शनिवार, 25 फ़रवरी 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 26 Feb 2017


👉 आज का सद्चिंतन 26 Feb 2017


👉 खण्डित होने से बचा समयदान का संकल्प

🔴 बात सन् 1990 ई. की है। पूज्य गुरुदेव ने महाप्रयाण से कुछ दिन पूर्व अपने नैष्ठिक साधकों को बुलाकर कहा था कि बेटे, हमें अब मिशन का कार्य तीव्र गति से करना है और ऐसे में हमारा स्थूल शरीर अधिक उपयुक्त नहीं जान पड़ता है, अतः अब हम इस स्थूल काया को छोड़ना चाहते हैं। तब साधकों ने कहा-गुरुजी, जब आप शरीर से नहीं रहेंगे तो इस मिशन को गति कौन प्रदान करेगा। मिशन का कार्य कैसे होगा? तब गुरुजी ने कहा-बेटे हम सूक्ष्म शरीर से कार्य करेंगे। स्थूल शरीर की अपेक्षा सूक्ष्म शरीर के द्वारा हम मिशन के कार्य को और अधिक तीव्र गति से कर पाएँगे।
   
🔵 यह प्रसंग अखण्ड ज्योति पत्रिका में प्रकाशित एक लेख का है। इस लेख को पढ़कर मुझे बहुत आश्चर्य हुआ कि पूज्य गुरुदेव अपने सूक्ष्म शरीर से कैसे कार्य करते होंगे। लेकिन जब मेरे जीवन में एक अविस्मरणीय घटना घटी, तो यह बात समझ में आ गई कि किस प्रकार गुरुदेव सूक्ष्म शरीर से तरह-तरह के काम किया करते हैं।
   
🔴 सन् 2009 में मैं पहली बार शान्तिकुञ्ज आया था। यहाँ की आध्यात्मिक ऊँचाइयों से प्रभावित मैंने मन ही मन संकल्प लिया कि अपने क्षेत्र में भी पाँच कुण्डीय गायत्री महायज्ञ करवाऊँगा। पंचकुण्डीय यज्ञ में पू. गुरुदेव कदम-कदम पर सूक्ष्म रूप से सहायता करते रहे। अगले वर्ष पुनः शान्तिकुञ्ज आकर नौ दिवसीय साधना सत्र करने के बाद एक मासीय युग शिल्पी सत्र पूरा किया और लगे हाथों यहाँ की डिस्पेन्सरी में तीन माह के लिए समयदान करना शुरू कर दिया। अभी समयदान की अवधि पूरी भी नहीं हुई थी कि एक विकट समस्या खड़ी हो गयी। वह रविवार का दिन था। तारीख थी 23 अक्टूबर 2010। रात के लगभग दस बजे मेरे घर से फोन आया कि पिताजी के बाएँ हाथ में पैरालाइसिस हो गया है। यह सुनकर मैं सकते में आ गया। अपने-आपको जैसे तैसे सहज करके मैंने यह जानने की कोशिश की कि अचानक यह अटैक कैसे हो गया। माँ ने बताया कि शाम के लगभग ४ बजे जब पिताजी गेहूँ की बोरी उठाने लगे, तो उन्हें लगा कि उनका बायाँ हाथ पूरी तरह से सुन्न हो गया है। उन्होंने माताजी को बुलाकर कहा कि उनका बायाँ हाथ काम नहीं कर रहा है। यह सुनकर माताजी घबरा उठीं। उन्होंने पिताजी का हाथ पकड़कर धीरे-धीरे दबाना और झटकना शुरू किया। लेकिन इससे कुछ भी फर्क नहीं पड़ा।
   
🔵 घर के सभी सदस्य अपना-अपना काम छोड़कर पिताजी के पास इकट्ठे हो गए। आपस में विचार करके सबने यही तय किया कि तुरंत किसी डॉक्टर को दिखाया जाए। थोड़ी देर बाद ही उन्हें मुजावरपुर के डॉ. श्री नृपाल सिंह सिगड़ोरे के पास ले जाया गया। जाँच करने पर पता चला कि पिताजी का ब्लडप्रेशर नार्मल से बहुत ही कम हो चुका है। डॉक्टर साहब ने बताया कि लो ब्लडप्रेशर ही पैरालाइसिस की वजह है। उन्होंने यह भी कहा कि बाँए अंग का पैरालाइसिस बहुत ही गंभीर होता है। लम्बे इलाज के बाद भी यह बड़ी मुश्किल से ठीक हो पाता है। दवा देकर डॉक्टर ने कुछ दिनों तक बेड रेस्ट का सुझाव दिया।
   
🔴 घर वापस आने के बाद पिताजी ने सारी बात फोन पर बताकर मुझे शांतिकुंज से तुरंत घर वापस आने को कहा। पिताजी के बारे में जानकर मेरा मन चिंता से भर उठा था। सुबह की ट्रेन से ही मेरा वापस जाना जरूरी था, लेकिन समयदान का संकल्प खंडित हो जाने का भय मुझे खाए जा रहा था। समझ में नहीं आ रहा था कि करूँ  तो क्या करूँ। ऊपर से विभागीय अनुमति मिलने की भी संभावना नहीं दिख रही थी क्योंकि प्रभारी डॉक्टर गायत्री शर्मा पिछले कुछ दिनों से शांतिकुंज में नहीं थीं। गाँव वापस जाने को लेकर अनिश्चय की स्थिति में ही मैंने घर फोन मिलाकर माँ-पिताजी को कहा कि वे आज से ही घर में दीपक जलाकर नित्य कम से कम तीन माला गायत्री मंत्र का जप शुरू कर दें। मैंने उन्हें भरोसा दिलाते हुए कहा कि आप लोग चिन्ता मत कीजिए। पूज्य गुरुदेव की कृपा से सब ठीक हो जाएगा। पिताजी के स्वास्थ्य लाभ के लिए माताजी ने उसी दिन से गायत्री महामंत्र का जप आरम्भ कर दिया। इधर मैंने भी अपनी प्रातःकालीन साधना के दौरान माता गायत्री से पिताजी को शीघ्र स्वस्थ कर देने की प्रार्थना की। फिर मैं पूज्य गुरुदेव एवं वन्दनीया माताजी के समाधि स्थल पर सिर टिकाकर उनसे प्रार्थना करने लगा कि वे मेरी इतनी कठिन परीक्षा न लें। यदि मेरा यह समयदान का संकल्प पूरा नहीं हुआ तो मेरी आत्मा मुझे हमेशा धिक्कारती रहेगी। किन्तु यदि मेरे पिताजी की बीमारी इसी प्रकार बनी रहती है तो आत्मा पर बोझ रखकर भी मुझे वापस जाना ही पड़ेगा। अब इस दुविधा से मुझे आप ही उबार सकते हैं।
   
🔵 अब मेरे डिस्पेन्सरी जाने का समय हो चुका था। वहाँ जाकर दिन भर तो मरीजों के दुःख बाँटने मेंं लगा रहा लेकिन शाम को आवास पर वापस आते ही एक बार फिर से चिन्तातुर हो गया। पूरा ध्यान घर की परिस्थितियों पर ही लगा था। तभी शाम को साढ़े पाँच बजे घर से पिताजी का फोन आया। उनकी आवाज प्रसन्नता से भरी हुई थी। उन्होंने बताया कि उन्होंने मेरे कहे अनुसार दीप जलाकर गायत्री मंत्र की तीन माला का जप पूरा कर लिया है और जप के पूरा होते-होते उन्हें लगभग 80 प्रतिशत आराम मिल चुका है।
   
🔴 यह सुनकर मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। पिताजी से सुनकर भी सहज ही विश्वास नहीं हो रहा था कि सिर्फ तीन माला गायत्री जप से ही पैरालाइसिस जैसी घातक बीमारी लगभग 80 प्रतिशत ठीक हो गई। गुरुसत्ता की इस असीम अनुकम्पा से मेरी आँखें भर आईं। मैं अपने-आप से कहने लगा-गुरुसत्ता ने अपने परिजनों को ठीक ही यह आश्वासन दिया है कि तुम मेरा काम करो और मैं तुम्हारा काम करूँगा। एक हफ्ते बाद ही घर से पिताजी का दूसरा फोन आया कि अब उनका हाथ पूरी तरह से काम करने लगा है और मेरे गाँव आने की आवश्यकता नहीं रह गई है। पावन गुरुसत्ता की इस असीम कृपा के लिए हमारा शत-शत नमन।  

🌹 डॉ. राजेश कुमार चौरिया, चारगाँव, छिन्दवाड़ा (म. प्र.) 
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Samsarn/Wonderfula

👉 महाकाल का प्रतिभाओं को आमंत्रण (भाग 5)

🌹 सर्वोपरि उपलब्धि-प्रतिभा  

🔴 संसार सदा से ऐसा नहीं था, जैसा कि अब सुन्दर, सुसज्जित, सुसंस्कृत और समुन्नत दीखता है। आदिकाल का मनुष्य भी वनमानुषों की तरह भूखा-नंगा फिरता था। ऋतु-प्रभावों से मुश्किल से ही जूझ पाता था। जीवित रहना और पेट भरना ही उसके लिए प्रधान समस्या थी और इतना बन पड़ने पर वह चैन की साँस भी लेता था। संसार तब इतना सुन्दर कहाँ था? यहाँ खाई-खंदक टीले, ऊसर, बंजर, निविड़ वन और अनगढ़ जीव-जन्तु ही जहाँ-तहाँ दीख पड़ते थे। आहार, जल और निवास तक की सुविधा न थी, फिर अन्य साधनों का उत्पादन और उपयोग बन पड़ने की बात ही कहाँ बन पाती होगी?         

🔵 आज का हाट-बाजारों उद्योग-व्यवसायों विज्ञान-आविष्कारों सुविधा-साधनों अस्त्र-शस्त्र सज्जा-शोभा शिक्षा और सम्पदा से भरा-पूरा संसार अपने आप ही नहीं बन गया है। उसने मनुष्य की प्रतिभा विकसित होने के साथ-साथ ही अपने कलेवर का विस्तार भी किया है। श्रेय मनुष्य को दिया जाता है, पर वस्तुत: दुनियाँ जानती है कि वहाँ सब कुछ सम्पदा और बुद्धिमत्ता का ही खेल है। इससे दो कदम आगे और बढ़ाया जा सके, तो सर्वतोमुखी प्रगति का आधार एक ही दीख पड़ता है प्रतिभा-परिष्कृत प्रतिभा। इसके अभाव में अस्तित्व जीवित लाश से बढ़कर और कुछ नहीं रह जाता।

🔴 सम्पदा का इन दिनों बहुत महत्त्व आँका जाता है; इसके बाद समर्थता, बुद्धिमत्ता आदि की गणना होती है। पर और भी ऊँचाई की ओर नजर दौड़ाई जाए, तो दार्शनिक, शासक, कलाकार, वैज्ञानिक, निर्माता एवं जागरूक लोगों में मात्र परिष्कृत प्रतिभा का ही चमत्कार दीखता है। साहसिकता उसी का नाम है। दूरदर्शिता, विवेकशीलता के रूप में उसे जाना जा सकता है। यदि किसी को वरिष्ठता या विशिष्टता का श्रेय मिल रहा हो, तो समझना चाहिए कि यह उसकी विकसित प्रतिभा का ही चमत्कार है। इसी का अर्जन सच्चे अर्थों में वह वैभव समझा जाता है, जिसे पाकर गर्व और गौरव का अनुभव किया जाता है। व्यक्ति याचक न रहकर दानवीर बन जाता है। यही है वह क्षमता, जो अस्त्र-शस्त्रों की रणनीति का निर्माण करती है और बड़े से बड़े बलिष्ठों को भी धराशायी कर देती है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 सफाई तो स्वाभाविक धर्म

🔴 सफाई को वे गाँधी जी की तरह अत्यावश्यक धर्म मानते थे और उनकी भी यह धारणा व्यावहारिक थी कि सफाई, जैसी आवश्यक वस्तु के लिये न तो दूसरों पर निर्भर रहना चाहिए और न ही उसे छोटा और घृणित कार्य मानना चाहिए। सफाई ऐसी व्यवस्था है, जिससे स्वास्थ्य और मानसिक प्रसन्नता चरितार्थ होती है, उससे दैनिक जीवन पर बडा़ सुंदर प्रभाव पड़ता है। इसलिए छोटा हो या बडा़ सफाई का कार्य सबके लिए एक जैसा है।

🔵 आफिसों के लोग, साधारण पदवी वाले कर्मचारी और घरों में भी जो लोग थोडा बहुत पढ-लिख जाते हैं, वे अपने आपको साफ-सुथरा रख सकते हैं। पर अपने आवास और पास-पडोस को साफ रखने से शान घटने की ओछी धारणा लोगों में पाई जाती है, किंतु उनको यह बात बिल्कुल भी छू तक न गई थी।

🔴 बात पहुत पहले की नहीं, तब की है जब वे प्रधानमंत्री थे, पार्लियामैंट से दोपहर का भोजन करने वे  अपने आवास जाया करते थे एक दिन की बात है घर के बच्चों ने तमाम् कागज के टुकडे फाड फाड कर चारों तरफ फैला दिये थे। खेल-खेल में और भी तमाम गंदगी इकट्ठी हो गई थी घर के लोग दूसरे कामों मे व्यस्त रहे, किसी का ध्यान इस तरफ नहीं गया कि घर साफ नहीं है और उनका भोजन करने का वक्त हो गया है।

🔵 प्रधान मंत्री नियमानुसार दोपहर के भोजन के लिए घर पहुँचे घर में पाँव रखते ही उनकी निगाह सर्वप्रथम घर की अस्त-व्यस्तता और गंदगी पर गई। दूसरा कोई होता तो नौकर को बुलाता घर बालों को डॉटता। पर उनका कहना था ऐसा करना मनुष्य का छोटापन व्यक्त करता है। सामने आया हुआ छोटा काम भी यदि भावनापूर्वक किया जाता है, तो उस छोटे काम का भी मूल्य बड़ जाता है, और सच पूछो तो छोटे छोटे कामों को भी लगन और भवनापूर्वक करने की इन्हीं सुंदर आदतों और सिद्धंतों ने उन्हें एक साधारण किसान के बेटे से विशाल गणराज्य का प्रधानमंत्री प्रतिष्ठित किया था।

🔴 उन्होंने न किसी को बुलाया, न डॉट-फटकार लगाई चुपचाप झाडू उठाया और कमरे में सफाई शुरु कर दी, तब दूसरे लोगों का भी ध्यान उधर गया पहरे के सिपाही, घर के नौकर उनकी धर्मपत्नि सब जहाँ थे, वही निर्वाक खडे देखते रहे और वे चुपचाप झाडू लगाते रहे। किसी को बीच में टोकने का साहस न पड़ा, क्योकि उनकी कडी़ चेतावनी थी काम करने के बीच में कोई भी छेडना अच्छा नहीं होता।

🔵 सफाई हो गई तो ये लोग मुस्कराते हुए रसोइ पहुँचे। ऐसा जान पडता था कि इनके मन मे झाडू लगाने से कोइ कष्ट नहीं पहुँचा वरन मानसिक प्रसन्नता बढ़ गई है।

🔴 धर्मपत्नी ने विनीत भाव से हाथ धोने के पानी देते हुए कहा- हम लोगों की लापरवाही से आपको इतना कष्ट उठाना पडा़ तो वे हँसकर बोले- हाँ लापरवाही तो हुई पर मुझे सफाई से कोई कष्ट नहीं हुआ। यह तो हर मनुष्य का स्वाभाविक धर्म है कि यह अपनी और अपने पडो़सी की बेझिझक सफाई रखा करे।

🔵 सब कुछ जहाँ का तहाँ व्यवस्थित हुआ, वे भोजन समाप्त कर फिर अपने नियत समय पर पार्लियामेंट लौट आए। अब जानना चाहेंगे अपने ऐसे आदर्शों के बल पर साधारण व्यक्ति से प्रधानमंत्री बनने वाले कौन थे ? वह और कोई नहीं लाल बहादुर शास्त्री थे। उन्होंने साबित कर दिया कि मनुष्य जन्मजात न तो बडा होता है, न प्रतिष्ठा का पात्र। उसको बडा़ उसका काम, उसकी सच्चाई और ईमानदारी बनाती है। उनका सपूर्ण जीवन ही ऐसे उद्धरणों से परिपूर्ण है।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 50, 51

👉 छोटे सद्गुणों ने आगे बढ़ाया

🔵 बालक अब्राहम लिंकन में महापुरुषों के जीवन चरित्र पढ़ने का बड़ा शौक था। घर की आर्थिक स्थिति बहुत दयनीय थी इसलिए वे खरीद तो न सकते पर इधर-उधर से माँग कर अपना शौक पूरा करते।

🔴 एक सुशिक्षित सज्जन से वे एक पुस्तक माँग कर पढ़ने लाये। उनने बालक की उत्कंठा देख कर पुस्तक दे तो दी पर कड़े शब्दों में हिदायत कर दी कि पुस्तक खराब न होने पावे और जल्दी से जल्दी लौटा दी जाय।

🔵 घर में दीपक न था। ठंड दूर करने के लिए अंगीठी में आग जला कर सारा घर उसी पर आग तापता था। लिंकन उसी के प्रकाश में पुस्तक पढ़ते थे। सारा घर सो गया, पर वे न सोये और पुस्तक में खोये रहे। अधिक रात गए जब नींद आने लगी तो जंगले में पुस्तक रख कर सो गया। संयोगवश रात को वर्षा हुई। बौछारें जंगले में हो कर आईं और पुस्तक भीग गई।

🔴 बालक सवेरे उठा तो उसे बड़ा दुख हुआ। बिना मैली कुचैली किये ठीक समय पर पुस्तक लौटा देने का वचन वह पूरा न कर सकेगा, इस पर उसे बड़ा दुःख हुआ। आँखों में आँसू भरे वह पुस्तक उधार देने वाले सज्जन के पास पहुँचा और ‘रुद्ध’ कण्ठ से भारी परिस्थिति कह सुनाई।

🔵 वे मैली पुस्तक वापिस लेने को तैयार न हुए। कीमत चुकाने को पैसे न थे। अंत में उनने यह उपाय बताया कि तीन दिन तक वह उस सज्जन के खेत में धान काटे और उस मजदूरी से पुस्तक की मूल्य भरपाई करे। बालक ने खुशी-खुशी यह स्वीकार कर लिया। तीन दिन धान काटे और वचन पूरा न करने के संकोच से छुटकारा पा लिया।

🔴 बालक लिंकन के ऐसे-ऐसे छोटे सद्गुणों ने उसे आगे बढ़ाया और बड़ा हो कर वह अमेरिका का लोक-प्रिय राष्ट्रपति चुना गया।
 
🌹 अखण्ड ज्योति अक्टूबर 1964

👉 विपत्ति में अधीर मत हूजिए। (भाग 1)

🔵 जिस बात को हम नहीं चाहते हैं और देवगति से वह हो जाती है, उसके होने पर भी जो दुखी नहीं होते किन्तु उसे देवेच्छा समझ कर सह लेते हैं, वही धैर्यवान पुरुष कहलाते हैं। दुःख और सुख में चित्त की वृत्ति को समान रखना धैर्य कहलाता है। जिसने शरीर धारण किया है उसे सुख-दुःख दोनों का ही अनुभव करना होगा। शरीर धारियों को केवल सुख ही सुख या केवल दुःख ही दुःख कभी भी प्राप्त नहीं हो सकता। जब यही बात है, शरीर धारण करने पर सुख-दुःख दोनों का ही भीग करना है, तो फिर दुःख में अधिक उद्विग्न क्यों हो जायँ ? दुख-सुख तो शरीर के साथ लगे ही रहते हैं।

🔴 हम धैर्य धारण करके उनकी प्रगति को ही क्यों न देखते रहें जिन्होंने इस रहस्य को समझ कर धैर्य का आश्रय ग्रहण किया है, संसार में वे ही सुखी समझे जाते हैं। धैर्य की परीक्षा सुख की अपेक्षा दुःख में ही अधिक होती है। दुःखों की भयंकरता को देखकर विचलित होना प्राणियों का स्वभाव है। किन्तु जो ऐसे समय में भी विचलित नहीं होता वही ‘पुरुषसिंह’ धैर्यवान् कहलाता है। आखिर हम अधीर होते क्यों है? इसका कारण हमारे हृदय की कमजोरी के सिवा और कुछ भी नहीं है। इस बात को सब कोई जानते हैं कि आज तक संसार में ब्रह्मा से लेकर कृमिकीट पर्यन्त सम्पूर्ण रूप से सुखी कोई भी नहीं हुआ। सभी को कुछ न कुछ दुःख अवश्य हुए हैं। फिर भी मनुष्य दुःखों के आगमन से व्याकुल होता है, तो यह उसकी कमजोरी ही कही जा सकती है।

🔵 महापुरुषों के सिर पर सींग नहीं होते, वे भी हमारी तरह दो हाथ और दो पैर वाले साढ़े तीन हाथ के मनुष्यकार जीव होते हैं। किन्तु उनमें यही विशेषता होती है कि दुःखों के आने पर वे हमारी तरह अधीर नहीं हो जाते। उन्हें प्रारब्ध कर्मों का भोग समझ कर वे प्रसन्नता पूर्वक सहन करते हैं। पाँडव दुःखों से कातर होकर अपने भाइयों के दास बन गये होते, मोरध्वज पुत्र शोक से दुःखी होकर मर गये होते, हरिश्चन्द्र राज्यलोभ से अपने वचनों से फिर गये होते, श्री रामचन्द्र वन के दुःखों की भयंकरता से घबरा कर अयोध्यापुरी में रहे गये होते, शिवि राजा ने यदि शरीर के कटने के दुःख से कातर होकर कबूतर को बाज के लिये दे दिया होता, तो इनको अब तक कौन जानता? ये भी असंख्य नरपतियों की भाँति काल के गाल में चले गये होते, किन्तु इनका नाम अभी तक ज्यों का त्यों ही जीवित है। इसका एक मात्र कारण उनका धैर्य ही है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 अखंड ज्योति मई 1950 पृष्ठ 8

👉 आत्मचिंतन के क्षण 26 Feb 2017

🔴 बुरे विचार और बुरे कार्य भी नींद के शत्रु माने गये हैं। ऊपर कहा जा चुका है—सदाचारी को, सन्तोषी को, स्वस्थ नींद आए बिना नहीं रह सकती। गन्दे विचार, उन्हें पैदा करने वाला गन्दा साहित्य, उपन्यास अश्लील वार्तालाप, अभद्र व्यवहार गन्दे चित्रों से मनुष्य को बचना चाहिए। चरित्र का संयमी सदाचारी होना भी आवश्यक है। आधुनिक युग में हम लोगों का चारित्रिक पतन और दुराचार पूर्ण, गन्दा जीवन, गन्दे विचार अश्लील कल्पनाएँ एवं द्वेष, आवेश, संशय, भय अविश्वास आदि अनिद्रा की बीमारी के मुख्य कारण हैं।

🔵 सुन्दर बनने के लिए बाहरी साधन जरूरी नहीं है। इस भ्रान्त धारणा को-कि अधिक बनाव शृंगार करेंगे तो अधिक लोग आकर्षित होंगे—अपने मस्तिष्क से निकाल कर अपने अंतःकरण के सौंदर्य को खोजने का प्रयत्न कीजिए। आपकी प्रसन्नता में, आपके सुखद विचारों में सुन्दरता भरी हुई है उसे जागृत कीजिए। सच्चा सौंदर्य मनुष्य के सद्गुणों में है। हम गुणवान् बनें, तेजस्वी बनें तो सौंदर्य हमारा साथ कभी न छोड़ेगा।

🔴 आज सम्पूर्ण नारी जाति का कर्त्तव्य है कि निन्दनीय वातावरण छोड़कर आगे बढ़े, और समाज सुधार, नैतिक उत्थान तथा धार्मिक पुनर्जागरण का संदेश मानवता को दें। उन्हें इस ढंग से कार्य करना होगा कि पुरुषों को बल मिले, उनकी खोई हुई शक्तियाँ जागें। इसके लिए उन्हें पुरुषों के साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर आगे बढ़ना होगा। अपने कार्यक्षेत्र का सफलतापूर्वक निर्वाह किये बिना विकास की गति को स्त्रियाँ प्रवाहमान नहीं रख सकतीं। उन्हें सारे उत्तरदायित्व समझदारी से निभाने पड़ेंगे।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 21)

🌹 विचारों का व्यक्तित्व एवं चरित्र पर प्रभाव
🔴 डा. एफ. ई. बिल्स, डा. लेलाड काडल रावर्ट मैक कैरिसन आदि अनेक स्वास्थ्य शास्त्रियों ने दीर्घायु के रहस्य ढूंढ़े। प्राकृतिक जीवन, सन्तुलित और शाकाहार, परिश्रमशील जीवन, संयमित जीवन—शतायुष्य के लिए यही सब नियम माने गये हैं, लेकिन कई बार ऐसे व्यक्ति देखने में आये जो इन नियमों की अवहेलना करके, रोगी और बीमार रहकर भी सौ वर्ष की आयु से अधिक जिये। इससे इन वैज्ञानिकों को भी भ्रम बना रहा कि दीर्घायुष्य का रहस्य कहीं और छिपा हुआ है। इनके लिए उसकी खोज निरन्तर जारी रही।

🔵 अमेरिका के दो वैज्ञानिक डा. ग्रानिक और डा. बिरेन बहुत दिनों तक खोज करने के बाद इस निश्चित निष्कर्ष पर पहुंचे कि दीर्घ जीवन का संबंध मनुष्य के मस्तिष्क एवं ज्ञान से है। उनका कहना है कि अनुसंधान के समय 92 और इस आयु के ऊपर के जितने भी लोग मिले वह सब अधिकतर पढ़ने वाले थे। आयु बढ़ने के साथ-साथ जिनकी ज्ञान वृद्धि भी होती है वे दीर्घजीवी होते हैं पर पचास की आयु पार करने के बाद जो पढ़ना बन्द कर देते हैं—जिनका ज्ञान नष्ट होने लगता है, जल्दी ही मृत्यु के ग्रास हो जाते हैं।

🔴 दोनों स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मत है कि मस्तिष्क जितना पढ़ता है उतना ही उसमें चिन्तन करने की शक्ति आती है। व्यक्ति जितना सोचता विचारता रहता है उसका नाड़ी मण्डल उतना ही तीव्र रहता है। हम यह सोचते हैं कि देखने का काम हमारी आंखें करती हैं, सुनने का काम कान, सांस लेने का काम फेफड़े, पेट भोजन पचाने और हृदय रक्त परिभ्रमण का काम करता है। विभिन्न अंग अपना-अपना काम करके शरीर की गतिविधि चलाते हैं। पर यह हमारी भूल है।

🔵 सही बात यह है कि नाड़ी मण्डल की सक्रियता से ही शरीर के सब अवयव क्रियाशील होते हैं, इसलिए मस्तिष्क जितना क्रियाशील होगा शरीर उतना ही क्रियाशील होगा। मस्तिष्क के मंद पड़ने का अर्थ है शरीर के अंग-प्रत्यंगों की शिथिलता और तब मनुष्य की मृत्यु शीघ्र ही हो जावेगी इससे जीवित रहने के लिए पढ़ना बहुत आवश्यक है। ज्ञान की धारायें जितनी तीव्र होंगी उतनी ही लम्बी होगी।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 मन: स्थिति बदले तो परिस्थिति बदले (भाग 29)

🌹 उदारता अपनाई ही जाए  

🔵 बिच्छू के बारे में सुना जाता है कि उसके बच्चे माँ का पेट खा पीकर तब बाहर निकलते हैं। लगता है मनुष्य ने कहीं बिच्छू की रीति-नीति तो नहीं अपना ली हैं, जिससे वह उस प्रकृति का सर्वनाश करके रहे, जो उसके जीवन धारणा करने का प्रमुख आधार है। खीझी हुई प्रकृति क्या बदला ले सकती है? अणु उपकरणों के बदले क्या प्रकृति ही सर्वनाश, महाप्रलय सामने लाकर खड़ी कर सकती है? यह सब सोचने की मानो किसी को फुरसत ही नहीं हैं।      

🔴 मनुष्य का मनुष्य के प्रति व्यवहार निराशाजनक स्तर तक नीचे गिर गया है। उसने अपनी सत्ता और महत्ता को किस प्रकार फुलझड़ी की तरह जलाने का कौतुक अपना लिया है, उससे प्रतीत होता है कि इस सुहावनी धरती पर रहते हुए भी हम सब प्रेत-पिशाचों की तरह एक दूसरे को काटने, गलाने, जलाने पर उतारू हैं। इसके प्रतिफल स्वरूप परस्पर सहयोग की बात बनना तो दूर, हम अविश्वास के ऐसे वातावरण में रह रहे हैं, जिससे अपनी छाया तक से डर लगता है।

🔵 विश्वास और विश्वासघात दोनों परस्पर हमजोली बनकर चल रहे हैं। असंयम के अतिवाद ने शारीरिक स्वास्थ्य और मानसिक दूरदर्शिता को मटियामेट करके रख दिया है। धन की इतनी बड़ी भूमिका बताई है कि उसे पाने के लिए कोई किसी के साथ कितनी ही बढ़ी-चढ़ी दुष्टता कर बैठे, तो उसे कम ही समझना चाहिए। ऐसे अभ्यस्त अनाचार के बीच कोई शरीर मस्तिष्क, परिवार, समाज, स्वयं समुन्नत रह सकेगा, इसकी आशा ही छोड़ देनी चाहिए, छूट भी गई है।      

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 दीक्षा और उसका स्वरूप (भाग 3)

👉 युग ऋषि की अमृतवाणी

🔴 मानव जीवन की विशेषताओं का और भगवान् के द्वारा विशेष विभूतियाँ मनुष्य को देने का एक और भी उद्देश्य है। जब मनुष्य इस जिम्मेदारी को समझ ले और ये समझ ले कि मैं क्यों पैदा हुआ हूँ, और यदि मैं पैदा हुआ हूँ? तो मुझे अब क्या करना चाहिए?  यह बात अगर समझ में आ जाए, तो समझना चाहिए कि इस आदमी का नाम मनुष्य है और इसके भीतर मनुष्यता का उदय हुआ और इसके अंदर भगवान् का उदय हो गया और भगवान् की वाणी उदय हो गयी, भगवान् की विचारणाएँ उदय हो गयीं।

🔵 यदि इतना न हो, तो उसको क्या कहा जाए? उसके लिए सिर्फ एक ही शब्द काम में लाया जा सकता है, उसका नाम है नर- पशु। नर- पशु कई तरह के हैं और नर- पशु भी दुनिया में बहुत सारे हैं। अधिकांश आदमी नर- पशु हैं। नर- पशु हो करके नर- नारायण होकर और पुरुष- पुरुषोत्तम और मानव को महामानव होकर के जीना चाहिए, आदर्शवादी और सिद्धान्तवादी होकर जीना चाहिए। यह दो उद्देश्य ही तो मनुष्य के हैं। 

🔴 जहाँ दूसरे लोग, दूसरे प्राणी इन्द्रियों की प्रेरणाओं से प्रभावित होते हैं, अपने अन्तःमन की प्रेरणा से प्रभावित होते हैं, जन्म- जन्मान्तरों के कुसंस्कारों से प्रभावित होते हैं, समीपवर्ती वातावरण से प्रभावित होते हैं और उसी के अनुसार अपनी गतिविधियों का निर्धारण करते हैं, वहीं मनुष्य वह है, जो किसी बाहर की परिस्थितियों से प्रभावित नहीं होता है,  बल्कि अन्तरंग की प्रेरणा और भगवान्  की पुकार और जीवन के उद्देश्य से ही प्रभावित होता है और सारी दुनिया की बातों को, सारी दुनिया के लोभ और आकर्षणों को उठाकर एक कोने पर रख देता है। उसी का नाम मनुष्य है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/Diksha/11

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 61)

🌹 प्रवास का दूसरा चरण एवं कार्य क्षेत्र का निर्धारण

🔴 प्रथम परीक्षा देने के लिए हिमालय बुलाए जाने के आमंत्रण को प्रायः दस वर्ष बीत गए। फिर बुलाए जाने की आवश्यकता नहीं समझी गई। उनके दर्शन उसी मुद्रा में होते रहे जैसे कि पहली बार हुए थे। ‘‘सब ठीक है’’ इतने ही शब्द कहकर प्रत्यक्ष सम्पर्क होता रहा। अन्तरात्मा में उसका समावेश निरन्तर होता रहा कभी अनुभव नहीं हुआ कि हम अकेले हैं। सदा दो साथ रहने जैसी अनुभूति होती रही। इस प्रकार दस वर्ष बीत गए।

🔵 प्रथम परीक्षा देने के लिए हिमालय बुलाए जाने के आमंत्रण को प्रायः दस वर्ष बीत गए। फिर बुलाए जाने की आवश्यकता नहीं समझी गई। उनके दर्शन उसी मुद्रा में होते रहे जैसे कि पहली बार हुए थे। ‘‘सब ठीक है’’ इतने ही शब्द कहकर प्रत्यक्ष सम्पर्क होता रहा। अन्तरात्मा में उसका समावेश निरन्तर होता रहा कभी अनुभव नहीं हुआ कि हम अकेले हैं। सदा दो साथ रहने जैसी अनुभूति होती रही। इस प्रकार दस वर्ष बीत गए।

🔴 रास्ता अपना देखा हुआ था। ऋतु उतनी ठण्डी नहीं थी जितनी कि पिछली बार थी। रास्ते पर आने-जाने वाले मिलते रहे। चट्टियाँ (ठहरने की छोटी धर्मशालाएँ) भी सर्वथा खाली नहीं थीं। इस बार कोई कठिनाई नहीं हुई। सामान भी अपेक्षाकृत साथ में ज्यादा नहीं था। घर जैसी सुविधा तो कहाँ, किन्तु जिन परिस्थितियों में यात्रा करनी पड़ी, वह असह्य नहीं अनभ्यस्त भर थी। क्रम यथावत चलता रहा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/hari/prav

👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 62)

🌹 हमारी जीवन साधना के अन्तरंग पक्ष-पहलू

🔵 आत्मकथा लिखने के आग्रह को केवल इस अंश तक पूरा कर सकते हैं कि हमारा साधना क्रम कैसे चला। वस्तुत: हमारी सारी उपलब्धियाँ प्रभु समर्पित साधनात्मक जीवन प्रक्रिया पर ही अवलम्बित है। उसे जान लेने से इस विषय में रूचि रखने वाले हर व्यक्ति को वह रास्ता मिल सकता है, जिस पर चल कर कि आत्मिक प्रगति और उससे जुड़ी विभूतियों का आनंद लिया जा सकता है। पाठकों को अभी इतनी ही जानकारी हमारी कलम से मिल सकेगी, सो उतने से ही इन दिनों सन्तोष करना पड़ेगा।

🔴 ६० वर्ष के जीवन में से १५ वर्ष का आरम्भिक बाल जीवन कुछ विशेष महत्त्व का नहीं है। शेष पाँच वर्ष हमने आध्यात्मिकता के प्रसंगों को अपने जीवन- क्रम में सम्मिलित करके बिताये हैं, पूजा- उपासना का उस प्रयोग में बहुत छोटा अंश रहा है। २४ वर्ष तक ६ घंटे रोज की गायत्री उपासना को उतना महत्व नहीं दिया जाना चाहिए, जितना कि मानसिक और भावनात्मक उत्कृष्टता के अभिवर्धन के प्रयत्नों को। यह माना जाना चाहिए कि यदि विचारणा और कार्यपद्धति को परिष्कृत न किया गया होता, तो उपासना के कर्मकाण्ड उसी तरह निरर्थक चले जाते, जिस तरह कि अनेक पूजा- पत्री तक सीमित मन्त्र- तन्त्रों का ताना- बाना बुनते रहने वालों को नितान्त खाली रहना पड़ता है।

🔵 हमारी जीवन साधना को यदि सफल माना जाए और उसमें दीखने वाली अलौकिकता को खोजा जाए तो उसका प्रधान कारण हमारी अन्तरंग और बहिरंग स्थिति के परिष्कार को ही माना जाए। पूजा उपासना को गौण समझा जाए। आत्मकथा के एक अंश को लिखने का दुस्साहस करते हुए हम एक ही तथ्य का प्रतिपादन करेंगे कि हमारा सारा मनोयोग और पुरुषार्थ आत्म- शोधन में लगा है। उपासना जो बन पड़ी है, उसे भी हमने भाव परिष्कार के प्रयत्नों के साथ पूरी तरह जोड़ रखा है। अब आत्मोद्घाटन के साधनात्मक प्रकरण पर प्रकाश डालने वाली कुछ चर्चाएँ पाठकों की जानकारी के लिए करते हैं_

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 25 Feb 2017


👉 आज का सद्चिंतन 25 Feb 2017


👉 ..और आखिर गुरुदेव ने सुनी उनकी बात

🔴 नवयुग के निर्माण के लिये युग शिल्पियों की जो विशाल सेना युगऋषि पं० श्रीराम शर्मा आचार्य ने खड़ी की है, उसके एक सजग और समर्पित सेनानी हैं श्री  विजय शर्मा। वे गया में उप कृषि निदेशक के पद पर कार्यरत हैं। जुलाई, २०१० के तीसरे सप्ताह में श्री शर्मा की तबीयत अचानक खराब हो गई। वह भी इस हद तक कि घर में कोहराम मच गया। उन्हें तुरन्त ही शहर के एक बड़े क्लीनिक में ले जाया गया। सघन जाँच हुई और ई.सी.जी. तथा टीएमटी की रिपोर्ट से इसके स्पष्ट संकेत प्राप्त हुए कि श्री शर्मा कॉरोनरी आर्टरी डिजीज़ के मरीज हैं। स्थिति इसलिए भी खतरनाक मानी गई कि यह उच्च रक्तचाप तथा मधुमेह के पुराने रोगी हैं।

🔵 दिनांक २३ जुलाई को श्री शर्मा जी का एन्जियोग्राफी मेट्रो हार्ट इंस्टीट्यूट, फरीदाबाद में डॉ. नीरज जैन, डी.एम., कॉर्डियोलॉजिस्ट के द्वारा किया गया। श्री शर्मा एन्जियोग्राफी के तीन- चार दिन पहले से ही इस बात को लेकर चिंतित थे कि यदि एन्जियोप्लास्टी अथवा बाईपास सर्जरी कराना पड़ा, तो इसका व्यय भार वहन करना उनके लिए कहीं से भी सम्भव नहीं हो पायेगा। दूसरा संकट यह भी था कि इतनी लम्बी छुट्टी विभाग से कैसे मिलेगी। चिन्ता जब चरम पर पहुँच गई, तो उन्होंने परम पूज्य गुरुदेव की सुपुत्री स्नेहसलिला शैलबाला पण्ड्या से फोन पर सम्पर्क करके अपनी परेशानी बताई, तो आदरणीया शैल जीजी ने कहा- आप चिन्ता मत करिए। गुरुजी सब सम्हाल लेंगे। सब कुछ नॉर्मल होगा।

🔴 उसी रात सोने से पहले ध्यान लगाकर उन्होंने पूज्य गुरुदेव से द्रवित मन से प्रार्थना की। उन्होंने कहा - गुरुदेव! इतने महँगे इलाज के लिए मेरे पास पैसे नहीं हैं, दफ्तर से छुट्टी भी नहीं मिलेगी। मैं बहुत मुश्किल में हूँ। कुछ ऐसा कीजिए, गुरुदेव! कि  सिर्फ  एक ही दिन में मेरी चिकित्सा पूरी हो जाय और इलाज में अधिक से अधिक ३०,००० रुपये खर्च हों।

🔵 .... और सचमुच परम पूज्य गुरुदेव ने उनकी बात सुन ली। इलाज एक ही दिन में हो गया और खर्च हुए मात्र २३,००० रुपये। २३ जुलाई, २०१० को जब शर्मा भाई साहब ने एन्जियोग्राफी करवाया, तो रिपोर्ट में सब कुछ सामान्य निकला। मेट्रो हार्ट इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट शत- प्रतिशत सामान्य पाई गई। दिनांक ७ सितम्बर को श्री शर्मा जी ने जब आदरणीया जीजी से हरिद्वार आकर मुलाकात की, तो जीजी ने आतुरता से उनकी कुशल- क्षेम पूछी। जाँच की रिपोर्ट के बारे में जानने के बाद उन्होंने गहरी साँस लेते हुए सिर्फ इतना कहा कि यह सब गुरुदेव की लीला है, पर उनकी आँखें साफ बोल रही थीं कि गुरुदेव अपने अंग अवयवों की रक्षा में संसार की सीमाओं को भी लांघ जाते हैं।

🌹 नीरज तिवारी पूर्वजोन, शांतिकुंज, हरिद्वार(उत्तराखण्ड)   
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Samsarn/Wonderfula

👉 महाकाल का प्रतिभाओं को आमंत्रण (भाग 4)

🌹 सर्वोपरि उपलब्धि-प्रतिभा    
🔴 प्रतिभाशाली लोगों को असाधारण कहते हैं। विशिष्ट और वरिष्ठ भी कहा जाता है। साधारण जनों को तो जिन्दगी के दिन पूरे करने में ही जो दौड़-धूप करनी पड़ती है, झंझटों से निपटना और जीवनयापन के साधन जुटाना आवश्यक होता है, उसे ही किसी प्रकार पूरा कर पाते हैं। पशु-पक्षियों और पतंगों से भी इतना ही पुरुषार्थ हो पाता है और इतना ही सुयोग जुट पाता है; किन्तु प्रतिभावानों की बात ही दूसरी है, वे तारागणों के बीच चन्द्रमा की तरह चमकते हैं। उनकी चाँदनी सर्वत्र शान्ति और शीतलता बिखेरती है। वह स्वयं सुन्दर और अपनी छत्र-छाया के सम्पर्क में आने वालों को शोभा-सुन्दरता से जगमगा देते हैं।        

🔵 प्रतिभावानों को उदीयमान सूर्य भी कह सकते हैं, जिसके दर्शन होते ही सर्वत्र चेतना का एक नया माहौल उमड़ पड़ता है। वे ऊर्जा और आभा के स्वयं तो उद्गम होते ही हैं, अपनी किरणों का प्रभाव जहाँ तक पहुँचा पाते हैं, वहाँ भी बहुत कुछ उभारते-बिखेरते रहते हैं। सच तो यह है कि नर-वानर को शक्ति-पुञ्ज बनाने का श्रेय प्रतिभा को ही है। प्रतिभा ही शरीर में ओजस्विता, मानस में तेजस्विता और अन्त:करण में विभूति भरी वर्चस्विता के रूप में दृष्टिगोचर होती है। मनुष्य की अपनी निजी विशेषता का परम पुरुषार्थ यही है। जो इससे वञ्चित रह गया, उसे मार्ग ढूँढ़ने का अवसर नहीं मिलता। मात्र अन्धी भेड़ों की तरह जिस-तिस के पीछे चलकर, जहाँ भाग्य ले पहुँचाता है, वहाँ जाकर, ऐसा व्यक्ति अशक्त परावलम्बियों जैसा जीवन जीता है। कठिनाइयों के समय यह मात्र घुटन अनुभव करता और आँसू भर बहाकर रह जाता है।

🔴 संसार असंख्य पिछड़े लोगों से भरा पड़ा है। वे गई-गुजरी जिन्दगी जीते और भूखे-नंगे तिरस्कृत-उपेक्षित रहकर किसी प्रकार मौत के दिन पूरे करते हैं। निजी समर्थता का अभाव देखकर उन पर विपन्नता और प्रतिगामिता के अनेक उद्भिज चढ़ दौड़ते हैं। दुर्व्यसन दुर्बल मनोभूमि वालों पर ही सवार होते हैं और उन्हें जिधर-तिधर खींचते-घसीटते फिरते हैं। ऐसे भारभूत लोग अपने लिए, साथी-सहयोगियों के लिए और समूचे समाज के लिए एक समस्या ही बने रहते हैं। इन्हीं का बाहुल्य देखकर अनाचारी अपने पञ्जे फैलाते, दाँत गड़ाते और शिकञ्जे कसते हैं। प्रतिभारहित समुदाय का धरती पर लदे भार जैसा आँकलन ही होता है। वे किसी की कुछ सहायता तो क्या कर सकेंगे, अपने को अर्धमृतक की तरह किन्हीं के कन्धों पर लादकर चलने का आश्रय ताकते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 विनयात् याति पात्रवाम्

🔴 विनयशीलता, नम्रता, सौम्यता व्यक्तित्व को उच्च स्थिति प्रदान करते है। लोगों के अंतःकरण जीतने का सबसे सरल मंत्र है कि हमारा जीवन, हमारा व्यवहार अत्यंत विनम्र हो।

🔵 यह धारणा डॉ० राजेंद्र प्रसाद की थी। जो अपनी विनम्रता के बल पर ही कम शिक्षा, अत्यंत सादगी, वहुत सरल विचारों के होते हुए भी, इस देश के सर्वप्रथम राष्ट्रपति निर्वाचित हुए और जब तक रहे उसी आदर भावना से उच्च पद पर प्रतिष्ठित रखे गए।

🔴 सामान्य लोगों में बडे़ और जिनसे स्वार्थ सधता हो उन्हीं तक विनम्र होने का संकीर्ण स्वभाव रहता है। आफिस में अफसर के सामने बहुत उदार हो जाते हैं, पर घर में पत्नी, बच्चे, नौकर के सामने ऐसे अकड़ भरते है जैसे वह कोई सेनापति हो, और वैसा करना आवश्यक हो, जिसने विनम्रता-सौम्यता त्यागी, उसने अपना जीवन जटिल बनाया प्रेम, स्नेह, आत्मीयता और सद्भाव का आनंद गँवाया। यदि इस जीवन को सफल, सार्थक और आनंदयुक्त रखना है तो स्वभाव उदार होना चाहिए। यह मनुष्यता की दृष्टि से भी आवश्यक है कि दूसरों से व्यवहार करते समय शब्दों और भाव-भंगिमाओं से कटुता प्रदर्शित न की जाए।

🔵 राजेंद्र बाबू के राष्ट्रपति जीवन की एक घटना है। उनकी हजामत के लिये जो नाई आया करता था, उसके हाथ-मुँह साफ नही रहते थे। गंदगी किसी को भी अच्छी नहीं लगती, तो फिर वह क्यों पसंद करते 'उन्होंने नाई से कहा आप हाथ-मुँह साफ करके आया करे। यह कहते हुए उन्होंने शब्दो में पूर्ण सतर्कता रखी। जोर न देकर शिष्ट भाव अधिक था, तो भी उन सज्जन पर इन शब्दों का कोई प्रभाव न पडा। वे अपने पूर्व क्रमानुसार ही आते रहे।

🔴 राजेंद्र बाबू राष्ट्रपति थे। अपने अधिकारियों से वे कठोर शब्दों में कहला सकते थे। यह भी संभव था कि नाई बदलवाकर किसी स्वच्छ साफ-सुथरे नाई की व्यवस्था कर लेते, पर मानवीयता की दृष्टि से उन्होंने इनमें से किसी की आवश्यकता नहीं समझी। एक व्यक्ति को सुधार लेना अच्छा, उसे बलात् मानसिक कष्ट देना या बहिष्कार करना अच्छा नहीं होता। मृदुता और नम्र व्यवहार से पराए अपने हो जाते हैं तो फिर अपनों को अपना क्यों नही बनाया जा सकता।

🔵 पर अब उन्हें इस बात का संकोच था कि दुबारा कहने से उस व्यक्ति को कहीं मानसिक कष्ट न हो। कई दिन उनका मस्तिष्क इन्हीं विचारों में घूमता रहा। यह भी उनका बडप्पन ही था कि साधारण-सी बात को भी उन्होंने विनम्रतापूर्वक सुलझाने में ही ठीक समझा।

🔴 दूसरे दिन नाई के आने पर बडी़ विनम्रता से बोले- आपको बहुत परिश्रम करना पड़ता होगा, उससे शायद वहाँ समय न मिलता होगा, इसलिए यहाँ आकर हाथ-मुँह धो लिया करे।

🔵 नाई को अपनी गलती पर बडा दुःख हुआ, साथ ही वह राजेंद्र बाबू की सहृदयता से बहुत प्रभावित हुआ। उसने अनुभव किया कि छोटी-छोटी बातों की उपेक्षा करने से ही डॉट-फटकार सुननी पडती है, पर विनम्रता से तो उसे भी ठीक किया जा सकता है। उसने उस दिन से हाथ-मुँह धोकर आने का नियम बना लिया। फिर कोई शिकायत नहीं हुई और न कोई कटुता ही पैदा हुई।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 48, 49

👉 झूठे मित्र

🔴 एक खरगोश बहुत भला था। उसने बहुत से जानवरों से मित्रता की और आशा की कि वक्त पड़ने पर मेरे काम आवेंगे। एक दिन शिकारी कुत्तों ने उसका पीछा किया। वह दौड़ा हुआ गाय के पास पहुँचा और कहा—आप हमारे मित्र हैं, कृपाकर अपने पैने सींगों से इन कुत्तों को मार दीजिए। गाय ने उपेक्षा से कहा—मेरा घर जाने का समय हो गया। बच्चे इन्तजार कर रहे होंगे, अब मैं ठहर नहीं सकती।

🔵 तब वह घोड़े के पास पहुँचा और कहा—मित्र घोड़े! मुझे अपनी पीठ पर बिठाकर इन कुत्तों से बचा दो। घोड़े ने कहा—मैं बैठना भूल गया हूँ, तुम मेरी ऊँची पीठ पर चढ़ कैसे पाओगे? अब वह गधे के पास पहुँचा और कहा—भाई, मैं मुसीबत में हूँ, तुम दुलत्ती झाड़ने में प्रसिद्ध हो इन कुत्तों को लातें मारकर भगा दो। गधे ने कहा—घर पहुँचने में देरी हो जाने से मेरा मालिक मुझे मारेगा। अब तो मैं घर जा रहा हूँ। यह काम किसी फुरसत के वक्त करा लेना।

🔴 अब वह बकरी के पास पहुँचा और और उससे भी वही प्रार्थना की। बकरी ने कहा—जल्दी भाग यहाँ से, तेरे साथ मैं भी मुसीबत में फँस जाऊँगी। तब खरगोश ने समझा कि दूसरों का आसरा तकने से नहीं अपने बल बूते से ही अपनी मुसीबत पार होती है। तब वह पूरी तेजी से दौड़ा और एक घनी झाड़ी में छिपकर अपने प्राण बचाए।  
 
🔵 अक्सर झूठे मित्र कुसमय आने पर साथ छोड़ बैठते हैं। दूसरों पर निर्भर रहने में खतरा है, अपने बलबूते ही अपनी समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
 
🌹 अखण्ड ज्योति अक्टूबर 1964

👉 व्यर्थ का उलाहना

🔵 हे प्रभु ! हे जगत्-पिता, जगन्नियन्ता कैसे आप मौन, मन्दिर में बैठे हैं। क्या आप देख नहीं रहे हैं कि बाहर संसार में अन्याय और अनीति फैली हुई है। अत्याचारियों के आतंक और त्रास से संसार त्राहि-त्राहि कर रहा है। आप उठिये और बाहर आकर अत्याचारियों का विनाश करिये, संसार को त्रास और उत्पीड़न से बचाइये। देखिये, मैं कब से आपको पुकार रहा हूँ, विनय और प्रार्थना कर रहा हूँ। किन्तु आप अनसुनी करते जा रहे हैं। हे प्रभु, हे जगन्नियन्ता न जाने आप जल्दी क्यों नहीं सुनते। पुकारते-पुकारते मेरी वाणी शिथिल हो रही है किन्तु अभी तक आपने मेरी पुकार नहीं, सुनी कहते-कहते, प्रार्थी करुणा से रो पड़ा !

🔴 तभी मूर्ति ने गम्भीरता के साथ कहा- ‘मनुष्य मुझे संसार में आने के लिये न कहे- मैं मनुष्यों से बहुत डरता हूँ। प्रार्थी ने विस्मय पूर्वक पूछा- भगवान् ! आप मनुष्य से डरते हैं- यह क्यों !

🔵 मूर्ति पुनः बोली- इसलिये कि यदि मैं संसार में सशरीर ईश्वर के रूप में आ जाऊँ तो मनुष्य मेरी दुर्गति बना डालें। क्योंकि हर मनुष्य को मुझ से कुछ न कुछ शिकायत है, हर मनुष्य मुझ से कुछ न कुछ सेवा चाहता है। अपनी शिकायतों को ढूँढ़ने और उन्हें दमर करने की अपेक्षा वह दोष मुझे देता है। पुरुष अपनी समस्यायें आप हल करने की अपेक्षा मुझे से सारे काम कराना चाहता है और मूल्य चुकाये बिना वैभव पाने की याचना करता है।

🔴 अब तुम्हीं बताओ ऐसी स्थिति में मैं सशरीर ईश्वर के रूप में कैसे आ सकता हूँ ? मूर्ति मौन हो गई

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखंड ज्योति दिसम्बर 1971 पृष्ठ 1

👉 आत्मचिंतन के क्षण 25 Feb 2017

🔴 भाग्यवाद का नाम से कर अपने जीवन में निराशा निरुत्साह के लिए स्थान मत दीजिए। आपका गौरव निरन्तर आगे बढ़ते रहने में है। भगवान् का वरद-हस्त सदैव आपके मस्तक पर है। वह तो आपका पिता अभिभावक, संरक्षक, पालक सभी कुछ है। उसकी अकृपा आप पर भला क्यों होगी? क्या यह सच नहीं है कि उसने आपको यह अमूल्य मनुष्य शरीर दिया है। बुद्धि दी है, विवेक दिया है। कुछ अपनी इन शक्तियों से भी काम लीजिए, देखिए आपका भाग्य बनता है या नहीं? भाग्य सदैव पुरुषार्थ का ही साथ देता है।

🔵 दुर्भाग्य के प्रमुख कारण मनुष्य के मनोविकार हैं। इन्हीं के जीवन बर्बाद होता है। काम, क्रोध, लोभ तथा मोह आदि के द्वारा ही मनुष्य का जीवन अपवित्र बनता है। संक्षेप में इसी को ही दुर्भाग्य की संज्ञा दी सकती है। अतः मनुष्य को चाहिए कि वह इन्द्रिय, मन और बुद्धि की अस्वच्छता को शुद्ध बनाने का सदैव अभ्यास करता रहे, इससे वह भविष्य सुन्दर बना सकता है। अनावश्यक वस्तुओं के अधिक से अधिक संचय को ही भाग्य नहीं कहते। वह मनुष्य जीवन में अच्छाइयों का विकास है, इसी से उससे शाश्वत सुख और शान्ति की उपलब्धि होती है। सत्कर्मों का आश्रय ही एक प्रकार से सौभाग्य का निर्माण करता है।

🔴 कर्म चाहे वह आज के हों अथवा पूर्व जीवन के उनका फल असंदिग्ध है। परिणाम से मनुष्य बच नहीं सकता। दुष्कर्मों का भोग जिस तरह भोगना ही पड़ता है, शुभ कर्मों से उसी तरह श्री—सौभाग्य और लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। यह सुअवसर जिसे उपलब्ध हो, वही सच्चा भाग्यशाली है और इसके लिए किसी दैव के भरोसे नहीं बैठना पड़ता। कर्मों का सम्पादन मनुष्य स्वयं करता है। अतः अपने अच्छे-बुरे भाग्य का—निर्णायक भी वही है। अपने भाग्य को वह कर्मों द्वारा बनाया-बिगाड़ा करता है। हमारा श्रेय इसमें है कि सत्कर्मों के द्वारा अपना भविष्य सुधार लें। जो इस बात को समझ लेंगे और इस पर आचरण करेंगे उनको कभी दुर्भाग्य का रोना नहीं रोना पड़ेगा।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 20)

🌹 विचारों का व्यक्तित्व एवं चरित्र पर प्रभाव

🔴 इसके विपरीत जो स्वास्थ्य सम्बन्धी सद्विचारों की साधना करते हैं, वे रोगी होने पर भी शीघ्र चंगे हो जाया करते हैं। रोगी इस प्रकार सोचने के अभ्यस्त होते हैं। वे उपचार के अभाव में भी स्वास्थ्य लाभकर लेते हैं— मेरा रोग साधारण है, मेरा उपचार ठीक-ठीक पर्याप्त ढंग से हो रहा है, दिन-दिन मेरा रोग घटता जाता है और मैं अपने अन्दर एक स्फूर्ति, चेतना और आरोग्य की तरंग अनुभव करता हूं। मेरे पूरी तरह स्वस्थ हो जाने में अब ज्यादा देर नहीं है। इसी प्रकार जो निरोग व्यक्ति भूलकर भी रोगों की शंका नहीं करता और अपने स्वास्थ्य से प्रसन्न रहता है। जो कुछ खाने को मिलता है, खाता और ईश्वर को धन्यवाद देता है, वह न केवल आजीवन निरोग ही रहता है, बल्कि दिन-दिन उसकी शक्ति और सामर्थ्य भी बढ़ती जाती है।

🔵 जीवन की उन्नति और विकास के सम्बन्ध में भी यही बात लागू होती है। जो व्यक्ति दिन रात यही सोचता रहता है कि उसके पास साधनों का अभाव है। उसकी शक्ति सामर्थ्य और योग्यता कम है, उसे अपने पर विश्वास नहीं है। संसार में उसका साथ देने वाला कोई नहीं है। विपरीत परिस्थितियां सदैव ही उसे घेरे रहती हैं। वह निराशावादी व्यक्ति जीवन में जरा भी उन्नति नहीं कर सकता। फिर चाहे उसे कुबेर का कोष ही क्यों न दे दिया जाय और संसार के सारे अवसर ही क्यों न उसके लिए सुरक्षित कर दिये जाय।

🔴 इसके विपरीत जो आत्म-विश्वास, उत्साह, साहस और पुरुषार्थ भावना से भरे विचार रखता है। सोचता है कि उसकी शक्ति सब कुछ कर सकने में समर्थ है। उसकी योग्यता इस योग्य है कि वह अपने लायक हर काम कर सकता है। उसमें परिश्रम और पुरुषार्थ के प्रति लगन है। उसे संसार में किसी की सहायता के लिए बैठे नहीं रहना है। वह स्वयं ही अपना मार्ग बनायेगा और स्वयं ही अपने आधार पर, उस पर अग्रसर होगा—ऐसा आत्मविश्वासी और आशावादी व्यक्ति अभाव और प्रतिकूलताओं में भी आगे बढ़ जाता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 दीक्षा और उसका स्वरूप (भाग 2)

👉 युग ऋषि की अमृतवाणी

🔴 हमारी सरकार भगवान् है और मनुष्य के पास जो कुछ भी विभूतियाँ, अक्ल और विशेषताएँ हैं, वे अपनी व्यक्तिगत ऐय्याशी और व्यक्तिगत सुविधा और व्यक्तिगत शौक- मौज के लिए नहीं हैं और व्यक्तिगत अहंकार की तृप्ति के लिए नहीं है। इसलिए जो कुछ भी उसको विशेषता दी गई है। उसको उतना बड़ा जिम्मेदार आदमी समझा जाए और जिम्मेदारी उस रूप में निभाए कि सारे के सारे विश्व को सुंदर बनाने में, सुव्यवस्थित बनाने में, समुन्नत बनाने में उसका महान् योगदान संभव हो।

🔵 भगवान् का बस एक ही उद्देश्य है- निःस्वार्थ प्रेम। इसके आधार पर भगवान् ने मनुष्य को इतना ज्यादा प्यार किया। मनुष्य को उस तरह का मस्तिष्क दिया है, जितना कीमती कम्प्यूटर दुनिया में आज तक नहीं बना। करोड़ों रुपये की कीमत का है, मानवीय मस्तिष्क। मनुष्य की आँखें, मनुष्य के कान, नाक, आँख, वाणी एक से एक चीज ऐसी हैं, जिनकी रुपयों में कीमत नहीं आँकी जाती है। मनुष्य के सोचने का तरीका इतना बेहतरीन है, जिसके ऊपर सारी दुनिया की दौलत न्यौछावर की जा सकती है।

🔴 ऐसा कीमती मनुष्य और ऐसा समर्थ मनुष्य- जिस भगवान् ने बनाया है, उस भगवान् की जरूर ये आकांक्षा रही है कि मेरी इस दुनिया को समुन्नत और सुखी बनाने में यह प्राणी मेरे सहायक के रूप में, और मेरे कर्मचारी के रूप में, मेरे असिस्टेण्ट के रूप में मेरे राजकुमार के रूप में काम करेगा और मेरी सृष्टि को समुन्नत रखेगा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 मन: स्थिति बदले तो परिस्थिति बदले (भाग 28)

🌹 उदारता अपनाई ही जाए

🔵 हेय स्तर में गिने जाने वाले पशु-पक्षियों को कोई नीति मर्यादा मान्य नहीं होती। गिद्ध, कौए और सियार कुछ भी पशुओं को न तो पत्नी और भगिनी-पुत्री के बीच अन्तर करना आता है, और न बीच चौराहे पर यौनाचार करने में कुछ अनुपयुक्त लगता है। इन प्राणियों का कहीं मल-मूत्र त्यागने में भी हिचक नहीं लगती। वे किसी का भी खेत खा सकते हैं। छोटे जल जन्तुओं को बगुले बिना कोई दया भाव दर्शाए नि:संकोच भाव से निगलते रहते हैं। यह एक निराली दुनिया है और उसकी अपनी सीमाएँ हैं, पर मनुष्य तो कुछ विशेष उपलब्धियाँ लेकर जन्मा है। उसकी गरिमा को सृष्टि में सर्वोच्च ठहराया गया है। ऐसी दशा में उसके कन्धों पर कुछ विशेष जिम्मेदारियाँ भी आती हैं और कड़ी मर्यादाओं का परिपालन एवं वर्जनाओं का अनुशासन भी आवश्यक हो जाता है।     

🔴 किसी के पास तलवार होने का तात्पर्य यह तो नहीं कि वह कहीं भी कत्लेआम कर डाले? अतिरिक्त बुद्धिमत्ता का तात्पर्य यह तो नहीं हो सकता कि इसके सहारे संसार की सुव्यवस्था को बर्बाद करके रख दें? अनीति बरतने के लिए उसे स्वेच्छाचार का लाइसेंस मिला हुआ नहीं है। इस स्तर की चतुरता अपना लेने का प्रतिफल यह तो नहीं होना चाहिए कि वह आत्मा और परमात्मा की आँखों में धूल झोंककर, अहंकार से उन्मत्त होकर, अपने क्रिया-कलापों से वातावरण को उद्वेगों और अनाचारों से भर दे?      

🔵 दृष्टि पसार कर जिस ओर भी देखा जाये, उसी ओर समस्याओं, उलझनों, विडम्बनाओं, विपत्तियों, विग्रहों, विद्रोहों और संकटों के घटाटोप उमड़ते-उभरते दिखाई देते हैं। जिस प्रकृति का पयपान करके, जिसकी गोद में हम सब क्रीड़ा कल्लोल कर रहे थे। आश्चर्य है कि हम उसी की गर्दन घोंट डालने के लिए उतारू हो गये? जहाँ से हम अन्न-जल और वनस्पति प्राप्त करके जीवन धारण किये रहा करते थे, वह सम्पदा जिसके साथ हमारा सम्बन्ध सहोदर भाई जैसा है, यदि उसे इसी प्रकार नष्ट करते चले गए तो अर्धांग पक्षाघात पीड़ित की तरह हमारा जीवन भी स्थिर न रह सकेगा।

🔴 भूगर्भ का असीम उत्खनन उसे बाँझ बनाकर छोड़ेगा। जलाशयों की सम्पदा को मारक तत्त्वों से भरते कारखाने, पीने योग्य पानी छोड़ेंगे भी या नहीं? आकाश-वायुमण्डल जिस प्रकार प्रदूषण से, विकिरण से, कोलाहल से निरन्तर भरता चला जा रहा है, उससे पृथ्वी का रक्षा कवच फट रहा है और बाढ़ हुआ तापमान हिम क्षेत्रों को पिघलाकर समुद्र में ऐसी बाढ़ लाने का ताना-बाना बुन रहा है, जिससे जितना थल भाग अभी भी बचा है, उसका अधिकांश भाग उस बाढ़ में समा जायेगा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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गुरुवार, 23 फ़रवरी 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 24 Feb 2017


👉 आज का सद्चिंतन 24 Feb 2017


👉 फलित हुआ माँ का आश्वासन

🔴 बात उन दिनों की है जब अश्वमेध यज्ञों की श्रृंखला चल रही थी। इस श्रृंखला में पटना का अश्वमेध यज्ञ भी था। फरवरी, १९९४ का महीना था। चारों तरफ केवल यज्ञ की ही चर्चा हो रही थी। यज्ञ के बारे में लोग तरह-तरह की बातें कर रहे थे। कोई कहता कि भगवान राम ने जिस प्रकार से अश्वमेध यज्ञ किया था और पहले घोड़ा छोड़ा था उसी प्रकार से इस यज्ञ में भी घोड़ा छोड़ा जाएगा।
  
🔵 प्रत्येक परिजन में भारी उत्साह था। मैं भी यज्ञ में जाने के लिए उत्साहित था। घर में पत्नी से यज्ञ की चर्चा की और मन बना लिया। यज्ञ की महिमा और उसका प्रभाव मैं जानता था, इसलिए यह अवसर मैं गँवाना नहीं चाहता था। मेरे छोटे बहनोई थे विश्वनाथ जी। छोटी कमाई, बड़ा परिवार। घर का खर्च बड़ी मुश्किल से चलता था। ऊपर से उन्हें शराब की लत लगी हुई थी। सारा का सारा पैसा शराब पीने में चला जाता था। कई बार उनने कसम खाई लेकिन हर बार कसम तोड़ देते थे। मन में आया कि उनको भी यज्ञ में ले चलूँ, शायद कल्याण हो जाए।                                                                                      
  
🔴 मैं इसके पहले शानितकुञ्ज एवं मिशन के  बारे में कुछ नहीं जानता था, केवल यज्ञ हवन से प्रभावित था कि इतना बड़ा यज्ञ हो रहा है तो इसमें शामिल होना चाहिए, यही भावना थी; और यह भी कि यदि बहनोई की शराब की आदत छूट जाय तो बच्चों का भविष्य बन जाएगा। यज्ञ में जाने की खबर सुनकर मेरा भतीजा अनिल, जिसकी उम्र केवल ७ वर्ष की थी, वह भी आ गया। अब मैं, मेरी, पत्नी बहनोई और भतीजा चारों लोग पटना के लिए गंगा-दामोदर एक्सप्रेस ट्रेन पर बैठे। साथ में और भी सैकड़ों परिजन थे। ट्रेन में भारी भीड़ थी। लगभग ८० प्रतिशत लोग यज्ञ में जाने वालों में से  ही थे।
  
🔵 उन दिनों बिहार के मुख्यमंत्री श्री लालू प्रसाद यादव जी थे। चर्चा का विषय बना था कि उन्होंने सभी ट्रेनें यज्ञ में जाने वालों के लिए निःशुल्क करा दी हैं। वे यज्ञ में पूरा सहयोग कर रहे हैं। यज्ञ स्थल के लिए भूमि की व्यवस्था भी लालू जी ने स्वयं करवाई थी।
  
🔴 यज्ञ में पहुँचे तो वहाँ की भीड़ देखकर हम दंग रह गए। यज्ञ की व्यवस्था बहुत ही अच्छी थी। सुरक्षा व्यवस्था के लिए बनी कार्यकर्ता टोली में मुझे भी शामिल कर लिया गया था। इस दायित्व को पाकर मैं फूला नहीं समा रहा था। यज्ञ के दौरान दिए गए सारगर्भित प्रवचनों को सुनकर आत्मा तृप्त हो गई। लालू जी ने भी मंच से लोगों को संबोधित किया। वे अपने अंदाज में कह रहे थे- यह वही स्थान है जहाँ हम भैंसे चराते थे और माँड़-भात खाते थे। आज बिहार में गायत्री परिवार जैसे मिशन की आवश्यकता है, जो अपने साथ-साथ सभी को लेकर चलते हैं।       
  
🔵 माता जी से मिला, तो लगा हमें असली माँ मिल गई है। सभी परिजन उनकी बातों को सुनकर प्रसन्न हो रहे थे। माता जी का प्रवचन सुना। वे बोल रही थीं  ‘‘बेटे हम तुम्हारी रक्षा वैसे ही करेंगे, जिस तरह से चिड़िया अपने अंडों को सेती है। हमारे डैने बहुत विशाल है। इन शब्दों को सुनकर मैं सोच रहा था कि ऐसा आश्वासन तो कोई बहुत बड़े ऋषि या भगवान ही दे सकते हैं। माता जी के इन शब्दों ने जैसे वहॉँ उपस्थित सभी लोगों में नवचेतना का संचार कर दिया था। मैं अपने-आपको बहुत सौभाग्यशाली मान रहा था कि ऐसी अवतारी सत्ता का सान्निध्य पा सका। यज्ञ में करीब ६०-६५ लाख व्यक्ति मौजूद थे। लेकिन व्यवस्था में कहीं कोई गड़बड़ी नहीं। यही सोच-सोच कर मैं हैरान था।
  
🔴 यज्ञ समाप्त हुआ। हम सभी अपने-अपने घर जाने को तैयार हुए। फुलवारी शरीफ मेन रोड पर आकर देखा, सड़क पर भारी भीड़ थी। हमें सड़क पार कर उस तरफ जाना था। मेरे बहनोई सड़क पार कर गए, तो अनिल भी पीछे दौड़ पड़ा। इधर हम कुछ समझ पाते उससे पहले ही तेज गति से आ रही एक एम्बेसडर कार उसके ऊपर से गुजर गई। एकबारगी अन्तरात्मा काँप गई। अन्दर से एक विकल पुकार उठी-माता जी यह क्या हो गया? अब मैं किसको क्या मुँह दिखलाऊँगा? कई बातें मस्तिष्क में कौंध गईं। बच्चे को खोने का डर तो था ही, अन्तर को मथते हुए एक शंका यह भी उठ रही थी-लोग तरह-तरह की बातें करेंगे। माताजी के आश्वासन पर से सभी का विश्वास उठ जाएगा।
  
🔵 गाड़ी जाने के बाद हम लोग सहमते हुए आगे बढ़े। देखा बच्चा बेहोश पड़ा था। चारों ओर से सहानुभूति के स्वर सुनाई पड़ रहे थे; पर उधर ध्यान देने का वक्त नहीं था। बच्चे को गोद में उठाकर जल्दी से किनारे ले आया। बच्चे के शरीर पर एक खरोंच तक नहीं लगी थी। किसी ने इस तरफ ध्यान दिलाया तो हमारे आश्चर्य का ठिकाना न रहा। सहसा यकीन ही नहीं हुआ। क्या ऐसा भी संभव है? फिर एक उम्मीद जगी शायद माताजी की कृपा से बच ही जाए। वहाँ उपस्थित एक भाई ने बताया कि पास ही डॉक्टर का क्लीनिक है, वहाँ ले जाइए। उन्होंने हाथ से इशारा करके दिखाया। करीब दस कदम की दूरी पर एक डॉक्टर की क्लीनिक थी। वहाँ ले जाकर बच्चे को बेंच पर बैठाया तो वह बैठ गया। डॉ० ने बच्चे को जाँच कर बताया- घबड़ाने की कोई बात नहीं। बच्चा डर गया है। इसे कुछ नहीं हुआ है। १५ मिनट बाद इसे आप ले जा सकते हैं। कोई १०-१५ मिनट बाद बच्चे ने आँखें खोल दीं और घबड़ाई नजरों से इधर-उधर देखने लगा। हमें देखकर आश्वस्त हुआ। हम सबकी आँखों में आँसू छलक आए। याद आ रहा था माताजी का आश्वासन ‘‘... हमारे डैने बहुत बड़े हैं।’’ तत्क्षण हमने अनुभव किया उनके डैनों का अमृततुल्य प्रभाव।

🌹 भरत प्रसाद सिन्दरी, धनबाद (झारखण्ड)   
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Samsarn/Wonderfula

👉 महाकाल का प्रतिभाओं को आमंत्रण (भाग 3)

🌹 सर्वोपरि उपलब्धि-प्रतिभा    

🔴 अपने पुरुषार्थ को इस स्तर पर सिद्ध करे कि यह मात्र दैवी अनुदानों के आधार पर ही समुन्नत बनकर नहीं रह रहा है, वरन् उसका निज का पुरुषार्थ भी समुचित मात्रा में सम्मिलित रहा है। यह प्रतिभा ही है जिसके बल पर वह अन्यायों की तुलना में अधिक सुसंस्कृत और समुन्नत बनता है। गोताखोर गहरी डुबकी लगाकर मोती बीनते हैं। हीरे खोजने वाले खदान का चप्पा-चप्पा ढूँढ़ डालते हैं। प्रतिभा को उपलब्ध करने के लिए भी इससे कम प्रयास से काम नहीं चलता।       

🔵 प्रतिभा एक दैवी स्तर की विद्युत चेतना है, जो मनुष्य के व्यक्तित्व और कर्तृत्त्व में असाधारण स्तर की उत्कृष्टता भर देती है। उसी के आधार पर अतिरिक्त सफलताएँ आश्चर्यजनक मात्रा में उपलब्ध की जाती है। साथ ही इतना और जुड़ता है कि अपने लिए असाधारण श्रेय, सम्मान और दूसरों के लिए अभ्युदय के मार्ग पर घसीट ले चलने वाला मार्ग-दर्शन वह कर सके। माँझी की तरह अपनी नाव को खेकर स्वयं पार उतरे और उस पर बिठाकर अन्यान्यों को भी पार उतारने का श्रेय प्राप्त कर सके। गिरों को उठाने, डूबतों को उबारने और किसी तरह समय गुजारने वालों को उत्कर्ष की ऊँचाई तक उछालने में समर्थ हो सके।

🔴 प्रतिभाशाली लोगों को असाधारण कहते हैं। विशिष्ट और वरिष्ठ भी कहा जाता है। साधारण जनों को तो जिन्दगी के दिन पूरे करने में ही जो दौड़-धूप करनी पड़ती है, झंझटों से निपटना और जीवनयापन के साधन जुटाना आवश्यक होता है, उसे ही किसी प्रकार पूरा कर पाते हैं। पशु-पक्षियों और पतंगों से भी इतना ही पुरुषार्थ हो पाता है और इतना ही सुयोग जुट पाता है; किन्तु प्रतिभावानों की बात ही दूसरी है, वे तारागणों के बीच चन्द्रमा की तरह चमकते हैं। उनकी चाँदनी सर्वत्र शान्ति और शीतलता बिखेरती है। वह स्वयं सुन्दर और अपनी छत्र-छाया के सम्पर्क में आने वालों को शोभा-सुन्दरता से जगमगा देते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 दुर्जनों से मान जाऊँ हार, यह संभव नही है

🔴 वाराणसी हिंदू विश्वविद्यालय के निर्माण का जो स्वरूप महामना मालवीय ने स्थिर किया था, उनके लिये बहुत धन की आवश्यकता थी। भीख माँगना अच्छा नहीं पर यदि नेक कार्य के लिये भीख भी माँगनी पडे तो मैं यह भी करुँगा, यह कहकर मालवीय जी ने विश्वविद्यालय के लिए दान माँगने का अभियान चलाया।

🔵 सत्संकल्प कभी अधूरे नही रहते। यदि ईमानदारी और निष्काम भावना से केवल लोक-कल्याणार्थ कोई काम संपन्न करना हो तो भावनाशील योगदानियों की कमी नहीं रहती। क्या धनी, क्या निर्धन विश्वविद्यालय के लिये दान देने की होड लग गई। सबने सोचा यह विद्यालय राष्ट्र की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत की रक्षा के लिए खुल रहा है। इसमे पढ़ने वाले छात्र चिरकाल तक प्रकाश पायेगे।

🔴 भारतीय संस्कृति के आदर्शों की रक्षा होगी इसलिये जो कुछ भी बन पडे देना चाहिये। उस समय दान के एक नये पैसे का भी वही मूल्य और महत्व हो गया, जो हजार दस हजार का होता है।

🔵 इकट्ठी और बडी रकम न मिले न सही, बहुत बडी शक्ति प्रतिभा योग्यता का एक व्यक्ति न मिले-न सही, कम योग्यता के कम साधनों के काफी व्यक्ति इकट्ठे हो जाएँ तो भी वह प्रयोजन आसानी से पूरे हो जाते है। इसलिये ५ रुपये का सहयोग भी उतना ही महत्त्व रखता है, जितना कि हजार का दान। दान में केवल व्यक्ति की भावना और लेने वाले का उद्देश्य पवित्र बना रहना चाहिए।

🔴 बिहार प्रांत का दौरा करते हुए मालवीय जी मुजफ्फरपुर पहुँचे। वहाँ एक भिखारिन ने दिन भर भीख मांगने के बाद जो पाँच पैसे मिले थे, सब मालवीय जी की झोली मे डाल दिए। पास ही एक और निर्धन व्यक्ति था उसने अपनी फटी कमीज दे दी उस कमीज को १०० रु. में नीलाम किया गया। किसी ने १०० कुर्सियों की जिम्मेदारी ली किसी ने एक कमरा बनवाने का संकल्प लिया, किसी ने पंखो के लिये रुपये दिए, किसी ने और कोई दान।

🔵 एक बंगाली सज्जन ने पाँच हजार रुपया नकद दान दिया। तो उनकी धर्मपत्नि ने बहुमूल्य कंगन दान दे दिया। पति ने दुगना दाम देकर खरीद लिया। पर भावना ही तो थी पत्नी ने उसे फिर दान दे दिया। यह क्रम इतनी देर चला कि रात हो गई। बिजली का प्रबंध था नहीं इसलिए लैंप की रोशनी में ही आई हुई धनराशि की गिनती की जाने लगी।

🔴 धन सग्रह एवं नीलामी का कार्य एक ओर चल रहा था, टिमटिमाते प्रकाश में दूसरी ओर कोठरी में रुपये गिने जा रहे थे, तभी कोइ बदमाश व्यक्ति उधर पहुँचा और बत्ती बुझाकर रूपयों से भरी तीनो थैलियां छीनकर ले भागा। कुछ लोगो ने पीछा ना किया पर अँधेरे मे वह कहाँ गायब हो गया, पता न चल पाया।

🔵 सब लोग इस घटना को लेकर दुःखी बैठे थे। एक सज्जन ने मालवीय जी से कहा- पंडित जी, इस पवित्र कार्य में भी जब लोग धूर्तता करने से बाज नहीं आते तो आप ही क्यों व्यर्थ परेशानियों का बोझ सर पर लेते है। जो कुछ मिला है किसी विद्यालय को देकर शांत हो जाइए। कोई बडा काम किया जाए, यह देश इस योग्य नहीं।

🔴 मालवीय जी गंभीर मुद्रा में बैठे थे, थोडा़ मुस्कराये और कहने लगे- भाई बदमाश एक ही तो था। मैं तो देखता हूँ कि भले आदमियों की संख्या सैकडो़ में तो यहीं खडी है। सौ भलों के बीच एक बुरे से घबराना क्या ? दुर्जनों से मान जाऊँ हार, यह मेरे लिये संभव नही। इस तरह यदि सतवृत्तियाँ रुक जाया करे, तो संसार नरक बन जायेगा। हम वह स्थिति नहीं लाने देना चाहते इसलिए अपने प्रयत्न बराबर जारी रखेगे।

🔵 मालवीय जी की तरह दुष्वृतियों से न डरने वाले लोग ही हिंदू विश्वविद्यालय जैसे बडे काम संपन्न कर पाते है।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 42, 43

👉 संत का गौरव

🔴 कुछ दिनों विनोबा भावे प्रतिदिन अपने पवनार आश्रम से लगभग तीन मील दूर स्थित सुरगाँव जाते थे, एक फावड़ा कंधे पर रखकर।  
 
🔵 एक बार कमलनयन बजाज ने उनसे पूछा कि आप फावड़ा रोज इतनी दूर अपने साथ क्यों ले जाते है। उस गाँव में ही किसी के यहाँ आप फावड़ा क्यों नहीं छोड़ आते ? 
 
🔴 विनोबा जी बोले-''जिस काम के लिए मैं जाता हूँ, उसका औजार भी मेरे साथ ही होना चाहिए। फौज का सिपाही अपनी बंदूक या अन्य हथियार लेकर चलता है, उसी प्रकार एक 'सफैया' को भी अपने औजार सदा अपने साथ लेकर ही चलना चाहिए। सिपाही को अपने हथियार से मोह हो जाता है उसी तरह हमें भी अपने औजारों को अपने साथ ले जाने में आनंद और गौरव अनुभव होना चाहिए।

🌹 प्रज्ञा पुराण भाग 2 पृष्ठ 17

👉 भगवान् पवित्रता के क्षीर सागर में विराजते हैं

🔴 मनुष्य जीवन व्यापार में सतत अपने आपको एक धोखा देता रहता है कि कहीं से उस पर उसकी बाह्योपचार प्रधान पूजा-प्रार्थना-आरती आदि से अनुदान बरसेंगे एवं उसके अभाव दूर हो जायेंगे। भगवान् का नाम लेकर लोग लाटरी का टिकट खरीदते देखे जाते हैं। वे यह मान बैठते हैं कि इसके बदले उन्हें जरूर कहीं न कहीं से छप्पर फाड़कर भगवान् धन बरसा देंगे। बाहरी पूजा स्वयं करने का मौका नहीं मिलता, तो किसी और से करवा के यह समझते हैं कि उसका लाभ अपने को मिल गया, चाहे स्वयं ने कितने ही पाप क्यों न किये हों, अचिन्त्य चिन्तन क्यों न विगत में किया जाता रहा हो तथा वर्तमान के क्रियाकलाप भी वैसे ही क्यों न चल रहे हों।

🔵 यह एक छलावा है, भ्रान्ति है तथा आत्मप्रवंचना मात्र है। भगवान् को नितान्त घटिया मान बैठना, यही समझ बैठना कि जरा सी प्रार्थना से बिना अन्तरंग साफ किये, बिना औरों के प्रति संवदेना जीवन में धारणा किये भगवान् प्रसन्न हो अनुदान बरसा देगा, तो फिर इससे बड़ी नासमझी दुनिया में कोई नहीं हो सकती।
  
🔴 आज बहुसंख्य व्यक्ति धर्म के इसी रूप को जीवन में धारण किये-दिखाई देते हैं। यदि इनने सही मायने में धर्म समझा होता, तो सबसे पहले अपने अन्तरंग को निर्मल बनाया होता। भगवान् तो इतने दयालु-क्षमा वत्सल हैं कि वे भक्त के निष्काम भाव से, उनकी शरण में आ जाने पर उसके पूर्व के सब पापों का बोझ अपने पर लेकर उसे न जाने कहाँ से कहाँ पहुँचा देते हैं। शर्त एक ही है कि निश्छल भाव से समर्पण कर फिर खोदी खाई के पाटने का पुरुषार्थ किया जाता रहे तो भगवत्कृपा व सत्कर्म दोनों मिलकर व्यक्ति की आत्मिक प्रगति का पथ प्रशस्त कर देते हैं।

🔵 भगवान् ने गीता में स्वयं यह कहा है कि पापियों से भी अधिक पाप करने वाला भी मेरी शरण में आ जाय तो वह ज्ञान रूपी नौका द्वारा सम्पूर्ण पाप समुद्र से भली भाँति स्वयं को तार सकता है (४/३५)। फिर व्यक्ति आत्मोन्मुख हो उस ज्ञान को प्राप्त करने का प्रयास क्यों नहीं करता, जो उसे पवित्रता के अनन्त स्रोत से जोड़ता है। यदि अध्यात्म का यह मर्म समझा जा सके तो बहुत से व्यर्थ के समयक्षेप करने वाले उपचारों से बचकर स्वयं को अपने समय व सारी विभूतियों को भगवत्परायण बनाते हुए निहाल हुआ जा सकता है। इस तत्व दर्शन को समझने में ही मनुष्य का हित है।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 20

👉 आत्मचिंतन के क्षण 24 Feb 2017

🔴 जो मनुष्य जितनी अधिक कामना रखता है, वह उतना ही अधिक दरिद्र रखता है। उसकी व्यग्रता उतनी बढ़ जाती है और उसका मन विविध तृष्णाओं की और दौड़ता रहता है। मनुष्य की विषय विविधता ही उसको पतन की ओर ले जाती है और पतनोन्मुख मनुष्य से किसी सदाशयता की आशा नहीं की जा सकती। उसका सन्तोष नष्ट हो जाता है और इस प्रकार उसे संसार में सभी प्राणी अपने से अधिक सुखी दिखाई देते हैं, जिससे उसे औरों से ईर्ष्या और अपने से खीझ होने लगती है। वह हर समय हर बात पर असंतुष्ट रहता है, जिससे उसमें क्रोध का बाहुल्य हो जाता है। क्रोध से विवेक नष्ट हो जाता है और विवेक के विनाश से वह सर्वनाश की ओर बड़ी तीव्र गति से अग्रसर हो पड़ता है।

🔵 क्षणिक सुख के लिए अपने जीवन लक्ष्य को भूल जाना बुद्धिमानी नहीं मान सकते। साँसारिक कामनायें अमृत तत्व की प्राप्ति नहीं करा सकतीं। उनका प्राप्त कर लेना किसी प्रकार श्रेयस्कर नहीं हो सकता। मनुष्य अपनी मूल सत्ता से बिछुड़ जाने के कारण दुःखी है। चिरन्तन शान्ति के लिए उसी परमात्मा की ही शरण लेनी होगी।

🔴 कर्म करते हुए मनुष्य से अज्ञान-वश त्रुटियाँ हो सकती हैं, किन्तु निष्काम भावना के कारण उसके सात्विक लक्ष्य पर किसी तरह का आक्षेप नहीं आता। लक्ष्य की स्थिरता ईश्वर के प्रति अनन्य भाव रखने से आती है। दोषों, त्रुटियों और भूलों से बचाव करना भी ईश्वरीय-ज्ञान के प्रकाश में ही संभव है।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 19)

🌹 विचारों का व्यक्तित्व एवं चरित्र पर प्रभाव

🔴 यही कारण है कि शिशु-पालन के नियमों में माता को परामर्श दिया गया है कि बच्चे को एकान्त में तथा निश्चिन्त एवं पूर्ण प्रसन्न मनोदशा में स्तनपान करायें। क्षोभ अथवा आवेग की दशा में दूध पिलाना बच्चे के स्वास्थ्य तथा संस्कारों के लिए हानिप्रद होता है। जिन माताओं के दूध पीते बच्चे, रोगी, रोने वाले, चिड़चिड़े अथवा क्षीणकाय होते हैं, उसका मुख्य कारण यही रहता है कि वे मातायें स्तनपान के वांछित नियमों का पालन नहीं करतीं अन्यथा वह आयु तो बच्चों के स्वास्थ्य तन्दुरुस्त होने की होती है। मनुष्य के विचारों का शरीर की अवस्था में बहुत घनिष्ठ सम्बन्ध होता है। यह एक प्राकृतिक नियम है।

🔵 इस नियम की वास्तविकता का प्रमाण कोई भी अपने अनुभव के आधार पर पा सकता है। वह दिन याद करें कि जिस दिन कोई दुर्घटना देखी हो। चाहे उस दुर्घटना का सम्बन्ध अपने से न रहा हो तब भी उसे देखकर मानसिक स्थिति पर जो प्रभाव पड़ा उसके कारण शरीर सन्न रह गया, चलने की शक्ति कम हो गई, खड़ा रहना मुश्किल पड़ गया, शरीर में सिहरन अथवा कम्पन पैदा हो गया, आंसू आ गये अथवा मुख सूख गया। उसके बाद भी जब उस भयंकर घटना का विचार मस्तिष्क में आता रहा शरीर पर बहुत बार उसका प्रभाव होता रहा।

🔴 मनोवैज्ञानिकों तथा चिकित्सा शास्त्रियों का कहना है कि आज रोगियों की बड़ी संख्या में ऐसे लोग बहुत कम होते हैं, जो वास्तव में किसी रोग से पीड़ित हों। अन्यथा बहुतायत ऐसे ही रोगियों की होती है, जो किसी न किसी काल्पनिक रोग के शिकार होते हैं। आरोग्य का विचारों से बहुत बड़ा सम्बन्ध होता है। जो व्यक्ति अपने प्रति रोगी होने, निर्बल और असमर्थ होने का भाव रखते हैं और सोचते रहते हैं कि उनका स्वास्थ्य अच्छा नहीं रहता। उन्हें आंख, नाक, कान, पेट, पीठ का कोई न कोई रोग लगा ही रहता है। बहुत कुछ उपाय करने पर भी वे पूरी तरह स्वस्थ नहीं रह पाते, ऐसे अशिव विचारों को धारण करने वाले वास्तव में कभी भी स्वस्थ नहीं रह पाते। यदि उनको कोई रोग नहीं भी होता है तो भी उनकी इस अशिव विचार साधना के फलस्वरूप कोई न कोई रोग उत्पन्न हो जाता है और वे वास्तव में रोगी बन जाते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 मन: स्थिति बदले तो परिस्थिति बदले (भाग 27)

🌹 उदारता अपनाई ही जाए  

🔵 स्वर्ग और नरक की दीवारें आपस में जुड़ी हुई हैं। घर वही है, पर एक दरवाजे से घुसने पर गन्दगी से भरीपूरी नरक वाली कोठरी में पहुँचना पड़ता हैं, किन्तु यदि दूसरे दरवाजे से होते हुये भीतर जाया जा सके तो स्वच्छता, सज्जा और सुगन्धि से भरापूरा वातावरण ही दीख पड़ेगा।    

🔴 हम अब झगड़ने, हड़पने, निगलने और समेटने-भरने पर उतारू होते हैं, तो हाथों-हाथ अनीतिजन्य आत्म प्रताडऩा सहनी पड़ती है। बाहर की भर्त्सना और प्रताडऩा को तो सहा भी जा सकता है, पर जब अन्तरात्मा कचोटती है, तब उसे सहन करना कठिन पड़ता है। पैर में लगी चोट और हाथ में लगी लाठी उतनी असह्य नहीं होती, जितना कि अपेन्डिसाइटिस, यों हृदय घात जन्य दर्द से आदमी बेहतर तिलमिला जाता है और प्राणों पर आ बीतती है।     

🔵 मानवी गरिमा को खोकर मनुष्य से ऐसा कुछ बन ही नहीं पड़ता, जिस पर वह सन्तोष या गर्व कर सके, प्रसन्नता व्यक्त कर सके और समुदाय के सम्मुख सिर ऊँचा उठाकर चल सके। बाहर की वर्षा से छाता लगाकर भी बचा जा सकता है, पर जब भीतर से लानत बरसती है तो उससे कैसे बचा जाये? धरती पर नरकीटक, नर-पशु और नर-पिशाच भी भ्रमण करते रहते हैं। देखने में उनकी भी आकृति मनुष्य जैसी ही होती है। अन्तर तो आदतों को स्वभाव बनकर जमी हुई प्रकृति को देखकर ही किया जा सकता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 दीक्षा और उसका स्वरूप (भाग 1)

👉 युग ऋषि की अमृतवाणी

🔴 भगवान् ने मनुष्य के साथ ऐसा कोई पक्षपात नहीं किया है, बल्कि उसे अमानत के रूप में कुछ विभूतियाँ दी हैं। जिसको सोचना कहते हैं, जिसको विचारणा कहते हैं, जिसको बोलना कहते हैं, जिसको भावनाएँ कहते हैं, जिसको उसकी विशेषताएँ कहते हैं, सिद्धियाँ- विभूतियाँ कहते हैं। ये सब अमानतें हैं। ये अमानतें मनुष्यों को इसलिए नहीं दी गई हैं कि उनके द्वारा वह सुख- सुविधाएँ कमाये और स्वयं के लिए अपनी ऐय्याशी या विलासिता के साधन इकट्ठे करे और अपना अहंकार पूरा करे।

🔵 ये सारी की सारी चीजें सिर्फ इसलिए उसको दी गयी हैं कि इन चीजों के माध्यम से वो जो भगवान् का इतना बड़ा विश्व पड़ा हुआ है, उसकी दिक्कतें और कठिनाइयों का समाधान करे और उसे अधिक सुन्दर और सुव्यवस्थित बनाने के लिए प्रयत्न करे। उसके लिए सब अमानतें हैं।

🔴 बैंक के खजांची के पास धन रखा रहता है और इसलिए रखा रहता है कि सरकारी प्रयोजनों के लिए इस पैसे को खर्च करे। उसको उतना ही इस्तेमाल करने का हक है, जितना कि उसको वेतन मिलता है। खजाने में अगर लाखों रुपये रखे हों, तो खजांची उन्हें कैसे खर्च कर सकता है? उसे क्यों खर्च करना चाहिए? पुलिस के पास या फौज के पास बहुत सारी बन्दूकें और कारतूसें होती हैं वे इसलिए थोड़े ही उसके पास होती हैं कि उसको अपने लिए उनका इस्तेमाल करना चाहिए और चाहे जो तरीका अख्तियार करना चाहिए, ये नहीं हो सकता।

🔵 कप्तान को और जो फौज का कमाण्डर है, उसको अपना वेतन लेकर जितनी सुविधाएँ मिली हैं, उसी से काम चलाना चाहिए और बाकी जो उसके पास बहुत सारी सामर्थ्य और शक्ति बंदूक चलाने के लिए मिली है, उसको सिर्फ उसी काम में खर्च करना चाहिए, जिस काम के लिए सरकार ने उसको सौंपा है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/Diksha/11

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 60)

🌹 अनगढ़ मन हारा, हम जीते

🔴 पिछला जीवन बिलकुल ही दूसरे ढर्रे में ढला था। सुविधाओं और साधनों के सहारे गाड़ी लुढ़क रही थी। सब कुछ सीधा और सरल लग रहा था, पर हिमालय पहुँचते ही सब कुछ उलट गया। वहाँ की परिस्थितियाँ ऐसी थीं, जिनमें निभ सकना केवल उन्हीं के लिए सम्भव था, जो छिड़ी लड़ाई के दिनों में कुछ ही समय की ट्रेनिंग लेकर सीधे मोर्चे पर चले जाते हैं और उस प्रकार के साहस का परिचय देते हैं जिसका इससे पूर्व कभी पाला नहीं पड़ा था।

🔵 प्रथम हिमालय यात्रा का प्रत्यक्ष प्रतिफल एक ही रहा कि अनगढ़ मन हार गया और हम जीत गए। प्रत्येक नई असुविधा को देखकर उसने नए बछड़े की तरह हल में चलने से कम आना-कानी नहीं की, किन्तु उसे कहीं भी समर्थन न मिला। असुविधाओं को उसने अनख तो माना और लौट चलने की इच्छा प्रकट की, किन्तु पाला ऐसे किसान से पड़ा था जो मरने मारने पर उतारू था। आखिर मन को झक मारनी पड़ी और हल में चलने का अपना भाग्य अंगीकार करना पड़ा। यदि जी कच्चा पड़ा होता तो स्थिति वह नहीं बन पड़ती, जो अब बन गई है। पूरे एक वर्ष नई-नई प्रतिकूलताएँ अनुभव होती रहीं, बार-बार ऐसे विकल्प उठते रहे जिसका अर्थ होता था कि इतनी कड़ी परीक्षा में पड़ने पर हमारा स्वास्थ्य बिगड़ जाएगा। भविष्य की साँसारिक प्रगति का द्वार बंद हो जाएगा। इसलिए समूची स्थिति पर पुनर्विचार करना चाहिए।

🔴 एक बार तो मन में ऐसा ही तमोगुणी विचार भी आया, जिसे छिपाना उचित नहीं होगा। वह यह कि जैसा बीसियों ढोंगियों ने हिमालय का नाम लेकर अपनी धर्म ध्वजा फहरा दी है, वैसा ही कुछ करके सिद्ध पुरुष बन जाना चाहिए और उस घोषणा के आधार पर जन्म भर गुलछर्रे उड़ाने चाहिए। ऐसे बीसियों आदमियों की चरित्र गाथा और ऐशो-आराम भरी विडम्बना का हमें आद्योपान्त परिचय है। यह विचार उठा, वैसे ही उसे जूते के नीचे दबा दिया। समझ में आ गया कि मन की परीक्षा ली जा रही है। सोचा कि जब अपनी सामान्य प्रतिभा के बलबूते ऐशो-आराम के आडम्बर खड़े किए जा सकते हैं, तो हिमालय को, सिद्ध पुरुषों को, सिद्धियों को, भगवान को, तपश्चर्या को बदनाम करके आडम्बर रचने से क्या फायदा?

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 61)

🌹 हमारी जीवन साधना के अन्तरंग पक्ष-पहलू

🔵 हमारे बहुत से परिजन हमारी साधना और उसकी उपलब्धियों के बारे में कुछ अधिक जानना चाहते हैं और वह स्वाभाविक भी है। हमारे स्थूल जीवन के जितने अंश प्रकाश में आए हैं, वे लोगों की दृष्टि से अद्भुत हैं। उनमें सिद्धियों, चमत्कारों और अलौकिकताओं की झलक देखी जा सकती है। कौतूहल के पीछे उसके रहस्य को जानने की उत्सुकता स्वाभाविक है, सो अगर लोग हमारी आत्म- कथा जानना चाहते हैं, उसके लिए इन दिनों विशेष रूप से दबाव देते हैं। तो उसे अकारण नहीं कहा जा सकता।

🔴 यों हम कभी छिपाव के पक्ष में नहीं रहे- दुराव छल, कपट हमारी आदत में नहीं; पर इन दिनों हमारी विवशता है कि जब- तक रंग- मंच पर प्रत्यक्ष रूप से हमारा अभिनय चल रहा है, तब तक वास्तविक को बता देने पर दर्शकों का आनंद दूसरी दिशा में मुड़ जाएगा और जिस कर्तव्यनिष्ठा को सर्वसाधारण में जगाना चाहते हैं, वह प्रयोजन पूरा न हो सकेगा। लोग रहस्यवाद के जंजाल में उलझ जायेंगे, इससे हमारा व्यक्तित्व भी विवादास्पद बन जाएगा और जो करने कराने हमें भेजा गया है उसमें भी अड़चन पड़ेगी। नि:संदेह हमारा जीवन अलौकिकताओं से भरा पड़ा है। रहस्यवाद के पर्दे इतने अधिक हैं कि उन्हें समय से पूर्व  खोला जाना अहितकर ही होगा।  

🔵 पीछे वालों के लिए उसे छोड़ देते हैं कि वस्तुस्थिति की सचाई को प्रामाणिकता की कसौटी पर कसें और जितनी हर दृष्टि से परखी जाने पर सही निकले उससे यह अनुमान लगाएँ कि अध्यात्म विद्या कितनी समर्थ और सारगर्भित है। उस पारस से छूकर एक नगण्य- सा व्यक्ति अपने लोहे जैसे तुच्छ कलेवर को स्वर्ण जैसा बहुमूल्य बनाने में कैसे समर्थ, सफल हो सका। इस दृष्टि से हमारे जीवन- क्रम में प्रस्तुत हुए अनेक रहस्यमय तथ्यों की समय आने पर शोध की जा सकती है और उस समय उस कार्य में हमारे अति निकटवर्ती सहयोगी कुछ सहायता भी कर सकते हैं; पर अभी वह समय से पहले  की बात है। इसलिए उस पर वैसे ही पर्दा रहना चाहिए, जैसे अब तक पड़ा रहा है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books/sunsaan_ke_shachar/hamari_jivan_saadhna

बुधवार, 22 फ़रवरी 2017

👉 आज का सद्चिंतन 23 Feb 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 23 Feb 2017


👉 तुम सदा रहते साथ हमारे

🔴 आज से करीब आठ वर्ष पहले की बात है। मैं झारखण्ड राज्य के भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा की जिला संयोजक थी। भा.सं.ज्ञा.परीक्षा सम्पादित कराने हेतु मुझे अक्सर झारखण्ड के कई जिलों का दौरा करना पड़ता था। एक बार मैं झींकपानी चाईबासा होकर वापस जमशेदपुर आ रही थी। अचानक एक जगह आकर हमारी बस रुक गई। आगे का रास्ता जाम था। बस कण्डक्टर ने बताया गाड़ी आगे नहीं जाएगी। आप लोगों को जाना हो, तो निजी वाहन, ऑटो रिक्शा आदि से जा सकते हैं। पता चला आज सरहूल है। यह इस क्षेत्र का प्रसिद्ध त्योहार है, जिसमें हजारों- हजार नर- नारी इकट्ठे होकर नाचते- गाते, खुशियाँ मनाते हैं। देखा, सड़क के दोनों ओर लगभग पाँच- सात हजार लोग अपने पारम्परिक वेश- भूषा में पंक्तिबद्ध खड़े होकर एक दूसरे की कमर पकड़कर नृत्य कर रहे हैं। सभी का शरीर एक साथ एक ताल पर आगे- पीछे, दाएँ- बाएँ झुक रहे थे।

🔵 झारखण्ड की संस्कृति की झाँकी को प्रस्तुत करता नृत्य- उत्सव का वह अपूर्व दृश्य भी मुझे बाँध न सका। बार- बार घिरती हुए साँझ की ओर देखती और मन कहता जल्दी घर पहुँचना है। बहुत लोग बस से उतर- उतर कर पैदल ही अपने रास्ते की ओर चल दिए। बस के कर्मचारी वहीं विश्राम की तैयारी करने लगे। हमें बता दिया गया कि यह कार्यक्रम अभी तीन- चार घण्टे तक चलेगा। मजबूर होकर मुझे भी उतर जाना पड़ा।

🔴 मुझे उस स्थान के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। लोगों से पूछताछ करने पर पता चला कि उस स्थान को हाता के नाम से जाना जाता है। मुझे किसी ने बताया जमशेदपुर जाने के लिए पश्चिम की ओर चलना होगा। इसी आधार पर मैं अपने गन्तव्य की ओर बढ़ने लगी। धीरे- धीरे अँधेरा घिर आया। सुनसान सड़क पर इक्के- दुक्के लोग ही चल रहे थे। सड़क के दोनों ओर क्या है, आगे वाले रास्ते में खाई है या खन्दक, रोड़ा है या कीचड़ यह भी नहीं दीखता। मैं अनायास कदम बढ़ाती जा रही थी। बगल की कँटीली झाड़ियों से कई बार पाँव भी जख्मी होते जा रहे थे, मगर मेरे मन में केवल एक बात आ रही थी कि समय रहते घर पहुँचना है। एक अनजाना सा भय मुझे दबाए जा रहा था। अकेली औरत, सुनसान सड़क, क्या कुछ नहीं हो सकता था। लेकिन मुझे घर पहुँचने की जल्दी थी।
  
🔵 अचानक मैंने ख्याल किया कि मेरे आगे- आगे सफेद धोती पहने लम्बे कद के कोई पुरुष चल रहे हैं। उनके कमर के ऊपर का हिस्सा नहीं दीख रहा। मुझे भय भी लग रहा था मगर उन्हीं के साथ- साथ कदम मिलाती हुई पीछे- पीछे चली जा रही थी। मुझे लग रहा था आगे वाले व्यक्ति के कदम तीन- तीन फीट पर पड़ रहे हैं। पता नहीं मैं कैसे उस गति से चल रही थी। उस समय यह सब सोचने के लिए भी समय नहीं था। जैसे मेरे कदम हवा में पड़ रहे थे। कष्ट की अनुभूति भी नहीं हो रही थी। करीब आधे- पौन घण्टे तक इसी तरह चलती गई। इसके बाद शहरी इलाका दीखने लगा। दुकानों की झिलमिल रोशनी देख मन में साहस आया। इसके बाद वह व्यक्ति भी न जाने कब आँखों से ओझल हो गया।

🔴 एक टेलीफोन बूथ पर जाकर मैंने फोन किया। घर में सूचना दी। विलम्ब होने का कारण बताया। वहीं पूछने पर पता चला उस स्थान का नाम परसूडीह है। वहाँ से ऑटो रिक्शा लेकर मैं बस स्टैण्ड गई, जहाँ से साकची की बस मिलने वाली थी।

🔵 जब घर पहुँची और सब हाल बताया, तो सभी विस्मय से अवाक रह गए। कहा- हाता से परसूडीह तुम इतनी जल्दी पहुँची कैसे? वह तो २५- ३० किलोमीटर का रास्ता है। मुझे आगे- आगे चलने वाले उस मार्गदर्शक की याद आई। श्रद्धा से नतमस्तक हो गई मैं। गुरुदेव कई बार कहा करते थे- बेटा, तुम मेरे काम में एक कदम भर बढ़ाओ, मैं तुम्हें सफलता के रास्ते दस कदम बढ़ा दूँगा।

🌹 सुषमा पात्रो टाटानगर (झारखण्ड)    
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Samsarn/Wonderfula

👉 महाकाल का प्रतिभाओं को आमंत्रण (भाग 2)

🌹 सर्वोपरि उपलब्धि-प्रतिभा  

🔴 मनुष्य ने सृष्टि के समस्त प्राणियों की तुलना में वरिष्ठता पाई है। शरीर-संरचना और मानसिक-मस्तिष्कीय विलक्षणता के कारण उसने सृष्टि के समस्त प्राणियों की तुलना में न केवल स्वयं को सशक्त, समुन्नत सिद्ध किया है; वरन् वह ऐसी सम्भावनाएँ भी साथ लेकर आया है, जिनके सहारे अपने समुदाय को, अपने समग्र वातावरण एवं भविष्य को भी शानदार बना सके। यह विशेषता प्रयत्नपूर्वक उभारी जाती है। रास्ता चलते किसी गली-कूचे में पड़ी नहीं मिल जाती। इस दिव्य विभूति को प्रतिभा कहते हैं। जो इसे अर्जित करते हैं, वे सच्चे अर्थों में वरिष्ठ-विशिष्ट कहलाने के अधिकारी बनते हैं, अन्यथा अन्यान्य प्राणी तो, समुदाय में एक उथली स्थिति बनाए रहकर किसी प्रकार जीवनयापन करते हैं।        

🔵 मनुष्य, गिलहरी की तरह पेड़ पर नहीं चढ़ सकता। बन्दर की तरह कुलाचें नहीं भर सकता। बैल जितनी भार वहन की क्षमता भी उसमें नहीं है। दौड़ने में वह चीते की तुलना तो क्या करेगा, खरगोश के पटतर भी अपने को सिद्ध नहीं कर सकता। पक्षियों की तरह आकाश में उड़ना उसके लिए सम्भव नहीं, न मछलियों की तरह पानी में डुबकी ही लगा सकता है। अनेक बातों में वह अन्य प्राणियों की तुलना में बहुत पीछे है; किन्तु विशिष्ट मात्रा में मिली चतुरता, कुशलता के सहारे वह सभी को मात देता है और अपने को वरिष्ठ सिद्ध करता है।

🔴 व्यावहारिक जीवन में मनुष्य अन्य प्राणि-समुदाय की तुलना में अनेक दृष्टियों से कहीं आगे है, वह उसी की नियति है। अधिकांश मनुष्यों को अन्य प्राणियों की अपेक्षा अधिक सुविधा-सम्पन्न जीवन-यापन करते हुए देखा जाता है। इतने पर भी सम्भावना यह भी है कि वह इन उपलब्धियों की तुलना में और भी अधिक समर्थता और महत्ता प्राप्त कर सके। पर शर्त एक ही है कि उस अभिवर्धन के लिए वह स्वयं अतिरिक्त प्रयास करे। कमियों को दूर करें और जिसकी नितान्त आवश्यकता है, उसे पाने-कमाने के लिए अधिक जागरूगतापूर्वक, अधिक तत्परता एवं तन्मयता बरते।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 सत्य मेरा जीवन-मंत्र

🔴 दादा मावलंकर जिस अदालत के वकील थे उसका मजिस्ट्रेट उनका कोई घनिष्ठ मित्र था। यों वकालत के क्षेत्र में उन्हें पर्याप्त यश और सम्मान भी बहुत मिला था। संपत्ति भी उनके पास थी, पर यह सब कुछ उनके लिये तब तक था, जब तक उनके सांच को आँच न आने पाती थी। वे कोई झूठा मुकदमा नहीं लेते थे और सच्चाई के पक्ष में कोई भी प्रयत्न छोड़ते नहीं थे।

🔵 यह उदाहरण उन सबके लिए आदर्श है जो यह कहते हैं कि आज का युग ही ऐसा है झूठ न बोलो, मिलावट न करो तो काम नहीं चलता। सही बात तो यह है कि झूठे, चापसूस और अपना स्वार्थ सिद्ध करने वाले के जीवन सदैव टकराते रहते है।

🔴 विषाद, क्षोभ, ग्लानि, अपमान, अशांति और पश्चाताप की परिस्थितियाँ बनावटी लोगों के पास ही आती हैं। सच्चे व्यक्तियों के जीवन में बहुत थोडी अशांति, अव्यवस्था और तंगी रहती है। अधिकांश तो शान और स्वाभिमान का ही जीवन जीते है।

🔵 वैसे ही मावलंकर जी भी थे। एक बार उनके पास बेदखली के लगभग ४० मुकदमे आए। मुकमे लेकर पहुँचने वाले लोग जानते थे कि कलक्टर साहब मावलंकर जी के मित्र है। इसलिये सुनिश्चित जीत की आशा से वे भारी रकम चुकाने को तैयार थे। मावलंकर चाहते तो वैसा कर भी सकते थे, किंतु उन्होंने पैसे का रत्तीभर भी लोभ न कर सच्चाई और मनुष्यता का ही बडप्पन रखा।

🔴 सभी दावेदारों को बुलाकर उन्होंने पूछा देखो भाई आज तो आप लोगों ने सब कुछ देखसमझ लिया। आप लोग घर जाओ। कल जिनके मुकदमे सही हों वही मेरे पास आ जाना।

🔵 दूसरे दिन कुल एक व्यक्ति पहुँचा। मावलंकर जी ने उस एक मुकदमे को लिया और ध्यान देकर उसकी ही पैरवी की। वह व्यक्ति विजयी भी हुआ। शेष ने बहुत दबाव डलवाया पर उन्होंने वह मुकदमे छुए तक नहीं।

🔴 आप जानते होंगे कि गाँधी जी भी प्रारंभ में बैरिस्टर थे। उनका जीवनमंत्र था- "सच्चाई का समर्थन और उसके लिए लड़ना।" झूठ और छल से जिस तरह औरों को घृणा होती है, उन्हें भी घृणा थी पर ऐसी नहीं कि स्वार्थ का समय आए तो उनकी निष्ठा डिग जाए। सत्य वही है जो जीवन में उतरे तो अपने पराये, हानि-लाभ, मान-अपमान का ध्यान किये बिना निरंतर सखा और मित्र बना रहे।

🔵 जब गांधी जी अफ्रीका मे थे तब उन्हें एक मुकदमा मिला। लाखों की संपत्ति का मुकदमा था। मुकदमा चलाने वाला पक्ष जीत गया। गांधी जी के काफी बडी रकम फीस में मिली।

🔴 इस बीच गाँधी जी को पता चल गया कि मुकदमा झूठा था तब वे एक बडे वकील के साथ मुकदमा करते थे। उन्होंने जाकर कहा- मुकदमा गलत हो गया है। सच्चे पक्ष को हम लोगों ने बुद्धि-चातुर्य से हराया, यह मुझे अच्छा नहीं लगता न यह मानवता के सिद्धंतों के अनुरूप ही है। जिसकी संपत्ति है उसी के मिले, दूसरा अनधिकार चेष्टा क्यों करे ''

🔵 वकील बहुत गुस्सा हुआ और बोला यह वकालत है महाशय इसमें सच्चाई नहीं चलती। सच्चाई ढूँढो़गे तो भूखों मरोगे।"

🔴 गाँधी जी न अपनी बात से डिगे न भूखे मरने की नौबत आई। उनकी निष्ठ ने उन्हें उपर ही उठाया। सारी दुनिया का नेता बना दिया। उन्होंने वह मुकदमा फिर अदालत में पेश कर दिया। सारी बात जज को समझायी। जज ने मामला पलट दिया और अंत में सत्य पक्ष की ही जीत हुई। आर्थिक लाभ भले ही न हुआ हो पर उससे उनकी प्रतिष्ठा को आँच न आई।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 42, 43

👉 सच्चा जन नेता

🔴 रुस के जन नेता लेनिन पर एक बार उनके शत्रुओं ने घातक आक्रमण किया और वे घायल रोग शय्या पर गिर पड़े। अभी ठीक तरह अच्छे भी नहीं हो पाये थे कि एक महत्वपूर्ण रेलवे लाइन टूट गई। उसकी तुरंत मरम्मत किया जाना आवश्यक था। काम बड़ा था फिर भी जल्दी पूरा हो गया। 
 
🔵 काम पूरा होने पर जब हर्षोत्सव हुआ तो देखा कि लेनिन मामूली कुली-मजदूरों की पंक्ति में बैठे हैं। रुग्णता के कारण दुर्बल रहते हुए भी लट्ठे ढोने का काम बराबर करते रहें और अपने साथियों में उत्साह की भावना पैदा करते रहे।
 
🔴 आश्चर्यचकित लोगों ने पूछा-''आप जैसे जन-नेता को अपने स्वास्थ्य की चिंता करते हुए इतना कठिन काम नहीं करना चाहिए था।'' लेनिन ने हँसते हुए कहा-"जो इतना भी नहीं कर सके उसे जन-नेता कौन कहेगा?''

🌹 प्रज्ञा पुराण भाग 2 पृष्ठ 16

👉 महानता से नाता जोड़ने की सूझबूझ

🔴 महानता के साथ सम्पर्क साधकर उस सहयोग का सुयोग पा लेना एक ऐसा अप्रत्याशित सौभाग्य है, जो कभी-कभी मनुष्य को मिलता है। ऐसे अवसर सदा-सर्वदा किसी को नहीं मिलते। पारस पत्थर को स्पर्श कर काले कुरूप और सस्ते मोल वाले लोहे का सोने जैसी गौरवास्पद बहुमूल्य धातु में बदल जाना सम्पर्क का परिणाम है। स्वाति की बूँदों से लाभान्वित होने पर सीप जैसी उपेक्षित इकाई को मूल्यवान मोती प्रसव करने का श्रेय मिलता है। पेड़ से लिपट कर चलने वाली बेल उसी के बराबर ऊँची जा पहुँचती और अपनी उस प्रगति पर गर्व करती है।

🔵 अपने बलबूते वह मात्र जमीन पर थोड़ी दूर रेंग ही सकती थी, किन्तु उसकी दुर्बल काया को देखकर इतने ऊँचे चढ़ जाने की बात साधारण बुद्धि की समझ में नहीं आती। पेड़ का सान्निध्य और लिपट पड़ने का पुरुषार्थ जब सोना में सुहागा जैसे समन्वय बनाता है, तो उससे महान पक्ष की कोई हानि नहीं होती, पर दुर्बल पक्ष को अनायास ही दैवी वरदान जैसा लाभ मिल जाता है। समर्पण के सामीप्य को महानता के साथ जुड़ने के ये कुछ उदाहरण हैं जो बताते हैं कि व्यक्ति के लिए वरेण्य क्या है।

🔴 दैवी प्रयोजनों में यदि क्षुद्र से जीव भी तनिक सा सहयोग करें तो दैवी सहायता अपरिमित परिमाण में पाते हैं। बन्दरों की समुद्र पर पुल बनाने की उदार श्रमशीलता एवं गिलहरी की बालू से समुद्र को पाटने की निष्ठा ने उन्हें ऐतिहासिक बना दिया। सुग्रीव के सहयोगी खोह-कन्दरा में आश्रय हेतु भटकने वाले हनुमान जब श्रीराम के सहयोगी बन गये तो पर्वत उठाने, समुद्र लांघने, लंका जलाने जैसा असम्भव पराक्रम दिखाकर युद्ध में जीत का निमित्त बन राम पंचायतन का एक अंग बन गए। अर्जुन-भीम वे ही थे, जिनने द्रौपदी को निर्वसन होते आँखों से देखा व वनवास के समय पेट भरने और जान बचाने के लिए जिन्हें बहुरूपिए बन कर दिन गुजारने पड़े थे। श्रीकृष्ण रूपी महान् सत्ता को अपनाने वाली उनकी बुद्धिमता ने उन्हें महाभारत के, विराट भारत के निर्माण का श्रेयाधिकारी बना दिया।

🔵 यह सुनिश्चित तथ्य है कि जिस किसी पर भगवत्कृपा बरसती है, वह महानता से अपना नाता जोड़ने की सूझबूझ-सत्प्रेरणा के रूप में ही बरसती है। आज की विषम परिस्थितियों में यदि यह तथ्य हम सब भी सीख-समझ कर महानता को अपना सकें, तो निश्चित उस श्रेय को प्राप्त करेंगे, जो प्रज्ञावतार की सत्ता इस सन्धिकाल की विषमवेला में अनायास ही हमें देना चाहती है।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 19