम न चलेगा। हमें अपने राष्ट्रीय और जातीय गौरव की रक्षा के लिए ही नहीं—मानवता, धार्मिकता और अध्यात्मिकता के आदर्शों को जीवित रखने के लिए उस भारतीय संस्कृति को जीवित रखना होगा जिसकी गोद में पलकर इस के निवासी देवता की पदवी प्राप्त करते हैं। जो संस्कृति घर-घर में नर रत्नों को, महापुरुषों को जन्म देने की अपनी प्रामाणिकता लाखों वर्षों से प्रमाणित करती आ रही है, उसे इस प्रकार आसुरी संस्कृति से पद दलित और परांगमुख होते देखना हमारे लिए एक बड़ी हल लज्जास्पद बात होगी।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिए पृष्ठ 8

👉 आध्यात्म पथ के पथिकों! अपरिग्रही बनो!!

🔶 मन से हर एक को सदैव अपरिग्रही होना चाहिए। आदर्श यही सामने रहना चाहिए कि सच्ची जरूरतें पूरी करने के लिए ही कमायें, जोड़ने जमा करने या ऐश उड़ाने के लिए नहीं। यदि गरीब आदमी लखपती बनने के मनसूबे बाँधता है तो वह परिग्रही है। धन वैभव के बारे में यही आदर्श निश्चित किया होना चाहिए कि सच्ची जरूरतों की पूर्ति के लिए कमायेंगे, उतनी ही इच्छा करेंगे, उससे अधिक संग्रह न करेंगे। धन को जीवन का उद्देश्य नहीं वरन् एक साधन बनाना चाहिए। “आत्मोन्नति और परमार्थ” जीवनोद्देश्य तो यही होना चाहिए।

🔷 जीवन धारण करने योग्य पैसा कमाने के अतिरिक्त शेष समय इन्हीं कार्यों में लगाना चाहिए। पैसे की आज जो सर्वभक्षी तृष्णा हर एक के मन में दावानल की तरह धधक रही है यह सर्वथा त्याज्य है। सादगी और अपरिग्रह में सच्चा आनन्द है। मनुष्य उतना ही आनन्दित रह सकता है जितना अपरिग्रही होगा। परिग्रही के सिर पर तो अशान्ति और अनीति सवार रहती है। इसी मर्म को समझते हुए योग शास्त्र के आचार्यों ने आध्यात्म पथ के पथिक को अपरिग्रही बनने का आदेश किया है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड-ज्योति जनवरी 1944 पृष्ठ 1

शुक्रवार, 25 मई 2018

👉 आज ही क्यों नहीं

🔷 एक बार की बात है कि एक शिष्य अपने गुरु का बहुत आदर-सम्मान किया करता था। गुरु भी अपने इस शिष्य से बहुत स्नेह करते थे लेकिन वह शिष्य अपने अध्ययन के प्रति आलसी और स्वभाव से दीर्घसूत्री था। सदा स्वाध्याय से दूर भागने की कोशिश करता तथा आज के काम को कल के लिए छोड़ दिया करता था। अब गुरूजी कुछ चिंतित रहने लगे कि कहीं उनका यह शिष्य ज़िंदगी के सफर में असफल ना हो जाये। आलस्य में व्यक्ति को अकर्मण्य बनाने की पूरी सामर्थ्य होती है। ऐसा व्यक्ति बिना परिश्रम के ही फलोपभोग की कामना करता है। वह शीघ्र निर्णय नहीं ले सकता और यदि ले भी लेता है,तो उसे कार्यान्वित नहीं कर पाता। यहाँ तक कि अपने पर्यावरण के प्रति भी सजग नहीं रहता है और ना ही भाग्य द्वारा दिए गए सुअवसरों का लाभ उठाने की कला में ही कुशल हो पाता है।

🔶 उन्होंने मन ही मन अपने शिष्य के कल्याण के लिए एक योजना बना ली। एक दिन एक काले पत्थर का एक टुकड़ा उसके हाथ में देते हुए गुरु जी ने कहा –‘मैं तुम्हें यह जादुई पत्थर का टुकड़ा, दो दिन के लिए दे कर, कहीं दूसरे गाँव जा रहा हूँ| जिस भी लोहे की वस्तु को तुम इससे स्पर्श करोगे, वह सोने में बदल जायेगी। पर याद रहे कि दूसरे दिन सूर्यास्त के पश्चात मैं इसे तुमसे वापस ले लूँगा।’

🔷 शिष्य इस अवसर को पाकर बड़ा प्रसन्न हुआ लेकिन आलसी होने के कारण उसने अपना पहला दिन यह कल्पना करते-करते बिता दिया कि जब उसके पास बहुत सारा सोना होगा तब वह कितना प्रसन्न, सुखी,समृद्ध और संतुष्ट रहेगा, इतने नौकर-चाकर होंगे कि उसे पानी पीने के लिए भी उठना नहीं पड़ेगा। फिर दूसरे दिन जब वह प्रातःकाल जागा,उसे अच्छी तरह से स्मरण था कि आज स्वर्ण पाने का दूसरा और अंतिम दिन है। उसने निश्चय किया कि वो बाज़ार से लोहे के बड़े-बड़े सामान खरीद कर लायेगा और उन्हें सोने में बदल देगा। दिन बीतता गया, पर आलसी होने के कारण वह इसी सोच में बैठा रहा कि अभी तो बहुत समय है, कभी भी बाज़ार जाकर सामान ले आएगा। उसने सोचा कि अब तो दोपहर का भोजन करने के पश्चात ही सामान लेने निकलूंगा पर भोजन करने के बाद उसे विश्राम करने की आदत थी , और उसने बजाये उठ के मेहनत करने के थोड़ी देर आराम करना उचित समझा। पर आलस्य से भरा हुआ उसका शरीर नींद की गहराइयों में खो गया, और जब वो उठा तो सूर्यास्त होने को था।

🔶 अब वह जल्दी-जल्दी बाज़ार की तरफ भागने लगा, पर रास्ते में ही उसे गुरूजी मिल गए उनको देखते ही वह उनके चरणों पर गिरकर, उस जादुई पत्थर को एक दिन और अपने पास रखने के लिए याचना करने लगा लेकिन गुरूजी नहीं माने और उस शिष्य का धनी होने का सपना चूर-चूर हो गया। पर इस घटना की वजह से शिष्य को एक बहुत बड़ी सीख मिल गयी। उसे अपने आलस्य पर पछतावा होने लगा, वह समझ गया कि आलस्य उसके जीवन के लिए एक अभिशाप है और उसने प्रण किया कि अब वो कभी भी काम से जी नहीं चुराएगा और एक कर्मठ, सजग और सक्रिय व्यक्ति बन कर दिखायेगा।

🔷 दोस्तों, जीवन में हर किसी को एक से बढ़कर एक मौके मिलते हैं पर हम इन्हे पहचान नहीं पाते और अपने आलस्य के कारण इन मौकों को हाथ से निकाल देते हैं और बाद में पछताते हैं।

🔶 अगर आप ज़िंदगी में सफल होना चाहते हैं तो अपने मौकों को पकड़ कर रखिये उन्हें हाथ से ना जाने दें क्योंकि अगर एक बार ये मौके हाथ से निकाल गए तो फिर सिवाय पछताने के कुछ नहीं बचेगा।

🔷 इसलिए अपने मौकों को सफलता में बदलने के लिए आज से ही लग जाइए | किसी भी काम को कल पर मत टालिए।

🔶 क्योंकि जिस काम को हम कल कर सकते हैं तो उसे आज ही क्यों नहीं?

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 26 May 2018




👉 आज का सद्चिंतन 26 May 2018


👉 मित्रता क्यों की जाती है?

🔷 क्या कोई मनुष्य किसी दूसरे मनुष्य से इस कारण मित्रता करता हैं कि वह पारस्परिक प्रत्युपकारों से वह लाभ प्राप्त करे जो अकेला रह कर नहीं कर सकता? या मित्रता का बन्धन किसी प्राकृतिक ऐसे उदार नियम से संबंधित हैं जिसके द्वारा एक मनुष्य हृदय दूसरे के हृदय के साथ अधिकाँश में उदारता और निस्वार्थता की भावना के साथ जा जुड़ता हैं?

🔶 उपरोक्त प्रश्नों की मीमाँसा करते हुए हमें यह जानना चाहिए कि मित्रता के बन्धन का प्रधान और वास्तविक हेतु प्रेम हैं। कभी कभी यह प्रेम वास्तविक हेतु प्रेम हैं। कभी कभी यह प्रेम वास्तविक न होकर कृत्रिम भी हुआ करता हैं परन्तु इससे यह नहीं कहा जा सकता कि मित्रता का भवन केवल स्वार्थ की ही आधार शिला पर स्थिर हैं।
सच्ची मित्रता में एक प्रकार की ऐसी स्वाभाविक सत्यता हैं जो कृत्रिम और बनावटी स्नेह में कदापि नहीं पाई जा सकती। मेरा तो इसी लिए ऐसा विश्वास हैं कि मित्रता की उत्पत्ति मनुष्य की दरिद्रता पर न होकर किसी हार्दिक और विशेष प्रकार के स्वाभाविक विचार पर निर्भर हैं जिसके द्वारा एक समान मन वाले दो व्यक्ति परस्पर स्वयमेव संबंधित हो जाते हैं।

🔷 यह पुनीत आध्यात्मिक स्नेह भावना पशुओं में भी देखी जाती हैं। मातायें क्या अपने बच्चों से किसी प्रकार का बदला चाहने की आशा से प्रेम करती हैं? बेचारे पशु जिनको न तो अपनी दीनता का ज्ञान हैं, न उन्नति की आकाँक्षा हैं और न किसी सुनहरे भविष्य का प्रलोभन हैं भला वे अपने बच्चों से किस प्रत्युपकार की आशा करते होंगे? सच तो यह हैं कि प्रेम करना जीव का एक आत्मिक गुण हैं। यह गुण मनुष्य में अधिक मात्रा में प्रकट होता हैं इसलिए वह मित्रता की ओर आकर्षित होता है।

🔶 जिसके आचरण और स्वभाव हमारे समान ही हों अथवा किसी ऐसे मनुष्य को जिसका अन्तःकरण ईमानदारी और नेकी से परिपूर्ण हो, किसी ऐसे मनुष्य को देखते ही हमारा मन उसकी ओर आकर्षित हो जाता हैं। सच तो यह हैं कि मनुष्य के अन्तःकरण पर प्रभाव डालने वाला नेकी के समान और कोई दूसरा पदार्थ नहीं हैं। धर्म का प्रभाव यहाँ तक प्रत्यक्ष हैं कि जिन व्यक्तियों का नाम हमको केवल इतिहासों से ही ज्ञात हैं और उनको गुजरे चिर काल व्यतीत हो गया उनके धार्मिक गुणों से भी हम ऐसे मुग्ध हो जाते हैं कि उनके सुख में सुखी और दुख में दुखी होने लगते हैं।

🔷 मित्रता जैसे उदार बन्धन के लिए ऐसा विचार करना कि उसकी उत्पत्ति केवल दीनता पर ही हैं अर्थात् एक मनुष्य दूसरे से मित्रता केवल इसीलिए करता हैं कि वह उससे कुछ लाभ उठाने और अपनी अपूर्णता को उसकी सहायता से पूर्ण करें, मित्रता को अत्यन्त ही तुच्छ और घृणित समझना हैं। यदि यह बात सत्य होती तो वे ही लोग मित्रता जोड़ने में अग्रसर होते जिनमें अधिक अवगुण और अभाव हों परन्तु ऐसे उदाहरण कहीं दिखाई नहीं पड़ते। इनके विपरीत यह देखा गया हैं कि जो व्यक्ति आत्मनिर्भर हैं, सुयोग्य हैं, गुणवान हैं, वे ही दूसरों के साथ प्रेम व्यवहार करने को अधिक प्रवृत्त होते हैं। वे ही अधिकतर उत्तम मित्र सिद्ध होते हैं।

🔶 सच तो यह हैं कि परोपकार अपने उत्तम कार्यों का व्यापार करने से घृणा करता हैं और उदार चरित्र व्यक्ति अपनी स्वाभाविक उदारता का आचरण करने दूसरों को सुख पहुँचाने में आनन्द मानते हैं वे बदला पाने के लिए अच्छा व्यवहार नहीं करते। मेरा निश्चित विश्वास हैं कि सच्ची मित्रता लाभ प्राप्त करने की व्यापार बुद्धि से नहीं जुड़ती, वरन् इसलिए जुड़ती हैं कि मित्रभाव के निस्वार्थ बर्ताव से एक प्रकार का जो आध्यात्मिक सुख मिलता हैं वह प्राप्त हो।

✍🏻 दार्शनिक सिसरो
📖 अखण्ड-ज्योति मई 1944 पृष्ठ 10

👉 यह अच्छी आदतें डालिए (भाग 4)

विरोध तथा प्रतिकूलता में धैर्य:-

🔷 विपत्ति, दुख या वेदनामय जीवन एक बड़ा शिक्षक है। यह वह स्थिति है जिसमें चारों ओर से कष्ट आते हैं, आर्थिक स्थिति बिगड़ जाती है, मन दुखी रहता है और कहीं से कोई सहारा नहीं दीखता। विपत्ति ऐसी घटनाओं का क्रम है, जो सफलता का शत्रु है और आनन्द को नष्ट करने वाला है। यह दुःख की मनः स्थिति है।

🔶 विपत्ति दूसरे रूप में एक वरदान सिद्ध होती है। जो व्यक्ति धैर्य बनाये रखता है, वह अन्ततः विजयी होता है। विपत्ति से हमारी इच्छा शक्ति में वृद्धि होती है और सहिष्णुता प्राप्त होती है। इससे हमारा मन ईश्वर की ओर प्रवृत्त होता है। अन्ततः इससे वैराग्य की प्राप्ति होती है। सत्य की पहली सीढ़ी है। विपत्ति वह गुरु है जो मनुष्य को उद्योगी और परिश्रमशील बनाता है। इससे मनुष्य की सोई हुई शक्तियाँ जाग्रत हो जाती हैं, साधारण कार्य करती हुई शक्ति तीव्र हो जाती हैं और जागरुकता प्राप्त होती है। समृद्धि के प्रकाश में आनन्द मनाना साधारण सी बात है, किन्तु प्रतिकूलता और विपत्ति में स्थिर बुद्धि रखना।

🔷 आप विपत्ति में चिंतित न रहें, धैर्य धारण करें, प्रसन्न मुद्रा बनाएँ, हँसते रहें आत्मा से शक्ति खींच कर अपनी समस्याओं को नवीन रूप में विचार करें। आपकी आत्मा में विपत्ति से जूझने की अनन्त शक्ति है। इसे अनुभव करें।

🔶 सोच कर देखिए, प्रशान्त सागर में रह कर क्या कोई सफल नाविक बन सकता है? सागर की उत्ताल लहरों से जूझ कर आँधी तूफान को झेल कर ही बड़े कप्तान बनते हैं विपत्ति के समुद्र में ही आप जीवन के कप्तान बनते हैं। आपके धैर्य, साहस, लगन, शक्ति , अध्यवसाय की परीक्षा विपत्तियों के भयंकर तूफानों में ही होती है। विपत्ति में चारों ओर से घिर कर हम नई नई बातें खोजते हैं, नई खोजें करते हैं, खूब सोचते विचारते और अपने व्यक्ति त्व का विकास करते हैं। विपत्ति हमारे मित्रों को परखने की सच्ची कसौटी है। विपत्ति एक ऐसा साँचा है, जो हमें नए सिरे से ढालता है और विषम परिस्थितियों से युद्ध करना सिखाता है।

🔷 विपत्ति संसार के बड़े बड़े महात्माओं, राजनीतिज्ञों, विद्वानों पर आई है। वे उसमें तपे, पिसे, कुटे और मजबूत बने हैं। फिर आप क्यों निराश होते हैं? काले बादलों की तरह वह हवा में उड़ जाने वाली क्षणिक वस्तु है। यह तो आपकी इच्छाशक्ति और दृढ़ता की परीक्षा लेने के लिए आती है।

📖 अखण्ड ज्योति, अप्रैल 1955 पृष्ठ 20
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1955/April/v1.20

👉 Truthfulness (Part 1)

🔷 Many instances can be cited when a newly married bride was led to confide in her spouse about her past mistakes and then, instead of promised love and forgiveness, a highly vindictive attitude was adopted thereby making her life a veritable hell. The right thing to do is to keep completely mum about incidents of the past whose revelation is likely to create problems and misery.

🔶 Truthfulness is considered a sign of nobility. A match between word and deed is indeed a virtue, and such qualities should be routinely practiced in daily activities. However it is not falsehood to keep quiet about matters of the past whose uncovering is likely to raise a storm. Very often silence amounts to truthfulness in such circumstances.

🔷 The story goes that a cow escaped from the clutches of a butcher and was grazing by the side of the river behind an ‘ashram’. The butcher, in her pursuit came in front of the ashram and inquired from the sage about the cow’s whereabouts. The sage replied philosophically, “That which has seen speaks not, that which speaks has seen not.” He was, of course, referring to the difference between the faculties of sight (eyes) and the speech (tongue). The butcher could not follow this symbolic language and returned disappointed. The cow was thus saved by this enigmatic truth thus prevented a big tragedy.

📖 Akhand Jyoti- Feb 2001

👉 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिये (भाग 2)

🔷 किसी धर्म में दीक्षित होने और उसकी संस्कृति अपना लेने में कुछ अन्तर तो है पर नाम मात्र का ही है। भारत में ईसाई संस्कृति फैल रही है। स्कूल और कालेजों के छात्र छात्राएं क्या पढ़ते हैं क्या नहीं, यह दूसरी बात है, पर वे वहां के वातावरण में अंग्रेजी भाषा सीखने के अतिरिक्त अंग्रेजी संस्कृति भी सीखते हैं। अध्यापक और अध्यापिकायें अपने व्यावहारिक जीवन में, अपने आचार विचार में, भाषा भेष भाव से, बच्चों पर यही संस्कार डालते हैं कि उन्हें न केवल अंग्रेजी पढ़नी चाहिए वरन् अंग्रेजी मूल संस्कृति का भी अनुकरण करना चाहिए।

🔶 गीली मिट्टी के समान हमारे कोमल बच्चे उस सांचे में ढलते हैं और धीरे-धीरे वे आधे ईसाई बन कर वहां से, निकलते हैं। सिरों पर ढूंढ़ने पर भी किसी के चोटी न मिलेगी। जनेऊ तलाश कराये जायें तो किसी बिरले के कन्धे पर ही उसके दर्शन होंगे। खड़े होकर पेशाब करने से लेकर चाय, डबल रोटी और अण्डे के आहार तक सभ्यता के चिह्न माने जाते हैं। इन सभ्य लोगों के होटलों में होने वाले प्रीतिभोजों में मांस मदिरा आवश्यक हैं अपनी मातृभाषा को हेय समझकर उसमें बातचीत करने को बेइज्जती समझते हैं और अंग्रेजी में पत्र लिखना बड़प्पन एवं गौरव का चिह्न मानते हैं।

🔷 भारत की गर्म जलवायु की दृष्टि से ठण्डे देश के उपयुक्त अंग्रेजी पोशाक सर्वथा अनुपयुक्त है। फिर भी लोग इसलिए उसे पहनते हैं कि अंग्रेजियत कोई बहुत बड़ी बात है। नेक-टाई ईसाई धर्म का एक धर्म चिह्न है, पर हम खुशी-खुशी उसे बांधते हैं। जरा से वजन का चार पैसे मूल्य का जनेऊ हमें बेकार लगता है और आधी छटांक भारी डेढ़ रुपया मूल्य की नेक टाई जिससे गला बांध देने पर आराम से हवा आने का मार्ग भी रुक जाय हमें यह अच्छी लगती है। यह सब उस संस्कृति के आगे आत्म समर्पण कर देने की ही महिमा है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिए पृष्ठ 7

👉 गुरुगीता (भाग 120)

👉 कामधेनु, कल्पतरू, चिन्तामणि है गुरूगीता का पाठ

🔷 इस प्रसंग में बड़ी भक्ति पूर्ण कथा है। यह कथा दक्षिण भारत के प्रभु भक्त वेंकटरमण की है। भक्त वेंकटरमण तुंगभद्रा तट पर बसे रंगपुरम के रहने वाले थे। बचपन से ही उन्हें भगवत् चरणों में अनुराग था। यज्ञोपवीत संस्कार के समय उन्हें गायत्री मंत्र मिला। यह मंत्र उन्हें उनके कुलगुरू ने दिया था। हालाँकि उन्हें तलाश थी उन आध्यात्मिक गुरू की, जो उन्हें ईश्वर साक्षात्कार करा सके। मन की यह लगन उन्होंने बड़ी विनम्रता पूर्वक अपने कुलगुरू को कह सुनायी। बालक वेंकटरमण की बात सुनकर कुलगुरू कुछ समय तो शान्त रहे, फिर बोले -वत्स यह कार्य तो क केवल सद्गुरू प्रदान कर सकते हैं। तुम्हें उनकी प्राप्ति के लिए गुरूगीता का अनुष्ठान करना होगा। वेंकटरमण ने कुलगुरू की इन बातों पर बड़ी आस्था से कहा- आचार्य! यदि हम पवनपुत्र हनुमान को अपना गुरू बनाना चाहें तो क्या यह सम्भव है। अवश्य वत्स! कुलगुरू ने बालक की श्रद्धा की सम्बल दिया।

🔶 बस, उस दिन से बालक वेंकटरमण हनुमान जी की मूर्ति के सामने गायत्री जप एवं गुरूगीता के पाठ में तल्लीन हो गया। नित्य प्रातः काल ब्रह्म मुहूर्त में उठना, स्नान, संध्या, तर्पण से निश्चित होकर हनुमान् जी की मूर्ति के सामने गायत्री मंत्र का जप एवं गुरूगीता का पाठ करना। वेंकटरमण का सह क्रम नित्यप्रति छः घण्टे चलता रहता। कभी- कभी वेंकटरमण चाँदनी रात में तुंगभद्रा के तट पर एकान्त में बैठकर गुरूगीता के श्लोकों का पाठ करने लगते, तब ऐसा मालूम होता कि उनके रोम- रोम से ही गुरूगीता मंत्रों की किरणें निकल रही हैं। इस प्रकार इस कठिन साधना में उनके ग्यारह वर्ष बीत गये।

🔷 बारहवें वर्ष के चैत्र शुक्ल पूर्णिमा की आधी रात तुंगभद्रा के बालुकामय तट पर बासन्ती बयार के झोंके के बीच में, वन्य पुष्पों के पराग की मधुरता के बीच वेंकटरमण रामभक्त हनुमान् का ध्यान करते हुए गुरूगीता का पाठ करने लगे। पाठ करते- करते उन्हें समाधि लग गयी। समाधि में उन्होंने देखा कि असंख्य वानरों की सेना के साथ हनुमान् जी आ रहे हैं। धीरे- धीरे वे सभी वानर पता नहीं कहाँ अदृश्य हो गये, बस रह गये केवल हनुमान् जी। उन्होंने बड़ी स्नेह भरी दृष्टि से वेंकटरमण को देखा और उसके चरणों में गिर गये और तभी उन्हें लगा श्री हनुमान् जी उनके हृदयपट पर अपनी तर्जनी अंगुली से स्वर्णाक्षरों में गायत्री मंत्र लिख रहे हैं और कह रहे हैं- उठो वत्स! मैं ही तुम्हारा गुरू हूँ। सचमुच गुरूगीता में क्या कुछ सम्भव नहीं। असम्भव को सम्भव करने वाली है इसकी महिमा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 180

👉 भाग्य से नहीं कर्म से निकला जाता है मुसीबतों से

🔶 एक समय की बात है| एक नदी के किनारे उसी नदी से जुडा एक तालाब था। उस तालाब में नदी से आई हुई बहुत सी मछलियाँ रहती थीं। वह तालाब लम्बी घास व झाडियों से घिरा होने के कारण आसानी से नजर नहीं आता था।

🔷 उसी मे ईना, चिनी तथा मिनी नाम की तीन मछलियों का समूह भी रहता था। वे आपस में मित्र थीं। उनके स्वभाव भिन्न थे। ईना संकट आने के लक्षण मिलते ही संकट टालने का उपाय करने में विश्वास रखती थी। चिनी कहती थी कि संकट आने पर ही उससे बचने की कोशिश करो। तथा मिनी का सोचना था कि संकट को टालने या उससे बचने की बात बेकार हैं करने कराने से कुछ नहीं होता, जो भाग्य में लिखा है, वही होता है।

🔶 एक दिन शाम को कुछ मछुआरे नदी में मछलियाँ पकडकर घर जा रहे थे। उस दिन उनके जालों में बहुत कम मछलियाँ फँसी थी। इसलिए उनके चेहरे उदास थे। तभी उन्हें झाड़ियों के ऊपर मछलीखोर पक्षियों का झुंड उड़ता हुआ दिखाई दिया। सबकी चोंच में मछलियाँ दबी थी। वे चौंके।

🔷 एक ने अनुमान लगाया “दोस्तो! लगता हैं झाड़ियों के पीछे नदी से जुडा तालाब है, जहां इतनी सारी मछलियाँ पल रही हैं।”

🔶 मछुआरे खुश होकर झाडियों में से होकर तालाब के तट पर आ निकले और ललचाई नजर से मछलियों को देखने लगे।🔴 एक मछुआरा बोला “अहा! इस तालाब में तो मछलियाँ भरी पडी हैं। आज तक हमें इसका पता ही नहीं लगा। हमें यहाँ ढेर सारी मछलियां मिलेंगी।

🔷 दूसरे ने कहा “आज तो शाम होने वाली हैं। कल सुबह ही आकर यहाँ जाल डालेंगे।” इस प्रकार मछुआरे दूसरे दिन का कार्यक्रम तय करके चले गए। तीनों मछलियों ने मछुआरों की बात सुन ली थी।

🔶 ईना ने कहा “साथियो! तुमने मछुआरे की बात सुन ली। अब हमारा यहाँ रहना खतरे से खाली नहीं हैं। खतरे की सूचना हमें मिल गई है। समय रहते अपनी जान बचाने का उपाय करना चाहिए। मैं तो अभी ही इस तालाब को छोडकर नदी में जा रही हूँ।

🔷 चिनी बोली “तुम्हें जाना हैं तो जाओ, मैं तो नहीं आ रही। अभी खतरा आया कहाँ हैं, जो इतना घबराने की जरुरत हैं | हो सकता है मछुआरे आयें ही नहीं । उन मछुआरों का यहाँ आने का कार्यक्रम रद्द हो सकता है। हो सकता हैं रात को उनके जाल चूहे कुतर जाएं, हो सकता है उनकी बस्ती में आग लग जाए।  इसलिए उनका आना निश्चित नहीं हैं। जब वह आएंगे, तब की तब सोचेंगे। हो सकता हैं मैं उनके जाल में फॅंसू ही नहीं।”

🔶 मिनी ने अपनी भाग्यवादी बात कही “भागने से कुछ नहीं होने वाला। मछुआरों को आना है तो वह आएंगे ही। हमें जाल में फँसना है  तो हम फँसेंगे ही। किस्मत में मरना ही लिखा हैं तो क्या किया जा सकता हैं?”

🔷 इस तरह ईना तो उसी समय वहाँ से चली गई। जबकि चिनी और मिनी मछली तालाब में ही रही।

🔶 सुबह हुई तो मछुआरे अपने जाल लेकर आ गए और उन्होंने तालाब में अपने जाल डाल दिए। चिनी ने संकट देखा तो जान बचाने के उपाय सोचने लगी । उसका दिमाग तेजी से काम करने लगा। आस-पास छिपने के लिए कोई खोखली जगह भी नहीं थी। तभी उसे याद आया कि उस तालाब में काफी दिनों से एक मरे हुए ऊदबिलाव की लाश तैरती रही हैं। वह उसके बचाव के काम आ सकती हैं।जल्दी ही उसे वह लाश मिल गई। लाश सडने लगी थी। प्रत्यु लाश के पेट में घुस गई और सडती लाश की सडांध अपने ऊपर लपेटकर बाहर निकली। कुछ ही देर में चिनी एक मछुआरे के जाल में फँस गई। मछुआरे ने अपना जाल खींचा और मछलियों को किनारे पर जाल से उलट दिया। बाकी मछलियाँ तो तडपने लगीं, लेकिन चिनी दम साधकर मरी हुई मछली की तरह पडी रही। मछुआरे को सडांध का भभका लगा तो मछलियों को देखने लगा। उसने निश्चल पडी चिनी को उठाया और सूंघा “आक! यह तो कई दिनों की मरी मछली हैं। सड चुकी हैं।” ऐसे बडबडाकर बुरा-सा मुंह बनाकर उस मछुआरे ने चिनी को तालाब में फेंक दिया।

🔷 चिनी अपनी बुद्धि का प्रयोग कर संकट से बच निकलने में सफल हो गई थी। पानी में गिरते ही उसने नदी की और दौड़ लगा दी ।

🔶 मिनी ने भाग्य के भरोसे रहकर अपनी जान बचाने का कोई प्रयास नहीं किया। वह भी दूसरे मछुआरे के जाल में फँस गई थी और एक टोकरी में डाल दी गई थी। भाग्य के भरोसे बैठी रहने वाली मिनी अब अपनी सोच पर पछता रही थीं कि अगर वो भी समय रहते नदी में चली गयी होती तो आज उसकी जान बच जाती। वह उसी टोकरी में अन्य मछलियों की तरह तडप-तडपकर मर गयी।

🔷 इन मछलियों कि तरह ही कुछ कुछ हमारा भी हाल है। हम भी कभी कभी जान बूझकर मुसीबतो को अपने आप बुला लेते हैं या पहले से पता होते हुए भी मुसीबतो से निकलने का प्रयास नहीं करते। और जब हम मुश्किलों से घिर जाते हैं तब पछताते हैं कि अगर हमने पहले से ये काम ना किया होता तो आज मुसीबतों में ना फंसते या अगर हम पहले से मुश्किलों से निकलने का उपाय कर लेते तो आज इतनी मुसीबतों में ना फंसते।

🔶 दोस्तों, इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि हमें भाग्य के भरोसे न बैठकर समय रहते अपनी मुसीबतों , संकटों से बाहर निकलने का प्रयास करना चाहिए।

👉 आज का सद्चिंतन 25 May 2018

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 25 May 2018


👉 देश सेवा का मार्ग

🔶 प्लेटो ने एक स्थान पर लिखा है कि -’किसी देश का इससे अधिक सौभाग्य क्या हो सकता है कि उसमें श्रेष्ठ आचरण वाले स्त्री पुरुषों का बाहुल्य हो।’ कवि बाल्ट व्हाइट मैन का कथन है कि-’किसी देश की महत्ता उसके ऊँचे भवनों, शिक्षालयों, सम्पत्ति कोषों से नहीं हो सकती। बलवान् और चरित्रवान् व्यक्ति ही अपने देश को महान बना सकते हैं। वह बड़ा ही भाग्यशाली राष्ट्र है, जिसके निवासी उच्च आचरण को अपना आदर्श मानते हों। जर्मनी के भाग्य विधाता हिटलर ने एक स्थान पर लिखा है-हमारे देश को निर्बल स्वास्थ्य वाले धुरन्धर विद्वानों की अपेक्षा ऐसे व्यक्तियों की अत्यधिक आवश्यकता है, जो भले ही कम पढ़े लिखे हों परन्तु वे स्वस्थ हों, सदाचारी हों, आत्म विश्वासी हों और दृढ़ इच्छा शक्ति वाले हों।’

🔷 देश की सबसे बड़ी आवश्यकता यह है कि हम उच्च आचरण वाले, निर्भीक, साहसी सदाचारी और स्वस्थ मनुष्यों की संख्या बढ़ावें। सुख, स्वराज्य, सुशासन तब तक किसी देश में स्थिर नहीं रह सकता, जब तक कि वहाँ के निवासी मानवोचित गुणों वाले न हों, वे मानवता का उत्तरदायित्व अनुभव न करते हों। निर्बलता, कायरता, भीरुता, छल, पाखंड और प्रवंचना का जब तक जोर रहेगा, तब तक दासता और दुर्भाग्य हमारा पल्ला नहीं छोड़ सकते। महात्मा गाँधी का कथन है कि “शारीरिक और मानसिक स्वस्थता की आवश्यकता जो लोग अनुभव करते हों और जो अपने को सब दृष्टियों से बलवान बनाने के लिये निरंतर प्रयत्नशील रहें, ऐसे ही देश सेवकों की भारत माता को आवश्यकता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड-ज्योति मई 1944 पृष्ठ 1

👉 यह अच्छी आदतें डालिए (भाग 3)

परिस्थितियों के अनुकूल ढल जाना :-

🔶 अपने आपको नई नई विषम तथा विरोधी परिस्थितियों के अनुसार ढाल लेना, इच्छाओं, आवश्यकताओं और रहन सहन को नवीन परिस्थितियों के अनुसार घटा बढ़ा लेना एक बड़ा गुण है। मनुष्य को चाहिए कि वह दूसरे व्यक्तियों, चाहे वे कैसे ही गुण स्वभाव के क्यों न हों, के अनुसार अपने को ढालना सीखे। नई परिस्थितियाँ चाहे जिस रूप में आयें, उसके वश में आ जायं। अच्छी और बुरी आर्थिक परिस्थितियों के अनुसार अपने को घटा बढ़ा लिया करें।

🔷 अधिकाँश व्यक्ति दूसरे के अनुसार अपने को ढाल नहीं पाते, इसलिए वे दूसरों का हृदय जीत नहीं पाते, न झुक सकने के कारण वे सफल नहीं हो पाते। पत्नी पति के अनुसार, पति पत्नी के अनुसार, विक्रेता ग्राहक के अनुसार, मातहत अफसर के अनुसार, विद्यार्थी गुरु के अनुसार, पुत्र पिता के अनुसार न ढल सकने के कारण दुःखी रहते हैं।

🔶 आप बेंत की तरह लचकदार बनें जिससे अपने को हर प्रकार के समाज के अनुसार ढाल लिया करें। इसके लिए आप दूसरे की रुचि, स्वभाव, आदतों और मानसिक स्तर का ध्यान रखें। शक्कर से मीठे वचन बोलें, प्रेम प्रदर्शित करें, दूसरों की आज्ञाओं का पालन करें। आपसे बड़े व्यक्ति यह चाहते हैं कि आप उनकी आज्ञा का पालन करें। सभ्यता पूर्वक दूसरे से व्यवहार करें। ढलने की प्रवृत्ति से मित्रताएं स्थिर बनती हैं, व्यापार चलाते हैं, बड़े बड़े काम निकलते हैं। इस गुण से इच्छा शक्ति बढ़ती है और मनुष्य अपने ऊपर अनुशासन करना सीखता है। इससे आत्मबलिदान की भावना का विकास होता है, स्वार्थ नष्ट होता है।

📖 अखण्ड ज्योति, अप्रैल 1955 पृष्ठ 19
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1955/April/v1.19

👉 Awakening Divinity in Man (Last Part)

🔶 Friends, turn away from the mirage of cravings, passions, greed and discontentment, and let your prayers and worship reach the stage where your personality would be illumined by God’s light, by the glow of divinity. This is true devotion. If you have cultivated virtuous tendencies and conduct, I assure you that you will get support and cooperation from people around you. Boons of enlightened progress will be showered upon you from all directions.

🔷 This is what has been, and will continue to be, the source of God’s blessings, the blessings of divine mother Gayatri. This has been the great tradition of devotion and of devotees and will be so in the future too. If you understand this secret and learn the true meaning of worship and devotion, your Gayatri anusthana here will be accomplished in the truest sense.

🔶 The self disciplining practices of this anusthana sadhana are meant to refine your personality so that virtuous tendencies flourish in you.  If this tapascarya of yours is sincere and one-pointed then at the end of this anusthana you will feel inwardly endowed with godly attributes of an authentically virtuous and noble person. When a person imbibes an attitude of loving service, he sees his own good in the welfare of others and experiences happiness in it. If you find them elevated in this state of nobility, I would say you have attained true devotion and grace of the god.

🔷 You would be blessed by God, just as the great devotees of the past have been. I have tried followed this path and have been blessed with sublime gifts in my life. I want all of you, who have come for this sadhana course of a condensed anusthana, to get inspired and be blessed by divine grace. If this inspires you and you begin to practice it, I assure you that the result will be so fulfilling, so majestic that you, your country, your life, your God, this sadhana course and I myself will be glorified. May God bless you with his grace.

|| OM SHANTI ||
 
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिये (भाग 1)

🔶 यों मनुष्य भी अन्य प्राणियों की तरह एक पशु है। थोड़ी बुद्धि अधिक रहने से वह अपेक्षाकृत कुछ अधिक सुख-साधन प्राप्त कर सकता है इतना ही सामान्यतः उसे बुद्धि विशेषता का लाभ है। पर यदि उसकी अन्तःप्रेरणा उच्च भावनाओं, आदर्शों एवं आकांक्षाओं से अनुप्राणित हुई तो वह असामान्य प्रकार का, उच्चकोटि का, सत्पुरुषों जैसा जीवन-यापन करता हुआ न केवल स्वयं सच्ची सुख शांति की अधिकारी बनता है वरन् दूसरे अनेकों को भी आनन्द और सन्तोष की परिस्थितियों तक ले पहुंचने में सहायक होता है। यदि वह अंतः प्रेरणाएं निकृष्ट कोटि की हुईं तो न केवल स्वयं रोग, शोक, अज्ञान, दारिद्र, चिन्ता, भय, द्वेष, दुर्भाव, अपकीर्ति एवं नाना प्रकार के दुःखों का भागी बनता है वरन् अपने से सम्बद्ध लोगों को भी दुर्मति एवं दुर्गति का शिकार बना देता है। जीवन में जो कुछ श्रेष्ठता या निकृष्टता दिखाई देती है उसका मूल आधार उसकी अन्तःप्रेरणा ही है। इसी को संस्कृति के नाम से पुकारते हैं।

🔷 जिस प्रकार कोई पौधा अपने आप उगे और बिना किसी के संरक्षण के बढ़े तो वह जंगली किस्म का कुरूप हो जाता है। पर यदि वही पौधा किसी चतुर माली की देख-रेख में अच्छे खाद्य पानी एवं संरक्षण के साथ बढ़ाया जाय, समय-समय पर काटा-छांटा या सुधारा जाय तो बहुत ही सुन्दर एवं सुविकसित हो सकता है। मानव जीवन की स्थिति भी इसी प्रकार की है उसे उचित दिशा में उचित रीति से विकसित करने की जो वैज्ञानिक पद्धति है उसे ‘संस्कृति’ कहा जाता है।

🔶 भारतीय संस्कृति—मानव संस्कृति है। उसमें मानवता के सभी सद्गुणों को भली प्रकार विकसित करने वाले सभी तत्व पर्याप्त मात्रा में मौजूद हैं। जिस प्रकार काश्मीर में पैदा होने वाली केशर, ‘कश्मीरी केशर’ के नाम से अपनी जन्मभूमि के नाम पर प्रसिद्ध है। इस नाम के अर्थ यह नहीं हैं कि उसका उपयोग केवल काश्मीर निवासियों तक ही सीमित है। भारतीय संस्कृति नाम भी इसीलिए पड़ा कि वह भारत में पैदा हुई है वस्तुतः वह विश्व-संस्कृत है। मानव संस्कृति है। सारे विश्व के मानवों की अन्तःप्रेरणा को श्रेष्ठ दिशा में प्रेरित करने की क्षमता उसमें कूट-कूटकर भरी हुई है। इस संस्कृति को साम्प्रदायिकता या संकीर्णता कहना—वस्तुस्थिति से सर्वथा अपरिचित होना ही है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिए पृष्ठ 6

👉 गुरुगीता (भाग 119)

👉 कामधेनु, कल्पतरू, चिन्तामणि है गुरूगीता का पाठ

🔶 इस प्रकरण को आगे बढ़ाते हुए भगवान् सदाशिव माता जगदम्बा से कहते हैं-

जपेत् शाक्तश्च सौरश्च गाणपत्यश्च वैष्णवः। शैवश्च सिद्धिदं देवि सत्यं सत्यं न संशयः॥१५१॥
अथ काम्यं जपे स्थाने कथयामि वरानने। सागरे वा सरित्तीरेऽथवा हरिहरालये॥ १५२॥
शक्तिदेवालये गोष्ठे सर्वदेवालये शुभे। वटे च धात्रिमूले वा मठे वृंदावने तथा॥ १५३॥
पवित्रे निर्मले स्थाने नित्यानुष्ठानतोऽपि वा। निवेदनेन मौनेन जपमेतं समाचरेत् ॥ १५४॥
श्मशाने भयभूमौ तु वटमूलान्तिके तथा। सिध्यन्ति धत्तूरे मूले चूतवृक्षस्य सन्निधौ॥ १५५॥

🔷 गुरूगीता का जप- पाठ अनुष्ठान शक्ति, सूर्य, गणपति, विष्णु ,शिव के उपासकों को भी सिद्धि देने वाला है। यह सत्य है, सत्य है इसमें कोई संशय नहीं है॥ १५१॥ भगवान् शिव माँ से कहते हैं- हे सुमुखि! अब मैं तुमसे गुरूगीता के अनुष्ठान के लिए योग्य स्थानों का वर्णन करता हूँ। इसके लिए उपयुक्त स्थान सागर, नदी का किनारा अथवा शिव या विष्णु का मंदिर है॥ १५२॥ भगवती का मंदिर, गौशाला, अथवा कोई देवमंदिर, वट, आँवला वृक्ष, मठ अथवा तुलसी वन इसके लिए शुभ माने गये हैं॥ १५३॥ पवित्र, निर्मल स्थान में मौन भाव से इसका जप- अनुष्ठान करना चाहिए॥ १५४॥ इस अनुष्ठान के लिए श्मशान, भयानक स्थान ,बरगद, धूतर या आम्रव़ृक्ष के नीचे का सुपास भी श्रेष्ठ कहा गया है॥१५५॥

🔶 भगवान् शिव के इन वचनों में गुरूगीता अनुष्ठान के विविध रहस्य हैं। इन रहस्यों में प्रमुखता है- साधना भूमि का अपना वातावरण होता है। अच्छा हो कि यह वातावरण साधना के लक्ष्य के अनुरूप हो। सात्विक लक्ष्य के लिए नदी, सागर उपयुक्त है, तो वैराग्य के उन्मेष के लिए ठीक है। इनमें से किसी स्थान का चयन साधक को अपनी मनोभूमि और अपने लक्ष्य के अनुसार करना चाहिए। स्थान उपयुक्त हो, लक्ष्य स्पष्ट हो, तो गुरूगीता की साधना साधक के सभी मनोरथों को पूरा करने वाली है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 179

बुधवार, 23 मई 2018

👉 खुश रहने का रहस्य

🔷 बहुत समय पहले की बात है, एक गाँव में एक महात्मा रहते थे। आसपास के गाँवो के लोग अपनी समस्याओं और परेशानियों के समाधान के लिए महात्मा के पास जाते थे। और संत उनकी समस्याओं, परेशानियों को दूर करके उनका मार्गदर्शन करते थे। एक दिन एक व्यक्ति ने महात्मा से पूछा – गुरुवर, संसार में खुश रहने का रहस्य क्या है ?

🔶 महात्मा ने उससे कहा कि तुम मेरे साथ जंगल में चलो, मैं तुम्हे खुश रहने का रहस्य बताता हूँ। उसके बाद महात्मा और वह व्यक्ति जंगल की तरफ चल दिए। रास्ते में चलते हुए महात्मा ने एक बड़ा सा पत्थर उठाया और उस व्यक्ति को देते हुए कहा कि इसे पकड़ो और चलो। उस व्यक्ति ने वह पत्थर लिया और वह महात्मा के साथ साथ चलने लगा।

🔷 कुछ देर बाद उस व्यक्ति के हाथ में दर्द होने लगा लेकिन वह चुप रहा और चलता रहा। जब चलते चलते बहुत समय बीत गया और उस व्यक्ति से दर्द सहा नहीं गया तो उसने महात्मा से कहा कि उस बहुत दर्द हो रहा है। महात्मा ने कहा कि इस पत्थर को नीचे रख दो। पत्थर को नीचे रखते ही उस व्यक्ति को बड़ी राहत मिली।

🔶 तब महात्मा ने उससे पूछा – जब तुमने पत्थर को अपने हाथ में उठा रखा था तब तुम्हे कैसा लग रहा था। उस व्यक्ति ने कहा – शुरू में दर्द कम था तो मेरा ध्यान आप पर ज्यादा था पत्थर पर कम था। लेकिन जैसे जैसे दर्द बढ़ता गया मेरा ध्यान आप पर से कम होने लगा और पत्थर पर ज्यादा होने लगा और एक समय मेरा पूरा ध्यान पत्थर पर आ गया और मैं इससे अलग कुछ नहीं सोच पा रहा था।

🔷 तब महात्मा ने उससे दोबारा पूछा – जब तुमने पत्थर को नीचे रखा तब तुम्हे कैसा महसूस हुआ।

🔶 इस पर उस व्यक्ति ने कहा – पत्थर नीचे रखते ही मुझे बहुत रहत महसूस हुई और ख़ुशी भी महसूस हुई।

🔷 तब महात्मा ने कहा कि यही है खुश रहने का रहस्य! इस पर वह व्यक्ति बोला – गुरुवर, मैं कुछ समझा नहीं।

🔶 तब महात्मा ने उसे समझाते हुए कहा – जिस तरह इस पत्थर को थोड़ी देर हाथ में उठाने पर थोड़ा सा दर्द होता है, थोड़ी और ज्यादा देर उठाने पर थोड़ा और ज्यादा दर्द होता है और अगर हम इसे बहुत देर तक उठाये रखेंगे तो दर्द भी बढ़ता जायेगा। उसी तरह हम दुखों के बोझ को जितने ज्यादा समय तक उठाये रखेंगे हम उतने ही दुखी और निराश रहेंगे। यह हम पर निर्भर करता है कि हम दुखों के बोझ को थोड़ी सी देर उठाये रखते हैं या उसे ज़िंदगी भर उठाये रहते हैं।

🔷 इसलिए अगर तुम खुश रहना चाहते हो तो अपने दुःख रुपी पत्थर को जल्दी से जल्दी नीचे रखना सीख लो और अगर संभव हो तो उसे उठाओ ही नहीं।

🔶 इस कहानी से हमें ये शिक्षा मिलती है कि यदि हमने अपने दुःख रुपी पत्थर को उठा रखा है तो शुरू शुरू में हमारा ध्यान अपने लक्ष्यों पे ज्यादा तथा दुखो पर कम होगा। लेकिन अगर हमने अपने दुःख रुपी पत्थर को लम्बे समय से उठा रखा है तो हमारा ध्यान अपने लक्ष्यों से हटकर हमारे दुखों पर आ जायेगा। और तब हम अपने दुखों के अलावा कुछ नहीं सोच पाएंगे और अपने दुखो में ही डूबकर परेशान होते रहेंगे और कभी भी खुश नहीं रह पाएंगे।

🔷 इसलिए अगर आपने भी कोई दुःख रुपी पत्थर उठा रखा है तो उसे जल्दी से जल्दी नीचे रखिये मतलब अपने दुखो को , तनाव को अपने दिलो दिमाग से निकल फेंकिए और खुश रहिये।

http://awgpskj.blogspot.in/2016/07/blog-post_2.html

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 24 May 2018

👉 आज का सद्चिंतन 24 May 2018


👉 यह अच्छी आदतें डालिए (भाग 2)

🔷 सुप्रवृत्तियों के विकास से अच्छी आदतों का निर्माण होता है, मनुष्य अपने उत्तम गुणों का विकास करता है और चरित्र में, अंधकार में प्रविष्ट दुर्गुणों का उन्मूलन होता है। अतः हमें प्रारंभ से ही यह जान लेना चाहिए कि हम किन किन गुणों तथा आदतों का विकास करें।

2. संयम :-

🔶 नैतिकता जीवन की आधार शिला संयम पर निर्भर है। संयम का तात्पर्य है अपने ऊपर अनुशासन रखना, विवेक के अनुसार शरीर को चलाना इत्यादि। संयमी व्यक्ति अपने मन, वचन, तथा शरीर पर पूर्ण अधिकार रखता है। वह उसे उचित ढंग से चलाता है और मिथ्या प्रलोभनों के वश में नहीं आता। जैसे ही कोई प्रलोभन मन मोहक रूप धारण कर उसके सम्मुख आता है, वैसे ही आत्म−अनुशासन उसकी रक्षा को आ उपस्थित होता है।

🔷 संयम हमारे असंयमी उन्मुक जीवन को अनुशासन में लाता है। संयम हमें उचित और विवेक पूर्ण मर्यादा में रहना सीखता है। जो वस्तुएं, आदतें अथवा कार्य हानिकर हैं, उनसे हमारी रक्षा करता है।

🔶 मनुष्य तथा पशु, उच्च तथा निम्न कोटि के जीवन में क्या अन्तर है? मनुष्य गन्दगी, त्रुटि, ज्यादती, खराबी, दुर्भाव से अपने आपको रोक सकता है, पशु में यह नियंत्रण नहीं होता। वह वासना के प्रवाह में अन्धा हो जाता है उसे हिताहित, कर्त्तव्य−अकर्त्तव्य, विवेक अविवेक का ज्ञान नहीं होता। मनुष्य संयम द्वारा अपनी इन्द्रिय मन तथा शरीर पर अनुशासन कर सकता है।

🔷 विवेक के विकास से संयम आता है। जैसे जैसे मनुष्य का विवेक बढ़ता है उसे यह ज्ञान होता है कि किस बात के अनियंत्रण से क्या क्या हानियाँ संभव हैं। वह इनसे अपनी रक्षा करने का प्रयत्न करता है। फलतः उसका आत्म विकास होता है।

🔶 संयम का प्रयोग पाँचों इन्द्रियों के विग्रह में करना चाहिए। हमारी इन्द्रियों के अमर्यादित और अनियंत्रित हो जाने से अनेक रोग पाप दुर्भावों की सृष्टि होती है। अतः सर्वप्रथम इन्द्रिय निग्रह से ही संयम का प्रयोग करना चाहिए।

🔷 जीवन का कोई क्षेत्र ऐसा नहीं जिसमें संयम का उपयोग का हो। संयमी व्यक्ति अपनी वासनाओं के परिष्कार द्वारा दीर्घजीवन प्राप्त करता है और शरीर को रोग मुक्त रखता है। संयम अनुशासन का पिता है और हमें वैराग्य भावना प्रदान करता है, योग मार्ग पर एकाग्रता पूर्वक चलने की शिक्षा प्रदान करता है। यह हमारी शक्ति को संग्रह, बुद्धि को स्थिर और मन को अनुशासन से परिपूर्ण करता है।

📖 अखण्ड ज्योति, अप्रैल 1955 पृष्ठ 19
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1955/April/v1.19

👉 Awakening Divinity in Man (Part 10)

All you really need will be provided

🔷 transparency of character is a great asset of a person through which he gets abundant support, affection and co-operation from all quarters. This is real prosperity. Can any monetary or material resources ever provide it? People donated unasked all their wealth and resources at the  feet of Buddha, moved by his compassion and absolute selflessness. Gandhiji’s benevolence, his missionary zeal, his aspirations were all aimed at the welfare of the lowliest and the lost.

🔶 This, together with the impeccability of his character, made him a universally acclaimed mahatma.  People from all strata of the society stood by him, cooperated with him and followed him. Millions of people voluntarily went to jails and sacrificed their lives for the noble cause of national freedom upon his call. Is such ethical and spiritual eminence attainable by us all? Yes, indeed, subject to only one condition – you too like mahatma, should be ready to be led by truth dwelling light of the spirit. Light, your shadow will follow you.

🔷 But you seem to be chasing your own shadow, the shadow of m³y³ – illusive worldly attractions and attachments – that seem to have overwhelmed you. You should learn to walk towards the light, towards God, noble aims and ideals. Such ideals are the attributes of deities like Hanuman and other emanations of God. 
 
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 निजी प्रयत्न का फल

🔷 आध्यात्मिक शास्त्र का यह एक अटल सिद्धान्त है कि जो अपने को जैसा मानता है, उसका बाह्य आचरण भी वैसा ही बनने लगता है। बीज से पौधा उगता है और विचारों से आचरण का निर्माण होता है। जो अपने को दीन, दास, दुखी, दासता मानता है वह वैसा ही बना रहेगा। हमारे देश में दीनता, दद्रिता, दुख, दरिद्रता के विचार फैले और भारतभूमि ठीक वैसी ही बन गई। अपने निवास लोक को जब हम ‘जननी जन्म भूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी’ कहते थे तब यह दैव लोक थी, जब ‘भव सागर’ कहने लगे तो वह बद्ध कारागार के रूप में हमारे मौजूद है।

🔶 यदि आप अपने को नीच पतित मानते हैं तो विश्वास रखिये आप वैसे ही बने रहेंगे कोई भी आपको ऊँचा या पवित्र न बना सकेगा, किन्तु जिस दिन आपके अन्दर से आत्मगौरव की आध्यात्मिक महत्ता की हुँकार उठने लगेगी उसी दिन से आपका जीवन दूसरे ही ढांचे में ढलना शुरू हो जायेगा संसार में जितने भी महापुरुष हुए हैं उनमें उनके निजी प्रयत्न का ही श्रेय अधिक है। हम मानते कि दूसरों की सहायता से भी उन्नति होती है पर यह सहायता उन्हें ही प्राप्त होती है। जो अपने सहायता खुद करते हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड-ज्योति सितम्बर 1943 पृष्ठ 9
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1943/September/v1.9

👉 प्रेम मर मिटने का नाम है।

🔷 पतंगे को पता होता है कि शमा कि रौशनी में उसे फन्ना हो जाना है।

🔶 भँवरे को पता है कि वोह कोमल पत्तियों को काट सकता है पर प्रेम पर आंच न आये वोह मिट जाता है।

🔷 चातक स्वाति कि पहली बूँद कि इंतज़ार में मुक्ति पा लेता है।

🔶 ठीक वैसे जैसे समुन्द्र आकाश से गिरी हुई पानी की बूँद को आत्मसात कर लेता है। फिर बूँद का कोई अस्तित्व ही नहीं रह जाता। वोह भी सागर बन जाती है वोह शरणागती स्वीकार लेती है।

🔷 जिसे प्रेम होता है तो वोह अपने प्रेमी से प्रेम करने की अनुमति नहीं लेता बस प्रेम करता है अंत नहीं देखता, फल की चिंता नहीं करता। बस प्रेम करता है। मोक्ष होगा या नहीं मिलन होगा या नहीं उससे कोई मतलब नहीं होता उसे। वोह मात्र प्रेम करता है।

करने हैं अगर शिकवे खुदा से,
तो छोड़ दे इबादत कोई ओर काम कर...........

🔶 बाकि तो बस भगवान का नाम जपता जा - जीवन में तू तपता जा

👉 गुरुगीता (भाग 118)

👉 कामधेनु, कल्पतरू, चिन्तामणि है गुरूगीता का पाठ

🔷 गुरूगीता के मंत्र गीत शिष्यों की प्राणचेतना में गूँजते हैं। प्राणों में निरन्तर होती इनकी अनुगूँज से उन्नयन, विकास एवं रूपान्तरण की अनेकों प्रक्रियायें घटित होती हैं। हालाँकि ये चमत्कारी प्रक्रियायें एवं परिणतियाँ होती उन्हीं के जीवन में हैं, जिनके अंतःकरण में शिष्यत्व का भाव बीज अंकुरित हो रहा है। अथवा जिनके अंतस् में किसी न किसी रूप में इसकी अवस्थिति व उपस्थिति है। बीज के सच को, इसके यथार्थ को हम सभी जानते हैं। कंकरीली- पथरीली जमीन की तहों में दबा हुआ बीज मौसम आने पर अंकुरित हुए बिना नहीं रहता। यह बीजांकुर भले ही कितना कोमल और नाजुक हो, फिर भी बड़ी आसानी से उस कंकरीली- पथरीली जमीन को भेदकर खुली हवा और सूर्य के उजाले
में अपने अस्तित्व की अमिट पहचान बताता है।

🔶 ठीक यही स्थिति शिष्य के बीज की है। शिष्य की अंतर्चेतना में, उसकी चित्त भूमि में इसकी उपस्थिति यदि है, तो समझो कि आध्यात्मिक जीवन की सम्भावनाएँ भी हैं। फिर भले ही यह बीज चित्त की कितनी ही गहरी तहों या परतों में क्यों न दबा हुआ हो। कामना, वासना अथवा लालसाओं के कितने ही कुसंस्कार इसे क्यों न घेरे हुए हों, परन्तु सही काल आने पर इसका अंकुरण सुनिश्चित है। इसी के साथ उन कुसंस्कारों की कालिमा का मिटना भी अनिवार्य है, जो इसे बाँधे है। श्रीमद्भगवद्गीता के महानायक परमगुरू योगेश्वर श्री कृष्ण का वचन- 'न मे भक्तः प्रणश्यति' मेरे भक्त का कभी नाश नहीं होता- त्रिकाल सत्य है। सतयुग त्रेता, द्वापर अथवा कलयुग के कालक्रम का इस पर कोई फर्क नहीं होता। सच्चा गुरूभक्त, सच्चा शिष्य अपने गुरू की कृपा से जीवन के परम लक्ष्य को पा ही लेता है।

🔷 गुरूगीता के पिछले क्रम में इसी यथार्थ की चर्चा की गयी थी। इसमें बताया गया था कि भोग हो या मोक्ष अथवा फिर आपदा निवारण गुरूगीता के अनुष्ठान से सब कुछ सम्भव है। आयु- आरोग्य, अचर सौभाग्य, दुःख, भय, विध्न एवं शापों का नाश गुरूगीता की साधना करने वाले को स्वयमेव मिलते हैं। इसकी साधना सभी बाधाओं का शमन करके धर्म, अर्थ काम एवं मोक्ष देने वाली है। यहाँ तक कि साधक जो- जो भी इच्छा करता है, वे सभी इच्छाएँ इससे निश्चित ही पूरी होती हैं। गुरूगीता का पाठ कामना पूर्ति के लिए कामधेनु है, कल्पनाओं की साकार करने वाला कल्पतरू है। यह चिंताओं को दूर करने वाली चिंतामणि है। इससे सभी तरह का मंगल होता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 177

👉 आज का सद्चिंतन 23 May 2018

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 23 May 2018

👉 माँ की सच्ची सीख

🔶 कोई सिद्धान्त अपने आप में अकेला पूर्ण नहीं। प्रयोगपक्ष जाने बिना सारा ज्ञान अधूरा हैं। फिर क्रिया पक्ष, ज्ञान पक्ष का पूरक है। ब्रह्म ज्ञान- तत्व चिन्तन अपनी जगह है, अनिवार्य भी है, परन्तु उसका व्यवहार पदा जिसे साधना- तपश्चर्या के रूप में जाने बिना एक मात्र मानसिक श्रम और ज्ञान वृद्धि तक ही सीमित रहने से उद्देश्य की पूर्ति नहीं होगी। चिकित्सकों को अध्ययन भी करना होता है एवं व्यावहारिक ज्ञान भी प्राप्त करना होता है। यह समग्रता लाये बिना वे चिकित्सक की पात्रता- पदवी नहीं पाते।

🔷 ऐसा अधूरापन अध्यात्म क्षेत्र में बड़े व्यापक रूप में देखने को मिलता है। ब्रह्म की, सद्मुणों की, आदर्शवादिता की चर्चा तो काफी लोग करते पाये जाते हैं परन्तु उसे व्यवहार में उतारने, जीवन का अंग बना लेने वाले कम ही होते हैं।

🔶 एक साधु द्वार पर बैठे तीन भाइयों को उपदेश कर रहे थे- वत्स! संसार में सन्तोष ही सुख है। जो कछुये की तरह अपने हाथ- पाँव सब ओर से समेट कर आत्म- लीन हो जाता है, ऐसे निरुद्योगी पुरुष के लिए संसार में किसी प्रकार का दु:ख नहीं रहता।

🔷 घर के भीतर बुहारी लगा रही माँ के कानों में साधु की यह वाणी पड़ी तो वह चौकन्ना हो उठी। बाहर आई और तीनों लड़की को खड़ा करके छोटे से बोली- 'ले यह घडा, पानी भर कर ला', मझले से कहा- 'उठा यह झाडू और घर- बाहर की बुहारी कर', अन्तिम तीसरे को टोकरी देते हुए उसनें कहा- 'तू चल और सब कूड़ा उठाकर बाहर फेंक' और अन्त में साधु की ओर देखकर उस कर्मवती ने उपदेश दिया- 'महात्मन्! निरुद्योगी मैंने बहुत देखे हैं, कई पड़ोस में ही बीमारी से ग्रस्त, ऋण भार से दबे शैतान की दुकान खोले पड़े है। अब मेरे बच्चों को भी वह विष वारुणी पिलाने की अपेक्षा आप ही निरुद्योगी बने रहिये और इन्हें कुछ उद्योग करने दीजिए। ' ज्ञान को कर्म का सहयोग न मिले तो कितना ही उपयोगी होने पर भी वह ज्ञान निरर्थक है।

👉 यह अच्छी आदतें डालिए (भाग 1)

🔶 सुप्रवृत्तियों के विकास से अच्छी आदतों का निर्माण होता है, मनुष्य अपने उत्तम गुणों का विकास करता है और चरित्र में, अंधकार में प्रविष्ट दुर्गुणों का उन्मूलन होता है। अतः हमें प्रारंभ से ही यह जान लेना चाहिए कि हम किन किन गुणों तथा आदतों का विकास करें।

नैतिकता:—

🔷 उत्तम चरित्र का प्रारंभ नैतिकता से होता है। नैतिकता अर्थात् श्रेष्ठतम आध्यात्मिक जीवन हमारा लक्ष्य होना चाहिए। नैतिकता हमें सद् असद्, उचित अनुचित, सत्य असत्य में अन्तर करना सिखाती है। नैतिकता सद्गुणी जीवक का मूलाधार है। यह हमें असद् आचरण, गलतियों अनीति और दुर्गुणों से बचाती है। नैतिकता का आदि स्रोत परमेश्वर है। अतः यह हमें ईश्वरीय जीवन व्यतीत करने की शिक्षा प्रदान करती है। यह वह जीवन शास्त्र है जो हमारे जीवन के कार्यों की आलोचना कर हमें उच्च आध्यात्मिक जीवन की ओर प्रेरित करती है।

🔶 नैतिकता धर्म का व्यवहारिक स्वरूप है। हम प्रायः उत्तम ग्रन्थ पढ़ते हैं, अनेक जीवन सूत्र जानते हैं किन्तु उत्तम आचरण जीवन में नहीं करते हैं। नैतिकता उस ज्ञान के व्यवहार और प्रयोग का नाम है। यह हमें जीवन को सही रूप में जीना सिखाती है। हमें क्या करना चाहिए? हमारा क्या कर्त्तव्य है? सही मार्ग कौन सा है? किस कार्य से हमें सर्वाधिक आत्म संतोष प्राप्त हो सकता है?—यह नैतिकता के मूल प्रश्न हैं। आपको वही करना चाहिए, जो उचित है, सबसे अधिक फल देने वाला है, जिसमें कोई गलती नहीं है। यह सब ज्ञान हमें नैतिकता से जीवन व्यतीत करने पर प्राप्त होते हैं।

🔷 नैतिकता के बिना धर्म का कोई अर्थ नहीं है। यह अव्यावहारिक और कल्पना शील बनता है। बिना नैतिकता के धर्म एक ऐसे वृक्ष के समान है जिसमें जड़ नहीं है। बिना नैतिकता के व्यवहारिक जीवन ऊँचा नहीं उठ सकता, न ईश्वरीय तथ्यों का जीवन में प्रकाश हो सकता है।

📖 अखण्ड ज्योति, अप्रैल 1955 पृष्ठ 18
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1955/April/v1.18

👉 Awakening Divinity in Man (Part 9)

🔶 My concept of worship and divine blessings is somewhat different. I can say that a true devotee can attract divine energies by the force of his nobility; he can compel deities to help in pursuit of his noble aims. A true devotee in this sense is much stronger a deity; he can get God’s help whenever he asks as his right. God cannot ignore his call.

🔷 Those who worship god begging for a few worldly possessions or for fulfillment of ego-centric desires can’t be true devotees even if they spend all their time in prayers and rituals. Glad consent to God’s will is the real spirit of devotion; it is the prime condition to be fulfilled for being a devotee in its true sense. God has inalterably assured His devotee, the Gita- “yogaksemam vahamyaham” I will provide for all your needs. 

🔶 True, God does take care of his devotee but He has not promised to satisfy his cravings. “Yoga” and “ksema” mean taking care of your physical, mental, intellectual and spiritual well-being. There should not be any confusion that it (God’s arrivance) includes the fulfilment of your gross sensual hunger. Don’t chase the mirage of passions and desires; it devalues the dignity of devotion and the pre-eminence of God’s grace. The relation between the deity and the devotee is graceful and dignified only when the devotee doesn’t beg for anything but rather offers to entirely give himself to the divine.

🔷 God has already given you so much! He has created you. He is always taking care of your yoga-ksema, without your praying for it. God is not a particularly embodied being. It is we who have conceived Him in various forms. If it is a must to give a definition, God could only be vaguely described as “an infinite ensemble of supreme moral principles, saintly ideals and nobility”. Faith in divine values and ideals and a self disciplined endeavor to live for high principles is true devotion and enlightened worship.
 
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 अपने वचन का पालन करिए!

🔶 आत्म-सम्मान को प्राप्त करने और उसे सुरक्षित रखने का एक ही मार्ग है, वह यह कि-’ईमानदारी’ को जीवन की सर्वोपरि नीति बना लिया जाये। आप जो भी काम करें, उसमें सच्चाई की पर्याप्त मात्रा होनी चाहिए, लोगों को जैसा विश्वास दिलाते हैं, उस विश्वास की रक्षा कीजिए। विश्वासघात, दगा करना, वचन पलटना, कुछ कहना और कुछ करना, मानवता का सबसे बड़ा पातक है।

🔷 आजकल वचन पलटना एक फैशन सा बनता जा रहा है। इसे हलके दर्जे का पाप समझा जाता है पर वस्तुतः अपने वचन का पालन न करना, जो विश्वास दिलाया है उसे पूरा न करना बहुत ही भयानक, सामाजिक पाप है। धर्म-आचरण की अ, आ, इ, ई, वचन पालन से आरंभ होती है। यह प्रथम कड़ी है जिस पर पैर रखकर ही कोई मनुष्य धर्म की ओर, आध्यात्मिकता की ओर, बढ़ सकता है।

🔶 आप जबान से कहकर या बिना जबान से कहे या किसी अन्य प्रकार दूसरों को जो कुछ विश्वास देते हैं, उसे पूरा करने का शक्ति भर प्रयत्न कीजिए, यह मनुष्यता का प्रथम लक्षण है। जिसमें यह गुण नहीं, सच्चे अर्थों में मनुष्य नहीं कहा जा सकता और न उसे वह सम्मान प्राप्त हो सकता है जो एक सच्चे मनुष्य को होना चाहिए।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड-ज्योति अक्टूबर 1943 पृष्ठ 1
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1943/October/v1.1

👉 आत्मसम्मान धन है।

🔶 आत्मसम्मान को प्राप्त करने और उसकी रक्षा करने के लिए प्राण प्रण से चेष्टा करते रहिए क्योंकि यह बहुमूल्य सम्पत्ति है। पैसे की तरह यह आँख से दिखाई नहीं पड़ता और पास रखने के लिए तिजोरी की जरूरत नहीं पड़ती तो भी स्पष्टतः यह धन है। हम ऐसे व्यापारियों को जानते हैं जिनके पास अपनी एक पाई न होने पर भी दूसरों से उधार लेकर बड़े-बड़े लम्बे चौड़े व्यापार कर डालते हैं क्योंकि उनका बाजार में सम्मान है, ईमानदारी की प्रतिष्ठा है।

🔷 हम ऐसे नौकरों को जानते हैं जिन्हें मालिक अपने सगे बेटे की तरह प्राण से प्यारा रखते हैं और उनके लिए प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष रूप से इतना पैसा खर्च कर देते हैं जो उनके निर्धारित वेतन से अनेक गुना होता है कारण यह कि नौकर के सद्गुणों के कारण मालिक के मन में उसका सम्मान घर कर लेता है। गुरुओं के वचन मानकर श्रद्धालु शिष्य अपना सर्वस्व देने के लिए तत्पर हो जाते हैं, अपनी जीवन दिशा बदल देते हैं, प्यारी से प्यारी वस्तु का त्याग कर देते हैं, राजमहल छोड़कर बिखारी बन जाते हैं, ऐसा इसलिए होता है कि शिष्य के मन में गुरु के प्रति अगाध सम्मान होता है, गुरु का आत्म सम्मान शिष्य को अपना वशवर्ती बना लेता है।

🔶 अदालत में किसी एक ही गवाह की गवाही विपक्षी सौ गवाहों की बात को रद्द कर देती है कारण यह है कि उस गवाह की प्रतिष्ठा न्यायाधीश को प्रभावित कर देती है। आत्म सम्मान ऊंची कोटि का धन है जिसके द्वारा ऐसे महत्वपूर्ण लाभ हो सकते हैं जो कितना ही पैसा खर्च होने पर नहीं हो सकते थे।

🔷 आत्मसम्मान धन है। बाजार में वह पूँजी की तरह निश्चित फल देने वाला है, समाज में पूजा कराने वाला है, आत्मा को पौष्टिक भोजन देने वाला है हम कहते हैं कि- हे आध्यात्मवाद का आश्रय लेने वाले शूरवीर साधकों, आत्मसम्मान सम्पादित करो और प्रयत्नपूर्वक उसकी रक्षा करो।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड-ज्योति सितम्बर 1943 पृष्ठ 6
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1943/September/v1.6

👉 गुरुगीता (भाग 117)

👉 कष्टों में भी प्रसन्न रखती है- गुरूभक्ति

🔶 यह कथा पंजाब प्रान्त के सन्त बाबा लाल के बारे में है। बाबा लाल बड़े पहुँचे हुए फकीर थे। उनकी अलौकिक शक्तियों एवं यौगिक विभूतियों के कारण न केवल सामान्य जन, बल्कि पीर- फकीर एवं शाहजादे, बादशाह भी अभिभूत रहते थे। शाहजहाँ का बड़ा बेटा दाराशिकोह भी उनका भक्त था। इस बात से कम लोग वाकिफ हैं कि वह अपने पीर- मुर्शीद सूफी सरमद से मिलने के पहले से वह बाबा लाल जी से मिला था। वह इन्हें लालपीर जी कहा करता था।

🔷 शाहजादा दाराशिकोह का मन सूफियाना था। उसे परमात्मा से सच्ची लगन थी। बाबा लाल से मिलकर उसने अपनी ख्वाहिश बयान की कि आप मुझे शिष्य के रूप में स्वीकार कर लीजिए। बाबा लाल जी ने उसकी ओर देखा और बोले -दारा! तुझे तेरे मुर्शीद मिलेंगे। इसके लिए गुरूगीता का पाठ किया कर। दाराशिकोह उन दिनों उपनिषदों का फारसी में अनुवाद कर रहे थे। उन्होंने बाबा लाल की बात मान कर गुरूगीता का पाठ प्रारम्भ किया। इसके प्रभाव से उन्हें अपने पीर- मुर्शीद सूफी सरमद से मुलाकात हुई। दारा एवं सरमद जैसे एक- दूसरे के लिए बने थे। हालाँकि सरमद से मिलने के बाद भी दारा ने बाबा लाल की भक्ति नहीं छोड़ी। ऐतिहासिक तथ्य कहते हैं कि दाराशिकोह ने बाबा लाल से सात बार मुलाकातें कीं। इन मुलाकातों में उन्होंने बाबा लाल से अनेकों सवाल किये। दाराशिकोह द्वारा किये गये प्रश्न एवं बाबा लाल द्वारा दिये गये जवाब वास्तव में आध्यात्मिकता का खजाना है। जिन्हें शाहजहान में वजीर राय मुंशी चन्द्रभान विरहमनज् ने फारसी में लिपिबद्ध करने का महान् कार्य किया। जो इसरारे मार्फत या इसरारे गुलजार या नादिरूलनुकात के नाम से प्रसिद्ध है।

🔶 इतिहास इस बात की गवाही देता है कि औरंगजेब ने अपने बड़े भाई दारा के साथ बड़ा ही बर्बर एवं अमानवीय बर्ताव किया। और अंत में उन्हें और उनके बेटे का कत्ल करा दिया। यहाँ तक कि उसने सूफी फकीर सरमद को भी मरवा दिया। इसके बाद वह अपने अहं एवं अकड़ के साथ बाबा लाल जी से मिलने गया। बाबा लाल जी उसे देखकर मुस्कराये। औरंगजेब ने उन्हें व्यंग्यपूर्वक प्रणाम् किया और पूछा- महराज वैसे तो आप कई सिद्धियों के मालिक हैं, फकीर सरमद के बारे में लोग कुछ ऐसा ही कहा करते थे। परन्तु किसी ने दाराशिकोह की मदद नहीं की। आपकी कोई सिद्धि और साधना उसके काम नहीं आयी। बेचारा बेमौत मारा गया!

🔷 बाबा लाल जी औरंगजेब की बात सुनकर हँसे और बोले- औरंगजेब तू मगरूर है और अंधा भी। तेरा भाई दारा दरवेश था, उसे किसी भी राज्य की कोई इच्छा नहीं थी। वह तो बस अपने पिता की रक्षा करना चाहता था। तूने जो उसके साथ बर्बरता का व्यवहार किया है, उसकी सजा तो तू उम्र भर भोगेगा। जिस तरह साँप अपनी केंचुली को छोड़कर यह नहीं सोचता कि उसकी केंचुली का क्या किया जायेगा, उसी प्रकार सच्चा दरवेश अपने बाहरी जीवन की चिंता नहीं किया करते। दारा ने भी अनेक कष्ट एवं यातना सहकर महातप किया और आज वह खुद की रहमतों फरिश्तों का बादशाह है। तू देखना चाहता है तो देख- ऐसा कहते हुए बाबा लाल ने औरंगजेब को स्पर्श किया। इस स्पर्श के साथ औरंगजेब रूहानी दुनिया में पहुँच गया और उसने दारा के आध्यात्मिक वैभव को देखा। उसे अपने किये पर बड़ी शर्म आई। आँख खुलने पर उसने बाबा लाल जी से माफी माँगी। लेकिन प्रत्युत्तर में बाबा ने कुछ नहीं कहा। क्रूर औरंगजेब को अपने मन के कोने में कहीं इसका अहसास जरूर हुआ होगा कि गुरूभक्ति एवं साधना कर्म निरर्थक नहीं होती।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 175

मंगलवार, 22 मई 2018

👉 आज का सद्चिंतन 22 May 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 22 May 2018


👉 कृपा कर क्रोध मत कीजिए (अन्तिम भाग)

🔷 समाज में दो प्रकार के व्यक्ति होते हैं—एक वे जो क्षण भर भी अकेले नहीं रह सकते। यदि उन्हें अकेला रहना पड़ जाय तो वह पागल हो जावें, और दूसरे वे जो समाज में आने से डरते हैं। जब तक समाज में रहते हैं सतर्क रहते हैं, सदा उससे भागने की चेष्टा में रहते हैं और जब वे उससे अलग हो जाते हैं तो अपने−आपको सुखी पाते हैं। पहले प्रकार के व्यक्ति बहिर्मुखी कहलाते हैं और दूसरे प्रकार के अन्तर्मुखी। पहले प्रकार के लोग प्रसन्न चित्त दिखाई देते हैं। दूसरे प्रकार के लोग दुखी दिखाई देते हैं पर होते हैं शान्त। पहले प्रकार के लोगों का क्रोध अति प्रबल होता है। वे सभी से अपने प्रसन्न रखे जाने की आशा करते हैं। पर जब यह आशा पूरी नहीं होती तो उनका क्रोध अपरिमित हो जाता है। जब इस क्रोध का प्रदर्शन किसी दूसरे व्यक्ति पर नहीं होता, तो वह निराशा में परिणत हो जाता है।

🔶 इस तरह समाज में अधिक रहने कि इच्छा क्रोध और निराशा मूलक होती है। यह इच्छा मनुष्य को परावलंबी बनाती है तथा स्वावलंबन को कम करती है। ऐसी ही अवस्था में क्रोध हमें अपने आवेश में उड़ा लेता है। जिस प्रक्रिया से हम स्वावलम्बी बनते हैं उसी से हम क्रोध पर विजय पाते हैं। अंतर्मुखी होना स्वार्थी बनना नहीं है। जो दूसरों की सेवा से बचना चाहते हैं, वे वास्तविक अन्तर्मुखी नहीं हैं वे स्वार्थी हैं। अन्तर्मुखी दूसरों की सेवा करने में सब से आगे और दूसरों से सेवा ग्रहण करने में सब से पीछे रहता है।

🔷 प्रत्येक भाव के संस्कार हमारे अदृश्य मन में रहते हैं और इन संस्कारों के अनुसार हमारा आचरण बनता जाता है। जो व्यक्ति अपने मन के कुसंस्कारों को तुरंत मिटा देता है वह बड़ा बुद्धिमान है। क्रोध के संस्कार प्रेम से मिटते हैं। जिसे व्यक्ति के प्रति क्रोध कि या जाय उसके प्रति शीघ्रातिशीघ्र प्रेम प्रदर्शित करना चाहिए। कभी भी अपनी भूल को स्वीकार करना बुरा नहीं है। भूल स्वीकार करने से मन बलवान होता है तथा उसकी भूल करने की प्रवृत्ति जाती रहती है। यहाँ यह सोचना उचित नहीं कि क्रोध जिस व्यक्ति पर किया गया वह तुच्छ है अथवा उससे हमारा कोई प्रयोजन आगे न होगा। हमें दूसरों से कुछ प्रयोजन भले ही न हो अपने आप से तो अवश्य प्रयोजन है।

🔶 दूसरों के प्रति क्रोध करके हम अपने आपके प्रति अन्याय करते हैं इस अन्याय का प्रतिकार हमें तुरंत करना चाहिए। यदि ऐसा न किया जाय तो अन्याय की प्रवृत्ति प्रतिक्षण बढ़ती जाती है जिसका आगे चलकर भयंकर परिणाम होता है। अन्याय का प्रायश्चित पश्चात्ताप में नहीं है, न्याय में है। दूसरों के प्रति किए अनर्थ का पाप उनकी सेवा करने से दूर होता है। क्रोध का प्रतिकार प्रेम है न कि आत्मग्लानि, वह उसका स्वाभाविक परिणाम है। प्रेम, क्रोध और उसके सभी परिणामों को नष्ट करता है।

📖 अखण्ड ज्योति, अप्रैल 1955 पृष्ठ 7
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1955/April/v1.7

👉 खरे बनिए! चापलूसी से दूर रहिए!

🔷 जो बात आपको सच्ची प्रतीत होती है उसे बिना किसी हिचकिचाहट के खुली जबान से कहिए अपने अन्तःकरण को कुचल कर बनावटी बातें करना, किसी के दबाव में आकर निजी विचारों को छिपाते हुए हाँ में हाँ मिलाना आपके गौरव के विपरीत है। इस प्रकार की कमजोरियाँ प्रकट करती हैं कि यह व्यक्ति आत्मिक दृष्टि से बिलकुल ही निर्बल है, डर के मारे स्पष्ट विचार तक प्रकट करने में डरता है। ऐसे कायर व्यक्ति किसी प्रकार अपना स्वार्थ साधन तो कर सकते हैं पर किसी के हृदय पर अधिकार नहीं जमा सकते।

🔶 स्मरण रखिए प्रतिष्ठा की वृद्धि सच्चाई और ईमानदारी द्वारा होती है। आप खरे विचार प्रकट करते हैं, जो बात मन में है उसे ही कह देते हैं तो भले ही कुछ देर के लिए कोई नाराज हो जावे पर क्रोध उतरने पर वह इतना तो अवश्य अनुभव करेगा कि यह व्यक्ति खरा है, अपनी आत्मा के प्रति सच्चा है। विरोधी होते हुए भी वह मन ही मन आदर करेगा।

🔷 आप किसी भी लोभ-लालच के लिए अपनी आत्म स्वतंत्रता मत बेचीए, किसी भी फायदे के बदले आत्म गौरव का गला मत कटने दीजिए। चापलूसी और कायरता से यदि कुछ लाभ होता हो तो भी उसे त्याग कर कष्ट में रहना स्वीकार कर लीजिए, क्योंकि इससे आपकी प्रतिष्ठा बढ़ेगी, आत्म गौरव को प्रोत्साहन मिलेगा। स्मरण रखिए आत्म गौरव के साथ जीने में ही जिन्दगी का सच्चा आनन्द है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति सितम्बर 1943 पृष्ठ 1
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1943/September/v1

👉 Awakening Divinity in Man (Part 8)

🔷 Friends! When God is pleased, He does not give you the petty worldly things you hanker after. Rather, He bestows on you godlike qualities which elevate your soul. The lives of world’s really great personage demonstrate this fact. None among them was such who did not receive God’s grace, guidance and cooperation of the masses they served.  Give me one name of a great personality who was not endowed with any godly qualities of compassion, love, faith and service and who did not elicit spontaneous and loving cooperation from those who followed him.

🔶 The noble values and principles of morality, ethics and spontaneity when adopted in conduct, help in enhancements of talents and resources. Saints adhere to great ideals of god like lives. They are never poor; required resources arrive at their doorstep. But they do not accumulate them; they generously share them with the needy.

🔷 When our minds are cleansed of all impurities and perversions, our material and inner resources are augmented. How many examples should I mention? The life of everyone who followed the ideal path of love-in-action and selfless service exemplifies this fact. They are true devotees in my view. I consider the worship and devotion of only those as true and worthwhile who could attract divine energies of their deity by the nobility of their character, by the magnetism of their virtues and by their single-minded determination at self refinement and self effacement When deities are happy with your worship, they bless you with the attributes of a divine being: enlightened wisdom, compassion and selfless service.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 पवित्र जीवन

🔷 मानव जीवन में व्यवहृत जितने अनुष्ठान (नियम, व्रत) सत्य, पूर्ण पवित्रता स्थापित कर सकते हैं, उनमें सबसे सरल, मीठा अनुष्ठान “ईश्वर पर विश्वास कर लेना है।” मनुष्य को यदि अपने चरित्र को ऊँचा उठाना है तो ईश्वरी नियमों को साथ-साथ आत्मिक बल बढ़ाकर स्वाध्याय, संतोष और तप को भी अपना एक मात्र लक्ष्य रखना है, इसी लक्ष्य के सहारे हम अपने अन्तिम लक्ष्य और ईश्वर के आत्मस्वरूप गुणों को प्राप्त करने की क्षमता उत्पन्न कर सकेंगे।

🔶 जैसे-जैसे हमारा स्वाध्याय बढ़ेगा, हमारी आत्मा संतोष व्रतधारी बनेगी और जब संतोष का पूर्ण रूपेण समावेश हो चुकेगा तो हमारा तप पवित्र मानव का स्वरूप लोकोपकारी वृत्तियों को जीवन देकर हमें हमारे एक मात्र लक्ष्य की पूर्ति में सहायक होगा। बस यही रूप मानव जाति का विश्व शान्तिदायक पवित्र जीवन है।

📖 अखण्ड-ज्योति अक्टूबर 1943 पृष्ठ 6
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1943/October/v1.14

👉 गुरुगीता (भाग 116)

👉 कष्टों में भी प्रसन्न रखती है- गुरूभक्ति

🔷 इस प्रकरण को विस्तार देते हुए भगवान् भोलेनाथ पराम्बा माँ भगवती से कहते हैं-

आयुरारोग्यमैयश्वर्यपुत्रपौत्रप्रवर्धनम्। अकामतः स्त्री विधवा जपान्मोक्षमवान्पुयात् ॥ १४६॥
अवैधव्यं सकामा तु लभते चान्यजन्मनि। सर्वदुःखभयं विध्नं नाशयेच्छापहारकम्॥ १४७॥
सर्वबाधाप्रशमनं धर्मार्थकाममोक्षदम्। यं यं चिन्तयते कामं तं तं प्राप्नोति निश्चितम्॥ १४८॥
कामितस्य कामधेनुः कल्पनाकल्पपादपः। चिन्तामणिः चिंतितस्य सर्वमङ्गलकारकम्॥१४९॥
मोक्षहेतुर्जपेत् नित्यं मोक्षश्रियमवाप्नुयात्। भोगकामो जपेद्यो वै तस्य कामफलप्रदम्॥१५०॥

🔶 गुरूगीता के विधिपूर्वक अनुष्ठान से आयु आरोग्य ऐश्वर्य एवं पुत्र- पौत्रों की वृद्धि होती है। विधवा स्त्री यदि निष्काम भाव से इसका पाठ करे, तो उन्हें मोक्ष मिलता है॥१४६॥ यदि वे सकाम भाव से पाठ करें, तो उन्हें अगले जन्म में अचल सौभाग्य की प्राप्ति होती है। गुरूगीता के पाठ से सभी दुःख, भय, विध्न एवं शापों का नाश होता है॥ १४७॥ इसकी साधना सभी बाधाओं का शमन करके धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष देने वाली है। यहाँ तक कि साधक जो- जो भी इच्छा करता है, वे सभी इच्छाएँ इससे निश्चित ही पूरी होती है।। १४८॥ यह गुरूगीता का पाठ कामना पूर्ति के लिए कामधेनु है। कल्पनाओं को साकार करने वाला कल्पतरू है। यह चिुंताओं को दूर करने वाली चिंतामणि है। इससे सभी का सब तरह से मंगल होता है॥१४९॥ मोक्ष की इच्छा से जो इसका पाठ करता है, उसे मोक्ष लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। भोग की इच्छा से पाठ करने वाले को मनवांछित भोग मिलते हैं॥१५०॥

🔷 भगवान् शिव के इन वचनों में गहरी सार्थकता एवं रहस्यमयता है। कई बार सामान्य जन इसकी रहस्यमयता के कारण गुरूगीता की साधना की सार्थकता नहीं समझ पाते। उन्हें लगता है, जो साधना में तत्पर है, उन्हें भला इतने कष्ट क्यों मिलते हैं। गुरूभक्त शिष्यों पर इतनी अधिक विपत्तियाँ क्यों आती हैं? सत्पथ पर चलते हुए उन्हें इतने ज्यादा संकटों का सामना क्यों करना पड़ता है? जबकि दुर्गुणी -दुराचारी लोगों को उनकी तुलना में ज्यादा सुख- भोग उठाते देखा जाता है। इन बातों के अटपटे रहस्यों का भेद करने में इन साधारण लोगों की बुद्धि हतप्रभ रह जाती है। उन्हें इस आध्यात्मिक उलटबासी में न कोई सार्थकता नजर आती है और न कोई यथार्थता। ऐसे लोग सदा- सदा अपने बौद्धिक प्रपंचों में उलझे रहकर साधना, तपस्या एवं सत्कर्मों से दूरी बनाये रखते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 174

रविवार, 20 मई 2018

👉 स्वर्ग का मार्ग:-

🔶 महात्मा बुद्ध के समय की बात है। उन दिनों मृत्यु के पश्चात आत्मा को स्वर्ग में प्रवेश कराने के लिए कुछ विशेष कर्मकांड कराये जाते थे। होता ये था कि एक घड़े में कुछ छोटे-छोटे पत्थर डाल दिए जाते और पूजा-हवन इत्यादि करने के बाद उस पर किसी धातु से चोट की जाती, अगर घड़ा फूट जाता और पत्थर निकल जाते तो उसे इस बात का संकेत समझा जाता कि आत्मा अपने पाप से मुक्त हो गयी है और उसे स्वर्ग में स्थान मिल गया है।

🔷 चूँकि घड़ा मिटटी का होता था इसलिए इस प्रक्रिया में हमेशा ही घड़ा फूट जाता और आत्मा स्वर्ग को प्राप्त हो जाती और ऐसा कराने के बदले में पंडित खूब दान-दक्षिणा लेते।

🔶 अपने पिता की मृत्यु के बाद एक युवक ने सोचा क्यों न आत्मा-शुद्धि के लिए महात्मा बुद्ध की मदद ली जाए, वे अवश्य ही आत्मा को स्वर्ग दिलाने का कोई और बेहतर और निश्चित रास्ता जानते होंगे। इसी सोच के साथ वो महात्मा बुद्ध के समक्ष पहुंचा।

🔷 उसने कहा, “हे महात्मन! मेरे पिता जी नहीं रहे, कृपया आप कोई ऐसा उपाय बताएं कि यह सुनिश्चित हो सके कि उनकी आत्मा को स्वर्ग में ही स्थान मिले।”

🔶 बुद्ध बोले, “ठीक है, जैसा मैं कहता हूँ वैसा करना…तुम उन पंडितों से दो घड़े लेकर आना। एक में पत्थर और दूसरे में घी भर देना। दोनों घड़ों को नदी पर लेकर जाना और उन्हें इतना डुबोना कि बस उनका उपारी भाग ही दिखे। उसके बाद पंडितों ने जो मन्त्र तुम्हे सिखाये हैं उन्हें जोर-जोर से बोलना और अंत में धातु से बनी हथौड़ी से उनपर नीचे से चोट करना। और ये सब करने के बाद मुझे बताना कि क्या देखा?”

🔷 युवक बहुत खुश था उसे लगा कि बुद्ध द्वारा बताई गयी इस प्रक्रिया से निश्चित ही उसके पिता के सब पाप काट जायेंगे और उनकी आत्मा को स्वर्ग की प्राप्ति होगी।

🔶 अगले दिन युवक ने ठीक वैसा ही किया और सब करने के बाद वह बुद्ध के समक्ष उपस्थित हुआ।

🔷 बुद्ध ने पूछा , “आओ पुत्र, बताओ तुमने क्या देखा?”

🔶 युवक बोला, “मैंने आपके कहे अनुसार पत्थर और घी से भरे घड़ों को पानी में डाल कर चोट की। जैसे ही मैंने पत्थर वाले घड़े पर प्रहार किया घड़ा टूट गया और पत्थर पानी में डूब गए। उसके बाद मैंने घी वाले घड़े पर वार किया, वह घड़ा भी तत्काल फूट गया और घी नदी के बहाव की दिशा में बहने लगा।”

🔷 बुद्ध बोले, “ठीक है! अब जाओ और उन पंडितों से कहो कि कोई ऐसी पूजा, यज्ञ, इत्यादि करें कि वे पत्थर पानी के ऊपर तैरने लगें और घी नदी की सतह पर जाकर बैठ जाए।”

🔶 युवक हैरान होते हुए बोला, “ आप कैसी बात करते हैं? पंडित चाहे कितनी भी पूजा करे लें पत्थर कभी पानी पे नहीं तैर सकता और घी कभी नदी की सतह पर जाकर नहीं बैठ सकता!”

🔷 बुद्ध बोले, “ बिलकुल सही, और ठीक ऐसा ही तुम्हारे पिताजी के साथ है। उन्होंने अपने जीवन में जो भी अच्छे कर्म किये हैं वो उन्हें स्वर्ग की तरफ उठाएंगे और जो भी बुरे कर्म किये हैं वे उन्हें नरक की और खीचेंगे। और तुम चाहे जितनी भी पूजा करा लो, कर्मकाण्ड करा लो, तुम उनके कर्मफल को रत्ती भर भी नहीं बदल सकते।”

🔶 युवक बुद्ध की बात समझ चुका था कि मृत्यु के पश्चात स्वर्ग जाने का सिर्फ एक ही मार्ग है और वो है जीवित रहते हुए अच्छे कर्म करना।