बुधवार, 11 जनवरी 2017

👉 कोयले का टुकड़ा

 🔵 अमित एक मध्यम वर्गीय परिवार का लड़का था। वह बचपन से ही बड़ा आज्ञाकारी और मेहनती छात्र था। लेकिन जब से उसने कॉलेज में दाखिला लिया था उसका व्यवहार बदलने लगा था। अब ना तो वो पहले की तरह मेहनत करता और ना ही अपने माँ-बाप की सुनता।  यहाँ तक की वो घर वालों से झूठ बोल कर पैसे भी लेने लगा था। उसका बदला हुआ आचरण सभी के लिए चिंता का विषय था। जब इसकी वजह जानने की कोशिश की गयी तो पता चला कि अमित बुरी संगती में पड़ गया है।  कॉलेज में उसके कुछ ऐसे मित्र बन गए हैं जो फिजूलखर्ची करने, सिनेमा देखने और धूम्र-पान करने के आदि हैं।

🔴 पता चलते ही सभी ने अमित को ऐसी दोस्ती छोड़ पढाई- लिखाई पर ध्यान देने को कहा; पर अमित का इन बातों से कोई असर नहीं पड़ता, उसका बस एक ही जवाब होता,  मुझे अच्छे-बुरे की समझ है, मैं भले ही ऐसे लड़को के साथ रहता हूँ पर मुझपर उनका कोई असर नहीं होता…

🔵 दिन ऐसे ही बीतते गए और धीरे-धीरे परीक्षा के दिन आ गए, अमित ने परीक्षा से ठीक पहले कुछ मेहनत की पर वो पर्याप्त नहीं थी, वह एक विषय में फेल हो गया । हमेशा अच्छे नम्बरों से पास होने वाले अमित के लिए ये किसी जोरदार झटके से कम नहीं था। वह बिलकुल टूट सा गया, अब ना तो वह घर से निकलता और ना ही किसी से बात करता। बस दिन-रात अपने कमरे में पड़े कुछ सोचता रहता। उसकी यह स्थिति देख परिवारजन और भी चिंता में पड़ गए। सभी ने उसे पिछला रिजल्ट भूल आगे से मेहनत करने की सलाह दी पर अमित को तो मानो सांप सूंघ चुका था, फेल होने के दुःख से वो उबर नही पा रहा था।

🔴 जब ये बात अमित के पिछले स्कूल के प्रिंसिपल को पता चली तो उन्हें यकीन नहीं हुआ, अमित उनके प्रिय छात्रों में से एक था और उसकी यह स्थिति जान उन्हें बहुत दुःख हुआ, उन्होंने निष्चय किया को वो अमित को इस स्थिति से ज़रूर निकालेंगे।

🔵 इसी प्रयोजन से उन्होंने एक दिन अमित को अपने घर बुलाया।

🔴 प्रिंसिपल साहब बाहर बैठे अंगीठी ताप रहे थे। अमित उनके बगल में बैठ गया। अमित बिलकुल चुप था , और प्रिंसिपल साहब भी कुछ नहीं बोल रहे थे। दस -पंद्रह मिनट ऐसे ही बीत गए पर  किसी ने एक शब्द नहीं कहा। फिर अचानक प्रिंसिपल साहब उठे और चिमटे से कोयले के एक धधकते टुकड़े को निकाल मिटटी में डाल दिया, वह टुकड़ा कुछ देर तो गर्मी  देता रहा पर अंततः ठंडा पड़ बुझ गया।

🔵 यह देख अमित कुछ उत्सुक हुआ और बोला,  प्रिंसिपल साहब, आपने उस टुकड़े को मिटटी में क्यों डाल दिया, ऐसे तो वो बेकार हो गया, अगर आप उसे अंगीठी में ही रहने देते तो अन्य टुकड़ों की तरह वो भी गर्मी देने के काम आता !

🔴 प्रिंसिपल साहब मुस्कुराये और बोले,  बेटा, कुछ देर अंगीठी में बाहर रहने से वो टुकड़ा बेकार नहीं हुआ, लो मैं उसे दुबारा अंगीठी में डाल देता हूँ…. और ऐसा कहते हुए उन्होंने टुकड़ा अंगीठी में डाल दिया।

🔵 अंगीठी में जाते ही वह टुकड़ा वापस धधक कर जलने लगा और पुनः गर्मी प्रदान करने लगा।

🔴 कुछ समझे अमित।  प्रिंसिपल साहब बोले, तुम उस कोयले के टुकड़े के समान ही तो हो, पहले जब तुम अच्छी संगती में रहते थे, मेहनत करते थे, माता-पिता का कहना मानते थे तो अच्छे नंबरों से पास होते थे, पर जैस वो टुकड़ा कुछ देर के लिए मिटटी में चला गया और बुझ गया, तुम भी गलत संगती में पड़ गए  और परिणामस्वरूप  फेल हो गए, पर यहाँ ज़रूरी बात ये है कि एक बार फेल होने से तुम्हारे अंदर के वो सारे गुण समाप्त नहीं हो गए… जैसे कोयले का वो टुकड़ा कुछ देर मिटटी में पड़े होने के बावजूब बेकार नहीं हुआ और अंगीठी में वापस डालने पर धधक कर जल उठा, ठीक उसी तरह तुम भी वापस अच्छी संगती में जाकर, मेहनत कर एक बार फिर मेधावी छात्रों की श्रेणी में आ सकते हो … 

🔵 याद रखो,  मनुष्य ईश्वर की बनायीं सर्वश्रेस्ठ कृति है उसके अंदर बड़ी से बड़ी हार को भी जीत में बदलने की ताकत है, उस ताकत को पहचानो, उसकी दी हुई असीम शक्तियों का प्रयोग करो और इस जीवन को सार्थक बनाओ।

🔴 अमित समझ चुका था कि उसे क्या करना है, वह चुप-चाप उठा, प्रिंसिपल साहब के चरण स्पर्श किये और निकल पड़ा अपना भविष्य बनाने

21 टिप्‍पणियां:

  1. aisa lag raha mano.. Gayatri maa ne meri liye hi likh kar beji h ye story....

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  2. Is kahani se sirf bachhe hi nahi MA aur pitaji bhi bahot kuch Sikh sakte hai,jai gurudev

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  3. Is kahani se sirf bachhe hi nahi MA aur pitaji bhi bahot kuch Sikh sakte hai,jai gurudev

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  4. Is kahani se sirf bachhe hi nahi MA aur pitaji bhi bahot kuch Sikh sakte hai,jai gurudev

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  5. aisa lag raha mano.. Gayatri maa ne meri liye hi likh kar beji h ye story....

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  6. Very interesting very inspirational..highly motivational..
    Pl continue this path of inspiration.
    Jai maa Gayatri.

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