बुधवार, 9 मार्च 2016


जीवन के सौभाग्य का सूर्योदय

जिनकी आत्मीयता में ऐसा कुछ न हो, सिद्धि-चमत्कार, कौतुक-कौतूहल दिखाने या सिखाने का क्रिया-कलाप चलता रहा हो, समझना चाहिए कि वहां गुरू और शिष्य की क्षुद्र प्रवृत्ति है और जादूगर-बाजीगर जैसा कोई खेल-खिलवाड़ चल रहा है। गन्ध बाबा- चाहे जिसे सुगन्धित फूल सुंघा देते थे। बाघ बाबा- अपनी कुटी में बाघ को बुलाकर बिठा लेते थे। समाधि बाबा- कई दिन तक जमीन में गढ़े रहते थे। सिद्ध बाबा- आगन्तुकों की मनोकामना पूरी करते थे। ऐसी-ऐसी अनेक जन श्रुतियां भी दिमाग में घूम गईं और समझ में आया कि यदि इन घटनाओं के पीछे मैस्मेरिज्म स्तर की जादूगरी थी तो ‘महान’ कैसे हो सकते हैं।

ठण्डे प्रदेश में गुफा में रहना जैसी घटनाएं भी कौतूहल वर्धक ही हैं। जो काम साधारण आदमी न कर सके उसे कोई एक करामात की तरह कर दिखाए तो इसमें कहने भर की सिद्धाई है। मौन रहना, हाथ पर रखकर भोजन करना, एक हाथ ऊपर रखना, झूले पर पड़े-पड़े समय गुजारना जैसे असाधारण करतब दिखाने वाले बाजीगर सिद्ध हो सकते हैं। पर यदि कोई वास्तविक सिद्ध या शिष्य होगा तो उसे पुरातन काल के लोग मंगल के लिए जीवन उत्सर्ग करने वाले ऋषियों के राजमार्ग पर चलना पड़ा होगा। आधुनिक काल में भी विवेकानन्द, दयानन्द, कबीर, चैतन्य, समर्थ की तरह उसी मार्ग पर चलना पड़ा होगा।

भगवान अपना नाम जपने मात्र से प्रसन्न नहीं होते, न उन्हें पूजा प्रसाद आदि की आवश्यकता है। जो उनके इस विश्व उद्यान को सुरम्य, सुविकसित करने में लगते हैं, उन्हीं का नाम जप सार्थक है। यह विचार मेरे मन में उसी वसन्त पर्व के दिन, दिन भर उठते रहे। क्योंकि उनने स्पष्ट कहा था कि ‘‘पात्रता में जो कमी है उसे पूरा करने के साथ-साथ लोक-मंगल का कार्य भी साथ-साथ करना है। एक के बाद दूसरा नहीं, दोनों साथ-साथ।’’ चौबीस वर्ष की उपासना क्रम समझाया। गायत्री पुरश्चरणों की श्रृंखला बताई। इसके साथ पालन करने योग्य नियम बताये, साथ ही स्वतन्त्रता संग्राम में एक सच्चे स्वयं सेवक की तरह काम करते रहने के लिए कहा।

क्रमशः जारी
हमारी वसीयत और विरासत पृष्ठ 16
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/hari/jivana.3

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