रविवार, 2 अक्तूबर 2016

👉 एक वेश्या ने कराया था विवेकानंद को संन्यासी होने का अहसास

🔴 स्वामी जी ने शिकागो की धर्म संसद में भाषण देकर दुनिया को ये एहसास कराया कि भारत विश्व गुरु है। अमेरिका जाने से पहले स्वामी विवेकानंद जयपुर के एक महाराजा के महल में रुके थे। महाराजा राजा विवेकानंद और रामकृष्ण परमहंस का भक्त था। विवेकानंद के स्वागत के लिए राजा ने एक भव्य आयोजन किया। इसमें वेश्याओं को भी बुलाया गया। शायद राजा यह भूल गया कि वेश्याओं के जरिए एक संन्यासी का स्वागत करना ठीक नहीं है। विवेकानंद उस वक्त अपरिपक्‍व थे। वे अभी पूरे संन्‍यासी नहीं बने थे। वह अपनी कामवासना और हर चीज दबा रहे थे। जब उन्‍होंने वेश्‍याओं को देखा तो अपना कमरा बंद कर लिया। जब महाराजा को गलती का अहसास हुआ तो उन्होंने विवेकानंद से माफी मांगी।

🔵 महाराजा ने कहा कि उन्होंने वेश्या को इसके पैसे दे दिए हैं, लेकिन ये देश की सबसे बड़ी वेश्या है, अगर इसे ऐसे चले जाने को कहेंगे तो उसका अपमान होगा। आप कृपा करके बाहर आएं। विवेकानंद कमरे से बाहर आने में डर रहे थे। इतने में वेश्या ने गाना गाना शुरू किया, फिर उसने एक सन्यासी गीत गाया। गीत बहुत सुंदर था। गीत का अर्थ था-
''मुझे मालूम है कि मैं तुम्‍हारे योग्‍य नहीं, तो भी तुम तो जरा ज्‍यादा करूणामय हो सकते थे। मैं राह की धूल सही, यह मालूम मुझे। लेकिन तुम्‍हें तो मेरे प्रति इतना विरोधात्‍मक नहीं होना चाहिए। मैं कुछ नहीं हूं। मैं कुछ नहीं हूं। मैं अज्ञानी हूं। एक पापी हूं। पर तुम तो पवित्र आत्‍मा हो। तो क्‍यों मुझसे भयभीत हो तुम?''

🔴 विवेकानंद ने अपने कमरे इस गीत को सुना, वेश्‍या रोते हुए गा रही थी। उन्होंने उसकी स्थिति का अनुभव किया और सोचा कि वो क्या कर रहे हैं। विवेकानंद से रहा नहीं गया और उन्होंने कमरे का गेट खोल दिया। विवेकानंद एक वेश्या से पराजित हो गए। वो बाहर आकर बैठ गए। फिर उन्होंने डायरी में लिखा, ''ईश्‍वर से एक नया प्रकाश मिला है मुझे। डरा हुआ था मैं। जरूर कोई लालसा रही होगी मेरे भीतर। इसीलिए डर गया मैं। किंतु उस औरत ने मुझे पूरी तरह हरा दिया। मैंने कभी नहीं देखी ऐसी विशुद्ध आत्‍मा।'' उस रात उन्‍होंने अपनी डायरी में लिखा, ''अब मैं उस औरत के साथ बिस्‍तर में सो भी सकता था और कोई डर नहीं होता।''

🔵 सीख- इस घटना से विवेकानंद को तटस्थ रहने का ज्ञान मिला, आपका मन दुर्बल और निसहाय है। इसलिए कोई दृष्‍टि कोण पहले से तय मत करो।

21 टिप्‍पणियां:

  1. जिसका मन साफ है, वह अनुभव से सीखता है तथा सदा आगे बढता है।

    उत्तर देंहटाएं
  2. सन्यास का अर्थ पलायन नही वरण सब इच्छाओं और वासनाओं से पार जाना है।

    उत्तर देंहटाएं
  3. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    उत्तर देंहटाएं
  4. Jab take hum apni icchao ka damn nhi karenge tab tak hum adhyatm me age nhi bagh payenge

    उत्तर देंहटाएं
  5. सत्य वचन,अति सुंदर
    https://positivethoughtsinhindi.blogspot.in/

    उत्तर देंहटाएं
  6. सत्य वचन,अति सुंदर
    http://positivethoughts.xyz/

    उत्तर देंहटाएं
  7. सत्य वह नहीं होता हैं, जिसको बतया जाय। बल्कि, सत्य वह होता है, जैसा खुद के द्वारा किया जाय, वैसा हीं दूसरों को बताया जाय।
    - जय शंकर मिश्रा

    उत्तर देंहटाएं
  8. मज़बूरी में खुद से किया हुआ सभी कार्य या किसी के मज़बूरी को केवल अपने व्यक्तिगत फायदे के लिए गलत फ़ायदा उठाना ही "पाप या अपराध" होता हैं।
    - जय शंकर मिश्रा

    उत्तर देंहटाएं
  9. खुद के प्रसंसा सुनना बहूत अच्छी बात हैं, इससे कही अच्छी होगी अपनी "बुराई" सुनकर उस बुराई को उसी समय से दूर करने में लग जाना। इससे कुछ दिन या समय के बाद ऐसा होगा आपके "खुबसूरत प्रसंसा" के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं होगा।
    - जय शंकर मिश्रा

    उत्तर देंहटाएं
  10. Bhut hi achhi prenadayk katha hai,
    aatmbal se bada koi bal nahi, or koi bhi chhota ya bada nahi.

    उत्तर देंहटाएं

👉 देवत्व विकसित करें, कालनेमि न बनें (भाग 7)

🔴 कुछ नई स्कीम है, जो आज गुरुपूर्णिमा के दिन कहना है और वह यह है कि प्रज्ञा विद्यालय तो चलेगा यहीं, क्योंकि केन्द्र तो यही है, लेकिन जग...