मंगलवार, 8 मार्च 2016

हमारी वसीयत और विरासत भाग 11
जीवन के सौभाग्य का सूर्योदय

वह पावन दिन-बसन्त पर्व का दिन था। प्रातः ब्रह्म मुहूर्त था। नित्य की तरह सन्ध्या वन्दन का नियम निर्वाह चल रहा था। प्रकाश पुंज के रूप में देवात्मा का दिव्य दर्शन- उसी कौतूहल से मन में उठी जिज्ञासा और उसके समाधान का यह उपक्रम चल रहा था। नया भाव जगा उस प्रकाश पुंज से घनिष्ठ आत्मीयता का। उनकी महानता अनुकम्पा और साथ ही अपनी कृतज्ञता का। इस स्थिति ने मन का काया-कल्प कर दिया। कल तक जो परिवार अपना लगता था वह पराया होने लगा और जो प्रकाश पुंज अभी-अभी सामने आया था, वह प्रतीत होने लगा कि मानो यही हमारी आत्मा है।

इसी के साथ हमारा भूतकाल बंधा हुआ था और अब जितने दिन जीना है, वह अवधि भी इसी के साथ जुड़ी रहेगी। अपनी ओर से कुछ कहना नहीं। कुछ चाहना नहीं। किन्तु दूसरे का जो आदेश हो उसे प्राण-पण से पालन करना। इसी का समर्पण है। समर्पण मैंने उसी दिन प्रकाश पुंज देवात्मा को किया और उन्हीं को न केवल मार्गदर्शक वरन् भगवान के समतुल्य माना। उस सम्बन्ध निर्वाह को प्रायः साठ वर्ष से अधिक होने को आते हैं। बिना कोई तर्क बुद्धि लड़ाये, बिना कुछ ननुनच किए, इशारे पर-एक ही मार्ग पर गतिशीलता होती रही है। सम्भव है या नहीं अपने बूते यह हो सकेगा या नहीं, इसके परिणाम क्या होंगे? इन प्रश्नों में से एक भी आज तक मन में उठा नहीं।

उस दिन मैंने एक और नई बात समझी कि सिद्ध पुरुषों की अनुकम्पा मात्र लोक-हित के लिए- सत्प्रवृत्ति सम्वर्धन के निमित्त होती है। न उनका कोई सगा सम्बन्धी होता है न उदासीन विरोधी। किसी को ख्याति, सम्पदा या कीर्ति दिलाने के लिए उनकी कृपा नहीं बरसती। विराट् ब्रह्म- विश्व मानव ही उनका आराध्य होता है। उसी के निमित्त अपने स्वजनों को वे लगाते हैं, अपनी इस नवोदित मान्यता के पीछे राम कृष्ण- विवेकानन्द का, समर्थ रामदास- शिवाजी का, चाणक्य-चन्द्रगुप्त का, गांधी-विनोबा का, बुद्ध-अशोक का गुरू शिष्य का सम्बन्ध स्मरण हो आया।

क्रमशः जारी
हमारी वसीयत और विरासत पृष्ठ 14-15
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/hari/jivana.2

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