रविवार, 14 अगस्त 2016

👉 समाधि के सोपान (भाग 17) (In The Hours Of Meditation)


🔴 अहो! एक जीवन है, जो प्रेम है, आनन्द है। मैं- वही जीवन हूँ। उस जीवन को कोई सीमित नहीं कर सकता, परिमित नहीं कर सकता तथा वही अनन्त जीवन है। वही शाश्वत जीवन है और वह जीवन मैं ही हूँ। उसका स्वभाव शांति है और मैं स्वयं शांति हूँ। उसकी समग्रता में कहीं कलह नहीं है। त्वरित आवागमन नहीं है। जीने की निर्दय चेष्टा नहीं है, प्रजनन की इच्छा नहीं है। वह अस्तिमात्र है। मैं वही जीवन हूँ। सूर्य और तारे इसे धारण नहीं कर सकते। इस ज्योति से अधिक प्रकाशमान और कोई ज्योति नहीं है। यह स्वयं- प्रभ है। इस जीवन की गहराइयों को नहीं नापा जा सकता। इसकी ऊँचाइयों को नहीं नापा जा सकता। मैं ही वह जीवन हूँ। तथा तुम मुझमें और मैं तुममें हूँ।

🔵 स्वयं निरालम्ब हो कर भी मैं सब का अवलम्बन हूँ। सभी रूपों में आत्मा मैं ही हूँ। जीवन की ध्वनि में मैं मौन हूँ। समय के ताने- बाने में बुना हुआ सब कुछ मैं ही हूँ। विचार और रूप के परे आत्मा मैं ही हूँ। मनरहित होकर भी मैं सर्वज्ञ हूँ। अरूप होकर भी मैं सर्वत्र हूँ। अधार्य होकर मैं सभी में विद्यमान हूँ। मैं शक्ति  हूँ ! मैं शांति हूँ। मैं अनंत हूँ।  मैं शाश्वत हूँ। सभी विविधताओं में ऐक्य स्थापन करने वाला सूत्र मैं ही हूँ। सभी जीवधारियों का सारतत्त्व मैं ही हूँ। सभी संघर्षरत अंशों का पूर्ण मैं ही हूँ। जन्म मृत्यु की सीमा के परे, अमर, अजन्मा, बंधनमुक्त में ही विद्यमान हूँ। जो मुझे पा लेता है वही मुक्त है।

🔴 सभी भ्रान्तियों के मध्य में मैं सत्य को देखता हूँ। वह दृश्य सत्य मैं ही हूँ। माया जो कि माँ का ही स्वरूप है, मैं उस मायिक शक्ति का शक्तिधर हूँ। काल के गर्भ से उत्पन्न होकर सभी रूपधारियों में मैं ही रूपधारण करता हूँ। मैं काल का भी जन्मस्थान हूँ। इसलिए शाश्वत हूँ। तथा जीव, तू वही है, जो मुझमें है, वही अन्तरात्मा ! इसलिए उठो, जागो और सभी बंधनों को छिन्न भिन्न कर दो। सभी स्वप्नों को भंग कर दो। भ्रांतियों को दूर कर दो। तुम्हीं आत्मा हो। आत्मा ही तुम हो। तुच्छता तुम्हारे स्वरूप के अनुभव में बाधा दे सकती है।  उठो ! उठो !! और जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाय न रुको। लक्ष्य जो आत्मा है, जीवन है, प्रेम है, है, जो कि मुक्त आत्मा का आनन्द, -ज्ञान है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

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