शुक्रवार, 23 दिसंबर 2016

👉 गृहस्थ-योग (भाग 43) 24 Dec

🌹 पारिवारिक स्वराज्य

🔵 ‘अनावश्यक संकोच’ पारिवारिक कलह की वृद्धि में सबसे प्रधान कारण हैं। बाहर के आदमियों से तो हम घुल घुल कर बात करते हैं, परन्तु घर वालों से सदा उदासीन रहते हैं, बहुत ही संक्षिप्त वार्तालाप करते हैं। बहुत कम परिवार ऐसे देखे जाते हैं, जिनमें घर के लोग एक दूसरे से अपने मन की बातें कह सकें। शिष्टाचार, बड़प्पन, लिहाज, लाज, पर्दा आदि का वास्तविक रूप नष्ट होकर उसका ऐसा विकृत स्वरूप बन गया है कि घर के सब लोग अपनी मनोभावनायें, आवश्यकताएं और अनुभूतियां एक दूसरे के सन्मुख रखते हुए झिझकते हैं।

🔴 इस गलती का परिणाम यह होता है कि एक दूसरे को ठीक तरह समझ नहीं पाते। किसी बात पर मतभेद हो तो उस भेद को अवज्ञा, अपमान या विरोध मान लिया जाता है ऐसा न होना चाहिये। किसी बात का निर्णय करना हो तो घर के सभी सलाह दे सकने के योग्य स्त्री पुरुषों की सलाह लेनी चाहिए। अपने अभाव प्रकट करने का हर एक को अवसर दिया जाय। जो काम करना हो उसे इस प्रकार अच्छी भूमिका के साथ, तर्क और उदाहरणों के साथ रखना चाहिए कि उस पर घर वालों की सहमति मिल जावे।

🔵  हर व्यक्ति यह अनुभव करे कि मेरे आदेश से ही यह कार्य हुआ। जिस प्रकार राज्य संचालन में प्रजा की सहमति आवश्यक है उसी प्रकार गृह व्यवस्था में परिजनों की सहमति रहने से शान्ति और सुव्यवस्था रहती है। राजनीतिक स्वराज्य से देश में अमनोअमान कायम रहता है। पारिवारिक स्वराज्य से परिवार में सुव्यवस्था रहती है। परिवार की प्रजा यह न समझे कि किसी की इच्छा जबरदस्ती हमारे ऊपर थोपी जा रही है वरन् उसे यह भान होना चाहिए कि सबसे लाभ और सब के हित के लिए विचार विनिमय और विवेक के साथ नीति निर्धारित की गई है तथा औचित्य एवं ईमानदारी को व्यवस्था संचालन में प्रधान स्थान दिया जा रहा है। इस सरल, स्वाभाविक और बिना किसी कठिनाई की नीति का जिस परिवार में पालन किया जाता है वहां सब प्रकार सुख-शान्ति बनी रहती है।।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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