शनिवार, 24 जून 2017

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 19)

🌹  इंद्रिय संयम, अर्थ संयम, समय संयम और विचार संयम का सतत अभ्यास करेंगे।

🔴 ध्यान रखना चाहिए कि जो उपार्जन से बचाया जाए, उसे उचित प्रयोजन में नियोजित कर दें। कमाने में न अनीति बरती जाए और न उपेक्षा। खर्च करने में सज्जनता एवं सत्परिणामों की जाँच पड़ताल रखी जाए अन्यथा संपन्नता, दरिद्रता से भी अधिक घातक सिद्ध होती है। इससे समाज में दूषित परंपराएँ पनपती है। धन के लक्ष्मी कहते हैं। सत्प्रयोजन में लगे तो लक्ष्मी, अपव्यय किया जाए, अनीति से कमाया या खर्च किया जाए तो वह माया है। माया का नाश सदैव हुआ है।
  
🔵 संयम पर न टिक पाने का कारण उसका स्वरूप न समझ पाना है। स्वरूप न समझ पाने से व्यक्ति उसी तरह फँस जाते हैं, जैसे अंधेरी रात में मार्ग में भरे पानी को सूखी जमीन समझकर व्यक्ति उसमें पैर फँसा देता है। स्वरूप एवं महत्त्व समझना कठिन नहीं है, परंतु उसके लिए मनुष्य को पूरा प्रयास तथा नित्य प्रति अभ्यास करना होगा। स्वरूप और महत्त्व समझने के लिए आवश्यक उद्योग न कर पाना भी असंयम की वृत्ति की ही प्रतिक्रिया है। अतः जो संयम का लाभ लेना चाहें वे उसका स्वरूप और महत्त्व समझें। संयम काँप एक पक्ष जहाँ अनावश्यक अपव्यय को रोकना है, वहाँ दूसरी हो उसे सृजनात्मक कार्यों हेतु नियोजित करना भी है। सामर्थ्य तभी श्रेयस्कर परिणाम उत्पन्न करती है, जब उसे अस्त- व्यस्तता एवं अनुपयुक्तता से बचाकर सृजनात्मक सत्प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त किया जाए।
 
🔴 सप्तर्षियों की बैठक होने वाली थी। उससे पूर्व ही वेदव्यास को महाभारत लिखकर देना था। समय कम था, तो भी उन्होंने गणेश जी की मदद ली और महाभारत लिखना प्रारंभ कर दिया। महाभारत समय से पूर्व ही लिख गया। अंतिम श्लोक लिखाते व्यास जी ने कहा- गणेश आश्चर्य है कि पूरा महाभारत लिख गया और इस बीच आप एक शब्द भी नहीं बोले। गणेश जी ने कहा- भगवन् इस संयम के कारण ही हम लोग वर्षों का कार्य कुछ ही दिन में संपन्न करने में समर्थ हुए हैं। बातों में समय नष्ट करने से काम में विलंब होता है। अपने काम में दत्तचित्त एवं शांत होकर लगे रहना चाहिए।
  
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.27

👉 इस धरा का पवित्र श्रृंगार है नारी (भाग 5)

🔴 वेद इतिहास के ग्रंथों का अनुशीलन करने से पता चलता है कि प्रारम्भिक समय में जब साधनों की कमी होने से पुरुषों को प्रायः जंगलों से आहार सामग्री प्राप्त करने तथा आत्म शिक्षा के कामों में अधिक ध्यान देना पड़ता था तब व्यवस्था, ज्ञान-विज्ञान तथा सभ्यता संस्कृति सम्बन्ध विषयों में अधिकाँश काम नारियाँ ही किया करती थी। इसलिये अनेक तत्त्ववेत्ता अन्वेषक मनुष्यों को आदिम सभ्यता की जन्मदात्री नारी को ही मानते है। ऐसा महत्वपूर्ण तथा जीवनदायिनी नारी की उपेक्षा करना कहाँ तक ठीक है यह विचारणीय विषय है।

🔵 नारी संसार की सुंदरता तथा श्रृंगार है। यदि नारी का मोहक रूप न होता तो बर्बर पुरुष बर्बर ही बना रहता है। हिंसा, आखेट तथा युद्ध में ही लगा रहता है यह नारी का ही आकर्षण तथा परामर्श था जिसने उसे हिंसा से विरत कर पशु पालन तथा खेती-बाड़ी के काम में लगाया। उसकी स्नेहमयी करुणा ने ही पुरुष की कठोरता जीतकर उसे सद्गृहस्थ में बदल दिया पारिवारिक बना दिया। यदि नारी न होती तो पुरुष में न तो सरसता का जागरण होता और न कला-कौशल से प्रेम।

🔴 रूप की अय्याशी उसकी आँख संसार में अपना केंद्र खोजते-खोजते थककर पथरा जाती। आखेट खोल लाने के अतिरिक्त उसकी आँखों का वह मूल्य महत्व तथा उपयोग न रहता जिसके आधार पर उसे प्रकृति के सुन्दर दृश्य और आकाश के सुंदर रंग अनुभूत करने की चेतना मिल सकी है। नारी के प्रति स्नेह आकर्षण ने पुरुष हृदय में न केवल कला का ही स्फुरण किया अपितु काम को भी जन्म दिया। नारी के रूप में भी नारी का महत्व कुछ कम नहीं है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 अखण्ड ज्योति- अगस्त 1995 पृष्ठ 25
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1995/August/v1.25

👉 आप किसी से ईर्ष्या मत कीजिए। (अंतिम भाग)

🔵 जो लोग यह समझते हैं कि वे ईर्ष्या की कुत्सित भावना को मन में छिपा कर रख सकते हैं और मानते हैं कि दूसरों व्यक्ति उसे जान न सकेगा। वे बड़ी भूल करते हैं। प्रथम तो यह भावना छिप ही नहीं सकती, किसी न किसी रूप में प्रकट हो ही जाती है। दूसरे दुराचार और छिपाने की भावना मनोविज्ञान की दृष्टि से अनेक मानसिक रोगों की जननी है। कितने ही लोगों में विक्षिप्त जैसे व्यवहारों का कारण ईर्ष्याजन्य मानसिक ग्रन्थि होती है। ईर्ष्या मन के भीतर ही भीतर अनेक प्रकार के अप्रिय कार्य करती रहती है।

🔴 मनुष्य का जीवन केवल उन्हीं अनुभवों, विचार, मनोभावनाओं संकल्पों का परिणाम नहीं जो स्मृति के पटल पर है। प्रत्युत गुप्त मन में छिपे हुए अनेक संस्कार और अनुभव जो हमें खुले तौर पर स्मरण भी नहीं हैं, वे भी हमारे व्यक्तित्व को बनाते हैं। फ्राँस के प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक वर्गसाँ ने मनुष्य के जीवन विकास का उपर्युक्त सिद्धान्त माना है। ईर्ष्या, क्रोध, काम, भाव, द्वेष, चिंता, भय, दुर्व्यवहार का प्रत्येक अनुभव अपना कुछ संस्कार हमारे अंतर्मन पर अवश्य छोड़ जाता है। ये संस्कार और अनुभव सदैव सक्रिय और पनपने वाले कीटाणु हैं। इन्हीं के ऊपर नवजीवन के निर्माण का कार्य चला करता है।

🔵 ईर्ष्या के विकार अंतर्मन में बैठ जाने पर आसानी से नहीं जाते। उससे स्वार्थ और अहंकार तीव्र होकर सुप्त और जागृत भावनाओं में संघर्ष और द्वन्द्व होने लगता है। निद्रा-नाश, घबराहट, प्रतिशोध लेने की भावना, हानि पहुँचाने के अवसर की प्रतीक्षा देखना, विमनस्कता इत्यादि मानसिक व्यथाएं ईर्ष्यापूर्ण मानसिक स्थिति की द्योतक है। यदि यह विकार बहुत तेज हुआ तो मन पर एक अव्यक्त चिंता हर समय बनी रहती है जल, अन्न, व्यायाम, विश्राम का ध्यान नहीं रहता, शयन समय घात प्रतिघात का संघर्ष और अव्यक्त की उद्भूत वासनाएं आकर विश्राम नहीं लेने देतीं। अतः मनुष्य की पाचनेन्द्रिय बिगड़ जाती है, रुधिर की गति में रुकावट होने लगती है, शारीरिक व्याधियाँ भी फूट पड़ती हैं। सम्पूर्ण शरीर में व्यवधान उपस्थित होने से मस्तिष्क का पोषण उचित रीति से नहीं हो पाता।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 अखण्ड ज्योति- जून 1949 पृष्ठ 20
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1949/June/v1.20

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 24 June 2017



शुक्रवार, 23 जून 2017

👉 आज का सद्चिंतन 24 June 2017


👉 कौवे की परेशानी

🔴  यदि आपको सुखी रहना है तो किसी से अपनी तुलना नहीं करो। ‘आप’ आप ही हो। आप के समान कोई नहीं। फिर क्यों दूसरों से अपनी तुलना करना, ईर्ष्या करना? आइये इस बात को एक कहानी के माध्यम से समझते हैं –
एक कौआ जंगल में रहता था और अपने जीवनसे संतुष्ट था। एक दिन उसने एक हंस को देखा,  “यह हंस कितना सफ़ेद है, कितना सुन्दर लगता है।”, उसने मन ही मन सोचा।

🔵 उसे लगा कि यह सुन्दर हंस दुनिया में सबसे सुखी पक्षी होगा, जबकि मैं तो कितना काला हूँ! यह सब सोचकर वह काफी परेशान हो गया और उससे रहा नहीं गया, उसने अपने मनोभाव हंस को बताये।

🔴  हंस ने कहा – “वास्तिकता ऐसी है कि पहले मैं खुदको आसपास के सभी पक्षिओ में सुखी समझता था। लेकिन जब मैने तोते को देखा तो पाया कि उसके दो रंग है तथा वह बहुत ही मीठा बोलता है। तब से मुझे लगा कि सभी पक्षिओ में तोता ही सुन्दर तथा सुखी है।”

🔵 अब कौआ तोते के पास गया।

🔴  तोते ने कहा – “मै सुखी जिंदगी जी रहा था, लेकिन जब मैंने मोर को देखा तब मुझे लगा कि मुझमे तो दो रंग ही, परन्तु मोर तो विविधरंगी है। मुझे तो वह ही सुखी लगता है।”

🔵 फिर कौआ उड़कर प्राणी संग्रहालय गया। जहाँ कई लोग मोर देखने एकत्र हुए थे।

🔴  जब सब लोग चले गए तो कौआ उसके पास जाकर बोला –“मित्र, तुम तो अति सुन्दर हो। कितने सारे लोग तुम्हे देखने के लिए इकट्ठे होते है! प्रतिदिन तुम्हे देखने के लिए हजारो लोग आते है! जब कि मुझे देखते ही लोग मुझे उड़ा देते है। मुझे लगता है कि अपने इस ग्रह पर तो तुम ही सभी पक्षिओ में सबसे सुखी हो।”

🔵 मोर ने गहरी सांस लेते हुए कहाँ – “मैं हमेशा सोचता था कि ‘मैं इस पृथ्वी पर अतिसुन्दर हूँ, मैं ही अतिसुखी हूँ।’ परन्तु मेरे सौन्दर्य के कारण ही मैं यहाँ पिंजरे में बंद हूँ। मैंने सारे प्राणी में गौर से देखे तो मैं समझा कि ‘कौआ ही ऐसा पक्षी है जिसे पिंजरे में बंद नहीं किया जाता।’  मुझे तो लगता है कि काश मैं भी तुम्हारी तरह एक कौआ होता तो स्वतंत्रता से सभी जगह घूमता-उड़ता, सुखी रहता !”

🔴  मित्रों, यही तो है हमारी समस्या। हम अनावश्यक ही दूसरों से अपनी तुलना किया करते है और दुखी-उदास बनते है। हम कभी हमें जो मिला होता है उसकी कद्र नहीं करते इसीके कारण दुःख के विषचक्र में फंसे रहेते है। 
🔵 प्रत्येक दिन को भगवान की भेट समझ कर आनंद से जीना चाहिए। सुखी होना तो सब चाहते है लेकिन सुखी रहेने के लिए सुख की चाबी हाथ करनी होगी तथा दूसरों से तुलना करना छोड़ना होगा। क्योंकि तुलना करना दुःख को न्योता देने के सामान है।

गुरुवार, 22 जून 2017

👉 दूसरों के दोष ही गिनने से क्या लाभ (अंतिम भाग)

🔵 अतएव हमें महात्मा कबीरदास की नम्रतापूर्ण उक्ति को सदा ध्यान में रखना चाहिए।

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न दीखा कोय।
जो दिल खोजा आपना, मुझ सा बुरा न होय॥


🔴 दूसरों के व्यक्तिगत दोषों के प्रति हमारा क्या रुख होना चाहिए इसका विवेचन करते हुए महात्मा तुलसी दास लिखते हैं कि “साधुओं का चरित्र कपास जैसा निर्मल और शुभ्र होता है, उसका फल परम गुणमय होता है और वह स्वयं दुख सहकर दूसरों के पाप रूपी छिद्रों को ढकता है। इसी गुण के कारण वह संसार में वन्दनीय है। अतएव यदि हमें भी इस शुभ्र कपास जैसा वन्दनीय होना है तो हमें दूसरों की व्यक्तिगत भूलों के प्रति बड़ा सहृदय होना चाहिए। सहृदय होने पर ही, हम किसी व्यक्ति के हृदय में स्थान पा सकते हैं। तभी वह हमें अपना हितेच्छु जानकर हम पर अपने हृदय का भेद प्रकट कर सकता है और तभी हम उसके मन की गाँठें खोलने में उसकी सहायता कर उसका सच्चा सुधार कर सकते हैं।

🔵 हमें किसी व्यक्ति के व्यक्तिगत दोषों के लिए जितना सहृदय होना है उतना ही हमें सामाजिक अपराध करने वालों के प्रति निर्मम होना पड़ेगा। सामाजिक अपराध करने वालों के उन अपराधों को हजार कान और आँखों से हमें सुनना और देखना पड़ेगा और उन्हें उनका दण्ड दिलवाना होगा।

🌹 समाप्त
🌹 अखण्ड ज्योति-अप्रैल 1949 पृष्ठ 18
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1949/April/v1.18

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 119)

🌹  हमारी प्रत्यक्ष सिद्धियाँ
🔵 साधना से सिद्धि का तात्पर्य उन विशिष्ट कार्यों से है, जो लोक-मंगल से सम्बन्धित होते हैं और इतने बड़े भारी तथा व्यापक होते हैं, जिन्हें कोई एकाकी संकल्प या प्रयास के बल पर नहीं कर सकता फिर भी वे उसे करने का दुस्साहस करते हैं और आगे बढ़ने का कदम उठाते हैं और अंततः असम्भव लगने वाले कार्य को भी सम्भव कर दिखाते हैं। समयानुसार जन सहयोग उन्हें भी मिलता रहता है। जब सृष्टि नियमों के अनुसार हर वर्ग के मनस्वी को सहयोग मिलते रहते हैं तब कोई कारण नहीं कि श्रेष्ठ कामों पर वह हर विधान लागू न होता हो। प्रश्न एक ही है अध्यात्मवादी साधनों और सहयोगों के अभाव में भी कदम बढ़ाते हैं और आत्मविश्वास तथा ईश्वर-विश्वास के सहारे नाव खेकर पार जाने का भरोसा रखते हैं। सामान्यजनों की मनःस्थिति ऐसी नहीं होती। वे सामने साधन सहयोग की व्यवस्था देख लेते हैं तभी हाथ डालते हैं।

🔴 साधनारत सिद्ध पुरुषों द्वारा महान् कार्य सम्पन्न होते रहे हैं। यही उनका सिद्ध चमत्कार है। देश में स्वतंत्रता आंदोलन आरम्भ कराने के लिए समर्थ गुरु रामदास एक मराठा बालक को आगे करके जुट गए और उसे आश्चर्यजनक सीमा तक बढ़ाकर रहे। बुद्ध ने संव्याप्त भ्रष्टाचार के विरुद्ध विश्वव्यापी बुद्धवादी आंदोलन चलाया। और उसे समूचे संसार तक विशेषतया एशिया के कोन-कोने में पहुँचाया। गाँधी ने सत्याग्रह आंदोलन छेड़ा। मुट्ठी भर लोगों के साथ धरसना में नमक बनाने के साथ शुरू किया। अंततः इसका कैसा विस्तार और कैसा परिणाम हुआ, यह सर्वविदित है।

🔵 विनोबा द्वारा एकाकी आरम्भ किया गया भूदान आंदोलन कितना व्यापक और सफल हुआ। यह किसी से छिपा नहीं है। स्काउटिंग, रेडक्रास आदि कितने ही आंदोलन छोटे रूप में आरम्भ हुए और वे कहीं से कहीं जा पहुँचे। राजस्थान का वनस्थली बालिका विद्यालय, बालासाहब आम्टे का अपंग एवं कुष्ठ रोगी सेवा सदन ऐसे ही दृश्य मान कृत्य हैं, जिन्हें साधना से सिद्धि का प्रत्यक्ष प्रमाण कहा जा सके। ऐसी अगणित घटनाएँ संसार में सम्पन्न हुई हैं, जिनमें आरम्भ कर्त्ताओं का कौशल, साधन एवं सहयोग नगण्य था, पर आत्मबल असीम था। इतने भर से गाड़ी चल पड़ी और जहाँ-तहाँ से तेल-पानी प्राप्त करती हुई क्रमशः पूर्व से अगली मंजिल तक जा पहुँची। सदुद्देश्यों की ऐसी पूर्ति के पीछे साधना से सिद्धि की झाँकी देखी जा सकती है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/hari/hamari

👉 आज का सद्चिंतन 23 June 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 23 June 2017


👉 जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि



🔵 एक बार राजा भोज की सभा में एक व्यापारी ने प्रवेश किया। राजा भोज की दृष्टि उस पर पड़ी तो उसे देखते ही अचानक उनके मन में विचार आया कि कुछ ऐसा किया जाए ताकि इस व्यापारी की सारी संपत्ति छीनकर राजकोष में जमा कर दी जाए। व्यापारी जब तक वहां रहा भोज का मन रह रहकर उसकी संपत्ति को हड़प लेने का करता। कुछ देर बाद व्यापारी चला गया। उसके जाने के बाद राजा को अपने राज्य के ही एक निवासी के लिए आए ऐसे विचारों के लिए बड़ा खेद होने लगा।

🔴 राजा भोज ने सोचा कि मैं तो प्रजा के साथ न्यायप्रिय रहता हूं। आज मेरे मन में ऐसा कलुषित विचार क्यों आया? उन्होंने अपने मंत्री से सारी बात बताकर समाधान पूछा। मन्त्री ने कहा- इसका उत्तर देने के लिए आप मुझे कुछ समय दें। राजा मान गए।

🔵 मंत्री विलक्षण बुद्धि का था। वह इधर-उधर के सोच-विचार में समय न खोकर सीधा व्यापारी से मैत्री गाँठने पहुंचा। व्यापारी से मित्रता करने के बाद उसने पूछा- मित्र तुम चिन्तित क्यों हो? भारी मुनाफे वाले चन्दन का व्यापार करते हो, फिर चिंता कैसी?

🔴 व्यापारी बोला- मेरे पास उत्तम कोटि के चंदन का बड़ा भंडार जमा हो गया है। चंदन से भरी गाडियां लेकर अनेक शहरों के चक्कर लगाए पर नहीं बिक रहा है। बहुत धन इसमें फंसा पडा है। अब नुकसान से बचने का कोई उपाय नहीं है।

🔵 व्यापारी की बातें सुनकर मंत्री ने पूछा- क्या हानि से बचने का कोई उपाय नहीं? व्यापारी हंसकर कहने लगा- अगर राजा भोज की मृत्यु हो जाए तो उनके दाह-संस्कार के लिए सारा चन्दन बिक सकता है। अब तो यही अंतिम मार्ग दिखता है।

🔴 व्यापारी की इस बात से मंत्री को राजा के उस प्रश्न का उत्तर मिल चुका था जो उन्होंने व्यापारी के संदर्भ में पूछा था। मंत्री ने कहा- तुम आज से प्रतिदिन राजा का भोजन पकाने के लिए चालीस किलो चन्दन राजरसोई भेज दिया करो। पैसे उसी समय मिल जाएंगे।

🔵 व्यापारी यह सुनकर बड़ा खुश हुआ। प्रतिदिन और नकद चंदन बिक्री से तो उसकी समस्या ही दूर हो जाने वाली थी। वह मन ही मन राजा के दीर्घायु होने की कामना करने लगा ताकि राजा की रसोई के लिए चंदन लंबे समय तक बेचता रहे।

🔴 एक दिन राजा अपनी सभा में बैठे थे। वह व्यापारी दोबारा राजा के दर्शनों को वहां आया। उसे देखकर राजा के मन में विचार आया कि यह कितना आकर्षक व्यक्ति है। इसे कुछ पुरस्कार स्वरूप अवश्य दिया जाना चाहिए।

🔵 राजा ने मंत्री से कहा- यह व्यापारी पहली बार आया था तो उस दिन मेरे मन में कुछ बुरे भाव आए थे और मैंने तुमसे प्रश्न किया था। आज इसे देखकर मेरे मन के भाव बदल गए। इसे दूसरी बार देखकर मेरे मन में इतना परिवर्तन कैसे हो गया?

🔴 मन्त्री ने उत्तर देते हुए कहा- महाराज! मैं आपके दोनों ही प्रश्नों का उत्तर आज दे रहा हूं। यह जब पहली बार आया था तब यह आपकी मृत्यु की कामना रखता था। अब यह आपके लंबे जीवन की कामना करता रहता है। इसलिए आपके मन में इसके प्रति दो तरह की भावनाओं ने जन्म लिया है। जैसी भावना अपनी होती है, वैसा ही प्रतिबिम्ब दूसरे के मन पर पडने लगता है।

🔵 दोस्तों, यह एक मनोवैज्ञानिक सत्य है। हम किसी व्यक्ति का मूल्यांकन कर रहे होते हैं तो उसके मन में उपजते भावों का उस मूल्यांकन पर गहरा प्रभाव पड़ता है। इसलिए जब भी किसी से मिलें तो एक सकारात्मक सोच के साथ ही मिलें। ताकि आपके शरीर से सकारात्मक ऊर्जा निकले और वह व्यक्ति उस सकारात्मक ऊर्जा से प्रभावित होकर आसानी से आप के पक्ष में विचार करने के लिए प्रेरित हो सके क्योंकि जैसी दृष्टि होगी, वैसी सृष्टि होगी।

👉 आप किसी से ईर्ष्या मत कीजिए। (भाग 3)

🔵 ईर्ष्या द्वारा हम मन ही मन दूसरे की उन्नति देखकर मानसिक दुःख का अनुभव किया करते हैं। अमुक मनुष्य ऊँचा उठता जा रहा है। हम यों ही पड़े हैं, उन्नति नहीं कर पा रहे हैं। फिर वह भी क्यों इस प्रकार उन्नति करे। उसका कुछ बुरा होना चाहिए। उसे कोई दुःख, रोग, शोक, कठिनाई, अवश्य पड़नी चाहिए। उसकी बुराई हमें करनी चाहिये। यह करने से उसे अमुक प्रकार से चोट लगेगी। इस प्रकार की विचारधारा से ईर्ष्या निरन्तर मन को क्षति पहुँचाती है। शुभ विचार करते, सद्प्रवृत्तियों तथा प्राणशक्ति का क्रमिक ह्रास होने लगता है।

🔴 ईर्ष्या से उन्मत्त हो मनुष्य धर्म, नीति, तथा विवेक का मार्ग त्याग देता है। उन्मादावस्था ही उसकी साधारण अवस्था हो जाती है और दूसरे लोगों की उन्माद और साधारण अवस्था उसे अपवाद के सदृश्य प्रतीत होती है। मस्तिष्क के ईर्ष्या नामक विकार से नाना प्रकार की विकृत मानसिक अवस्थाओं की उत्पत्ति होती है। भय, घबराहट, भ्रम ये सब मनुष्य की ईर्ष्या और विवेक बुद्धि के संघर्ष से उत्पन्न होते हैं।

🔵 प्रत्येक क्रिया से प्रतिक्रिया की उत्पत्ति होती है। ईर्ष्या की क्रिया से मन में तथा बाह्य वातावरण में जो प्रतिक्रिया उत्पन्न होती है, वे विषैली हैं। आपकी अपवित्र भावनाएं इर्द-गिर्द के वातावरण को दूषित कर देती हैं। वातावरण विषैला होने से समाज का अपकार होता है। जो ईर्ष्या की भावनाएँ आपने दूसरों के विषय में निर्धारित की है, संभव है, दूसरे भी प्रतिक्रिया स्वरूप वैसी ही धारणाएं आपके लिए मन में लायें।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 अखण्ड ज्योति- जून 1949 पृष्ठ 20

👉 आत्मचिंतन के क्षण 23 June

🔴 सामाजिक ढर्रे जब बहुत पुराने हो जाते हैं, तब उनमें जीर्णता और कुरूपता उत्पन्न हो जाना स्वाभाविक है। इसे सुधारा और बदला जाना चाहिए। समय की प्रगति से जो पिछड़ जाते हैं, समय उन्हें कुचलते हुए आगे बढ़ जाता है। ऋतु परिवर्तन के साथ आहार-विहार की नीति भी बदलनी पड़ती है। युग की माँग और स्थिति को देखकर हमें सोचना चाहिए कि वर्तमान की आवश्यकताएँ हमें क्या सोचने और करने के लिए विवश कर रही हैं। विचारशीलता की यही माँग है कि आज की समस्याओं को समझा जाय और सामयिक साधनों से उन्हें सुलझाने का प्रयत्न किया जाय।

🔵 उपासना का आरम्भ कहाँ से किया जाय? इसका उदाहरण किसी स्कूल में जाकर देखा जा सकता है। वहाँ नये छात्रों का वर्णमाला, गिनती, सही उच्चारण, सही लेखन आदि से शिक्षण आरम्भ किया जाता है और पीछे प्रगति के अनुसार ऊँची कक्षाओं में चढ़ाया जाता है। स्नातक बनने के उपरान्त ही अफसर बनने की प्रतियोगिता में प्रवेश मिलता है और जो उस कसौटी पर खरे उतरते हैं उन्हें प्रतिभा के अनुरूप ऊँचे दर्जे के दायित्व सौंपे जाते हैं।
                                              
🔴 अध्यात्म क्षेत्र में प्रवेश करने वाले को व्रतशीलता की दीक्षा लेनी पड़ती है। व्रत का अर्थ मात्र आहार क्रम में न्यूनता लाना नहीं है वरन् यह भी है कि सत्प्रवृत्तियों को अपनाने के लिए संकल्पवान होना, औचित्य को अपनाये रहने में किसी दबाव या प्रलोभन से अपने को डगमगाने न देना। श्रेष्ठता के मार्ग से किसी भी कारण विचलित न होना। जो दृढ़तापूर्वक ऐसी व्रतशीलता का निर्वाह करते हैं उन्हें अपने चारों ओर ईश्वर की सत्ता ज्ञान चक्षुओं से विद्यमान दीख पड़ती है। उन्हें किसी शरीरधारी की छवि चर्म चक्षुओं से देखने में न वास्तविकता प्रतीत होती है न आवश्यकता।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 इस धरा का पवित्र श्रृंगार है नारी (भाग 4)

🔴 नारी को अर्धांगिनी ही नहीं सह-धारिणी भी कहा गया है। पुरुष का कोई भी धर्मानुष्ठान पत्नी के बिना पूरा नहीं होता। बड़े-बड़े राजसूय तथा अश्वमेध यज्ञों में भी यजमानों को अपनी पत्नी के साथ ही बैठना पड़ता था और आज भी षोडश संस्कारों से लेकर तीर्थ स्नान तक का महत्व तभी पूरा होता है जब गृहस्थ पत्नी को साथ लेकर पूरा करता है। किसी भी गृहस्थ का सामान्य दशा में अकेले धर्मानुष्ठान करने का निषेध हैं इतना ही नहीं भारतीय धर्म में तो नारी को और भी अधिक महत्व दिया गया है।

🔵 ब्रह्मा, विष्णु, महेश जैसे देवताओं का क्रिया-कलाप भी उनकी सह-धर्मियों, सरस्वती, लक्ष्मी तथा पार्वती के बिना पूरा नहीं होता। कहीं किसी स्थान पर भी यह अपनी शक्तियों से रहित नहीं पायें जाते। विद्या, वैभव तथा वीरता की अधिष्ठात्री देवियों के रूप में भी नारी की प्रतिष्ठा व्यक्त की गई है और उसे शारदा, श्री दुर्गा शक्ति के नामों से पुकारा गया है।

🔴 नारियों की धार्मिक, सामाजिक तथा राष्ट्रीय सेवाओं के लिये इतिहास साक्षी है। जिससे पता चल सकता है नारी पुरुष से किसी क्षेत्र में पीछे नहीं हैं अनसूया, गार्गी, मैत्रेयी, शतरूपा अहिल्या, मदालसा आदि धार्मिक सीता, सावित्री, दमयंती तथा पद्मावती वीरबाला वीरमती, लक्ष्मीबाई व निवेदिता कस्तूरबा प्रभृति नारियाँ राष्ट्रीय व सामाजिक क्षेत्र की प्रकाशवती तारिका है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 अखण्ड ज्योति- अगस्त 1995 पृष्ठ 25
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1995/August/v1.25

👉 कायाकल्प का मर्म और दर्शन (भाग 6)

🔴 यह मानकर चलिए कि आप दान देने में समर्थ हैं और आप देंगे, किसी-न को, कुछ-न देंगे। अपनी धर्मपत्नी को कुछ-न जरूर देंगे आप। उसकी योग्यता कम है, तो योग्यता बढ़ाइए। उसका स्वास्थ्य कमजोर है, तो स्वास्थ्य बढ़ाइए न। आप उसकी उन्नति का रास्ता नहीं खोलेंगे? उसके सम्मान को नहीं बढ़ाएँगे? उसके भविष्य को नहीं बढ़ाएँगे? आप ऐसा कीजिए फिर देखिए आप दानी हो जाते हैं कि नहीं।

🔵  आप भिखारी रहेंगे, तो उससे काम-वासना की बात करते रहेंगे, मीठे वचनों की बात करते रहेंगे, सहयोग की माँग करते रहेंगे, माँगते-ही रहेंगे। फिर आप हैरान होंगे और दूसरों की नजरों में हेय कहलाएँगे। फिर माँगने से मिल ही जाएगा, इसका क्या गारण्टी? गारण्टी भी नहीं है, मिलने की संभावना भी नहीं है, फिर आप ऐसी निराशा में क्यों बेवजह पापड़ बेलें। आप ऐसा क्यों नहीं कर सकते कि देने की ही बात विचार करें। देने में आप पूरी तरह समर्थ हैं। आप सद्भावनाएँ दे सकते हैं, सेवा के लिए कहीं-न से समय निकाल सकते हैं, इसी प्रकार बहुत कुछ दे सकते हैं।

🔴 आप ऐसा कीजिए, यहाँ से दानी बनकर जाइए और अपने याचक के चोले को यहीं हमारे सिर पर पटक के चले जाइए। आप अपनी मालिकी को खत्म करके सिर्फ माली होकर ही यहाँ से जाइए। अब आप मालिक होकर मत जाना। मालिक होकर चलेंगे, तब बहुत हैरान हो जाएँगे। यकीन रखिये मालिक को इतनी हैरानी, इतनी चिन्ता रहती है, जिसका कि कोई ठिकाना नहीं; लेकिन माली? माली को सारे बगीचे में खूब मेहनत करनी पड़ती है; दिन में भी मेहनत करता है, रात में भी मेहनत करता है और हैरानी का नाम नहीं। क्यों? क्योंकि वह समझता है कि यह बगीचा किसी और का है, मालिक का है और हमारा फर्ज, हमारी ड्यूटी यह है कि इन पेड़ों को अच्छे-से रखें और वह अच्छे-से रखता है, सिंचाई करता है, गुड़ाई करता है, निराई करता है, जो भी बेचारा कर सकता है, करता है।

🔵 आप सिर्फ अपने कर्तव्य और फर्ज तक अपना रिश्ता रखिए, आप इस बात के परिणामों के बारे में विचार करना बन्द कर दीजिए; क्योंकि परिणाम के बारे में कोई गारण्टी नहीं हो सकती। आप जैसा चाहते हैं, वैसी परिस्थितियाँ मिल जाएँ, इस बात की कोई गारण्टी नहीं, बिल्कुल गारण्टी नहीं। नहीं, हम मेहनत करेंगे। मेहनत पर भी कोई गारण्टी नहीं। आप इम्तहान में पास हो जाएँगे, कोई जरूरी नहीं है। आप मेहनती लड़के हैं, तो भी हो सकता है फेल हो जाएँ। आप व्यापार करने में कुशल आदमी हैं, तब भी यह हो सकता है कि कुछ महँगाई सस्ते की वजह से आपको नुकसान हो जाए। आप बहुत चौकस आदमी हैं; लेकिन फिर भी हो सकता है कि आपको बीमारी दबोच ले, चोर-उठाईगीर आपका नुकसान कर दें, आप किसी जंजाल में फँस जाएँ और अपनी अमीरी गँवा बैठें। यह सब हो सकता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://awgpskj.blogspot.in/2017/06/5.html

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 18)

🌹  इंद्रिय संयम, अर्थ संयम, समय संयम और विचार संयम का सतत अभ्यास करेंगे।

🔴 विचारों को आवारा कुत्तों की तरह अचिंत्य चिंतन में भटकने न देने का नित्य अभ्यास करना चाहिए। विचारों को हर समय उपयोगी दिशाधारा के साथ नियोजित करके रखना चाहिए। अनगढ़, अनुपयुक्त, निरर्थक विचारों से जूझने के लिए सद्विचारों की सेना को पहले से ही तैयार रखना चाहिए। अचिंत्य चिंतन उठते ही जूझ पड़ें और उन्हें निरस्त करके भगा दें। चिड़िया घर में बड़ा होता है, उसमें पशु- पक्षियों का घूमने- फिरने की आजादी होती है, पर बाहर जाने नहीं दिया जाता, ठीक यही नीति विचार वैभव के बारे में भी बरती जाए, उन्हें जहाँ- तहाँ बिखरने न दिया जाए।
  
🔵 परिश्रम एवं मनोयोग का प्रत्यक्ष फल धन है। भौतिक एवं आत्मिक दोनों क्षेत्रों में व्यक्ति को अपव्यय की छूट नहीं है। पैसा चाहे अपना हो या पराया, मेहनत से कमाया गया हो या मुफ्त में मिला हो, उसे हर हालत में जीवनोपयोगी, समाजोपयोगी सामर्थ्य मानना चाहिए। श्रम, समय एवं मनोयोग मात्र सत्प्रयोजनों हेतु ही व्यय करना चाहिए। श्रम, समय एवं मनोयोग तीन संपदाएँ भगवत् प्रदत्त हैं। अतः धन को काल देवता एवं श्रम देवता का सम्मिलित अनुदान मानना चाहिए। जैसी दूरदर्शिता समय और विचार के अपव्यय के लिए बरतने की है, वैसी ही धन पर भी लागू होती है।
 
🔴 बचाया धन परमार्थ में ही लगाना ठीक रहता है। बुद्धिमानी इसी में है कि जितना भी कमाया जाए, उसका अनावश्यक संचय अथवा अपव्यय न हो। जो कमाए हुए धन का सदाशयता में उपयोग नहीं करता, वह घर में दुष्प्रवृत्तियों को आमंत्रित करता है। लक्ष्मी उसी घर में फलती- फूलती है, जहाँ उसका सदुपयोग होता है। आडम्बरयुक्त विवाह, प्रदर्शन, फैशन परस्ती में अनावश्यक खर्च करने से उपार्जन का सही उपयोग नहीं होता। यहीं से सामाजिक अपराधों को बढ़ावा मिलता है। पारिवारिक कलह, मुकदमेबाजी आदि भी इन्हीं कारणों से उपजती है। समुद्र संचय नहीं करता, मेघ बनकर बरस जाता है, तो बदले में नदियाँ दूना जल लेकर लौटती हैं। यदि वह भी कृपण हो, संचय करने लगता, तो नदियाँ सूख जातीं, अकाल छा जाता और यदि अत्यधिक उदार हो घनघोर बरसने लगता तो अतिवृष्टि की विभीषिका आ जाती। अतः समन्वित नीति ही ठीक है।
  
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.26

👉 आप किसी से ईर्ष्या मत कीजिए। (भाग 2)

🔵 श्री रामचन्द्र शुक्र ने लिखा है- ‘स्पर्धा में दुःख का विषय होता है ‘मैंने उन्नति क्यों नहीं की? और ईर्ष्या में दुःख का विषय होता है- ‘उसने उन्नति क्यों की? स्पर्धा संसार में गुणी, प्रतिष्ठित और सुखी लोगों की संख्या में कुछ बढ़ती करना चाहती है, और ईर्ष्या कमी।

🔴 स्पर्धा व्यक्ति विशेष से होती है। ईर्ष्या उन्हीं-उन्हीं से होती है जिनके विषय में यह धारणा होती है। कि लोगों की दृष्टि हमारे हाथ उन पर अवश्य पड़ेगी या पड़ती होगी। ईर्ष्या के संचार के लिए पात्र के अतिरिक्त समान की भी आवश्यकता है। समाज में उच्च स्थिति, दूसरों के सन्मुख अपनी नाक ऊँची रखने के लिये ईर्ष्या का जन्म होता है। हमारे पास देखकर भी हम मनोविकार का संचार हो जाता है।

🔵 ईर्ष्या में क्रोध का भाव किसी न किसी प्रकार मिश्रित रहता है। ईर्ष्या के लिए भी कहा जाता है कि “अमुक व्यक्ति ईर्ष्या से जल रहा है।” साहित्य में ईर्ष्या को संचारी के रूप में समय-समय पर व्यक्त किया जाता है। पर क्रोध बिल्कुल जड़ क्रोध है। जिसके प्रति हम क्रोध करते हैं, उसके मानसिक उद्देश्य पर ध्यान नहीं देते। असम्पन्न ईर्ष्या वाला केवल अपने को नीचा समझे जाने से बचने के लिए आकुल रहता है। धनी व्यक्ति दूसरे को नीचा देखना चाहता है।

🔴 ईर्ष्या दूसरे की असंपन्नता की इच्छा की आपूर्ति से उत्पन्न होती है। यह अभिमान को जन्म देगी, अहंकार की अभिवृद्धि करेगी, और कुढ़न का ताना-बाना बुनेगी। अहंकार से आदत होकर हम दूसरे की भलाई न देख सकेंगे। अभिमान में मनुष्य को अपनी कमजोरियाँ नहीं दीखतीं। अभिमान का कारण अपने विषय में बहुत ऊँची मान्यता धारण कर लेना है। ईर्ष्या उसी की सहगामिनी है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 अखण्ड ज्योति- जून 1949 पृष्ठ 19
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1949/June/v1.19

👉 आज का सद्चिंतन 22 June 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 22 June 2017



👉 पोस्टमैन

🔴 एक पोस्टमैन ने एक घर के दरवाजे पर दस्तक देते हुए कहा,"चिट्ठी ले लीजिये।" अंदर से एक बालिका की आवाज आई,"आ रही हूँ।" लेकिन तीन-चार मिनट तक कोई न आया तो पोस्टमैन ने फिर कहा,"अरे भाई! मकान में कोई है क्या, अपनी चिट्ठी ले लो।

🔵 "लड़की की फिर आवाज आई,"पोस्टमैन साहब, दरवाजे के नीचे से चिट्ठी अंदर डाल दीजिए, मैं आ रही हूँ। "पोस्टमैन ने कहा,"नहीं, मैं खड़ा हूँ, रजिस्टर्ड चिट्ठी है, पावती पर तुम्हारे साइन चाहिये।" करीबन छह-सात मिनट बाद दरवाजा खुला। पोस्टमैन इस देरी के लिए झल्लाया हुआ तो था ही और उस पर चिल्लाने वाला था ही, लेकिन दरवाजा खुलते ही वह चौंक गया, सामने एक अपाहिज कन्या जिसके पांव नहीं थे, सामने खड़ी थी।

🔴  पोस्टमैन चुपचाप पत्र देकर और उसके साइन लेकर चला गया। हफ़्ते, दो हफ़्ते में जब कभी उस लड़की के लिए डाक आती, पोस्टमैन एक आवाज देता और जब तक वह कन्या न आती तब तक खड़ा रहता। एक दिन उसने पोस्टमैन को नंगे पाँव देखा। दीपावली नजदीक आ रही थी। उसने सोचा पोस्टमैन को क्या ईनाम दूँ।

🔵 एक दिन जब पोस्टमैन डाक देकर चला गया, तब उस लड़की ने, जहां मिट्टी में पोस्टमैन के पाँव के निशान बने थे, उन पर काग़ज़ रख कर उन पाँवों का चित्र उतार लिया। अगले दिन उसने अपने यहाँ काम करने वाली बाई से उस नाप के जूते मंगवा लिये। दीपावली आई और उसके अगले दिन पोस्टमैन ने गली के सब लोगों से तो ईनाम माँगा और सोचा कि अब इस बिटिया से क्या इनाम लेना? पर गली में आया हूँ तो उससे मिल ही लूँ।

🔴  उसने दरवाजा खटखटाया। अंदर से आवाज आई,"कौन? "पोस्टमैन, उत्तर मिला। बालिका हाथ में एक गिफ्ट पैक लेकर आई और कहा,"अंकल, मेरी तरफ से दीपावली पर आपको यह भेंट है। "पोस्टमैन ने कहा,"तुम तो मेरे लिए बेटी के समान हो, तुमसे मैं गिफ्ट कैसे लूँ?" कन्या ने आग्रह किया कि मेरी इस गिफ्ट के लिए मना नहीं करें। "ठीक है कहते हुए पोस्टमैन ने पैकेट ले लिया।

🔵 बालिका ने कहा,"अंकल इस पैकेट को घर ले जाकर खोलना। घर जाकर जब उसने पैकेट खोला तो विस्मित रह गया, क्योंकि उसमें एक जोड़ी जूते थे। उसकी आँखें भर आई। अगले दिन वह ऑफिस पहुंचा और पोस्टमास्टर से फरियाद की कि उसका तबादला फ़ौरन कर दिया जाए। पोस्टमास्टर ने कारण पूछा,तो पोस्टमैन ने वे जूते टेबल पर रखते हुए सारी कहानी सुनाई और भीगी आँखों और रुंधे कंठ से कहा,"आज के बाद मैं उस गली में नहीं जा सकूँगा। उस अपाहिज बच्ची ने तो मेरे नंगे पाँवों को तो जूते दे दिये पर मैं उसे पाँव कैसे दे पाऊँगा?"

🔴  संवेदनशीलता का यह श्रेष्ठ दृष्टांत है। संवेदनशीलता यानि, दूसरों के दुःख-दर्द को समझना, अनुभव करना और उसके दुःख-दर्द में भागीदारी करना, उसमें शरीक होना। यह ऐसा मानवीय गुण है जिसके बिना इंसान अधूरा है।

🔵 ईश्वर से प्रार्थना है कि वह हमें संवेदनशीलता रूपी आभूषण प्रदान करें ताकि हम दूसरों के दुःख-दर्द को कम करने में योगदान कर सकें। संकट की घड़ी में कोई यह नहीं समझे कि वह अकेला है, अपितु उसे महसूस हो कि सारी मानवता उसके साथ है।

मंगलवार, 20 जून 2017

👉 दूसरों के दोष ही गिनने से क्या लाभ (भाग 2)

🔵 भविष्य में क्या होगा यह तो ठीक-ठीक नहीं जाना जा सकता पर यह तो बिल्कुल सही है कि जो दूसरों के ऐब देखता है वह अपना मिथ्या अहंकार बढ़ाता है और उसके स्वभाव में क्रोध और घृणा की वृद्धि होती है। वह दूसरों के सम्बन्ध में अहंकार पूर्ण धारणाएं बनाता है और अपने आपको सबसे अच्छा समझने लगता है। वह अपनी बुराइयों की ओर से अन्धा हो जाता है और उसमें एक तरह का छिछोरापन या चुगली खाने की आदत आ जाती है।

🔴 एक बार महात्मा ईसा के पास कुछ लोग एक स्त्री को लेकर आये और कहने लगे कि प्रभु इसने व्यभिचार किया है इसे पत्थर मार-मार कर मार डालना चाहिए। महात्मा ईसा ने कहा है कि अच्छी बात है पर इसे वह पत्थर मारे जिसने एक भी पाप न किया हो। उस स्त्री को मारने की किसी की हिम्मत न पड़ी और सब लोग एक-एक करके चुपचाप वहाँ से खिसक गए। तब महात्मा ईसा ने उस स्त्री से दयापूर्वक कहा कि अब आगे ऐसा न करना। अपने प्राण-रक्षक के इन शब्दों का इस स्त्री पर इतना प्रभाव हुआ कि वह स्त्री एक साध्वी महिला बन गई।

🔵 सच है हमारे ऐब देखने वाले हमारे चरित्र को उतना नहीं सुधार सकते जितना कि हम पर दया और सहानुभूति रखने वाले। महात्मा ईसा ने उस समय यह भी बतला दिया कि कोई भी मनुष्य इतना पवित्र नहीं हो सकता कि वह दूसरों के व्यक्तिगत पापों पर निगाह डाले और उनके लिए उसे स्वयं दंड दे। केवल एक परमात्मा ही पूर्ण है और वही हमें हमारे व्यक्तिगत पापों के लिए दण्ड दे सकता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 अखण्ड ज्योति-अप्रैल 1949 पृष्ठ 18
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1949/April/v1.18

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 118)

🌹  हमारी प्रत्यक्ष सिद्धियाँ

🔵 सम्पदा एकत्रित होती है, तो उसका प्रभाव परिलक्षित होता है। शरीर से स्वस्थ मनुष्य बलिष्ठ और सुंदर दीखता है। सम्पदा वालों के ठाठ-बाठ बढ़ जाते हैं। बुद्धिमानों का वैभव वाणी, रहन-सहन में दिखाई पड़ता है। ठीक इसी प्रकार आध्यात्मिक सम्पदा बढ़ने पर उसका प्रभाव भी स्पष्ट उदीयमान होता है दृष्टिगोचर होता है। साधना से सिद्धि का अर्थ होता है, असाधारण सफलताएँ। साधारण सफलताएँ तो सामान्य जन भी अपने पुरुषार्थ और साधनों के सहारे प्राप्त करते रहते हैं और कई तरह की सफलताएँ अर्जित करते रहते हैं। अध्यात्म क्षेत्र बड़ा और ऊँचा है, इसलिए उसकी सिद्धियाँ भी ऐसी होनी चाहिए जिन्हें सामान्यजनों के एकाकी प्रयास से न बन पड़ने वाली, अधिक ऊँचे स्तर की मानी जा सके।

🔴 इसे दुर्भाग्य ही कहना चाहिए कि आध्यात्मिकता का अवमूल्यन होते-होते वह बाजीगरी स्तर पर पहुँच गई है और सिद्धियों का तात्पर्य लोग किसी ऐसे ही अजूबे से समझने लगे हैं, जो कौतुक-कौतूहल उत्पन्न करता हो। दर्शकों को अचम्भे में डालता हो। भले ही वे अचरज सर्वथा निरर्थक ही क्यों न हो? बालों में से खाल निकाल लेना कोई ऐसा काम नहीं है कि जिसके बिना किसी का काम रुकता हो या फिर किसी का उससे बहुत बड़ा हित होने वाला हो। असाधारण कृत्य, चकाचौंध में डालने वाले करतब ही बाजीगर लोग दिखाते रहते हैं।

🔵 इसी के सहारे वाहवाही लूटते और पैसा कमाते हैं, किन्तु इनके कार्यों में से एक भी ऐसा नहीं होता कि जिससे जन-हित का कोई प्रयोजन पूरा होता हो। कौतूहल दिखाकर अपना बड़प्पन सिद्ध करना उनका उद्देश्य होता है। इसके सहारे वे अपना गुजारा चलाते हैं। सिद्ध पुरुषों में भी कितने ही ऐसे होते हैं, जो ऐसी कुछ हाथों की सफाई दिखाकर अपनी सिद्धियों का विज्ञापन करते रहते हैं। हवा में हाथ मारकर इलायची या मिठाई मँगा देने, नोट दूने कर देने जैसे कृत्यों के बहाने चमत्कृत करके कितने ही भोले लोगों को ठग लिए जाने के समाचार आए दिन सुनने को मिलते रहते हैं। लोगों का बचपना है, जो बाजीगरी-कौतुकी और अध्यात्म क्षेत्र की सिद्धियों का अंतर नहीं कर पाते। बाजीगरों और सिद्ध पुरुषों के जीवन क्रम में स्तर में जो मौलिक अंतर रहता है, उसे पहचानना आवश्यक है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/hari/hamari

👉 आज का सद्चिंतन 21 June 2017


प्रेरणादायक प्रसंग 21 June 2017


👉 "जिम्मेदार कौन"

🔵 बहु को जलाकर मार डालने वाले सास, ससुर और पति को जब पुलिस गिरफ्तार करके ले जाने लगी तो सुबकती हुई छोटी बहन अचानक ही इंस्पेक्टर को रोककर बोली-

🔴 "इन्हें भी गिरफ्तार करिये इंस्पेक्टर साहब। दीदी की मौत के लिए ये लोग भी बराबर के जिम्मेदार हैं।"

🔵 "क्या आपके माँ-बाप?" इंस्पेक्टर ने आश्चर्य से पूछा।

🔴 वहाँ उपस्थित सभी लोग स्तब्ध रह गए एक बेटी का माँ-बाप पर ऐसा आरोप सुनकर।

🔵 "तू पागल हो गयी है क्या? अरे हम खुद उसकी मौत के दुःख में अधमरे हो रहे हैं। भला कोई माँ-बाप अपनी बेटी को कभी मार सकते हैं क्या? हे भगवान" माँ अपना माथा पीटने लगी।

🔴 "दीदी शादी के कुछ समय बाद से ही बराबर आप लोगों को अपनी परेशानी बता रही थी कि उसके ससुराल वाले उसके साथ दुर्व्यवहार कर रहे हैं। जीजा और सास मारपीट करते थे। उसे खाना नहीं देते थे। कितनी मिन्नत करती थी वो आपसे कि मुझे बचा लो इन दरिंदों के हाथ से। ये लोग मुझे मार डालेंगे।" छोटी ने बताया।

🔵 "हम तो उसका घर-परिवार बचाना चाहते थे। कौन माँ-बाप नहीं चाहते कि लड़की अपने घर में सुखी रहे।" पिता ने अपनी दलील दी।

🔴 "सुखी?" छोटी गुस्से से बोली "ये जानने के बाद भी कि उसकी सास और पति की निगाह एक अमीर आदमी की दौलत पर है जो पैसों के बूते पर अपनी बदनाम हो चुकी बेटी की शादी जीजाजी से जल्द से जल्द करवाना चाहता है। और इस लालच में जीजा और उसकी माँ दीदी की जान लेने की पूरी तैयारी में है, क्योंकि तलाक तो आप लेने नहीं देते दीदी को।"

🔵 "हम तो समझौता चाहते थे..." माँ ने कुछ कहना चाहा।

🔴 "अरे दरिंदों से कैसा समझौता माँ। कितना रोयी थी दीदी हाथ जोड़कर आप लोगों के सामने कि माँ एक कोने में इज़्ज़त से पड़े रहने दो बस। अपनी रोटी मैं आप कमा लूँगी। लेकिन आपने कभी समाज की, कभी अपने बुढ़ापे को बदनामी से बचाने की दुहाई देकर दीदी का मुँह बन्द कर दिया हर बार कि शादी के बाद लड़कियां ससुराल में ही अच्छी लगती हैं। काश आप समाज और इज़्ज़त की परवाह करने की जगह अपनी बेटी की परवाह करते।" छोटी हिकारत से बोली। सबको साँप सूंघ गया। इंस्पेक्टर गहरी साँस लेकर रह गया।

🔵 "सच है, बेटियों को मारने में ससुराल वाले जितने जिम्मेदार होते है, उससे अधिक जिम्मेदारी मायके वालों की उपेक्षा और बेटियों के विवाह के बाद, अपने कर्तव्यों की इतिश्री समझकर गंगा नहा लेने वाली मानसिकता की होती है। अगर माँ-बाप बेटियों को घर में बराबर का दर्जा और साथ दें तो ससुराल में वो यूँ बली न चढ़ाई जा सकेंगीं।"

👉 आप किसी से ईर्ष्या मत कीजिए। (भाग 1)

🔵 ईर्ष्या वह आन्तरिक अग्नि है जो अन्दर ही अन्दर दूसरे की उन्नति या बढ़ती देखकर हमें भस्मीभूत किया करती है। दूसरे की भलाई या सुख देखकर मन में जो एक प्रकार की पीड़ा का प्रादुर्भाव होता है, उसे ईर्ष्या कहते हैं।

🔴 ईर्ष्या एक संकर मनोविकार है जिसकी संप्राप्ति आलस्य, अभिमान और नैराश्य के संयोग या जोड़ से होती है। अपने आपको दूसरे से ऊँचा मानने की भावना अर्थात् मनुष्य का ‘अहं’ इसके साथ संयुक्त होता है।

🔵 ईर्ष्या मनुष्य की हीनत्व भावना से संयुक्त है। अपनी हीनत्व भावना ग्रन्थि के कारण हम किसी उद्देश्य या फल के लिए पूरा प्रयत्न तो कर पाते, उसकी उत्तेजित इच्छा करते रहते हैं। हम सोचते हैं-”क्या कहें हमारे पास अमुक वस्तु या चीज होती? हाय! वह चीज उसके पास तो है, हमारे पास नहीं? वह वस्तु यदि हमारे पास नहीं है तो उसके पास भी न रहे।’

🔴 ईर्ष्या व्यक्तिगत होती है। इसमें मनुष्य दूसरे की बुराई अपकर्ष, पतन, बुराई, त्रुटि की भावनाएँ मन में लाता है। स्पर्धा ईर्ष्या की पहली मानसिक अवस्था है। स्पर्धा की अवस्था में किसी सुख, ऐश्वर्य, गुण, या मान से किसी व्यक्ति विशेष को संपन्न देख अपनी त्रुटि पर दुःख होता है, फिर प्राप्ति की एक प्रकार की उद्वेग पूर्ण इच्छा उत्पन्न होती है। स्पर्धा वह वेगपूर्ण इच्छा या उत्तेजना है, जो दूसरे से अपने आपको बढ़ाने में हमें प्रेरणा देती है। स्पर्धा बुरी भावना नहीं। यह वस्तुगत है। इसमें हमें अपनी कमजोरियों पर दुःख होता है। हम आगे बढ़कर अपनी निर्बलता को दूर करना चाहते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 अखण्ड ज्योति- जून 1949 पृष्ठ 19
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1949/June/v1.19

👉 आत्मचिंतन के क्षण 21 June

🔴 आपमें से हर आदमी को हम यह काम सौंपते हैं कि आप हमारे बच्चे के तरीके से हमारे मिशन को चलाइए। बन्द मत होने दीजिए। हम तो अपनी विदाई ले जाएंगे, लेकिन जिम्मेदारी आपके पास आएगी। आप कपूत निकलेंगे तो फिर लोग आपकी बहुत निन्दा करेंगे और हमारी निन्दा करेंगे। कबीर का बच्चा ऐसा हुआ था जो कबीर के रास्ते पर चलता नहीं था तो सारी दुनिया ने उससे यह कहा—‘बूढ़ा वंश कबीर का उपजा पूत कमाल’ आपको कमाल कहा जाएगा और यह कहा जाएगा कि कबीर तो अच्छे आदमी थे, लेकिन उनकी संतानें दो कौड़ी की भी नहीं है।

🔵 परिजनो! आप हमारी वंश परम्परा को जानिए। अगर हमको यह मालूम पड़ा कि आपने हमारी परम्परा नहीं निबाही और अपना व्यक्तिगत ताना-बाना बुनना शुरू कर दिया और अपना व्यक्तिगत अहंकार, अपनी व्यक्तिगत यश-कामना और व्यक्तिगत धन-संग्रह करने का सिलसिला शुरू कर दिया, व्यक्तिगत रूप से बड़ा आदमी बनना शुरू कर दिया, तो हमारी आंखों से आंसू टपकेंगे और वह आंसू आपको चैन से नहीं बैठने देंगे। आपको हैरान कर देंगे।
                                              
🔴 हमारे विचारों को लोगों को पढ़ने दीजिए। जो हमारे विचार पढ़ लेगा, वही हमारा शिष्य है। हमारे विचार बड़े पैने हैं, तीखे हैं। हमारी सारी शक्ति हमारे विचारों में सीमाबद्ध है। दुनिया को हम पलट देने का जो दावा करते हैं, वह सिद्धियों से नहीं, अपने सशक्त विचारों से करते हैं। आप हमारे विचारों को फैलाने में सहायता कीजिए। अब हमको नई पीढ़ी चाहिए। हमारी विचारधारा उन तक पहुंचाइए।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 इस धरा का पवित्र श्रृंगार है नारी (भाग 3)

🔴 पत्नी के रूप में उसका महत्व कुछ कम नहीं हैं नारी पुरुष की अर्धांगिनी हैं पत्नी के बिना पति का व्यक्तित्व पूरा नहीं होता। उसी की महिमा के कारण पुरुष गृहस्थ होने का गौरव पाता है और पत्नी ही वह माध्यम है जिसके द्वारा किसी की वंश परम्परा चलती है। यह पत्नी की ही तो उदारता है कि वह पुरुष के पशुत्व को पुत्र में बदल कर उसका सहारा निर्मित कर देती है। पुरुष के प्यार, स्नेह तथा उन्मुक्त आवेगों को अभिव्यक्त करने में पत्नी का कितना हाथ है इसे सभी जानते है।

🔵 परेशानी, निराशा, आपत्ति अथवा जीवन के निविड़ अंधकार में वह पत्नी के सिवाय कौन है जो अपनी मुस्कानों से उजाला कर दिया करे अपने प्यार तथा स्नेह से हृदय नवजीवन जगाकर आश्वासन प्रदान करती रहे। पत्नी का सहयोग पुरुष के सुख में चार चाँद लगा देता और दुःख में वह उसकी साझीदार बनकर हाथ बँटाया करती हैं दिन भर बाहर काम करके और तरह-तरह के संघर्षों से थककर आने पर भोजन स्नान तथा आराम-विश्राम की व्यवस्था पत्नी के सिवाय और कौन करेगा।

🔴 पुरुष एक उद्योगी उच्छृंखल इकाई है। परिवार बसाकर रहना उसका सहज स्वभाव नहीं हैं यह नारी की ही कोमल कुशलता है जो इसे पारिवारिक बनाकर प्रसन्नता की परिधि में परिभ्रमण करने के लिये लालायित बनाये रखती है। पत्नी ही पुरुष को उद्योग उपलब्धियों की व्यवस्था एवं उपयोगिता प्रदान करती हैं पुरुष पत्नी के कारण ही गृहस्थ तथा प्रसन्न चेता बनकर सामाजिक भद्र जीवन बिताया करता पत्नी रहित पुरुष का समाज में अपेक्षाकृत कम आदर होता है।

🔵 परिवारों में सामाजिकता के आदान-प्रदान उन्हीं के बीच होता हैं पारिवारिकता तथा पत्नी की परिधि पुरुष को अनेक प्रकार की दुष्प्रवृत्तियों से बचाये रहती है। पत्नी के रूप में नारी का यह महत्व कुछ कम नहीं है। यदि आज संसार में नारी का सर्वथा अभाव हो जाये तो कल से ही पुरुष पशु हो उठे, सारी समाज व्यवस्था उच्छृंखल हो उठे, और सृष्टि का व्यवस्थित स्वरूप अस्त-व्यस्त हो जाये।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 अखण्ड ज्योति- अगस्त 1995 पृष्ठ 25
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1995/August/v1.25

👉 कायाकल्प का मर्म और दर्शन (भाग 5)

🔴 बगुले और हंस सफेद होते हैं दोनों; लेकिन प्रकृति में अंतर होता है। आकृति में क्या फरक होता है! आप दूर से फोटो खींच लीजिए, आकृति में थोड़ा-सा ही फर्क दिखाई पड़ेगा। कौए और कोयल की प्रकृति नहीं मिल सकती। कौए और कोयल की प्रकृति तो एक जैसी ही है। आप फोटो खींच लीजिए, दोनों एक-से ही मालूम पड़ेंगे तो फिर कौआ, कोयल कैसे हो जाता है? यहाँ आकृति बदलने की बात नहीं है, प्रकृति बदलने की ओर इशारा है।

🔵 यह कायाकल्प का वर्णन है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने कायाकल्प का वर्णन ऐसे ही रूप में किया है। आपको यहाँ अपना कायाकल्प करने की तैयारी करनी चाहिए। शरीर कल्प नहीं, मनःकल्प। मनःकल्प आप किस तरह करें? इस तरह कीजिए कि आपका क्षुद्रता का दायरा, महानता के दायरे में बदल जाए। आपका दाया बहुत छोटा है। कूपमण्डूक के तरीके से, कुएँ के मेढक के तरीके से पेट भरेंगे, रोटी कमाएँगे, बेटे को खिलाएँगे, बेटी को खिलाएँगे, एक छोटे-से दायरे में गूलर के भुनगे के तरीके से आप भी सारी चीजों को सीमाबद्ध किए हुए हैं। आप असीम बन जाइए। आप महान बन जाइए। आप सीमित रहने से इनकार कर दीजिए।

🔴 आप पिंजड़े के पक्षी की तरह जिंदगी मत व्यतीत कीजिए और आप उड़ने की तैयारी कीजिए। कितना बड़ा आकाश है, इसमें स्वच्छन्द विचरण करने के लिए उमंगें एकत्रित कीजिए और पिंजड़े की कारा में कैद होने से इनकार कर दीजिए। आपको मालूम पड़ता है कि पिंजड़े की कीलियों में हम सुरक्षित हैं, यहाँ हमको चारा, दाना मिल जाता है; लेकिन कभी आपने खुली हवा में साँस ली नहीं है और आपने अपने पंखों के साथ उड़ाने का, आसमान में आनंद लिया नहीं है। आप ऐसा कीजिए, आप यहाँ से अपने आपको बंधन-मुक्त करने की कोशिश कीजिए। आप भव-बंधनों में जकड़े हुए आदमी मत रहिए। आप मुक्त आदमी की तरह विचार कीजिए। आप नर से नारायण बनने की महत्त्वाकांक्षा तैयार कीजिए।

🔵 आप उसी क्षुद्र महत्त्वाकांक्षा में उलझे रहेंगे क्या? कौन-सी? लोकेषणा, वित्तैषणा, पुत्रैषणा। नहीं, आप कुछ और बड़ी महत्त्वाकांक्षा को लाइए। आप पुरुष से पुरुषोत्तम बनिए, आप नर से नारायण बनने की बात विचार कीजिए, आप कामनाओं की आग में जलने की अपेक्षा भावनाओं के स्वर्ग और शांति में प्रवेश कीजिए। कामनाओं में ही लगे रहेंगे क्या? आप माँगते ही रहेंगे क्या? भिखारी ही बने रहेंगे क्या? नहीं, आप भिखारी बनने से इनकार कर दीजिए। अब आप यहाँ से दानी बनकर जाइए। जिंदगी भर आपने अपेक्षाएँ की हैं, इसकी अपेक्षा उसकी अपेक्षा; गणेश जी हमको ये दे देंगे, साँई बाबा ये दे देंगे, औरत हमको यह देगी, बच्चा हमको यह कमाकर देगा; आपका सारा जीवन भिखमंगे की तरह, अपेक्षा करने वालों की तरह व्यतीत हो गया। अब आप कृपा कीजिए और अपना ढर्रा बदल दीजिए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 17)

🌹  इंद्रिय संयम, अर्थ संयम, समय संयम और विचार संयम का सतत अभ्यास करेंगे।

🔴 दस इंद्रियों में दो प्रमुख हैं, जिनमें से एक जिह्वा तथा दूसरी जननेन्द्रिय है। जिसने इनको वश में कर लिया, समझो उसने शारीरिक, मानसिक स्वास्थ्य को प्राप्त कर लिया है। जिह्वा संयम से शारीरिक स्वास्थ्य तथा जननेन्द्रिय के संयम से मनोबल अक्षुण्ण रहता है। जिह्वा का शरीरगत स्वास्थ्य से सीधा संबंध है। जिह्वा स्वाद को प्रधानता देकर ऐसे पदार्थों को खाती रहती है, जो अनावश्यक ही नहीं, हानिकारक भी होते हैं। स्वाद- स्वाद में भोजन की मात्रा बढ़ने से पेट खराब तथा असंख्य रोग हो जाते हैं।
  
🔵 समय संयम में शिथिलता रहने से मनुष्य निश्चित रूप से आलसी और प्रमादी बनता है। नियमितता न रहने से जो किया जाता है, वह आधा- अधूरा रहता है। समय का सदुपयोग, सुनियोजित श्रम से ही किया जा सकता है। आलस्य का अर्थ है- शारीरिक श्रम से बचना तथा प्रमाद, मानसिक जड़ता का नाम हे। शरीर बलवान होते हुए भी व्यक्ति श्रम से जी चुराए, तो उसे प्रमाद कहा जाता है। हमारे सबसे समीपवर्ती शत्रु आलस्य और प्रमाद ही हैं। जो समय देवता की अवहेलना करते हैं, वे जीवन को निरर्थक बिता कर चलते बनते हैं। समय के असंयमी ही अल्पजीवी कहलाते हैं, भले ही उनकी आयु कुछ भी हो। समय ईश्वर प्रदत्त सम्पदा है। उसे श्रम में मनोयोगपूर्वक नियोजित करके विभिन्न प्रकार की संपदाएँ, विभूतियाँ अर्जित की जा सकती हैं। जो समय गँवाता है, उसे जीवन गँवाने वाला ही समझा जाता है।
 
🔴 समय की तरह ही विचार प्रवार को भी सत्प्रयोजनों में निरत रखा जाए। उत्कृष्ट उपयोगी विचारों को मर्यादा में सीमाबद्ध रखने से वे सृजनात्मक प्रयोजनों में लगते हैं और महत्त्वपूर्ण प्रतिफल उत्पन्न करते हैं। मनोनिग्रह के अभ्यास से जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण सफलता प्राप्त करते हैं। नित्य विचारों की अनगढ़ता अस्त- व्यस्तता से बचना चाहिए। विचारों को सुनियोजित कर लक्ष्य विशेष से जोड़कर लौकिक व आत्मिक जगत में लाभान्वित होना चाहिए। व्यक्ति जो भी कार्य करता है, वह विचारों की परिणति है। ‘‘जो जैसा सोचता है, वह वैसा ही करता है।’’ इस उक्ति को सदैव स्मरण रखना चाहिए।
  
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.25

http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/Sankalpaa/sence.1

सोमवार, 19 जून 2017

👉 दूसरों के दोष ही गिनने से क्या लाभ (भाग 1)

🔵 अगर है मंजूर तुझको बेहतरी, न देख ऐब दूसरों का तु कभी।
कि बदबीनी आदत है शैतान की, इसी में बुराई की जड़ है छिपी।

🔴 महात्मा ईसा ने कहा है कि “दूसरों के दोष मत देखो जिससे कि मरने के उपरान्त तुम्हारे भी दोष न देखे जावें” और तुम्हारा स्वर्गीय पिता तुम्हारे अपराधों को क्षमा कर दें। यदि आप दूसरों के दोषों को क्षमा नहीं करते तो आप अपने दोषों के लिए क्षमा पाने की आशा क्यों करते हैं?

🔵 मनुष्य का पेट क्यों फूला-फूला सा रहता है और उसकी पीठ क्यों पिचकी रहती है इसका कारण तनिक विनोद पूर्ण ढंग से एक महाशय इस प्रकार बताते हैं कि इन्सान दूसरों के पाप देखा करता है इसलिए दूसरों की पाप रूपी गठरी उसके सामने बंधी रहती है पर उसे अपने ऐब नहीं दिखाई देते, वह उनकी और पीठ किए रहता है इसलिए उसकी पीठ चिपकी रहती है।

🔴 एक बार भगवान बुद्ध के पास दो व्यक्ति परस्पर लड़ते-झगड़ते हुए हुए आए। एक दूसरे के लिए कहता था कि महाराज इसके आचरण कुत्ते जैसे हैं इसलिए यह अगले जन्म में कुत्ता होगा। दूसरा पहले के लिए कहता है कि महाराज इसके आचरण बिल्ली जैसे हैं और यह अगले जन्म में बिल्ली होगा। भगवान बुद्ध ने बात समझ ली ओर पहले से कहा कि तेरा साथी तो नहीं पर तुझे ही अगले जन्म में कुत्ता होना पड़ेगा क्योंकि तेरे हृदय में कुत्ते के संस्कार जम रहे हैं कि कुत्ता इस प्रकार आचरण करता है। इसी तरह उन्होंने दूसरे से कहा कि वह खुद बिल्ली होगा।

🌹  क्रमशः जारी
🌹 अखण्ड ज्योति-अप्रैल 1949 पृष्ठ 17
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1949/April/v1.17

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 117)

🌹  ब्राह्मण मन और ऋषि कर्म

🔵 उपरोक्त पंक्तियों में ऋषि परम्परा की टूटी कड़ियों में से कुछ को जोड़ने का वह उल्लेख है जो पिछले दिनों अध्यात्म और विज्ञान की, ब्रह्मवर्चस् शोध साधना द्वारा सम्पन्न किया जाता रहा है। ऐसे प्रसंग एक नहीं अनेकों हैं, जिन पर पिछले साठ वर्षों से प्रयत्न चलता रहा है और यह सिद्ध किया जाता रहा है कि लगनशीलता, तत्परता यदि उच्चस्तरीय प्रयोजनों में संलग्न हो तो उसके परिणाम कितने महत्त्वपूर्ण हो सकते हैं।

🔴 सबसे बड़ा और प्रमुख काम अपने जीवन का एक ही है कि प्रस्तुत वातावरण को बदलने के लिए दृश्य और अदृश्य प्रयत्न किए जाएँ। इन दिनों आस्था संकट सघन है। लोग नीति और मर्यादा को तोड़ने पर बुरी तरह उतारू हैं। फलतः अनाचारों की अभिवृद्धि से अनेकानेक संकटों का माहौल बन गया है। न व्यक्ति सुखी है, न समाज में स्थिरता है। समस्याएँ, विपत्तियाँ, विभीषिकाएँ निरंतर बढ़ती जा रही हैं।

🔵 सुधार के प्रयत्न कहीं भी सफल नहीं हो रहे हैं। स्थिर समाधान के लिए जनमानस का परिष्कार और सत्प्रवृत्ति सम्वर्धन यह दो ही उपाय हैं। यह प्रत्यक्ष, रचनात्मक, संगठनात्मक, सुधारात्मक उपयोग द्वारा भी चलने चाहिए और अदृश्य आध्यात्मिक उपचारों द्वारा भी। विगत जीवन में यही किया गया है। समूची सामर्थ्य को इसी में होमा गया है। परिणाम आश्चर्यजनक हुए हैं, जो होने वाला है, अगले दिनों अप्रत्याशित कहा जाएगा। एक शब्द में यह ब्राह्मण मनोभूमि द्वारा अपनाई गई संत परम्परा अपनाने में की गई तत्परता है। इस प्रकार के प्रयासों में निरत व्यक्ति अपना भी कल्याण करते हैं, दूसरे अनेकानेक का भी।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/hari/brahman.4

👉 आज का सद्चिंतन 20 June 2017


प्रेरणादायक प्रसंग 20 June 2017



👉 अप्रत्याशित सफलताओं का आधार प्रचंड मनोबल!!

🔵 एक बार की बात है गौतम बुद्ध अपने भिक्षुओं के साथ विहार करते हुए शाल्यवन में एक वट वृक्ष के नीचे बैठ गए। धर्म चर्चा शुरू हुयी और उसी क्रम में एक भिक्षु ने उनसे प्रश्न किया - "भगवन्! कई लोग दुर्बल और साधनहीन होते हुए भी कठिन से कठिन परिस्थितियों को भी मात देते हुए बड़े-बड़े कार्य कर जाते हैं, जबकि अच्छी स्थिति वाले साधन सम्पन्न लोग भी उन कार्यों को करने में असफल रहते हैं। इसका क्या कारण हैं? क्या पूर्वजन्मों के कर्म अवरोध बन कर खड़े हो जाते हैं?"

🔴 ‘नहीं’ बुद्ध ने समझाते हुए कहा, और एक प्रेरक कथा सुनाने लगे- विराट् नगर के राजा सुकीर्ति के पास लौहशांग नामक एक हाथी था। राजा ने कई युद्धों में इस पर आरूढ़ होकर विजय प्राप्त की थी। शैशव से ही लौहशांग को इस तरह प्रशिक्षित किया था कि वह युद्ध कला में बड़ा प्रवीण हो गया था। सेना के आगे चलते हुए पर्वताकार लौहशांग जब अपनी क्रुद्धावस्था में प्रचण्ड हुँकार भरता हुआ शत्रु सेनाओं में घुसता था तो देखते ही देखते विपक्षियों के पाँव उखड़ जाते थे।

🔵 धीरे-धीरे समय से साथ जिस तरह जन्म के बाद सभी प्राणियों को युवा और जरावस्था से गुजरना पड़ता है, उसी क्रम से लौहशांग भी वृद्ध होने लगा, उसकी चमड़ी झूल गई और युवावस्था वाला पराक्रम जाता रहा। अब वह हाथीशाला की शोभा मात्र बनकर रह गया। उपयोगिता और महत्व कम हो जाने के कारण उसकी ओर पहले जैसा ध्यान भी नहीं था। उसे मिलने वाले भोजन में कमी कर दी गई। एक बूढ़ा सेवक उसके भोजन पानी की व्यवस्था करता, वह भी कई बार चूक कर जाता और हाथी को भूखा प्यासा ही बहुत प्यासा होने और कई दिनों से पानी न मिलने के कारण एक बार लौहशांग हाथीशाला से निकल कर पुराने तालाब की ओर चल पड़ा, जहाँ उसे पहले कभी प्रायः ले जाया करता था। उसने भरपेट पानी पीकर प्यास बुझाई और गहरे जल में स्नान के लिए चल पड़ा। उस तालाब में कीचड़ बहुत था दुर्भाग्य से वृद्ध हाथी उसमें फँस गया। जितना भी वह निकलने का प्रयास करता उतना ही फँसता जाता और आखिर गर्दन तक कीचड़ में फँस गया।
🔴 यह समाचार राजा सुकीर्ति तक पहुँचा, तो वे बड़े दुःखी हुए। हाथी को निकलवाने के कई कई प्रयास किये गये पर सभी निष्फल। उसे इस दयनीय दुर्दशा के साथ मृत्यु मुख में जाते देखकर सभी खिन्न थे। जब सारे प्रयास असफल हो गये, तब एक चतुर मंत्री ने युक्ति सुझाई। इसके अनुसार हाथी को निकलवाने वाले सभी प्रयत्न करने वालों को वापस बुला लिया गया और उन्हें युद्ध सैनिकों की वेशभूषा पहनाई गई। वे वाद्ययन्त्र मँगाये गए जो युद्ध अवसर पर उपयोग में लाए जाते थे।

🔵 हाथी के सामने युद्ध नगाड़े बजने लगे और सैनिक इस प्रकार कूच करने लगे जैसे वे शत्रु पक्ष की ओर से लौहशांग की ओर बढ़ रहे हैं। यह दृश्य देखकर लौहशांग में न जाने कैसे यौवन काल का जोश आ गया। उसने जोर से चिंघाड़ लगाई तथा शत्रु सैनिकों पर आक्रमण करने के लिए पूरी शक्ति से कण्ठ तक फँसे हुए कीचड़ को रौंदता हुआ तालाब के तट पर जा पहुँचा और शत्रु सैनिकों पर टूट पड़ने के लिए दौड़ने लगा। बड़ी मुश्किल से आखिर उसे नियन्त्रित किया गया।
🔴 यह कथा सुनाकर तथागत ने कहा - “भिक्षुओं! संसार में मनोबल ही प्रथम है। वह जाग उठे तो असहाय और विवश  प्राणी भी असंभव होने वाले काम कर दिखाते हैं तथा मनुष्य अप्रत्याशित सफलताएँ प्राप्त करते हैं।

👉 उन्नति के पथ पर (भाग 3)

🔵 केवल ख्याति पाना ही तो उन्नति नहीं है। ख्याति तो चोर, डाकू, बदमाश आदि भी प्राप्त कर लेते हैं। ऐसी उन्नति से मनुष्यता को लाभ नहीं है। सात्विक तथा शुद्ध उन्नति ही संसार का भला कर सकती है। शुद्ध तथा दृढ़ संकल्प ही ऐसी उन्नति की पहली सीढ़ी है। और फिर उन्नति सभी के हृदयों में अंकुर रूप से विद्यमान है। सुविचारों और सुसंगति के पानी से यह अंकुर विशाल वृक्ष में परिणत हो जाता है। यह तो एक महोदधि है। मनुष्य कई बार असफल प्रयत्न होने पर भी साहस नहीं तोड़ते, वे ही मनुष्य रत्न अमूल्य रत्न ले आते हैं। उन्नति करते हुए यह ध्यान रहे कि उन्नति किसी को खोजती नहीं परन्तु वह खोजी जाती है। इसके लिये देखिये की आप से उन्नत कौन है। उनके संघ में रहिये और उन्नत होने का प्रयत्न करते रहिए।

🔴 कोई बुरा कार्य न करो। सोचो कि इस कार्य के लिये मनुष्य क्या कहेंगे। बुरे कार्य के कारण अपमानित होने का डर ही उन्नति का श्रीगणेश है। उन्नति करती है तो अपने आपको अनन्त समझो और निश्चय करो कि मैं उन्नति पथ पर अग्रसर हूँ। परन्तु अपनी समझ और अपने निश्चय को यथार्थ बनाने के लिये कटिबद्ध हो जाओ। अपने अनंत विचारों को शब्दों की अपेक्षा कार्य रूप में प्रगट करो। प्रयत्न करते हुए अपने आपको भूल जाओ। जब तुम अनन्त होने लगो तो अपने आपको महाशक्ति का अंश मान कर गौरव का अनुभव करो, परन्तु शरीर, बुद्धि और धन के अभिमान में चूर न हो जाओ। यदि उन्नति के कारण आपको अभिमान हो गया तो मध्याह्न के सूर्य की भाँति आपका पतन अवश्यंभावी है।

🔵 जब आप उन्नति पथ पर अग्रसर हैं तो भूल जायें कि आप कभी नीच, तथा दुष्ट-बुद्धि और पतित थे। निश्चित करो कि मेरा जन्म ही उन्नति के लिये हुआ है और ध्येय की प्राप्ति में सुध-बुध खो दो। और जब भी आपमें हीन विचार आये तो सोचो कि-जब वेश्या पतिव्रता हो गई तो उसे वेश्या कहना पाप है। दुष्ट जब भगवत् शरण हो गया, तो वह दुष्ट कहाँ रहा? जब लोहा पारस से छू गया तो उसमें लोहे के परमाणु भी तो नहीं रहे। इसी तरह जब मैं उन्नति पथ पर अग्रसर हूँ तो अवनति हो ही कैसे सकती है?

🌹 समाप्त
🌹 अखण्ड ज्योति 1948  नवम्बर पृष्ठ 24
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1948/November/v1.24

👉 आत्मचिंतन के क्षण 20 June

🔴 तुम सब हमारी भुजा बन जाओ, हमारे अंग बन जाओ, यह हमारे मन की बात है। अब तुम पर निर्भर है कि तुम कितना हमारे बनते हो? समर्पण का अर्थ है दो का अस्तित्व मिट कर एक हो जाना। तुम भी अपना अस्तित्व मिटाकर हमारे साथ मिला दो व अपनी क्षुद्र महत्त्वाकांक्षा को हमारी अनन्त आध्यात्मिक महत्त्वाकांक्षाओं में विलीन कर दो। जिसका अहं जिन्दा है, वह वेश्या है। जिसका अहं मिट गया वह पवित्र है। देखना है कि हमारी भुजा, आंख, मस्तिष्क बनने के लिए तुम कितना अपने अहं को गला पाते हो?

🔵 आज दुनिया में पार्टियां तो बहुत हैं, पर किसी के पास कार्यकर्त्ता नहीं हैं। लेबर सबके पास है, पर समर्पित कार्यकर्त्ता जो सांचा बनता है व कई को बना देता है अपने जैसा, कहीं भी नहीं है। हमारी यह दिली ख्वाहिश है कि हम अपने पीछे कार्यकर्त्ता छोड़ कर जाएं। इन सभी को सही अर्थों में डाई एक सांचा बनना पड़ेगा तथा वही सबसे मुश्किल काम है। रॉ मैटेरियल तो ढेरों कहीं भी मिल सकता है, पर डाई कहीं-कहीं मिल पाती है। श्रेष्ठ कार्यकर्त्ता श्रेष्ठतम डाई बनाता है। तुम सबसे अपेक्षा है कि अपने गुरु की तरह एक श्रेष्ठ सांचा बनोगे।
                                              
🔴 अपना मन सभी से मिलाओ। मिल-जुलकर रहो, अपना सुख बांटो-दुःख बंटाओ। यही सही अर्थों में ब्राह्मणत्व की साधना है। साधु तुम अभी बने नहीं हो। मन से ब्राह्मणत्व की साधना करोगे, तो पहले ब्राह्मण बनो तो साधु अपने आप बन जाओगे। सेवा बुद्धि का, दूसरों के प्रति पीड़ा का, भाव सम्वेदना का विकास करना ही साधुता को जगाना है। आशा है, तुम इसे अवश्य पूरा करोगे व हमारी भुजा, आंख व पैर बन जाने का संकल्प लोगे, यही आत्मा की वाणी है, जो तुमसे कुछ कराना चाहती है।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 इस धरा का पवित्र श्रृंगार है नारी (भाग 2)

🔴 आज जिस नारी को हमने घर की वंदनीय, परदे की प्रतिमा और पैरों की जूती बनाकर रख छोड़ा है और जो मूक पशु की तरह सारा कष्ट, सारा क्लेश, विष घूँट की तरह पीकर स्नेह का अमृत ही देती है उस नारी के सही स्वरूप तथा महत्व पर निष्पक्ष होकर विचार किया जाये तो अपनी मानवता के नाते सहधर्मिणी होने के नाते, राष्ट्र व समाज की उन्नति के नाते उसे उसका उचित स्थान दिया ही जाना चाहिये। अधिक दिनों उसके अस्तित्व, व्यक्तित्व तथा अधिकारों का शोषण राष्ट्र का ऐसे गर्त में गिरा सकता है जिससे निकल सकना कठिन हो जाएगा। अतः कल्याण तथा बुद्धिमत्ता इसी में है कि समय रहते चेत उठा जाये और अपनी इस भूल को सुधार ही लिया जाय।

🔵 नारी का सबसे बड़ा महत्व उसके जननी पद में निहित हैं यदि जननी न होती तो कहाँ से इस सृष्टि का सम्पादन होता और कहाँ से समाज तथा राष्ट्रों की रचना होती! यदि माँ न हो तो वह कौन-सी शक्ति होती जो संसार में अनीति एवं अत्याचार मिटाने के लिये शूरवीरों को धरती पर उतारती। यदि माता न होती तो बड़े-बड़े वैज्ञानिक, प्रचण्ड पंडित, अप्रतिम साहित्यकार, दार्शनिक, मनीषी तथा महात्मा एवं महापुरुष किस की गोद में खेल-खेलकर धरती पर पदार्पण करते। नारी व्यक्ति, समाज तथा राष्ट्र की जननी ही नहीं वह जगज्जननी हैं उसका समुचित सम्मान न करना, अपराध है पाप तथा अमनुष्यता है।

🔴 नारी गर्भ धारण करती, उसे पालती, शिशु को जन्म देती और तब जब तक कि वह अपने पैरों नहीं चल पाता और अपने हाथों नहीं खा पता उसे छाती से लगाये अपना जीवन रस पिलाती रहती है। अपने से अधिक संतान की रक्षा एवं सुख-सुविधा में निरत रहती है। खुद गीले में सोती और शिशु को सूखे में सुलाती है। उसका मल-मूत्र साफ करती है। उसको साफ-सुथरा रखने में अपनी सुध-बुध भूले रहती है। इस सम्बन्ध में हर मनुष्य किसी न किसी नारी का ऋणी हैं। ऐसी दयामयी नारी का उपकार यदि तिरस्कार तथा उपेक्षा से चुकाया जाता है तो इससे बड़ी शर्म की बात और क्या हो सकती है।

🌹 अखण्ड ज्योति- अगस्त 1995 पृष्ठ 25
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1995/August/v1.25

👉 कायाकल्प का मर्म और दर्शन (भाग 4)

🔴 जब इतने बड़े-बड़े महापुरुष और भगवान के अवतार दुनिया में नहीं रहे, तो और कौन रहेगा? अगर अमृत कहीं रहा होता तो इन लोगों ने जरूर पी लिया होता; पर अध्यात्म का एक अमृत है जो आपको यहाँ मिल सकता है, आप जिसके नीचे बैठकर अजर-अमर हो सकते हैं। यह अध्यात्म ज्ञान है और जिस दिन आपको यह बोध हो जाएगा कि हम जीवात्मा हैं, शरीर नहीं हैं, उसी दिन आपका मौत का भय निकल जाएगा और योजनाएँ ऐसी बनेंगी, जो आपके जन्म-जन्मान्तर की समस्याओं के समाधान करने में समर्थ होती हों। आज तो आप छोटे आदमी हैं और और छोटी समस्याओं में डूबे रहते हैं। पेट कैसे चुकायेंगे? लड़कियों की शादी कैसे होगी? हमारी नौकरी में तरक्की कैसी होगी इत्यादि छोटी चीजों में आप लगे रहते हैं, लेकिन आप अगर कभी अमर हो गये तब? तब आप अमर लोगों की तरह विचार करेंगे और यह सोचेंगे कि अपने उत्थान के साथ-साथ सारे विश्व का उत्थान करने के लिए क्या करना चाहिए और कैसे बनना चाहिए?  

🔵 बस, यही है यहाँ की परिस्थितियाँ, जिनसे लाभ उठाना चाहिए। यहाँ के वातावरण का आप लाभ उठाइए। साधना-क्रम जो आप करते हैं, वह भी ठीक है, वह भी अच्छी बात है; लेकिन साधना-क्रम के अलावा जो यहाँ आपको मिल रहा है, सान्निध्य मिल रहा है, आप इसकी उपेक्षा मत कीजिए। आप यहाँ ऐसे वातावरण के सान्निध्य में हैं जो आपको मानसिक दृष्टि से कायाकल्प कर सकने में पूरी तरी से सामर्थ्य हैं। कायाकल्प शरीर का नहीं हो सकता, प्रकृति का हो सकता है। प्रकृति ही बदल सकती है आदमी की। आकृति? आकृति नहीं बदल सकती। आकृति बदल भी कैसे सकते हैं हम?
 
🔴 आपकी नाक की जैसी बनावट है, अब किसी और तरह की नाक कैसे काट के लगा दें आपके! आपकी लंबी नाक है, आप क्या चाहते हैं, चौड़ी नाक हो जाए, यह हम कैसे कर सकते हैं? बताइये? आपके दाँत कैसे हैं? बड़े-बड़े? तो अब हम दाँतों को उखाड़ के नये दाँत कैसे लगा दें? आपका शरीर दुबला है, तो अब हम कैसे मोटा बना दें? इसलिए जो चीज संभव नहीं है, वह संभव कैसे हो सकती है? आकृतियाँ नहीं बदल सकतीं आदमी की, प्रकृति बदल सकती है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने इसी के बारे में रामायण में कहा है। त्रिवेणी का माहात्म्य उन्होंने बताया है, तीर्थराज का माहात्म्य बताते हुए उन्होंने कहा है कि कौए कोयल हो जाते हैं, बगुले हंस हो जाते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 16)

🌹  इंद्रिय संयम, अर्थ संयम, समय संयम और विचार संयम का सतत अभ्यास करेंगे।

🔴 पुराने कुसंस्कारी अभ्यासों को निरस्त करने के लिए नए उत्साह से, साहसपूर्वक सत्प्रयोजनों को दैनिक क्रियाकलाप में सम्मिलित करना पड़ता है और बार- बार उभरने वाली पशु- प्रवृत्तियों को निरस्त करने के लिए कड़ा रुख अपनाना पड़ता है। इस प्रकार अपने आप से जूझने को ही संयम समझना चाहिए। अर्जुन की भूमिका, इस अपने से संघर्ष करने (महाभारत) में प्रत्येक कर्मयोगी को निभानी पड़ती है।

🔵 जीवन एक युद्धस्थली है, जिसमें मनुष्य को सतत कामुक प्रतिकूल विचारों से लेकर चिर संचित प्रवृत्तियों तक एवं ऋतुकाल की बदलती परिस्थितियों से लेकर वातावरण में अस्वाभाविक परिवर्तन से जूझना पड़ता है। जीवनी शक्ति, जो उसे मानसिक रूप से लड़ सकने योग्य साहसी एवं उसके शरीर संस्थान को रोगी होने से बचाती है, एक ही अनुदान की परिणति हे- संयम जो इसे अपनाता है, वह न रोगी होता है न दुःखी। वह जीवन संग्राम में कभी दुःखी नहीं होता तथा विशृंखलित अस्त- व्यस्त विचार उसे प्रभावित नहीं कर पाते।

संयम एवं संघर्ष एक- दूसरे के पर्यायवाची हैं तथा असंयम की परिणति ही दीन- हीन दरिद्रता, रोग- शोक के रूप में होती है। जीवन देवता की उपासना तब ही भली प्रकार संभव है, जब अपने जीवन रसों को व्यर्थ बहाना छोड़कर मनुष्य उन्हें सृजनात्मक चिंतन व कर्तव्य में नियोजित करें। यदि व्यक्ति असंयम के दुष्परिणामों को समझ जाए, तो भूतल पर स्वर्ग आ जाए तथा दुःख दारिद्रय सर्वथा समाप्त हो जाए।
 
🔴 जीवन सम्पदा के चार क्षेत्र हैं- इंद्रिय शक्ति, समय शक्ति, विचार शक्ति, धन (साधन) शक्ति। आरंभ की तीन तो ईश्वर प्रदत्त हैं। चौथी इन तीनों के संयुक्त प्रयत्न से भौतिक क्षेत्र में पुरुषार्थ द्वारा अर्जित की जाती हैं। जो व्यक्ति इन्हें दैवी विभूतियाँ मानकर इनका सुनियोजन करता है, अभाव से भरे संसार में रहते हुए भी साधन एकत्र कर लेता है। शारीरिक सामर्थ्य, वाणी का सही उपयोग एवं समय सम्पदा का सही सुनियोजन करने के लिए ये विभूतियाँ भगवान् ने बहुत सोच- समझकर मानव को विरासत में दी हैं।
  
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.24

रविवार, 18 जून 2017

👉 अच्छी आदतें कैसे डाली जायं? (भाग 3)

🔵 ‘बेकार न बैठो’ एक ऐसा सबक है जो मनुष्य को आलसी बनने से रोकता है। आलसी बनना मन को चंचल बनाना है और काम करना मन को एकाग्र करने का साधन है। काम करने के दो प्रकार हैं। पहला प्रकार है नियमित काम करना। नियमित काम करने से मन की चंचलता घटती है पर अनियमित काम करने की ओर जाना ही चंचलता का चिह्न माना जाता है। इसलिए यह पहले ही लिखा जा चुका है कि हमें प्रतिदिन सोने के पूर्व दूसरे दिन कार्यक्रम को निश्चित कर लेना चाहिए। या ध्यान रखने की बात इतनी ही है कि नियमित रूप तथा व्यवस्थित ढंग से काम करने के लिए कार्यक्रम की आवश्यकता है, लेकिन इसका अर्थ कार्यक्रम के वशवर्ती होकर काम करना नहीं है।

🔴 किसी चीज का दास होना बुरा है, उस नियन्त्रण करना ही लक्ष्य है। इसलिए कार्यक्रम नियन्त्रण स्थापन करने का साधन है कि साध्य। कार्यक्रम बना लेने के अनन्तर अकस्मात दूसरे दिन किसी अन्य कार्य करने आवश्यकता हो जावे तो कार्यक्रम में रद्दोबदल कर देना बुरा नहीं है। लेकिन मन की चंचलता के कारण या अपने आलस्य अथवा प्रमाद के कारण कार्य को न करना एक प्रकार की भयानक आदत को जन्म देता है जो कि मनुष्य सफलता से दूर निराशा के खाई खंदकों में पटक देती है, इसलिए आरंभ से ही सावधान रहना चाहिए और बिना किसी आवश्यक प्रयोजन उपस्थित हुए निश्चित कार्यक्रम एवं निश्चित समय की अवहेलना नहीं करनी चाहिए।

🔵 जो कार्य जितने समय में सुचारु रूप से हो सके उसे उतने ही समय में पूरा करना नहीं है। जल्दी करके कार्य को बिगाड़ देने से कार्यक्रम की पूर्ति नहीं होती इसलिए कार्य की सुन्दरता की रक्षा करने की ओर भी ध्यान रखने की आवश्यकता है। जिसके सामने सौंदर्य का लक्ष्य रहता है वह जल्दीबाजी से बचा रहता है और काम को बिगड़ने नहीं देता।

🔴 प्रायः देखा जाता है कि जल्दीबाजी समय की बचत नहीं करती बल्कि कार्यसिद्धि के समय को और बढ़ा देती है। यह भी मन की चंचलता के कारण होता है। जिस समय मनोनिग्रह को अपना लिया जाता है उस समय जल्दीबाजी की वृति स्वयं ही हट जाती है। इसके अतिरिक्त व्यवहार में शालीनता आती है, शिष्टता आती है, सौम्यता आती है जो कि मनुष्य को सम्पूर्ण रूप से चमका देती है और उसका प्रभाव मनुष्य के अन्तःकरण पर ही नहीं होता बाहरी आचरण खान पान पहनाव उढ़ाव पर भी होता है। सफलता पाने की कुँजी आदतों का निर्माण है, इसलिए अपनी आदतों पर ठीक रूप से निगरानी रखने की आवश्यकता है।

🌹 समाप्त
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति- सितम्बर 1948 पृष्ठ 17
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1948/September/v1.17

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 116)

🌹  ब्राह्मण मन और ऋषि कर्म

🔵 संस्कारवान क्षेत्र एवं तपस्वियों के सम्पर्क लाभ के अनेक विवरण हैं। स्वाति बूँद के पड़ने से सीप में मोती बनते हैं, बाँस में वंशलोचन एवं केले में कपूर, चंदन के निकटवर्ती झाड़-झंखाड़ भी उतने ही सुगंधित हो जाते हैं। पारस स्पर्श कर लोहा सोना बन जाता है। हमारे मार्गदर्शक सूक्ष्म शरीर से पृथ्वी के स्वर्ग इसी हिमालय क्षेत्र में शताब्दियों से रहते आए हैं, जिसके द्वार पर हम बैठे हैं। हमारी बैटरी चार्ज करने के लिए समय-समय पर वे बुलाते रहते हैं। जब भी उन्हें नया काम सौंपना हुआ है, तब नई शक्ति देने हमें वहीं बुलाया गया है और लौटने पर हमें नया शक्ति भण्डार भर कर वापस आने का अनुभव हुआ है।

🔴 हम प्रज्ञापुत्रों को, जाग्रत आत्माओं को युग परिवर्तन में रीछ, वानरों की, ग्वाल-बालों की भूमिका निभाने की क्षमता अर्जित करने के लिए शिक्षण पाने या साधना करने के निमित्त बहुधा शान्तिकुञ्ज बुलाते रहते हैं। इस क्षेत्र की अपनी विशेषता है। गंगा की गोद, हिमालय की छाया, प्राण चेतना से भरा-पूरा वातावरण एवं दिव्य संरक्षण यहाँ उपलब्ध है। इसमें थोड़े समय भी निवास करने वाले अपने में कायाकल्प जैसा परिवर्तन हुआ अनुभव करते हैं। उन्हें लगता है कि वस्तुतः किसी जाग्रत तीर्थ में निवास करके अभिनव चेतना उपलब्ध करके वे वापस लौट रहे हैं। यह एक प्रकार का आध्यात्मिक सैनीटोरियम है।

🔵 साठ वर्ष से जल रहा अखण्ड दीपक, नौ कुण्ड की यज्ञशाला में नित्य दो घण्टे यज्ञ, दोनों नवरात्रियों में २४-२४ लक्ष गायत्री महापुरश्चरण, साधना आरण्यक में नित्य गायत्री उपासकों द्वारा नियमित अनुष्ठान, इन सब बातों से ऐसा दिव्य वातावरण यहाँ विनिर्मित होता है जैसा मलयागिरि में चंदन वृक्षों की मनभावन सुगंध का। बिना साधना किए भी यहाँ वैसा ही आनंद आता है, मानों यह समय तप साधना में बीता। शान्तिकुञ्ज गायत्री तीर्थ की विशेषता यहाँ सतत दिव्य अनुभूति होने की है। यह संस्कारित सिद्ध पीठ है, क्योंकि यहाँ सूक्ष्म शरीरधारी वे सभी ऋषि क्रिया-कलापों के रूप में विद्यमान हैं, जिनका वर्णन हमने किया है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/hari/brahman.4

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 19)

🌹  इंद्रिय संयम, अर्थ संयम, समय संयम और विचार संयम का सतत अभ्यास करेंगे। 🔴 ध्यान रखना चाहिए कि जो उपार्जन से बचाया जाए, उसे उचित प्रयो...