रविवार, 31 जनवरी 2016

कहिए कम-करिये ज्यादा (अन्तिम भाग)

इसे हम बराबर देखते हैं कि केवल बातें बनाने वाला व्यक्ति जनता की नजरों से गिर जाता है। पहले तो उसकी बात का कुछ असर ही नहीं होता। कदाचित उसकी ललित एवं आकर्षक कथन शैली से कोई प्रभावित भी हो जाय तो बाद में अनुभव होने पर वह सब प्रभाव जाता रहता है। वाकशूर के पीछे यदि कर्मवीरता का बल नहीं तो वह पंगु हैं। जो बात कहनी हो उसको पहिले तोलिए फिर बोलिए। शब्दों को बाण की उपमा दी गई। एक बार बाण के छूट जाने पर उसे रोकना बस की बात नहीं। लोहे का बाण तो एक ही जन्म और शरीर को नष्ट करता है पर शब्द बाण तो भविष्य की युग युगीन परम्परा को भी नष्ट कर देता है।

यह सब ठीक होते हुए भी प्रश्न उठता है कि विश्व में वाकशूर ही क्यों अधिक दिखाई देते हैं। उत्तर स्पष्ट है-बोलना सरल है। इसमें किसी तरह का कष्ट नहीं होता। कार्य करने में कष्ट होता है अपनी रुचि वृत्ति-स्वभाव बुरी आदतों पर अंकुश लगाना पड़ता है। और यह बड़ा कठिन कार्य है इन्द्रियाँ स्वच्छंद हो रही हैं, विषय वासनाओं की ओर लपलपाकर बढ़ना चाहती हैं। इनका दमन किये बिना इच्छित और उपयोगी कार्य नहीं किया जा सकता। कष्ट एवं कठिनता होने पर भी जो हमारे व विश्व के लिये आवश्यक है वह तो करना ही चाहिये। अतः सच्चे कर्म योग का अभ्यास करने की आदत डालना आवश्यक है। अभ्यास ही सिद्धि का मूलमंत्र है।

कहना हम सब को बहुत आता है। पर करना नहीं आता या चाहते नहीं। केवल दूसरों की आलोचना एवं अपनी बातें बघारना ही हमारा मनसूबा बन गया है। हमारे पांडित्य में परोपदेश और विद्या ‘विवादाय’ चरितार्थ हो रहे हैं। इन्हें हमें आत्मसुधार और विश्व उद्धार में लगाना है। अन्यथा हमारा अध्ययन ‘आप बाबाजी बैंगन खावे औरों को प्रबोध सुनावें’ सा ही रहेगा।

कई कहते हैं- “हमारी कोई सुनता ही नहीं, कहते-कहते थक गये पर सुनने वाले कोई सुनते नहीं अर्थात् उन पर कुछ असर ही नहीं होता”। मेरी राय में इसमें सुनने वालों से अधिक दोष कहने वालों का है। कहने वाले करना नहीं जानते। वे अपनी ओर देखें। आत्मनिरीक्षण कार्य की शून्यता की साक्षी दे देगा। वचन की सफलता का सारा दारोमदार कर्मशीलता में है। आप चाहे बोलें नहीं, थोड़ा ही बोलें पर कार्य में जुट जाइये। आप थोड़े ही दिनों में देखेंगे कि लोग बिना कहे आपकी ओर खिंचे जा रहे हैं। अतः कहिये कम, करिये अधिक। क्योंकि बोलने का प्रभाव तो क्षणिक होगा पर कार्य का स्थायी होता है। जैन योगी चिदानन्द जी ने क्या ही सुन्दर कहा है-
कथनी कथै कोई। रहणी अति दुर्लभ होई॥

अन्य कवियों ने भी कहा है-
कथनी मीठी खांड सी, करनी विष की लोय।
कथनी तजि करनी करै, विष से अमृत होय।1।

कथनी बदनी छांडी के, करनी सों चितलाय।
नरहिं नीर पिये बिना, करनी प्यास न जाय।2।

करनी बिन  कथनी कथै, अज्ञानी दिन रात।
कूकर ज्यों भूँसत, फिरै, सुनी सुनाई बात।3।

अखण्ड ज्योति-जून 1950 पृष्ठ 16
http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1950/June.16

शनिवार, 30 जनवरी 2016

कहिए कम-करिये ज्यादा (भाग 1)

मानव स्वभाव की एक बड़ी कमजोरी प्रदर्शन प्रियता है। बाहरी दिखावे को वह बहुत ज्यादा पसन्द करता है। यद्यपि वह जानता और मानता है कि मनुष्य की वास्तविक कीमत उसकी कर्मशीलता, कर्मठता है। ठोस और रचनात्मक कार्य ही स्थायी लाभ, प्रतिष्ठा का कारण होता है। दिखावा और वाक शूरता नहीं। यह जानते हुये भी उसे अपनाता नहीं। इसीलिये उसे एक कमजोरी के नाम से सम्बोधित करना पड़ता है।

प्रकृति ने मनुष्य को कई अंगोपाँग दिये हैं और उनसे उचित काम लेते रहने से ही मनुष्य एवं विश्व की स्थिति रह सकती है। पर मानव स्वभाव कुछ ऐसा बन गया है कि सब अंगों का उपयोग ठीक से न कर केवल वाक्शक्ति का ही अधिक उपयोग करता है। इससे बातें तो बहुत हो जाती हैं, पर तदनुसार कार्य कुछ भी नहीं हो पाता। हो भी कैसे वह करना भी नहीं चाहता और इसीलिये दिनों दिन वाक्शक्ति का प्रभाव क्षीण होता जाता है। कार्य करने वाले को बोलना प्रिय नहीं होता, उसे व्यर्थ की बातें बनाने को अवकाश ही कहाँ होता है? वह तो अपनी वाक्शक्ति का उपयोग आवश्यकता होने पर ही करता है। अधिक बोलने से वाक्शक्ति का महत्व घट जाता है। जिसकी जबान के पीछे धर्म शक्ति का बल होता है उसी का प्रभाव पड़ता है।

वस्तुतः कार्य करना एक साधना है। इससे साधित वाक्शक्ति मंत्रवत् बलशाली बन जाती है। साधक के प्रत्येक वाक्य में अनुभव एवं कर्म साधना की शक्ति का परिचय मिलता है। इसीलिए भारतीय संस्कृति में मौन का बड़ा महत्व है। जैन तीर्थंकर अपनी साधना अवस्था में प्रायः मौनावलम्बन करते हैं। इसी से उनकी वाणी में शक्ति निहित रहती है।

वर्तमान युग के महापुरुष महात्मा गाँधी के जबरदस्त प्रभाव का कारण उनका कर्मयोग ही है। वे जो कुछ कहते उसे करके बताते थे। इसी में सचाई का बल रहता है। इस सचाई और कर्मठता के कारण ही गाँधी जी के हजारों लाखों करोड़ों अनुयायी विश्व में फैले हुये हैं। गाँधी जी अपने एक क्षण को भी व्यर्थ न खोकर किसी न किसी कार्य में लगे रहते थे। और आवश्यकता होने पर कार्य की बातें भी कर लेते थे। इसी का प्रभाव है कि बड़े-बड़े विद्वान-बुद्धिमान एवं श्रीमान् उनके भक्त बन गये।

क्रमशः जारी
अखण्ड ज्योति-जून 1950 पृष्ठ 15
http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1950/June.15

शुक्रवार, 29 जनवरी 2016

पगडंडियाँ न खोजें राजमार्ग पर चलें


जीवन एक वन है जिसमें फूल भी है और कांटे भी; जिसमें हरी-भरी सुरम्य घाटियाँ भी हैं और ऊबड़-खाबड़ जमीन भी। अधिकतर वनों में वन्य-पशुओं और वनवासियों के आने-जाने से छोटी-मोटी पगडण्डियाँ बन जाती हैं। देखने में तो यह सुव्यवस्थित रास्ते प्रतीत होते हैं किन्तु यह जंगलों में जाकर लुप्त हो जाते हैं। आसानी और शीघ्रता के लिए बहुधा यात्री इन पगडंडियों को पकड़ लेते हैं और सही रास्ते को छोड़ देते हैं।

जीवन-वन में ऐसी पगडंडियाँ बहुत हैं जो छोटी दीखती हैं, पर गंतव्य स्थान तक पहुँचती नहीं है। जल्दबाज लोग पगडंडियाँ ही ढूंढ़ते हैं, किन्तु उनको यह मालूम नहीं होता है कि ये अन्त तक नहीं पहुँचती और जल्दी काम बनने का लालच दिखाकर दल-दल में फँसा देती है। ये रास्ते वास्तव में बड़े ही आकर्षक होते हैं।

पाप और अनीति का मार्ग जंगल की पगडंडी, मछली की वंशी और चिड़ियों के जाल की तरह है। अभीष्ट कामनाओं की जल्दी से जल्दी, अधिक से अधिक मात्रा में पूर्ति हो जाये, इस लालच से लोग वह काम करना चाहते हैं जो जल्दी ही सफलता की मंजिल तक पहुँचा दे। जल्दी और अधिकता दोनों ही वाँछनीय हैं, पर उतावली में उद्देश्य को ही नष्ट कर देना, बुद्धिमत्ता नहीं माना जायगा।

जीवन-वन का राजमार्ग सदाचार और धर्म है। उस पर चलते हुए लक्ष्य तक पहुँचना समय-साध्य तो हैं, पर जोखिम उसमें नहीं है। ईमानदारी के राजमार्ग पर चलते हुए मंजिल देर में पूरी होती है, उसमें सीमा और मर्यादाओं का भी बन्धन है, पर अनीति का वह दल-दल, वन की वह कँटीली झाड़ियाँ और ऊबड़-खाबड़ जमीन राजमार्ग में कहाँ ? जिनमें फँसकर जीवनोद्देश्य ही नष्ट हो जाता है। हम पगडंडियों पर न चलें, राजमार्ग ही अपनावें। देर में सही, थोड़ी सही, पर जो सफलता मिलेगी, वह स्थायी भी होगी और शान्तिदायक भी।

पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति-फरवरी 1975 पृष्ठ 3
http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1975/February.3

गुरुवार, 28 जनवरी 2016

मनुष्य की महानता का रहस्य

मनुष्य सब प्राणियों से श्रेष्ठ है। शक्तिमान् होना अथवा शक्तिहीन होना मनुष्य के स्वयं अपने हाथ में है।

अपनी प्रत्येक आदत एवं वासना के ऊपर आप नियंत्रण पा सकते हैं, क्योंकि आप अनंत परमात्मा के एक अंश हैं और परमात्मा के बल के आगे ऐसा कुछ भी नहीं है, जो टिक सके। अनेक मनुष्य हलके प्रकार का जीवन इस तरह बिताते हैं, जिसमें व्यक्ति स्वतंत्र होता ही नहीं है। क्या तुम्हें इस संसार में प्रभावशाली बनना है? यदि हाँ, तो आप अपने आप पर निर्भर रहो और स्वतंत्र बनने का प्रयत्न करो। अपने आप को साधारण मनुष्य मत समझो। हम गरीब हैं, हमसे क्या होगा, ऐसा मत कहो।

यदि आप परमात्मा के ऊपर विश्वास रखकर लोगों की आलोचना से नहीं डरोगे, तो प्रभु अवश्य आप को सहायता देगा। यदि लोगों को खुश करने के लिए अपना जीवन बिताएँगे, तो लोगों से आप कदापि खुश नहीं रहेंगे, बल्कि जैसे-जैसे आप उन्हें खुश रखने में लगेंगे, वैसे-वैसे ही आप गुलाम बनते जाऍगे, वैसे-वैसे ही आप से उनकी माँग भी बढ़ती जाएगी।

जो कोई स्वाभाविक रीति से अपनी सामर्थ्य का उपयोग करता है, वह निश्चित रूप से महान् पुरुष है। जिन मनुष्यों को अपनी मूलशक्ति आत्मशक्ति का भान होता है, वे ओछे और बेकार काम करते हुए नहीं दिखाई देते।

-अखण्ड ज्योति-मई 1948 पृष्ठ 7
http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1950/May.7

मंगलवार, 26 जनवरी 2016

बुरे विचारों से दूर रहिए। (अन्तिम भाग)

हमारे जीवन का सुख और दुःख हमारे विचारों पर ही निर्भर रहता है। आधुनिक मनोविज्ञान की खोजों से पता चलता है कि मनुष्य का न सिर्फ आन्तरिक जीवन वरन् उसके समस्त जीवन के व्यवहार तथा शारीरिक स्वास्थ्य भी मन की कृष्ट तथा अकृष्ट गतियों का परिणाम मात्र है। अशुभ विचारों का लाना ही अपने जीवन को दुखी बनाना है, तथा शुभ विचारों का लाना सुखी बनाना है।

अब प्रश्न यह आता है कि हम अशुभ विचारों को आने से कैसे रोकें जिससे कि उनसे पैदा किये दुखों से हम बच सकें? यह प्रश्न बड़े महत्व का है और संसार के समस्त मनस्वी लोगों ने इस प्रश्न पर गम्भीर विचार किया है। किन्तु इस विषय पर जितना ही विचार किया जाय श्रेयस्कर है। प्रत्येक मनुष्य को इस विषय पर विचार करना चाहिये। दूसरों के विचारों से हमें लाभ अवश्य होता है किन्तु जब तक हम दूसरों के विचारों का मनन नहीं करते, उनसे भली प्रकार लाभ नहीं उठा सकते। लेखक पहले इस विषय पर अपने विचारों का उल्लेख करेगा इस लेख का तात्पर्य यहाँ है कि प्रत्येक पाठक को इस विषय पर विचार करने को प्रस्तुत किया जाय, ताकि जीवन की सबसे महत्वपूर्ण समस्या को अपने आप सुलभ कर सकें।

बुरे विचारों के निरोध का उपाय सबसे प्रथम उनको पहचानना ही है। जिनके विचारों को। हम बुरे विचार मानते ही नहीं, उन्हें हम अपने मनोमन्दिर में प्रवेश करने से क्योंकर रोक सकेंगे? यदि दूसरों के धनापहरण के विचार को हम उत्तम विचार मानते हैं तो उसे अपने मन में आने से रोकने की जगह भली प्रकार से उसका स्वागत करेंगे। जो विचार बुरे होते हैं। वे उनके प्रथम स्वरूप में ही बुरे नहीं लगेंगे, उनके परिणाम बुरे होते हैं। विचारवान व्यक्ति ही इस बात को जान सकता है कि अमुक विचार अन्त में दुखदायी होगा।

संसार के अत्याधिक मनुष्यों को यह समझाना ही कठिन है कि उनके विचार ही उनके सुख-दुख के कारण हैं। मनुष्यमात्र में अपने आप पर विवेचना करने की शक्ति का अभाव होता है। हम सभी बहिर्मुखी हैं। हम अपने कष्टों का कारण दूसरों को मानने में सन्तोष पाते हैं। अपने दोषों को दूसरे में देखते हैं। जिस अवाँछनीय घटना की जड़ हमारे विचारों में ही है उसे हम दूसरे व्यक्तियों में देखते हैं। इस प्रकार की मानसिक प्रवृत्ति को दोषारोपण की प्रवृत्ति कहते हैं अथवा प्रोजेक्शन कहते है। वही मनुष्य बुरे विचारों के निरोध में समर्थ होता है, जो अपने आपके विषय में सदा चिन्तन करता है और जो परोक्ष रूप से भी यह जानता है कि मनुष्य का मन ही दुख और दुखों का कारण है। ऐसे ही मनुष्य में भले ओर बुरे विचारों के पहचानने की शक्ति उत्पन्न होती है।

किसी भी ऐसे विचार को बुरा विचार कहना चाहिये जो आत्मा को दुःख देता हो, उसको भ्रम में डालता हो। बीमारी के विचारों और असफलता के विचारों को सभी बुरा कहेंगे यह प्रत्यक्ष ही है कि इन विचारों से मन को दुख होता है और अनहोनी घटना होके रहती है। किन्तु इस बात को मानने के लिये कम लोग तैयार होंगे कि शत्रुता के विचार, दूसरों को क्षति पहुंचाने के विचार भी बुरे विचार है। ये विचार भी उसी प्रकार हमारी आत्मा का बल कम कर देते हैं जिस प्रकार कि असफलता और बीमारी के विचार आत्मा का बल कम कर देते हैं।

समाप्त
अखण्ड ज्योति मई 1950 पृष्ठ 14-1501
http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1950/May.14

सोमवार, 25 जनवरी 2016

बुरे विचारों से दूर रहिए। (भाग 1)

हमारा मन अभ्यास का दास है। जिस प्रकार का अभ्यास मन को कराया जाता है उसी प्रकार उसका अभ्यास सदा के लिए बन जाता है। जिस मनुष्य को पढ़ने-लिखने का अभ्यास रहता है, उसका मन रुचि के साथ ऐसे काम को करने लगता है। ऐसे व्यक्ति से बिना पढ़े-लिखे रहा ही नहीं जाता। जिस मनुष्य को दूसरों की निन्दा करने का अभ्यास है, जो दूसरों के अहित का सदा चिन्तन किया करता है, वह भी उन कर्मों को किये बिना रह नहीं सकता ऐसे कार्य उसकी एक प्रकार की नशा जैसे व्यसन हो जाते हैं, वह व्यक्ति अनायास ही दूसरों की निंदा और अकल्याण सोचने में लग जाता है। दूसरों की स्तुति सुनकर उसे बुखार जैसा आ जाता है।

जिस व्यक्ति का इस प्रकार का अभ्यास हो जाता है वह जब अपने आपके विष में अशुभ विचार लाता है तो उन विचारों का भी विरोध नहीं कर सकता। जिनको दूसरों की बुराई का चिन्तन भला लगता है, वह अपनी बुराई का भी चिन्तन करने लगता है फिर इस प्रकार के विचार उसके मन को नहीं छोड़ते। अब यदि वह चाहे कि अमुक अशुभ विचार को हम छोड़ दें तो भी अब वह उसे छोड़ने में असमर्थ होता है। वहीं मनुष्य अपने विचारों पर नियन्त्रण कर सकता है जिसकी आत्मा बलवान और विवेकी है। जिस साँप को हम दूसरों के काटने के लिये पाले हैं, वहीं साँप किसी असावधानी की अवस्था में अपने आपको काट सकता है। दूसरों को दुःख देने के विचार साँप के सदृश है। अतएव सबका सदा कल्याण सोचना, किसी का भी अहित न सोचना, बुरे विचारों के निराकरण का पहला उपाय है।

जिस व्यक्ति के प्रति हम बुरे विचार लाते हैं उससे हम घृणा करने लगते हैं। घृणा की वृत्ति उलट कर भय की वृत्ति बन जाती है। जो दूसरों की मानहानि का इच्छुक है उसके मन में अपने आप ही अपनी मान हानि का भय उत्पन्न हो जाता है। जो दूसरों की शारीरिक क्षति चाहता है, उसे अपने शरीर के विषय में अनेक रोगों की कल्पना अपने आप उठने लगती है। जो दूसरों की असफलता चाहता है वह अपनी सफलता के विषय में सन्देहात्मक हो जाता है।

हमें यहाँ ध्यान रखना चाहिये कि कोई भी भावना व्यक्ति विशेष से सम्बन्धित नहीं रहती। हम किसी समय एक विशेष व्यक्ति से डर रहे हों, संभव है वह व्यक्ति हमारा कुछ बुरा न कर सके वह किसी कारण से हमसे दूर हो जाये। किन्तु इस प्रकार व्यक्ति विशेष से दूर हो जाने पर हम अपनी दुर्भावना से मुक्त नहीं होते। यह भावना अपना एक दूसरा विषय खोज लेगी।

अगले अंक में समाप्त
अखण्ड ज्योति मई 1950 पृष्ठ 13
http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1950/May.13

शनिवार, 23 जनवरी 2016

देने से ही मिलेगा

किसी को कुछ दीजिए या उसका किसी प्रकार का उपकार कीजिए तो बदले में उस व्यक्ति से किसी प्रकार की आशा न कीजिए। आपको जो कुछ देना हो दे दीजिए। वह हजार गुणा अधिक होकर आपके पास लौट आवेगा। परन्तु आपको उसके लौटने या न लौटने की चिन्ता ही न करनी चाहिए। अपने में देने की शक्ति रखिए, देते रहिए। देकर ही फल प्राप्त कर सकेंगे। यह बात सीख लीजिए कि सारा जीवन दे रहा है। प्रकृति देने के लिए आप को बाध्य करेगी। इसलिए प्रसन्नतापूर्वक दीजिए। आज हो या कल, आपको किसी न किसी दिन त्याग करना पड़ेगा ही।

जीवन में आप संचय करने के लिए आते हैं परन्तु प्रकृति आपका गला दबाकर मुट्ठी खुलवा लेती है। जो कुछ आपने ग्रहण किया है वह देना ही पड़ेगा, चाहे आपकी इच्छा हो या न हो। जैसे ही आपके मुँह से निकला कि ‘नहीं, मैं न दूँगा।’ उसी क्षण जोर का धक्का आता है। आप घायल हो जाते हैं। संसार में कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं है जो जीवन की लम्बी दौड़ में प्रत्येक वस्तु देने, परित्याग करने के लिए बाध्य न हो। इस नियम के प्रतिकूल आचरण करने के लिए जो जितना ही प्रयत्न करता है वह अपने आपको उतना ही दुखी अनुभव करता है।

हमारी शोचनीय अवस्था का कारण यह है कि परित्याग करने का साहस हम नहीं करते इसी से हम दुखी हैं। ईंधन चला गया उसके बदले में हमें गर्मी मिलती है। सूर्य भगवान समुद्र से जल ग्रहण किया करते हैं उसे वर्षा के रूप में लौटाने के लिए आप ग्रहण करने और देने के यन्त्र हैं। आप ग्रहण करते हैं देने के लिए। इसलिए बदले में कुछ माँगिए नहीं। आप जितना भी देंगे, उतना ही लौटकर आपके पास आवेगा।

- स्वामी विवेकानन्द
अखण्ड ज्योति फरवरी 1964 पृष्ठ 9
http://literature.awgp.in/magazine/AkhandjyotiHindi/1964/February.1

शुक्रवार, 22 जनवरी 2016

अपनी वासनाएं काबू में रखिए। (अन्तिम भाग2)

अपने अपराध को स्वीकार करना यह उन्नति पथ के ऊपर मानों कई कदम आगे बढ़ना है। साधनों को दोष देते फिरना मूर्खता है। वास्तव में कैद का दंड देने वाला मजिस्ट्रेट नहीं है, तुम्हारे कुकार्य ही हैं। इसमें संदेह नहीं कि संसार में पाप-समृद्ध रूपी राक्षस नाना प्रकार के मनोहर रूप धारण कर मनुष्यों के चित्त को विकृत करने का प्रयत्न करते हैं, परन्तु उन्हें अपने हृदय में स्थान देना या न देना तुम्हारे काबू में है। जिस प्रकार भूतों का भय दृढ़चित्त मनुष्यों के हृदय में फटकने भी नहीं पाता उसी प्रकार सच्चरित्र मनुष्यों के पास आने में पाप-वासनाओं को भी बड़ा डर लगता है। लालच उसी के लिए है जो लालची है। निर्लोभी व्यक्ति को वह अपने फंदे में कभी नहीं फँसा सकता । अतएव इन कुवासनाओं को धिक्कारना और दोष देना निरर्थक है। मनुष्य की दृष्टि को भी हित करने वाले पाप-समूह की संसार में क्या आवश्यकता थी। भोले-भाले शुद्ध-हृदय मनुष्य को ठगना और उसे चक्कर में फंसाना निदान उसकी निन्दा करना और उसे दंड-पात्र ठहराना यह तो दुष्टों का माया-पूर्ण षड्यंत्र जंचता है।

 वास्तव में विचार करने से मालूम होता है कि पदार्थों की परीक्षा करने के लिए बहुधा भय-पूर्ण स्थलों का उपयोग किया जाता है। सोने की परीक्षा करने के लिए काली कसौटी चाहनी पड़ती है। इसी भाँति मनुष्य के हृदय की परीक्षा करने के हेतु ही पाप-वासनायें संसार में विद्यमान है। देखो, जब तक तुम्हारे सामने कोई 500 रुपयों की थैली चुपचाप लाकर न रख दे तब तक तुम लोभी हो अथवा निर्लोभी, इसकी परीक्षा कैसे हो सकती है? यदि पाप न होते तो संसार में महात्मा और दुष्टों की पहचान कैसे होती। अतएव छल, अभिमान, माया, मोह इत्यादि कुवासनाओं से घेरे जाने पर अपने लिए असमर्थ मान कर उन्हें दोष का स्थान मानना मानो उन्नति के मार्ग से हटना है।

प्रत्येक व्यक्ति का अनुभव है कि वासनाओं की तपस्या कितनी कठिन है। पाप क्रोध के बुरे परिणामों के विषय में चाहे ग्रंथ के ग्रंथ लिख देने योग्य ज्ञान रखते हों, घंटों उस विषय पर व्याख्यान देकर लोगों को उनके आवेश के शमन करने की शिक्षा दे सकते हों, परन्तु जब सच्चे क्रोध का अवसर आ- उपस्थित होता है उस समय उसे संभाल लेना टेढ़ा काम है। इसीलिये किसी महात्मा का कथन है कि केवल ज्ञान के द्वारा आत्मोन्नति असंभव है। जानना और काम को कर दिखाना ये दो बातें हैं। काम-वासना को ही लीजिए पुराणों की तिलोत्तमा द्वारा ब्रह्माजी के तपो-भ्रष्ट होने की बात सभी को विदित है। पाँच हजार वर्ष तक दिव्य तप करने वाला योगी भी जिस काम-वासना को विजय न कर सका उसकी जलन का क्या ठिकाना है।

वासनाओं के अवगुणों और बुरे फलों की आलोचना करने के लिए यदि प्रतिदिन मनुष्य कोई विशेष समय नियत कर लेता उसकी नैतिक उन्नति बहुत शीघ्र हो सकती है। प्रत्येक धर्म में अपने दिन भर के कार्यों पर विचार करने के लिए सोने के पेश्तर समय निश्चित करने का उपदेश दिया गया है। उसका अभिप्राय यही है कि मनुष्य अपने नैतिक चरित्र की संभाल उसी भाँति कर लिया करे जैसे कि वह अपने दैनिक आय-व्यय किया करता है।

समाप्त
महात्मा जेम्स ऐलन
अखण्ड ज्योति अप्रैल 1950 पृष्ठ 9
http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1950/April.9

गुरुवार, 21 जनवरी 2016

अपनी वासनाएं काबू में रखिए। ( भाग 1)

किसी समय एक चोर ने न्यायाधीश के समक्ष अपनी चोरी की सफाई देते हुए इस भाँति कहा हुजूर मैंने चोरी तो अवश्य की है, परन्तु सच्चा अपराधी मैं नहीं हूँ। मेरे पड़ोसी ने अपना सोने का चमकदार कंठा दिखाकर मेरे मन को मोहित कर लिया और मुझे उसको चुरा लेने के लिए लाचार किया। अतएव सच्चा अपराधी वही है और सजा उसी को होनी चाहिए। अपराधी की ये बाते सुनकर जज साहब को उसकी युक्ति पर हँसी आ गई उन्होंने अपराधी को एकान्त वास की सजा देकर कहा कि अब तुम्हारा मन लुभाने के लिए तुम्हारे सामने कोई मनुष्य न आवेगा।

यदि सच पूछा जाये तो नैतिक संसार में मनुष्य प्रतिदिन इसी प्रकार की युक्तियों का उपयोग करता रहता है। अमुक मनुष्य मेरे कार्य में बाधा डालता है, अमुख ने मुझसे ऐसी बात कहीं जिससे मुझे क्रोध आ गया, चार आदमियों में बैठते हैं तो लाचार होकर ऐसा काम करना ही पड़ता है-, इत्यादि बातें अपने दोषों को दूसरों के सिर मढ़ने के प्रयत्न नहीं तो क्या हैं?

कितना अच्छा हो यदि मनुष्य कोई अपराध करने के साथ ही उसे स्वीकार करने में आना-कानी न करे। नैतिक उन्नति की सबसे पहली सीढ़ी यही है कि मनुष्य अपने अपराधों को समझने लगें। हजारों मनुष्य तो बुरे कार्यों को करते रहते और उन बेचारों को रंच मात्र भी खबर नहीं कि ये कार्य वास्तव में बुरे हैं। जिस समय चोर चोरी को सचमुच बुरा समझने लगे उसी समय से जान लो कि अब वह रास्ते पर आ रहा है। परन्तु केवल दिखाऊ मन की इच्छा से अथवा किसी की हाँ में हाँ मिलाने के अभिप्राय से बुरे कार्य बुरा कह देने से कोई नहीं । इससे तो उलटी हानि है। कुकार्य से घृणा होने की बात तो दूर रही, ऐसा करने से तो उसने अपने आपको ही ठगा कहना चाहिए। प्रवंचना अथवा मायाजाल इसी का नाम है परन्तु देखा जाता है कि लोक में मनुष्यों ने इसे ही सभ्यता और शिष्टाचार मान रखा है। ऐसे लौकिक व्यवहार की अवहेलना करने से समाज भले ही असंतुष्ट हो जाए, परन्तु उन्नति की इच्छा रखने वाले मनुष्य को इसमें आगा-पीछा न करना चाहिए।

अपने किये हुए अपराधों को दूसरों के सिर मढ़ते फिरने की कुटेव के कारण मनुष्य अपने ऐबों को नहीं देख सकता। जो कार्य उसने किया है उसका बुरा फल होने पर वह तुरन्त किसी दूसरे व्यक्ति को पकड़ने की कोशिश करने लगता है। अपने आलस्य द्वारा समय पर किये गये कार्यों की आलोचना होने पर वह अपने सिर का दोष दूसरों पर मढ़ देता है। यदि ऐसा करने के बदले वह अपने अपराध को मुक्त कंठ से स्वीकार कर ले तो संदेह नहीं कि वह दुबारा वैसा कार्य न करे।

क्रमशः जारी
महात्मा जेम्स ऐलन
अखण्ड ज्योति अप्रैल 1950 पृष्ठ 9
http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1950/April.9

बुधवार, 20 जनवरी 2016

सद्विचारों द्वारा जीवन लक्ष्य की प्राप्ति।

प्रत्येक मनुष्य अपने विचारों द्वारा ही अपना आत्म निर्माण करता है। क्योंकि विचार का बीज ही समयानुसार फलित होकर गुणों का रूप धारण करता है और वे गुण, मनुष्य के दैनिक जीवन में कार्य बनकर प्रकट होते रहते हैं। विचार ही वह तत्व है जो गुण, कर्म, स्वभाव के रूप में, दृष्टिगोचर होता है। मन, कर्म, वचन में विचारों का ही प्रतिबिम्ब सदा परिलक्षित होता रहता है।

मानव मनोभूमि में सत् और असत् दो प्रकार के संकल्प काम करते रहते हैं। भलाई और बुराई दोनों ही ओर मन चलता रहता है। इस द्विधा में जिधर रुचि अधिक हुई, उधर ही प्रकृतियां बढ़ जाती है। यदि असत मार्ग पर चला गया तो अपयश, द्वेष, चिन्ता, दैवी प्रकोप, शारीरिक और मानसिक अस्वस्थता दरिद्रता एवं अप्रतिष्ठा प्राप्त होती है। और यदि सत मार्ग का अनुगमन किया गया तो प्रशंसा, प्रतिष्ठा, प्रेम, सहयोग, संतोष, दीर्घ जीवन, शारीरिक और आत्मिक बलिष्ठता एवं सदा आनन्द ही आनन्द का रसास्वादन होता है। दो प्रकार के विचार ही मनुष्य समाज को दो भागों में बाँटते हैं। सुखी-दुखी, रोगी-निरोगी, दरिद्र-सम्पन्न, दृष्ट-सज्जन, पापी-पुण्यात्मा, निन्दित-पूज्य, प्रसन्न-चिन्तित आदि द्विविधि श्रेणियाँ केवल मात्र द्विविधि विचारों द्वारा ही विनिर्मित होती हैं।

अधिक संख्या में जनसमुदाय का मानसिक धरातल परिमार्जित नहीं होता, उसमें पाश्विक वृत्तियों की प्रधानता रहती हैं। अविवेक, अज्ञान, अदूरदर्शिता, संकुचित स्वार्थपरायणता, लोभ विषय विकारों में आसक्ति एवं निकृष्ट कोटि के मनोरंजन की अभिलाषाओं से मनः दोष भरा रहता है। जिससे उसके सोचने, कार्य करने और आनंद लाभ करने की परिधि ऐसी सीमित हो जाती है जिसमें बुराई, तामसिकता एवं अशान्ति ही उत्पन्न हो सकती है। इसी कटघरे में अधिकाँश लोग बंद रहते हैं माया का यह घेरा मनुष्य को बुरी तरह जकड़े रहता है। वह जकड़ा हुआ प्राणी पराधीनता जन्म नाना प्रकार के दुखों को प्राप्त करता रहता है। यही भव बन्धन है।

अज्ञान, आसक्ति, अहंकार वासना एवं संकीर्णता के बंधनों से छुटकारा पाने को ही मुक्ति कहते हैं। आत्मा-परमात्मा का अंश होने के कारण स्वभावतः युक्त है, उसे यह कुप्रवृत्तियाँ ही अपने बंधन में बाँधकर मायाबद्ध जीव बना लेती है। इन बंधनों से छुटकारा मिलते ही आत्मा अपने वास्तविक स्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है और जीवन मुक्ति का अनिर्वचनीय उपलब्ध करने लगता है।

अपनी भूल आप समझ में नहीं आती, यदि समझ में आ जाय तो उसे तुरन्त सुधार लें। रोगी यह नहीं समझता कि मैं कुपथ्य कर रहा हूँ यदि उसे ऐसा पता होता तो कुपथ्य करके प्राणों को संकट में क्यों डालता? यों तो कहने सुनने को हर एक भूल करने वाला और कुमवृध करने वाला यह जानता है कि जो कर रहे हैं वह ठीक नहीं पर ऐसा केवल बाहरी रूप से ही सोचा जाता है, यदि अन्तःकरण के गहन अन्तराल को सच्चे हृदय से या कुपंथ की बुराई मालूम हो जाय तो उसे छोड़ते हुए देर न लगे। बात माया बन्धन के बारे में है। स्वार्थ, वासना के निकृष्ट सुख में लोग वैसे ही अनुभव करते रहते हैं जैसे कुत्ता सूखी हड्डी चबा कर मसूड़े छिलने से निकलने वाले ही रक्त को ही चाटता है और रक्तपान का अनुभव करता है। यदि मानव मन को अनुभूति अंतःकरण के गहरे अन्तराल में होना कि माया बन्धन के कटघरे में जो सुख है क्रमवश सुख लगता है वस्तुतः वह भारी घाटे विपत्ति का कारण है तो उसे अपने बन्धनों को तोड़ने में निश्चय ही तत्परता हो जाएगी।
इस अनुभूति के लिए ही आध्यात्मवाद समस्त शिक्षा और साधना है। इस श्रेय मार्ग पर चलने वाला सत् का महत्व समझ जाता वह सद्विचारों को अपनाता है, जिससे सुदूर और सत्कार्यों में उसकी प्रवृत्ति होती है और धीरे-धीरे वह सत्पुरुष बनता हुआ सन्मार्ग चलता हुआ जीवन लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है।

अखण्ड ज्योति मार्च 1950 पृष्ठ 15-16
http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1950/March.15

सोमवार, 18 जनवरी 2016

सत्कर्मों से दुर्भाग्य भी बदल सकता है। (अन्तिम भाग)

परन्तु इसमें सूक्ष्म नियमानुसार कभी कभी हेर फेर भी हो जाता है। जो प्रारब्ध परिपक्व होकर भोग के रूप में प्रस्तुत है उसमें परिवर्तन होना तो कठिन है पर जो कर्म अभी पक रहे हैं, भोग बनने की स्थिति में जो अभी नहीं पहुँच पाये हैं उन पर वर्तमान कर्मों का प्रभाव पड़ता है और उनका फल न्यून या अधिक हो सकता है अथवा वे नष्ट भी हो सकते हैं। धर्म ग्रन्थों में जहाँ शुभ कर्मों का महात्म्य वर्णन किया गया है वहाँ स्थान-स्थान पर ऐसा उल्लेख आया है कि “इस शुभ कर्म के करने से पिछले पाप नष्ट हो जाते हैं।” यहाँ सन्देह उत्पन्न होता है कि यदि उस कर्म के करने वाले के पाप नष्ट ही हो गये तो वर्तमान में तथा भविष्य में किसी प्रकार का दुख या अभाव उसे न रहना चाहिए। परन्तु ऐसा होता नहीं, शुभ कर्म करने वाले भी अन्य साधारण व्यक्तियों की तरह सुख दुख प्राप्त करते रहते हैं।

पूर्वकृत पापों के नष्ट होने का संबंध उन कर्मों से है जिनका अभी परिपाक नहीं हुआ है, जो अभी संचित रूप में पड़े हैं और समयानुसार फलित होने के लिए जो सुरक्षित रखे हुए हैं। वर्तमान काल में यदि अधिक बलवान शुभकर्म किए जाएं, मन में यदि उच्चकोटि की सतोगुणी भावनाओं का प्रकाश प्रज्वलित रहे तो उसके तेज से, ऊष्मा से वह अशुभ संचय झुलसने लगता है और हत प्रभ हीन वीर्य होने लगता है। जहाँ अग्नि की भट्टी जलती रहती हो उसके आस पास में कई पुस्तकें औषधियाँ आदि रखी रहें तो वे सब उस गर्मी के कारण जीर्ण शीर्ण निस्तेज और क्षतवीर्य हो जायेंगी। कोई बीज उस गर्मी को रखे रहें तो उनकी उपजाने की शक्ति मारी जायेगी। इसी प्रकार यदि वर्तमान काल में कोई व्यक्ति अपनी मनोभूमि को तीव्रगति से निर्मल और सतोगुणी बनाता जा रहा है तो उसकी तीव्रता से भूतकाल के अशुभ कर्मों की शक्ति अवश्य नष्ट होगी। इसी प्रकार यदि भूतकाल में अच्छे कर्म किये गये थे और उनका सुखदायक शुभ परिपाक होने जा रहा था तो वह परिपाक भी वर्तमान काल के कुकर्मों, दुर्गुणों, कुविचारों और दुष्ट भावनाओं के कारण हीन-वीर्य, निष्फल और मृतप्रायः हो सकता है। वर्तमान का प्रभाव भूत पर ही पड़ता है और भविष्य पर भी। महापुरुषों के पूर्वज भी प्रशंसा पाते है और संतान भी आदर की दृष्टि से देखी जाती है। दुष्ट कुकर्मियों के पूर्वज भी कोसे जाते हैं और उनकी संतानें भी लज्जा का अनुभव करती है।

स्मरण रखिए वर्तमान ही प्रधान है। पिछले जीवन में आप भले या बुरे कैसे भी काम करते रहे हों यदि अब अच्छे काम करते हैं तो चंद भोग्य बन गये फलों को छोड़ कर अन्य संचित पाप क्षतवीर्य हो जायेंगे और यदि उनका कुछ परिणाम हुआ भी तो बहुत ही साधारण स्वल्प कष्ट देने वाला एवं कीर्ति बढ़ाने वाला होगा। शिवि, दधीच, हरिश्चन्द्र, प्रहलाद, ध्रुव, पांडव आदि को पूर्व भोगों के अनुसार कष्ट सहने पड़े पर वे कष्ट अन्ततः उनकी कीर्ति को बढ़ाने वाले और आत्मलाभ कराने वाले सिद्ध हुए। सुकर्मी व्यक्तियों के बड़े-बड़े पूर्व घातक स्वल्प दुख देकर सरल रीति से भुगत जाते हैं। पर जो वर्तमान काल में कुमार्गगामी हैं उनके पूर्वकृत सुकर्म तो हीन वीर्य हो जायेंगे जो संचित पाप कर्म हैं वे सिंचित होकर परिपुष्ट और पल्लवित होंगे, जिससे दुखदायी पाप फलों की शृंखला अधिकाधिक भयंकर होती जाएगी।
हमें चाहिए कि सद्विचारों को आश्रय दें और सुकर्मों को अपनायें, यह प्रणाली हमारे बुरे भूतकाल को भी श्रेष्ठ भविष्य में परिवर्तित कर सकती है।

समाप्त
अखण्ड ज्योति फरवरी 1950 पृष्ठ 18-19
http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1950/February.18

रविवार, 17 जनवरी 2016

सत्कर्मों से दुर्भाग्य भी बदल सकता है। (भाग 1)

प्रारब्ध कर्मों का, भूतकाल में किये हुए भले बुरे कामों का, फल मिलना प्रायः निश्चित ही होता है। कई बार तो ऐसा होता है कि कृतकार्य का फल तुरन्त मिल जाता है, कई बार ऐसा होता है कि प्रारब्ध भोगों की प्रबलता होने के कारण विधि निर्धारित भली-बुरी परिस्थिति वर्तमान काल में बनी रहती है और इस समय जो कार्य किए गए है उनका परिणाम कभी पीछे भुगतने के लिए जमा हो जाता है।

यदि प्रत्येक भले बुरे कर्म का फल तुरन्त हाथों-हाथ मिल जाता होता तो इस संसार में कहीं भी पापी और पाप का निशान ढूंढ़ने मिलता। क्योंकि जैसे विष खाते ही तुरन्त मृत्यु हो जाती है। वैसे ही पाप करते ही उसकी भयंकर पीड़ा होती तो उसे कोई स्पर्श भी न करता और बुराई का स्वादिष्ट फल मिठाई की तरह मधुर, बर्फ सा शीतल, चन्दन सा सुगंधित और सब प्रकार मनोहर आनन्द मय होता तो दौड़ दौड़ कर सभी लोग बुराई करते, अशुभ कर्म करने में कोई किसी से पीछे न रहता। परन्तु परमेश्वर ने मनुष्य की बुद्धिमता की परीक्षा करने के लिए और उसकी स्वतंत्रता, दूरदर्शिता और विवेकशीलता को स्वतंत्र दिशा में विकसित होने देने के लिए ऐसी व्यवस्था की है कि कर्मफल तुरन्त तो बहुत कम मिलते हैं वे आगे पीछे के लिए जमा होते रहते है। यह उधार खाता, उचंत खाता, बैंकों के हिसाब की तरह आगे पीछे जमा खर्च में पड़ता रहता है। यह वह स्थान है जिस पर मनुष्य की बुद्धिमता परखी जाती है, इसी खतरे से सावधान करने के लिए धर्म का विधान है।

वेद पुराण शास्त्र, इतिहास इसी जगह पर सावधान करने के लिए अपना अभिमत घोषित करते रहते हैं। फिर भी लोग चूकते हैं।-भ्रम में पड़ते हैं, और इस संदेह में पढ़ते हैं कि जाने कर्मफल मिलता भी है या नहीं। शास्त्रों की वाणी, धर्म की व्यवस्था जाने सच है भी या नहीं। इस संदेह में भ्रमित होकर ही वे पाप और नास्तिकता को अपना लेते है। तुरन्त फल न मिलना यही तो माया है, इस माया में ही मनुष्य भ्रमित होता है। आग छूने से जलन और बर्फ छूने से ठंडक की भाँति यदि पाप पुण्य का स्पर्श अपना अपना तुरन्त परिणाम दिखाते तो वेदशास्त्र धर्म भजन, पूजन कथा, कीर्तन आदि किसी की जरूरत न पड़ती। जैसे हरी घास को देखते ही गधा सीधा उसे खाने को चला जाता है वैसे ही सब लोग पुण्य के लिए सीधे चल देते है। और जैसे लाल झंडे को देखकर भैंस बिदकती है वैसे ही पाप का नाम सुनते ही लोग उससे बचकर दूर भागते हैं। पर ऐसा है नहीं, यही ईश्वर की माया है। हम माया को समझें और उसके जाल में न उलझें यही हमारी बुद्धिमानी का प्रमाण हो सकता है।

जैसे गोबर के उपले आज थापे जाएं तो वे कई दिन में सूख कर जलाने लायक होते है। हम जो भले बुरे कर्म करते रहते हैं उनका भी धीरे धीरे परिपाक होता रहता है और कालान्तर में वे कर्मफल के रूप में परिणित होते है। इसी प्रक्रिया को भाग्य, तकदीर, कर्मलेख, विधाता के अंक, प्रारब्ध, होतव्यता, आदि नामों से पुकारते हैं। हम देखते हैं कि कई व्यक्ति अत्यन्त शुभ कर्मों में प्रवृत्त है पर उन्हें कष्ट में जीवन बिताना पढ़ रहा है और जो पाप में प्रवृत्त हैं वे चैन की छान रहे हैं। इस का कारण यही है कि उनके भूतकाल के कर्मों का उदय इस समय हो रहा है और आज की करनी का फल उन्हें आगे आने वाले समय में मिलेगा।
मोटा नियम यही है कि जो किया गया है, उसका फल अवश्य मिलेगा। कर्म जैसे मन्द या तीव्र किये गये होंगे उनकी बुराई अच्छाई के अनुसार न्यूनाधिक सुख दुख का विधान होता है। यह कर्म भोग बड़े बड़ों को भोगना पड़ता है।

क्रमशः जारी
अखण्ड ज्योति फरवरी 1950 पृष्ठ 17-18
http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1950/February.17

शनिवार, 16 जनवरी 2016

इन तीन का ध्यान रखिए। (अन्तिम भाग)

इन तीन के लिये लड़ो-
इज्जत, देश, और मित्र। इनकी प्रतिष्ठा आपकी अपनी इज्जत है। यदि आप में स्वाभिमान है, तो आपको इन तीनों की रक्षा अपनी सम्पूर्ण शक्ति से करनी चाहिए।

इन तीन की चाह करो-निर्मलपन, भलापन, आनन्दी स्वभाव। आन्तरिक शान्ति के लिये तीनों आवश्यक है।

इन तीनों को स्मरण रखो-
आरोग्य, सुमित्र और संतोष वृत्ति। ये तीनों ही आड़े समय काम में आने और रक्षा करने वाले है। चाहे अन्य बातों में आप पीछे रहें, किन्तु इन स्वास्थ्य और आरोग्य सम्पादकों को प्राप्त करते रहिये। सच्चा मित्र जीवन का सब से बड़ा हितैषी और सहायता है। संतोषवृत्ति मनः शक्ति को परिपुष्ट करने, आन्तरिक समस्वरता को प्रदान करने वाली परमौषधि है।

इन तीनों का प्राप्त करो-
अच्छी पुस्तक अच्छी सोबत और अच्छी आदतें। अच्छे, उपयोगी, चरित्र का परिष्कार एवं आत्म सुधार करने वाले सद्ग्रन्थ जिस व्यक्ति के पास है, उसे अकेलापन, नीरसता, शुष्कता कभी न प्रतीत होगी। पुस्तकें सदा सर्वदा चौबीसों घंटे का आत्मसुधार करने को प्रस्तुत हैं, आपकी सद्शिक्षाएँ देने को मौजूद रहती हैं। इनके सत्संग से अनेक साधारण व्यक्ति महत्ता प्राप्त कर सकते हैं। सत्साहित्य से समाज के ज्ञान का संवर्द्धन चरित्र का संशोधन होता है। उच्च कोटि के साहित्य से ही घर की शोभा है।

महात्मा गाँधी जी ने कहा है, “अच्छी पुस्तकों के पास रहने से हमें अपने भले मित्रों के साथ न रहने की कमी नहीं खटकती। जितना ही मैं उत्तम पुस्तकों का अध्ययन करता गया, उतना ही मुझे उनकी विशेषताएं मालूम होती गईं। जिसे पुस्तकें पढ़ने का शौक है, वह सब जगह सुखी रह सकता है।” लोकमान्य तिलक के अनुसार, “मैं नर्क में भी उत्तम पुस्तकों का स्वागत करूंगा, क्योंकि इनमें वह शक्ति है कि वे जहाँ होंगी, वहाँ आप ही स्वर्ग बन जायेगा।” अच्छी पुस्तकें ही अच्छी सोहबत और अच्छी आदतें प्रदान कर सकती हैं।

समाप्त
अखण्ड ज्योति फरवरी 1950 पृष्ठ 14
http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1950/February.14

शुक्रवार, 15 जनवरी 2016

इन तीन का ध्यान रखिए। (भाग 2)

इन तीनों को ग्रहण कीजिए- चरित्र के उत्थान एवं आत्मिक शक्तियों के उत्थान के लिए इन तीनों सद्गुणों-
होशियारी, सज्जनता और सहनशीलता-का विकास अनिवार्य है।

(1) यदि आप अपने दैनिक जीवन और व्यवहार में निरन्तर जागरुक, सावधान रहें, छोटी छोटी बातों का ध्यान रखें, सतर्क रहें, तो आप अपने निश्चित ध्येय की प्राप्ति में निरन्तर अग्रसर हो सकते हैं। सतर्क मनुष्य कभी गलती नहीं करता, असावधान नहीं रहता। कोई उसे दबा नहीं सकता।
(2) सज्जनता एक ऐसा दैवी गुण है जिसका मानव समाज में सर्वत्र आदर होता है। सज्जन पुरुष वन्दनीय है। वह जीवन पर्यंत पूजनीय होता है। उसके चरित्र की सफाई, मृदुल व्यवहार, एवं पवित्रता उसे उत्तम मार्ग पर चलाती हैं।
(3) सहनशीलता दैवी सम्पदा में सम्मिलित है। सहन करना कोई हँसी खेल नहीं प्रत्युत बड़े साहस और वीरता का काम है केवल महान आत्माएँ ही सहनशील होकर अपने मार्ग पर निरन्तर अग्रसर हो सकती हैं। इनके अतिरिक्त इन तीन पर श्रद्धा रखिये-धैर्य, शान्ति, परोपकार।

इन तीन को हासिल कीजिए-
सत्यनिष्ठा, परिश्रम और अनवरतता

(1) सत्यनिष्ठ व्यक्ति की आत्मा विशालतर बनती है। रागद्वेष हीन श्रद्धा एवं निष्पक्ष बुद्धि उसमें सदैव जागृत रहती है। वह व्यक्ति वाणी, कर्म, एवं धारणा प्रत्येक स्थान पर परमेश्वर को दृष्टि में रख कर कार्य करता है। जो वाणी, कर्तव्य रूप होने पर हमारे ज्ञान या जानकारी को सही सही प्रकट करती है और उसमें ऐसी कमीवेशी करने का यत्न नहीं करती है कि जिससे अन्यथा अभिप्राय भासित हो, वह सत्यवाणी है। विचार में जो सत्य प्रतीत हो, उसके विवेकपूर्ण आचरण का नाम ही सत्य कर्म है।
(2) परिश्रम एक ऐसी पूजा है, जिसके द्वारा कर्म पथ के सब पथिक अपने पथ को, जीवन और प्राण को ऊँचा उठा सकते हैं। कार्लाइल का कथन है कि परिश्रम द्वारा कोई भी बड़े से बड़ा कार्य, उद्देश्य या योजना सफल हो सकती है।
(3) अनवरतता अर्थात् लगातार अपने उद्योग में लगे रहना मनुष्य को सफलता के द्वारा पर लाकर खड़ा कर देता है। पुनःपुनः अपने कर्तव्य एवं योजनाओं को परिवर्तित करने वाला कभी सफलता लाभ नहीं कर सकता।

इन तीनों का आनन्द प्राप्त करो-
खुला दिल, स्वतन्त्रता और सौंदर्य- ये तीनों आपके आनन्द की अभिवृद्धि करने वाले तत्व हैं।

(1) खुला दिल सबसे उत्तम वस्तुएँ ग्रहण करने को प्रस्तुत रहता है, संकुचित हृदय वाला व्यक्तिगत वैमनस्य के कारण दूसरे के सद्गुणों को कभी प्राप्त करने की चेष्टा नहीं करता। स्वतन्त्रता का आनन्द वही साधक जानता है जो रूढ़िवादिता, अंधविश्वास, एवं क्षणिक आवेशों से मुक्त है।
(2) स्वतंत्रता का अर्थ अत्यन्त विस्तृत है। सोचने, बोलने, लिखने, प्रकट करने की स्वतन्त्रता प्राप्त करनी चाहिए। जो व्यक्ति आर्थिक दृष्टि से स्वतंत्र है, वह अनेक झगड़ों से मुक्त है।
(3) सौंदर्य-आत्मिक और चारित्रिक-दोनों ही उन्नति और प्रगति की ओर ले जाने वाले हैं। यदि सौंदर्य के साथ कुरुचि और वासना मिश्रित हो जायेंगी, तो वह अपना वास्तविक अभिप्राय नष्ट कर देगा। सौंदर्य के साथ सुरुचि का समावेश होना चाहिए। आप सौंदर्य की जिस रूप में पूजा करें, यह स्मरण रखिये वह आप में शुभ भावनाएं प्रेरित करने वाला, सद्प्रेरणाओं को उत्पन्न करने वाला हो।

क्रमशः जारी
अखण्ड ज्योति फरवरी 1950 पृष्ठ 14
http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1950/February.14

गुरुवार, 14 जनवरी 2016

इन तीन का ध्यान रखिए। (भाग 1)

उत्पादन की जड़-इन तीनों को सदैव अपने अधिकार में रखिये-

अपना क्रोध, अपनी जिह्वा और अपनी वासना।
(1) ये तीनों ही भयंकर उत्पादक की जड़ हैं। क्रोध के आवेश में मनुष्य कत्ल करने तक नहीं रुकता। ऊटपटाँग बक जाता है और बाद में हाथ मल मल कर पछताता है।
(2) जीभ के स्वाद के लालच में भक्ष्य अभक्ष्य का विवेक नष्ट हो जाता है। अनेक व्यक्ति चटपटे मसालों, चाट पकौड़ी और मिठाइयाँ खा खाकर अपनी पाचन शक्ति सदा के लिये नष्ट कर डालते हैं।
(3) सबसे बड़े मूर्ख वे हैं जो अनियंत्रित वासना के शिकार हैं। विषय-वासना के वश में मनुष्य का नैतिक, धार्मिक एवं आध्यात्मिक पतन तो होता ही है, साथ ही गृहस्थ सुख, स्वास्थ्य और वीर्य नष्ट होता है। समाज ऐसे भोग विलासी पुरुष को घृणा की दृष्टि से अवलोकता है। गुरुजन उसका तिरस्कार करते हैं। ऐसे पापी मदहोश को स्वास्थ्य लक्ष्मी और आरोग्य सदा के लिये त्याग देते हैं। इन तीनों ही शत्रुओं पर पूरा पूरा नियंत्रण रखिये।

इन तीनों को झिड़को :-

निर्दयता, घमण्ड और कृतघ्नता
(1) ये मन के मैल हैं। इनसे बुद्धि प्राप्त करने में फंस जाती है। निर्दयी व्यक्ति अविवेकी और अदूरदर्शी होता है। वह दया और सहानुभूति का मर्म नहीं समझता। 
(2) घमण्डी हमेशा एक विशेष प्रकार के नशे में मस्त रहता है, धन, बल, बुद्धि में अपने समान किसी को नहीं समझता।
(3) कृतघ्न पुरुष दूसरों के उपकार को शीघ्र ही भूल कर अपने स्वार्थ के वशीभूत रहता है। वह केवल अपना ही लाभ देखता है। वस्तुतः उस अविवेकी का हृदय सदैव मलीन और स्वार्थ-पंक में कलुषित रहता है। दूसरे के किए हुए उपकार को मानने तथा उसके प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकाशित करने में हमारे आत्मिक गुण-विनम्रता, सहिष्णुता और उदारता प्रकट होते हैं।

इन तीनों को त्याग दीजिए-

कुढ़ना, बकझक और हँसी मजाक।
(1) कुढ़ना एक भयंकर मानसिक विकार है। इससे मनुष्य की शक्ति का ह्रास, चिंता और व्यग्रता में वृद्धि होती है। निश्चयबल का क्षय होता है और अपने प्रति अविश्वास उत्पन्न होता है। कुढ़ने का अभिप्राय है हीनत्व की भावना से ग्रसित होना। यह उसी की प्रतिक्रिया है। मनुष्य के किए जब कुछ नहीं होता, तो वह कुढ़ता है। यही मानसिक व्याधि विकसित होने पर नैराश्य का रूप धारण कर लेती है।
(2) व्यर्थ की बकझक से मनुष्य का थोथापन प्रकट होता है। बातूनी व्यक्ति जबानी जमा खर्च में चतुर होता है, ठोस कर्म कम करता है क्योंकि बकझक ही में शक्ति नष्ट हो जाती है।
(3) अनियंत्रित हँसी मजाक आत्मिक दृष्टि से गर्हित है। गन्दा हँसी मजाक कटुता का रूप धारण कर लेता है। इससे मनुष्य की गुप्त वासना का पर्दाफाश होता है। अतः इन तीनों को-कुढ़ना, व्यर्थ की बकझक और अनियंत्रित हँसी मजाक की अधिकतर आदतों को त्याग देना उचित है।

क्रमशः जारी
अखण्ड ज्योति फरवरी 1950 पृष्ठ 13
http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1950/February.13

बुधवार, 13 जनवरी 2016

दोष-दृष्टि को सुधारना ही चाहिए (अन्तिम भाग)

बुद्धिमान व्यक्ति अपने लाभ और हित के लिये हर बात के अच्छे-बुरे दो पहलूओं में से केवल गुण पक्ष पर ही दृष्टि डालता है। क्योंकि वह जानता है, कि विपक्ष पर ध्यान देने, उसको ही देखते रहने से मन को अशाँति के अतिरिक्त और कुछ हाथ न लगेगा, दोष-दृष्टि रखने और दोषान्वेषक करने से घृणा तथा द्वेष का ही प्रादुर्भाव होता है, जिसका परिणाम कलह-क्लेश अथवा अशाँति असन्तोष के सिवाय और कुछ नहीं होता। इससे वस्तु अथवा व्यक्ति की तो कुछ हानि होती नहीं अपना हृदय कलुषित और कलंकित होकर रह जाता है।

अपने दृष्टि-दोष के कारण प्रायः अच्छी चीजें भी बुरी और गुण भी अवगुण होकर हानिकारक बन जाते हैं। जैसे स्वाँति-जल का ही उदाहरण ले लीजिये। स्वाँति की बूँद जब सीप के मुख में पड़ जाती है, तब मोती बन कर फलीभूत होती है और यदि वही बूँद साँप के मुख में पड़ जाती है तो विष का रूप धारण कर लेती हैं। वस्तु एक ही है किन्तु वह उपयोग और संपर्क के गुण दोष के कारण सर्वथा विपरीत परिणाम में फलीभूत हुई।

किसी में गुण की कल्पना न कर सकने के कारण दोषदर्शी अविश्वासी भी होता है। वह किसी की सद्भावना एवं सहानुभूति में भी कान खड़े करने लगता है। प्रेम एवं प्रशंसा में भी स्वार्थपूर्ण चाटुकारिता का दोष देखता है। इसलिये संपर्क में आने और स्नेहपूर्ण बरताव करने वाले हर व्यक्ति से भयाकुल और शंकाकुल रहा करता है। उसे विश्वास ही नहीं होता कि संसार में कोई निःस्वार्थ और निर्दोष-भाव से मिल कर हितकारी सिद्ध हो सकता है। विश्वास, आस्था, श्रद्धा, सराहना से रहित व्यक्ति का खिन्न असंतुष्ट और व्यग्र रहना स्वाभाविक ही है, जैसा कि दोष-दर्शी रहता भी है।

यदि आपको अपने अन्दर इस प्रकार की दुर्बलता दिखी हो तो तुरन्त ही उसे निकालने के लिए और उसके स्थान पर गुण-ग्राहकता का गुण विकसित कीजिये। इस दशा में आपको हर व्यक्ति, वस्तु और वातावरण में आनंद, प्रशंसा अथवा विनोद की कुछ-न-कुछ सामग्री मिल ही जायेगी। दूसरों के गुण-दोषों में से उस हंस की तरह केवल गुण ही ग्रहण कर सकेंगे, जोकि पानी मिले हुए दूध में से केवल दूध-दूध ही ग्रहण कर लेता है और पानी छोड़ देता है।

दूसरों की अच्छाइयों को खोजने, उनको देख-देख प्रसन्न होने और उनकी सराहना करने का स्वभाव यदि अपने अन्दर विकसित कर लिया जाये तो आज दोष-दर्शन के कारण जो संसार, जो वस्तु और जो व्यक्ति हमें काँटे की तरह चुभते हैं, वे फूल की तरह प्यारे लगने लगें। जिस दिन यह दुनिया हमें प्यारी लगने लगेगी, इसमें दोष, दुर्गुण कम दिखाई देंगे, उस दिन हमारे हृदय से द्वेष एवं घृणा का भाव निकल जायेगा और हमें हर दिशा और हर वातावरण में प्रसन्नता ही आने लगेगी। दुःख, क्लेश और क्षोभ, रोष का कोई कारण ही शेष न रह जायेगा।

समाप्त
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति मई 1968 पृष्ठ 24
http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1968/May.24

मंगलवार, 12 जनवरी 2016

दोष-दृष्टि को सुधारना ही चाहिए (भाग 3)

दोष-दर्शन की प्रक्रिया जोर पकड़ ही चुकी थी, उसकी सखी-सहेली झल्लाहट, खीझ, कुढ़न, कुण्ठा, अरुचि आदि सब साथ ही लगी हुई थीं। निदान घर आकर भोजन अच्छा न लगा पत्नी निहायत बेसऊर दिखाई देने लगी। बच्चे यदि सोते मिले तो नालायक हैं। शाम से ही सो जाते हैं। और यदि जगते मिले तो लापरवाह और तन्दुरुस्ती का ध्यान न रखने वाले बन गये। तात्पर्य यह कि उस दिन जहाँ अन्य सब लोग अधिक-से-अधिक प्रसन्नता के अधिकारी बने वहाँ दोषदर्शी के लिये हर बात खेदजनक और दुःखदायी बन गई।

किसी मित्र सम्बन्धी अथवा आत्मीयजन ने मानिये जन्म-दिन अथवा किसी अन्य शुभ अवसर पर अपनी योग्यता एवं समाज के अनुसार कोई उपहार दिया अथवा भेजा। कोई भी व्यक्ति इस सम्मान और स्नेह से पुलकित हो उठता और आभार भरा धन्यवाद देते-देते न अघाता। किन्तु दोषदर्शी तो अपने रोग से मजबूर ही रहता है। यद्यपि वह आभार एवं धन्यवाद न प्रकट करने की असभ्यता नहीं करता तथापि और कुछ नहीं उसमें इतना ही शामिल कर देता कि आपने बेकार यह चीज भेजी। यह तो मेरे पास पहले से ही थी और मुझे ऐसा रंग यह डिजाइन पसन्द नहीं है। यह रंग और प्रकार उपहार के रूप में बहुत आम और सस्ते हो गये हैं। इससे अच्छा यह होता कि आप सद्भावना और बधाई के ही दो शब्द दे देते। बात भले ही सही रही हो। किन्तु इस भावना ने, इस दोष-दृष्टि ने उसको स्वयं तो प्रसन्न नहीं ही होने दिया साथ ही अपने मित्र और स्वजन की प्रसन्नता भी छीन ली।

यही बात नहीं कि दोष-दृष्टा केवल दूसरों में ही बुराई और कमियाँ देखता हो। स्वयं अपने प्रति भी उसका यही अत्याचार रहा करता है। उदाहरण के लिये वह बाजार से अपने लिये कोई वस्तु खरीदने जाती है। पहले तो वह कितनी ही प्रकार की चीजें क्यों न दिखलाई जायें, उसे पसन्द ही नहीं आती, सबमें कोई-न-कोई दोष दिखलाई देता है। वस्तु के निर्दोष होने पर भी वह अपनी और से किसी दोष का आरोपण कर ही लेगा। अपनी इस प्रक्रिया से थक जाने के बाद जब चीज लेकर घर आता है। तब भी उसका पेट अप्रशंसा से भरा नहीं होता। चीज डाली और कहना आरम्भ कर दिया- ‘‘खरीदने को खरीद तो अवश्य लाया लेकिन कुछ पसन्द नहीं आई। यदि पत्नी इस बात को नहीं मानती और चुनाव की प्रशंसा करती है, तो झूठी प्रशंसा का करने का आरोप पाती है। जब तक वह अपनी पसन्द, बाजारदारी, चीज की पहचान के विषय में आलोचना नहीं कर लेता, बुराई नहीं निकाल लेता, अपनी अकल और अनुभव को कोस नहीं लेता चैन नहीं पड़ता। इस प्रकार वह इस प्रसन्नता के छोटे अवसर को भी खिन्नता से कडुआ बना ही लेता है।

तात्पर्य यह है कि दोष-दर्शी कितने ही सुन्दर स्थान, वस्तु और व्यक्ति के संपर्क में क्यों न आये अपने अवगुण के प्रभाव से उससे मिलने वाले आनन्द से वंचित ही रहता है। निदान इस लम्बे-चौड़े संसार में उसे न तो कहीं आनन्द दीखता है और न किसी वस्तु में सामंजस्य का सुख प्राप्त होता है। उसे हर व्यक्ति, हर वस्तु और हर वातावरण अपनी रुचि के साथ असमंजस उत्पन्न करती ही दीखती है। जबकि गुण-ग्राहक हर व्यक्ति, हर वस्तु और हर वातावरण में सामंजस्य और सुन्दरता ही खोज निकालता है। यही कारण है कि गुण-ग्राहक सदैव प्रसन्न और दोषान्वेषक सदा खिन्न बना रहता है।

वस्तुतः बात यह है कि संसार की प्रत्येक वस्तु गुण-दोषमय ही है। कोई भी वस्तु एवं व्यक्ति ऐसा नहीं हो सकता कि जिसमें या तो गुण-ही-गुण भरे हों अथवा दोष-ही-दोष। अपनी दृष्टि के अनुसार हर व्यक्ति उसमें गुण या दोष देख कर प्रसन्न अथवा खिन्न हुआ करता है।

क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति मई 1968 पृष्ठ 23
http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1968/May.23

सोमवार, 11 जनवरी 2016

दोष-दृष्टि को सुधारना ही चाहिए (भाग 2)

दोष-दर्शन से दूषित व्यक्ति जब किसी व्यक्ति के संपर्क में आता है, तब अपने मनोभाव के अनुसार उसके अन्दर बुराइयाँ ढूँढ़ने लगता है और हठात् कोई न कोई बुराई निकाल ही लेता है। फिर चाहे वह व्यक्ति कितना ही अच्छा क्यों न हो। उदाहरण के लिये किसी विद्वान महात्मा को ही ले लीजिये। लोग उसे बुलाते, आदर सत्कार करते और उसके व्याख्यान से लाभ उठाते हैं। महात्मा जी का व्याख्यान सुन कर सारे लोग पुलकित, प्रसन्न व लाभान्वित होते हैं।

उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा करते और अपने उतने समय को बड़ा सार्थक मानते। अनेक दिनों, सप्ताहों तथा मासों तक उस सुखद घटना का स्मरण करते और ऐसे संयोग की पुनरावृत्ति चाहने लगते। अधिकाँश लोग उस व्याख्यान का लाभ उठा कर अपना ज्ञान बढ़ाते, कोई गुण ग्रहण करते और किसी दुर्गुण से मुक्ति पाते हैं। वह उनके लिए एक ऐसा सुखद संयोग होता है जो गहराई तक अपनी छाप छोड़ जाता है, ऐसे ही सुव्यक्ति गुणाग्राही कहे जाते हैं।

अब दोष-दृष्टा को ले लीजिये। उसकी स्थिति बिल्कुल विपरीत होती है। जहाँ अन्य लोग उक्त महात्मा में गुण ही देख सके वहाँ उसे केवल दोष ही दिखाई दिये। उसका हृदय महात्मा के प्रशंसकों के बीच, उनकी कुछ खामियों के रखने के लिये बेचैन हो जाता। जब अवकाश अथवा अवसर न मिलता तो प्रशंसा में सम्मिलित होकर उनके बीच बोलने का अवसर निकाल कर कहना प्रारम्भ कर देता- ‘‘हाँ, महात्मा जी का व्याख्यान था तो अच्छा- लेकिन उतना प्रभावोत्पादक नहीं था, जितना कि लोग प्रभावित हुए अथवा प्रशंसा कर रहे हैं। कोई मौलिकता तो थी नहीं। यही सब बातें अमुक नेता ने अपनी प्रचार-स्पीच में शामिल करके देशकाल के अनुसार उसमें धार्मिकता का पुट दे दिया था। अजी साहब क्या नेता, क्या महन्त सबके-सब अपने रास्ते जनता पर नेतृत्व करने के सिवाय और कोई उद्देश्य नहीं रखते। यह सब पूजा, प्रतिष्ठा व पेट का धन्धा है।”

यदि लोग सच्चाई से विमुख होकर उससे सहमत न हुए तब तो वह वाद-विवाद के लिये मैदान पकड़ लेता है और अन्त में अपना दोषदर्शी चित्र दिखा कर लोगों की हीन दृष्टि का आखेट बन कर प्रसन्नता खो कर और विषण्ण होकर लौट आता है। जहाँ गुण ग्राहकों ने उस दिन महीनों काम आने वाली प्रसन्नता प्राप्त की, वहाँ दोष-दृष्टा ने जो कुछ टूटी-फूटी प्रसन्नता उस समय पास में थी वह भी गवाँ दी।

क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति मई 1968 पृष्ठ 22-23
http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1968/May.22

रविवार, 10 जनवरी 2016

दोष-दृष्टि को सुधारना ही चाहिए (भाग 1)

क्या कभी अपने यह सोचा कि आप पग-पग पर खिन्न, असंतुष्ट, उद्विग्न अथवा उत्तेजित क्यों रहते हैं? क्यों आपको समाज, संसार मनुष्यों, मित्रों, वस्तुओं, परिस्थितियों यहाँ तक अपने से भी शिकायत रहती है? आप सब कुछ करते, बरतते और भोगते हुए भी वह मजा, आनन्द और प्रसन्नता नहीं पाते, जो मिलनी चाहिये और संसार के अन्य असंख्यों लोग पा रहे हैं। आप विचारक, आलोचक, शिक्षित, और सभ्य भी हैं, किन्तु आपकी यह विशेषता भी आपको प्रसन्न नहीं कर पाती। स्त्री-बच्चे, घर, मकान सब कुछ आपको उपलब्ध है। फिर भी आप अपने अन्दर एक अभाव और एक असंतोष अनुभव ही करते रहते हैं। घर, बाहर, मेले-ठेले, सफर, यात्रा, सभा-समितियों, भाषणों, वक्तव्यों- किसी में भी कुछ मजा ही नहीं आता। हर समय एक नाराजी, नापसन्दी एवं नकारात्मक ध्वनि परेशान ही रखती है। संसार की किसी भी बात, वस्तु और व्यक्ति से आपका तादात्म्य ही स्थापित हो पाता है।

साथ ही आप पूर्ण स्वस्थ हैं। मस्तिष्क का कोई विकार आपमें नहीं है। आपका अन्तःकरण भी सामान्य दशा में है और आस-पास में ऐसी कोई घटना भी नहीं घटी है, जिससे आपकी अभिरुचिता एवं प्रसादत्व विक्षत हो गया हो। ऐसा भी नहीं हुआ कि विगत दिनों में ही किसी ऐसे अप्रिय संयोग से सामंजस्य स्थापित करना है, जिसकी अनुभूति आज भी आपको विषाण बनाये हुए हैं।

वास्तव में बात बड़ी ही विचित्र और अबूझ-सी मालूम होती है। जब प्रत्यक्ष में इस स्थायी अप्रियता का कोई कारण नहीं दिख पड़ा, फिर ऐसा कौन-सा चोर, कौन-सा ठग आपके पीछे अप्रत्यक्ष रूप से लगा हुआ है, जो हर बात के आनन्द से आपको वंचित किए हुये आपके जन्म-सिद्ध अधिकार प्रसन्नता का अपहरण कर लिया करता है। इसको खोजिये, गिरफ्तार करिये और अपने पास से मार भगाइये। जीवन में सदा दुःखी और खिन्नावस्था में रहने का पाप न केवल वर्तमान ही बल्कि आगामी शत-शत जीवनों तक को प्रभावित कर डालता है।

देखिये और जरा ध्यान से देखिये कि आपके अन्दर ‘दोष-दर्शन’ करने की दुर्बलता, तो नहीं घर पर बैठी है। क्योंकि ‘दोष-दर्शन’ का दृष्टिकोण भी जीवन को कुछ-कुछ ऐसा ही बना देता है। दोष-दर्शन और संतोष, दोष-दर्शन और प्रसन्नता, दोष-दर्शन तथा सामंजस्य का नैसर्गिक विरोध है। दोष-दृष्टि मनुष्य के हृदय पर उसके मानस पर एक ऐसा आवरण है, जो न हो बाहर की प्रसन्न- किरणों को भीतर प्रतिबिम्बित होने देता है और न भीतर का उल्लास बाहर ही प्रकट होने देता है। इसे मनुष्य एवं आनन्द के बीच एक लौह दीवार ही समझना चाहिये। लीजिये दोषदर्शी व्यक्तियों की दशा से अपना मिलान कर लीजिये और यदि अपने में दोष पायें तो तुरन्त सुधार कर डालिये, जिससे, अगले दिनों में आप भी उस प्रकार प्रसन्न रह सकें, जिस प्रकार लोग रहते हैं और उन्हें रहना ही चाहिये।

क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति मई 1968 पृष्ठ 22
http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1968/May.22

शनिवार, 9 जनवरी 2016

लक्ष्य में तन्मय हो जाइए।

मन बड़ा शक्तिवान है परन्तु बड़ा चञ्चल । इसलिए उसकी समस्त शक्तियाँ छितरी रहती हैं और इसलिए मनुष्य सफलता को आसानी से नहीं पा लेता। सफलता के दर्शन उसी समय होते हैं, जब मन अपनी वृत्तियों को छोड़कर किसी एक वृत्ति पर केन्द्रित हो जाता है, उसके अलावा और कुछ उसके आमने-सामने और पास रहती ही नहीं, सब तरफ लक्ष्य ही लक्ष्य, उद्देश्य ही उद्देश्य रहता है।

मनुष्य अनन्त शक्तियों का घर है, जब मनुष्य तन्मय होता है तो जिस शक्ति के प्रति तन्मय होता है, वह शक्ति जागृत होती और उस व्यक्ति को वह सराबोर कर देती है। पर जो लोग तन्मयता के रहस्य को नहीं जानते अपने जीवन में जिन्हें कभी एकाग्रता की साधना का मौका नहीं मिला, वे हमेशा डाल डाल और पात पात पर डोलते रहे परन्तु सफलता देवी के वे दर्शन नहीं कर सके।

जिन्हें हम विघ्न कहते हैं, वे हमारे चित्त की विभिन्न वृत्तियाँ हैं जो अपने अनेक आकार प्रकार धारण करके सफल नहीं होने देतीं। यदि हम लक्ष्य सिद्ध करना चाहते हैं तो यह आवश्यक है कि लक्ष्य से विमुख करने वाली जितनी भी विचार धारायें उठें और पथ-भ्रष्ट करने का प्रयत्न करें हमें उनसे अपना सम्बन्ध विच्छेद करते जाना चाहिए। और यदि हम चाहें अपनी दृढ़ता को कायम रखें, अपने आप पर विश्वास रखें तो हम ऐसा कर सकते हैं, इसमें किसी प्रकार का कोई सन्देह नहीं है। एक ऐतिहासिक घटना इस सम्बन्ध में हमें विशेष प्रकाश दे सकती है।

सिंहगढ़ जीतने के लिए मराठों के एक दल ने उस पर चढ़ाई कर दी। प्रसिद्ध तानाजी राव इसके सेनानी थे। अपने सैनिकों के साथ किले की दीवार पर रस्सी टाँगकर चढ़ गये। शत्रुओं के साथ घोर युद्ध होने लगा। तानाजी खेत रहे। इस पर वीर मराठा चंचल हो गये और एकाग्रता भंग होते ही उन्होंने भागना आरम्भ कर दिया, जिस रास्ते आये थे उसी रास्ते से उतरने का प्रयत्न करने लगे। तानाजी के भाई सूर्याजी ने उस रास्ते को बन्द करने के लिए रस्सी को काट दिया और कह दिया कि भागने का रास्ता बन्द हो गया। भागने का रास्ता बन्द हो जाने पर जीत का ही रास्ता खुला मिला, इस लिए जो शक्ति भागने में लग गई थी उसने फिर जीत का बाना पहना। और सिंहगढ़ पर विजय प्राप्त की।

मन की अपरिमित शक्ति को जो लक्ष्य की ओर लगा देते हैं और लक्ष्य भ्रष्ट करने वाली वृत्तियों पर अंकुश लगा लेते हैं अथवा उनसे अपना मुँह मोड़ देते हैं वे ही जीवन के क्षेत्र में विजयी होते हैं, सफल होते हैं। शास्त्रों में इस सफलता को पाने के लिए बाण के समान गतिवाला बनने का आदेश दिया है-
“शर वत् तन्मयो भवेत्”
बाण की तरह तन्मय होना चाहिए।

धनुष से छूटा बाण अपनी सीध में ही चलता जाता है, वह आस-पास की किसी वस्तु के साथ अपना संपर्क न रख कर सीधा वहीं पहुँचता है जो कि उसके सामने होती है। अर्थात् सामने की तरफ ही उसकी आँख खुली रहती है और सब ओर से बन्द। इसलिये जो लोग लक्ष्य की तरफ आँख रखकर शेष सभी ओर से अपनी इन्द्रियों को मोड़ लेते है और लक्ष्य की ओर ही समस्त शक्ति लगा देते हैं वे ही सफल होते हैं। उस समय अर्जुन से पूछे गये द्रोण के प्रश्न-उत्तर में अर्जुन की तरह उनकी अन्तरात्मा में एक ही ध्वनि गूँजती है अतः अपना लक्ष्य ही दिखाई देता है।

पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति फरवरी 1950 पृष्ठ 9
http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1950/February.9

शुक्रवार, 8 जनवरी 2016

हमारी अतृप्ति और असंतोष का कारण।

आवश्यकताओं को मर्यादा से बढ़ा देने का नाम अतृप्ति और दुःख है उन्हें कम कर पूर्ति करने से सुख और सन्तोष प्राप्त होता है। मनुष्य एक ही प्रकार के सुख से तृप्त नहीं रहता। अतः असंतोष सदैव बना रहता है। वह असंतोष निंदनीय है जिसमें किसी वस्तु की प्राप्ति के लिए मनुष्य दिन रात हाय-हाय करता रहे और न पाने पर असंतुष्ट, अतृप्त, और दुःखी रहे।

तृष्णाएं एक के पश्चात् दूसरी बढ़ेगी। एक आवश्यकता की पूर्ति होगी, तो दो नई आवश्यकताएं आकर उपस्थित हो जायेंगी। अतः विवेकशील पुरुष को अपनी आवश्यकताओं पर कड़ा नियंत्रण रखना चाहिए। इस प्रकार आवश्यकताओं को मर्यादा के भीतर बाँधने के लिए एक विशेष शक्ति-मनोनिग्रह की जरूरत है।

एक विचारक का कथन है-“जो मनुष्य अधिकतम संतोष और सुख पाना चाहता है, उसको अपने मन और इन्द्रियों को वश में करना अत्यन्त आवश्यक है। यदि हम अपने आपको तृष्णा और वासना में बहायें, तो हमारे असंतोष की सीमा न रहेगी।”

अनेक प्रलोभन तेजी से हमें वश में कर लेते हैं, हम अपनी आमदनी को भूल कर उनके वशीभूत हो जाते हैं। बाद में रोते चिल्लाते हैं। जिह्वा के आनन्द, मनोरंजन आमोद प्रमोद के मजे हमें अपने वश में रखते हैं। हम सिनेमा का भड़कीला विज्ञापन देखते ही मन को हाथ से खो बैठते हैं और चाहे दिन भर भूखे रहें, अनाप-शनाप व्यय कर डालते हैं। इन सभी में हमें मनोनिग्रह की नितान्त आवश्यकता है। मन पर संयम रखिये। वासनाओं को नियंत्रण में बाँध लीजिये, पॉकेट में पैसा न रखिये। आप देखेंगे कि आप इन्द्रियों को वश में रख सकेंगे।

आर्थिक दृष्टि से मनोनिग्रह और संयम का मूल्य लाख रुपये से भी अधिक है। जो मनुष्य अपना स्वामी है और इन्द्रियों को इच्छानुसार चलाता है, वासना से नहीं हारता, वह सदैव सुखी रहता है।

प्रलोभन एक तेज आँधी के समान है जो मजबूत चरित्र को भी यदि वह सतर्क न रहे, गिराने की शक्ति रखती है। जो व्यक्ति सदैव जागरुक रहता है, वह ही संसार के नाना प्रलोभनों आकर्षणों, मिथ्या दंभ, दिखावा, टीपटाप से मुक्त रह सकता है। यदि एक बार आप प्रलोभन और वासना के शिकार हुए तो वर्षों उसका प्रायश्चित करने में लग जायेंगे।

पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति जनवरी 1950 पृष्ठ 9
http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1950/January.9

गुरुवार, 7 जनवरी 2016

विश्वास करो।

विश्वास करो कि तुम जगत में महान कार्य के लिये आये हो, तुम्हारे भीतर महान आत्मा का निवास है। विश्वास करो कि तुम शरीर नहीं आत्मा हो, तुम मृत्यु नहीं अमर हो, इसलिए तुम्हें कोई नष्ट नहीं कर सकता, कोई तुम्हें विचलित नहीं कर सकता।

विश्वास करो कि तुम अकेले नहीं हो। जंगल, नदी, पर्वत और एकान्त में भी तुम अकेले नहीं हो, तुम्हारे साथ सर्वशक्तिमान सर्वव्यापक परमात्मा है। जब तुम सोते हो और गाढ़ निद्रा में होते को तब भी परम प्रभु तुम्हारे अंग संग होता है। तुम्हारा वह अनन्त पिता तुम्हें जीवन दे रहा है, वह तुम्हें महान और चिरायु बनाना चाहता है इसलिए किसी भी दशा में अपने आपको अकेला और असहाय न मानो, भला जब अमरत्व सहायों का भी सहाय राजाओं का भी राजा परम प्रभु तुम्हारे साथ हैं तब तुम अपने आपको निराश्रित और असहाय क्यों समझते हो। क्या हुआ यदि तुम्हारा विनाश करने के लिए सब साँसारिक शक्तियाँ एकत्र हैं। यदि परमपिता तुम्हारी रक्षा कर रहा है तो विश्वास करो कोई तुम्हारा बाल भी बाँका नहीं कर सकता। विश्वास करो, तुम्हारा पिता तुम्हें प्यार करता है। वह तुम्हें अपने पास बुला रहा है। परन्तु तुम अपने पिता के पास न जाकर बाहर की ओर बढ़े जा रहे हो। जरा रुको, अनन्त प्रेम की प्राप्ति तुम्हें परम पिता के पास होगी।

विश्वास करो। ईश्वर तुम से बहुत उपयोगी कार्य लेना चाहता है। तुम ईश्वर का निमित्त बन कर प्रभु को आत्म समर्पण कर दो, समर्पण करने से तुम्हें बड़ी शक्ति मिलेगी।

आत्म-समर्पण का अर्थ यह नहीं कि तुम आत्मविश्वास खो बैठो। जब तुमने परम आत्मा को आत्मसमर्पण किया है। तब तुम में पूर्ण आत्म-विश्वास जागृत होना चाहिए। उस दशा में तुम महान बन गये हो, तुम्हें भय नहीं रहा ऐसा सोचो तुम महान से मिलकर महान बन गये यह विश्वास करो। विश्वास करो, तुम बलवान हो। निर्बलता पाप है। तुम अपने मन में से निर्बलता को सदा के लिये भगा दो। आत्मा और परमात्मा दोनों बल हैं। तुम्हारी निर्बल मनोवृत्ति मानसिक है। मन भी प्राकृतिक है तुम तो प्रकृति से परे हो। इसलिए मन में कभी निर्बलता को न आने दो।

विश्वास करो, तुम पवित्र और शुद्ध हो। अशुद्धता और अपवित्रता को तुम जब चाहो झाड़ सकते हो, इस लिए यदि तुम से कभी भूल भी हो गई है तो उससे अधिक चिन्तित न बनो। आगे से उस बुराई को कभी न करने के दृढ़ संकल्प के साथ बढ़ो। बढ़ते ही चलो तुम्हें कोई नहीं रोक सकता। आज तक बढ़ने वाले को कोई नहीं रोक पाया। यदि तुम यह सोचो कि कोई तुम्हारा विरोध न करे तभी तुम कर सकोगे तो यह भी कभी न होगा। बहुधा तुम जीवन संघर्ष को ही विरोध मान लेते हो। विरोध के बिना तुम बढ़ने का विचार न करो। तुम विश्वास करो कि तुम सब बाधाओं पर विजयी हो सकोगे, उठो और आगे बढ़ो।

-कर्मयोग से
अखण्ड ज्योति दिसम्बर 1949 पृष्ठ 9
http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1949/December.9

बुधवार, 6 जनवरी 2016

जीवन संग्राम की तैयारी कीजिए। (अन्तिम भाग)

प्रतिभा को पहचान लेने के बाद, उसके समुचित विकास में अनेक बातों का सहारा लेना पड़ता है। घरेलू परिस्थितियों का इस सम्बन्ध में बहुत अधिक महत्व है क्योंकि मनुष्य जिस माता के गर्भ से जन्म लेता है और जिस पिता के प्यार से पलता है, उसके प्रभाव से उसकी प्रतिभा अछूती नहीं रह सकती। इन्हीं कारणों से प्रायः सभी विद्वानों ने मातृ-प्रभाव को मुक्त कंठ से स्वीकार किया है। वह युवक बड़े भाग्यवान हैं और उनकी सफलता निश्चित है जिन्हें अच्छी माता और अच्छे पिता का संरक्षण प्राप्त है।

घरेलू प्रभाव के बाद मनुष्य की प्रतिभा पर सबसे अधिक प्रभाव ‘मित्र’ का पड़ता है। इस प्रकार के कुप्रभाव से बचना मनुष्य के हाथ में है। अच्छी संगति की महिमा इसीलिए बार-बार गाई है कि मनुष्य के जीवन का निर्माण उसके मित्रों के सहयोग से होता है। एक लेखक ने कहा है कि एक सच्चा मित्र मनुष्य की सुरक्षा का सबसे बड़ा साधन है और जिसको ऐसा मित्र मिल गया, उसे मानो एक बड़ा खजाना मिल गया। एक सच्चा मित्र जीवन की दवा है। अपनी प्रतिभा के अनुकूल ही अपने मित्र बनाने चाहिए। अंग्रेजी कवि वायरन के काव्य का अध्ययन करने से स्पष्ट पता चलता है कि उसकी प्रतिभा पर उसके मित्रों के विचारों का रंग खूब चढ़ा हुआ है। शेली के संग में रह कर ही उसने भावों की कोमलता और प्रकृति के प्रति असीम अनुराग प्राप्त किया। अपने अध्ययन काल में पोले बड़ा आलसी था। रात भर सोने के बाद भी वह दिन चढ़े तक सोया करता था। एक दिन उसका मित्र आया और उसको बिस्तर पर पड़े देखकर बोला- “तुम्हारे बारे में सोचते-सोचते मैं रात भर न सो सका। मैं सिर्फ यही सोचता रहा तुम कितने बेवकूफ हो। मेरे पास इतने साधन है कि मैं जितना चाहूँ आराम कर लूँ, जितना चाहूँ आलस करूं, पर तुम गरीब हो, और आलस्य तुम्हें उचित नहीं। मैं शायद संसार में कुछ भी नहीं कर दिखा सकता अगर कोशिश भी करूं, पर तुम सब कुछ कर सकने में समर्थ हो। मुझे रातभर सिर्फ यह सोच कर नींद नहीं आई कि तुम बड़े मूर्ख हो और अब मैं तुमको गंभीरता पूर्वक सावधान करने और चेतावनी देने आया हूँ। अगर वास्तव में तुम इसी तरह आलसी बने रहे तो मैं तुम्हारा साथ हमेशा के लिए छोड़ दूँगा।”

यह प्रेम की ताड़ना थी। पोले के बाद का जीवन ‘मित्र’ के महत्व का सबसे बड़ा साक्षी है। अज्ञान और आलस्य के गहन अंधकार को मित्र का प्रकाश ही दूर कर सकता है।
अपनी सच्ची शक्तियों को पहचान लेने के बाद और उनमें विकास के लिए उचित सहयोग प्राप्त कर लेने के बाद जीवन संग्राम के लिए यात्रा करने का समय आ जाता है। उसी समय यह भी निश्चित कर लेना आवश्यक है कि हम अपने उद्देश्य कभी भी न बदलेंगे और सूत्र से काम लेंगे। प्रारम्भ में कोई भी काम अच्छा नहीं लगता और उसके कारण भी है, चाहे वह नौकरी हो, चाहे व्यापार हो या कला की उपासना, शुरू में ही सारे आयोजन इकट्ठा करने और उपयुक्त वातावरण तैयार करने में बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। लुढ़कते हुए पत्थर पर काई नहीं जमती और ‘रोम का निर्माण एक दिन में नहीं हुआ”- यह दो कहावतें याद रखनी चाहिए। जीवन में यदि सब्र और शाँति से काम लिया जाय तो असफल होने का कोई कारण नहीं रहता।

कभी-कभी ऐसा होता है कि जिस उद्देश्य को लेकर हम चलना चाहते हैं, दूसरे लोग उसे नीची दृष्टि से देखते हैं। ऐसी स्थिति में अपने मन चाहे काम से घृणा न करने लगना चाहिए। दूसरों को व्यर्थ में प्रसन्न करने और झूठा सम्मान प्राप्त करने के लिए अपनी प्रतिभा की भूख को मार डालना बड़ी बेवकूफी है। हर एक काम को ईमानदारी और सुरुचिपूर्ण ढंग से करके गौरव पूर्ण बनाया जा सकता है। सड़क पर एक गंदा टाट बिछाकर हजारों मक्खियों की भिनभिनाहट के बीच में बैठ कर जूता तैयार करने वाले मोची का व्यवसाय घृणित नहीं है, उसकी क्रिया प्रणाली घृणित है। बाजार में साफ सुथरे ढंग से बैठ कर और अपने ग्राहकों को अच्छा काम देकर वही मोची पूरा सम्मान प्राप्त कर सकता है।
जीवन संग्राम की तैयारी का प्रारंभ यहीं से होता है।

मंगलवार, 5 जनवरी 2016

जीवन संग्राम की तैयारी कीजिए। (भाग 1)

मनुष्य का बचपन सावन की हरियाली है। उसमें चिंता नहीं, विकार नहीं और कर्त्तव्य का बंधन भी नहीं। बचपन का अंत मानो फूलों की सेज पर शयन करने के आनन्द की समाप्ति है। युवावस्था आते ही- मैं क्या बनूँगा?- यह एक प्रश्न दिन-रात प्रत्येक युवक की आँखों के सामने घूमा करता है। उसके माता-पिता और अभिभावकों के आगे यह समस्या आ जाती है कि- हम उसको क्या बनाये? युवावस्था को ‘मस्ती’ जैसे शब्दों की व्याख्या करना एक भयानक भूल है- संसार के निष्ठुर सत्य का सामना इसी समय करना पड़ता है। युवावस्था एक संग्राम है और युवक की एक भूल असफलता का कारण बन सकती है। युवावस्था शतरंज के खेल की भाँति ‘खेल’ कही जा सकती है पर यह याद रखना चाहिए कि एक गलत चाल से ही ‘जान’ का खतरा भी पैदा हो जाता है।

एक नवयुवक साहसी व्यक्ति को अपनी सफलता के लिए अपने शरीर और मन के स्वास्थ्य को ठीक रखने के लिए वह जान लेना जरूरी है कि वह जितना बड़ा बोझ अपने कंधों पर उठाने जा रहा है, उसके ढोने की शक्ति उसकी है या नहीं। बोझा ढोने में मनुष्य की लगन बड़ी सहायक होती है। चींटी अपने से बीसियों गुना भार उठा ले जाती है, क्योंकि उसमें सच्ची लगन है और अध्यवसाय है। वकील बनने की क्षमता रखने वाला, यदि रसायन शास्त्री बनने का प्रयत्न करे, तो इसे अपनी प्रतिभा का नष्ट करना ही कह सकते हैं। एक जन्मजात गायक कभी भी शेयर बाजार में सफल नहीं हो सकता। जिसमें अदम्य साहस है, जो प्रत्येक स्थिति पर काबू पा लेता है और जो बिखरी शक्तियों को एक में समन्वित कर लेता है, वह दैनिक जीवन में चमक सकता है। इस बात में सभी विद्वान सहमत हैं कि यदि सूर्य के रथ को खींचने वाले द्रुतगामी घोड़ों को बैलगाड़ी में जोत दिया जाय, तो इससे बढ़कर मूर्खता की दूसरी बात हो ही नहीं सकती। इसलिए युवक को चाहिए की वह अपनी आत्मा को पहचाने और संरक्षकों तथा माता-पिता का सबसे बड़ा काम यही है कि उसे केवल इतनी सहायता दे जिसमें उसे अपनी शक्तियों का बोध अच्छी तरह हो जाय। अभिभावकों की अदूरदर्शिता और अति प्रेम के कारण कितनी ही प्रतिभाओं का विकास न हो सका।

अपनी शक्ति को पहचानने में भी बहुत बड़े धोखे हो जाते हैं। ‘पसंद’ और ‘प्रतिभा’ दो अलग अलग चीजें है और ‘पसंद’ को ‘प्रतिभा’ समझ लेना बड़ी भारी भूल है। यदि किसी को कविता सुनने में आनन्द आता है तो उसे वह न समझ लेना चाहिए कि वह कालिदास और भवभूति बन सकता है। पसंद और प्रतिभा में विवेक कर लेना कठिन भी है पर उसे इस प्रकार समझा जा सकता है। ‘प्रतिभा’ मनुष्य के हृदय के भीतर निरंतर जलने वाली ज्वाला है, वह उसकी महत्वाकाँक्षा को प्रतिफल भोजन देकर जीवित रखती है। दिन-रात, सोते-जागते और उठते-बैठते, स्पष्ट या अस्पष्ट रूप से मनुष्य एक बड़ी भारी कमी अपने में महसूस करता है। उसे पूरा करने के लिए उसका हृदय तड़पता रहता है और उसी के चिंतन में उसे शान्ति मिलती है, बस प्रतिभा यही है। प्रतिभा केवल एक होती है, पसन्द अनेक होती हैं। गायिका के जमघट में बैठकर और संगीत का आनन्द लाभ करके जब यह इच्छा होती है कि कितना अच्छा हो यदि मुझे भी गाना आ जाये और उस समय यह भी सोच ले कि हम भी गीत का अभ्यास करेंगे मगर उस गोष्ठी से दूर हट कर वही इच्छा लुप्त हो जाती है और यदि महीनों उस संगति में न जाये तो उस ओर ध्यान भी नहीं जाता, वही स्थिति पसन्द का बोध कराती है। पसंद क्षणिक है, वह मन को केवल अस्थायी शान्ति देती है। मनुष्य परिवर्तन चाहता है ‘पसंद’ केवल इसमें सहायता देती है। यदि पसंद पूरी न हो तो मनुष्य को कोई दुख विशेष नहीं होता। एक औंस ‘प्रतिभा’ हजारों मन ‘पसंद’ से ज्यादा कीमती है। इसलिए राख के अन्दर छिपी हुई चिंगारी की तरह अपनी प्रतिभा को खोज निकालो।

जीवन कभी भी शाँत, सुखी और सफल नहीं हो सकता, जब तक उसका समन्वय प्रकृति प्रदत्त प्रतिभा के साथ न हो। एक विद्वान कहता है कि-”बालक जो चाहता है, युवक उसकी प्राप्ति का प्रयत्न करता है और पूर्ण मनुष्य उसे प्राप्त करता है।” सच्चा और स्वतः परिश्रम प्रतिभा से पैदा होता है। नेलसन ने जल युद्ध में अद्वितीय सफलता इसलिए प्राप्त की कि वह बचपन में जहाज का खिलौना खेला करता था। चन्द्रगुप्त मौर्य भारत सम्राट इसीलिए बना कि वह बचपन में खेलने कूदने में राजा का अभिनय किया करता था। यदि सच्ची प्रतिभा है तो जरा सा बल मिलने और मार्ग प्रदर्शन करने पर पूर्ण सफलता प्राप्त करा देती है।

क्रमशः जारी
अखण्ड ज्योति अक्टूबर 1949 पृष्ठ 13
http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1949/October.13

सोमवार, 4 जनवरी 2016

भाग्य का निर्माण अपने हाथ में है।

अनेक बार छोटी-मोटी असफलता मिलने तथा अभाव ग्रस्त होने पर लोग ऐसा कहने लगते हैं-”क्या करें, हमारे भाग्य में ही ऐसा लिखा है, हमें ऐसी ही हीन स्थिति में रहना पड़ेगा। यदि हमारे भाग्य में सफलता बंधी होती तो अब तक के प्रयत्न असफल क्यों होते?” ऐसे अदूरदर्शी मनुष्य भाग्यवाद के गूढ़ सिद्धान्तों को नहीं समझते और न यह समझते हैं कि इस प्रकार की मान्यता बना लेने के कारण वे किस प्रकार अपने भविष्य के निर्माण में भारी बाधा उपस्थित कर रहे हैं। ऐसे लोग मार्ग की बाधाओं का मुकाबला नहीं कर सकते।

सफलता की देवी का प्रसन्न करने के लिए पुरुषार्थ की भेंट चढ़ानी पड़ती है। जो मनुष्य पुरुषार्थी नहीं है, प्रयत्न और परिश्रम में दृढ़ता नहीं रखता वह स्थायी सफलता का अधिकारी नहीं हो सकता। यदि अनायास किसी प्रकार कोई सम्पत्ति उसे प्राप्त हो भी जाय तो वह उससे संतोषजनक लाभ नहीं उठा सकता। वह ऐसे ही अनायास चली जाती है जैसे कि अनायास आई थी।

रोटी का स्वाद वह जानता है जिसने परिश्रम करने के पश्चात् क्षुधार्त होकर ग्रास तोड़ा हो। धन का उपयोग वह जानता है जिसने पसीना बहाकर कमाया हो। सफलता का मूल्याँकन वही कर सकता है जिसने अनेकों कठिनाइयों, बाधाओं और असफलताओं से संघर्ष किया हो। जो विपरीत परिस्थितियों और बाधाओं के बीच मुस्कराते रहना और हर असफलता के बाद दूने उत्साह से आगे बढ़ना जानता है। वस्तुतः वही विजयलक्ष्मी का अधिकारी होता है।

जो लोग सफलता के मार्ग में होने वाले विलम्ब की धैयपूर्वक प्रतीक्षा नहीं कर सकते, जो लोग अभीष्ट प्राप्ति के पथ में आने वाली बाधाओं से लड़ना नहीं जानते वे अपनी अयोग्यता और ओछेपन को बेचारे भाग्य के ऊपर थोप कर स्वयं निर्दोष बनने का उपहासास्पद प्रयत्न करते हैं। ऐसी आत्म वंचना से लाभ कुछ नहीं हानि अपार है। सबसे बड़ी हानि यह है कि अपने को अभागा मानने वाला मनुष्य आशा के प्रकाश से हाथ धो बैठता है और निराशा के अन्धकार में भटकते रहने के कारण इष्ट प्राप्ति से कोसों पीछे रह जाता है।

इतिहास पर दृष्टिपात कीजिए, जिन महापुरुषों ने बड़े-बड़े कार्य किये हैं उन्होंने एक से एक बढ़कर आपत्तियों को झेला है। यदि वे हर एक कठिनाई के समय ऐसा सोचते कि “हमारे भाग्य में यदि सफलता बंधी होती तो यह बाधा क्यों उपस्थित होती, इसलिए जब कोई बात भाग्य में ही नहीं है तो प्रयत्न क्यों करे?” विचार कीजिए कि ऐसी मान्यता यदि उन्होंने रखी होती तो क्या वे इतने महान बने होते?

बाधाएं, कठिनाइयाँ, आपत्तियाँ और असफलताएं एक प्रकार की कसौटी हैं जिन पर पात्र-कुपात्र की खरे-खोटे की परख होती है। जो इस कसौटी पर खरे उतरते हैं, सफलता के अधिकारी सिद्ध होते हैं उन्हें ही इष्ट की प्राप्ति होती है। जो सस्ती सफलता के फिराक में रहते हैं, बिना अड़चन और स्वल्प प्रयत्न में जो मनमाने मनसूबे पूरे करना चाहते हैं वे न तो प्रकृति के नियमों को समझते हैं न ईश्वरीय विधान को। उन्हें जानना चाहिए कि कायर पुरुष भाग्य की दुहाई देते रहते हैं और उद्योगी पुरुष सिंह विजय लक्ष्मी प्राप्त करते हैं।

अखण्ड ज्योति सितम्बर 1949 पृष्ठ 30
http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1949/September.30

रविवार, 3 जनवरी 2016

हमारा महान शत्रु-आलस्य।

किसी भी कार्य की सिद्धि में आलस्य सबसे बड़ा बाधक है, उत्साह की मन्दता प्रवृत्ति में शिथिलता लाती है। हमारे बहुत से कार्य आलस्य के कारण ही सम्पन्न नहीं हो पाते। दो मिनट के कार्य के लिए आलसी व्यक्ति फिर करूंगा, कल करूंगा-करते-करते लम्बा समय यों ही बिता देता है। बहुत बार आवश्यक कार्यों का भी मौका चूक जाता है और फिर केवल पछताने के आँतरिक कुछ नहीं रह जाता।

हमारे जीवन का बहुत बड़ा भाग आलस्य में ही बीतता है अन्यथा उतने समय में कार्य तत्पर रहे तो कल्पना से अधिक कार्य-सिद्धि हो सकती है। इसका अनुभव हम प्रतिपल कार्य में संलग्न रहने वाले मनुष्यों के कार्य कलापों द्वारा भली-भाँति कर सकते हैं। बहुत बार हमें आश्चर्य होता है कि आखिर एक व्यक्ति इतना काम कब एवं कैसे कर लेता है। स्वर्गीय पिताजी के बराबर जब हम तीन भाई मिल कर भी कार्य नहीं कर पाते, तो उनकी कार्य क्षमता अनुभव कर हम विस्मय-विमुग्ध हो जाते हैं। जिन कार्यों को करते हुए हमें प्रातःकाल 9-10 बज जाते हैं, वे हमारे सो कर उठने से पहले ही कर डालते थे। जब कोई काम करना हुआ, तुरन्त काम में लग गये और उसको पूर्ण करके ही उन्होंने विश्राम किया। जो काम आज हो सकता है, उसे घंटा बाद करने की मनोवृत्ति, आलस्य की निशानी है। एक-एक कार्य हाथ में लिया और करते चले गये तो बहुत से कार्य पूर्ण कर सकेंगे, पर बहुत से काम एक साथ लेने से- किसे पहले किया जाय, इसी इतस्ततः में समय बीत जाता है और एक भी काम पूरा और ठीक से नहीं हो पाता। अतः पहली बात ध्यान में रखने की यह है कि जो कार्य आज और अभी हो सकता है, उसे कल के लिए न छोड़, तत्काल कर डालिए, कहा भी है-
काल करे सो आज कर, आज करे सो अब।
पल में परलय होयगी, बहुरि करेगा कब॥

दूसरी बात ध्यान में यह रखनी है कि एक साथ अधिक कार्य हाथ में न लिये जायं, क्योंकि इससे किसी भी काम में पूरा मनोयोग एवं उत्साह नहीं रहने से सफलता नहीं मिल सकेगी। अतः एक-एक कार्य को हाथ में लिया जाय और क्रमशः सबको कर लिया जाय अन्यथा सभी कार्य अधूरे रह जायेंगे और पूरे हुए बिना कार्य का फल नहीं मिल सकता।
जैन धर्म में कार्य सिद्धि में बाधा देने वाली तेरह बातों को तेरह काठियों (रुकावट डालने वाले) की संज्ञा दी गई है। उसमें सबसे पहला काठिया ‘आलस्य’ ही है। बहुत बार बना बनाया काम तनिक से आलस्य के कारण बिगड़ जाता है। प्रातःकाल निद्रा भंग हो जाती है, पर आलस्य के कारण हम उठकर काम में नहीं लगते। इधर-उधर उलट-पुलट करते-करते काम का समय गंवा बैठते हैं। जो व्यक्ति उठकर काम में लग जाता है, वह हमारे उठने के पहले ही काम समाप्त कर लाभ उठा लेता है। दिन में भी आलसी व्यक्ति विचार में ही रह जाता है, करने वाला कमाई कर लेता है। अतः प्रति समय किसी न किसी कार्य में लगे रहना चाहिए। कहावत भी है ‘बैठे से बेगार भली’। निकम्मे आदमी में कुविचार ही घूमते हैं। अतः निकम्मेपन को हजार खराबियों की जड़ बतलाया गया है।

मानव जीवन बड़ा दुर्लभ होने से उसका प्रति क्षण अत्यन्त मूल्यवान है। जो समय जाता है, वापिस नहीं आता। प्रति समय आयु क्षीण हो रही है, न मालूम जीवन दीप कब बुझ जाय। अतः क्षण मात्र भी प्रमाद न करने का उपदेश भगवान महावीर ने दिया है। महात्मा गौतम गणधर को सम्बोधित करते हुए उन्होंने उत्तराध्ययन-सूत्र में ‘समयं गोयम मा पमायए’ आदि- बड़े सुन्दर शब्दों में उपदेश दिया है। जिसे पुनः-पुनः विचार कर प्रमाद का परिहार कर कार्य में उद्यमशील रहना परमावश्यक है। जैन दर्शन में प्रमाद निकम्मे पन के ही अर्थ में नहीं, पर समस्त पापाचरण के आसेवन के अर्थ में है। पापाचरण करके भी जीवन के बहुमूल्य समय को व्यर्थ ही न गंवाइये।

आलस्य के कारण हम अपनी शक्ति से परिचित नहीं होते- अनन्त शक्ति का अनुभव नहीं कर पाते और शक्ति का उपयोग न कर, उसे कुँठित कर देते हैं। किसी भी यन्त्र एवं औजार का आप उपयोग करते रहते हैं तो ठीक और तेज रहता है। उपयोग न करने से पड़ा-पड़ा जंग लगकर बरबाद और निकम्मा हो जाता है। उसी प्रकार अपनी शक्तियों को नष्ट न होने देकर सतेज बनाइये। आलस्य आपका महान शत्रु है। इसको प्रवेश करने का मौका ही न दीजिए एवं पास में आ जाए तो दूर हटा दीजिए। सत्कर्मों में तो आलस्य तनिक भी न करे क्योंकि “श्रेयाँसि बहु विघ्नानि” अच्छे कामों में बहुत विघ्न जाते हैं। आलस्य करना है, तो असत् कार्यों में कीजिए, जिससे आप में सुबुद्धि उत्पन्न हो और कोई भी बुरा कार्य आप से होने ही न पावे।

अखण्ड ज्योति सितम्बर 1949 पृष्ठ 12
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शनिवार, 2 जनवरी 2016

अहंकार के मोह जाल से बचिये।

यद्यपि सम्पूर्ण भीतरी शत्रुओं- माया, मोह, ईर्ष्या, काम, लोभ, क्रोध इत्यादि का तजना कठिन है, तथापि अनुभव से ज्ञान होता है कि ‘अहंकार’ नामक आन्तरिक शत्रु को मिटाना और भी कष्ट साध्य है। यह वह शत्रु है जो छिप कर हम पर आक्रमण करता है। हमें ज्ञान तक नहीं होता कि हम ‘अहंकार’ के वशीभूत हैं।

अहंकार प्रत्येक मनुष्य में वर्तमान है। धनी मानी, वृद्ध, युवक, बालक विज्ञान किसी न किसी प्रकार के अहंकार में डूबे हैं। ‘अहं’ ही घमंड है। हमें किसी न किसी बात का मिथ्या गर्व बना है। विद्वान को अपनी विद्वत्ता का, धनी को अपने धन का, स्त्री को अपने रूप, यौवन, सौंदर्य का अहंकार है, राजा और जागीरदार अपने ऐश्वर्य के अहंकार में किसी दूसरे की नहीं सोचते, पूँजीपति अपनी पूँजी के गर्व में गरीब मजदूरों के अधिकारों को नहीं देना चाहते। संसार के अनेक संघर्षों का कारण यही है कि किसी के ‘अहं’ को चोट पहुँचती है। अभिमान मनुष्य के पतन का मूल है।

‘अहंकार’ को सूर हाथी मानते हैं। उन्होंने इसे ‘दिग्विजयी गज’ कहकर सम्बोधित किया है। अर्थात् संसार में बहुत कम इस दुर्बलता से मुक्त हैं। आदि काल से मनुष्य इस प्रयत्न में है कि वह अभिमान से मुक्त हो जाये और इसी के लिए प्रयत्न करता रहा है। किंतु शोक! महाशोक!! जीवन पर्यंत हम वृथा के अभिमान में फँसे रहते हैं। अपने बराबर किसी को नहीं मानते। अपनी बुद्धि को सबसे अधिक महत्व प्रदान करते हैं। अपनी चीज, बाल बच्चे, विचार, दृष्टिकोण, घर बार सच पर अभिमान करते हैं। इसी वृथा के अहंकार के कारण हम जीवन में और बड़ी बातें सम्पन्न नहीं कर पाते। जहाँ के तहाँ ही पड़े रह जाते हैं। हमारी उन्नति में रोक पहुँचाने वाला शत्रु अहंकार ही तो है।

मनुष्य अभिमान कर विषयों में फंसा रहता है, विवेक भूलता है। और फिर आयु पर्यन्त पछताता है। सम्पत्ति आती है और एक मामूली से झटके से निकल जाती है। शारीरिक शक्ति बीमारी के एक आक्रमण से नष्ट हो जाती है। पग जरा सी गलती से छूट जाना है और मनुष्य पदच्युत हो जाता है फिर कोई उसे टके को भी नहीं पूछता। धन, सम्पदा, ऐश्वर्य, शक्ति सब निस्सार पदार्थ हैं। मनुष्य इनके अभिमान में अपनी आध्यात्मिक उन्नति को भूल जाता है और पतनोन्मुख होता है।

अहंकार का अर्थ संकुचितता है। इससे मनुष्य अपने आपको एक संकुचित परिधि में बाँधे रखता है। वह दूसरों से उन्मुक्त भ्रातृभाव से मिल नहीं पाता, अपना हृदय उनके सामने नहीं खोल सकता। मिथ्या गर्व में वह यह सोचा करता है कि दूसरे आये और आकर उसकी मिथ्या प्रशंसा करे। प्रशंसा से वह फूल उठता है। उसकी शठता, मद, अभिमान द्विगुणित हो उठते हैं। धीरे-धीरे उसे दूसरों से तारीफ कराने की आदत बन जाती है। वह अपनी तनिक सी बुराई सुनते ही विह्वल हो उठता है और क्रोध में कुछ का कुछ कर बैठता है। बन्धन ही मृत्यु है, अहंकार का बन्धन सर्वथा त्याज्य है। अहंकार को चोट पहुँचते ही मनुष्य को हजारों बिच्छुओं के काटने के समान दुःख होता है।

आप जन्म से दूसरों के समान हैं। दूसरे भी आप जैसे ही हैं। सब में समानता है। फिर किस बात का वृथा अहंकार आप करते हैं। मिथ्या अभिमान में फँसकर क्यों आप एक नए आन्तरिक दुःख की सृष्टि कर रहे हैं। यदि आप अभिमानी नहीं हैं तो आपका अन्तस्थल शुद्ध निर्मल रहेगा, मानसिक वृत्तियाँ शाँत बनी रहेगी, मधुर निद्रा आवेगी, जनता में प्रत्येक जगह आपका सम्मान होगा। आपके पड़ौसी आपको भली प्रकार समझ सकेंगे। आन्तरिक दृष्टि से सफाई, स्वास्थ्य और सौभाग्य की जननी है। इस मनोविकार के मोहजाल में मुक्त हो जाइये।

अखण्ड ज्योति सितम्बर 1949 पृष्ठ 11
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शुक्रवार, 1 जनवरी 2016

‘बुरे’ भी ‘भले’ बन सकते हैं। (अन्तिम भाग)

एक बार स्वामी विवेकानन्द अमेरिका में अध्यात्म पर भाषण दे रहे थे। अमेरिकनों ने सभा में ही पूछा स्वामी जी! क्या भारतवासी पूर्ण अध्यात्मवादी हो गये हैं, जिससे उन्हें उपदेश न देकर आपको अमेरिका आने की आवश्यकता अनुभव हुई? स्वामी जी ने इस प्रश्न का बड़ा अच्छा उत्तर दिया। उन्होंने कहा- आप अमेरिका निवासी रजोगुणी स्थिति में है, धनी और विद्या सम्पन्न है इसलिए आप ही सतोगुण स्थिति में चलने के, अध्यात्म का अवलम्बन करने के अधिकारी हैं। मैं अधिकारी पात्रों को ढूँढ़ता हुआ आपके पास अमेरिका आया हूँ। मेरे देश वासी इस समय, दरिद्रता, अविद्या और पराधीनता में जकड़े पड़े हैं, उनकी स्थिति तम की है। मैं उनसे कहा करता हूँ कि- तुम उद्योगी बनो, अधिक कमाओ, अच्छा खाओ और सम्मान पूर्वक जीना सीखो यही उनके लिए आत्मोन्नति का मार्ग है। तम की स्थिति को पार कर रजोगुण में जागृत होना और तदुपरान्त सतोगुण में पदार्पण करना आत्मोन्नति का यह सीधा सा मार्ग है।

जो लोग पिछले जीवन में कुमार्ग गामी रहे हैं, बड़ी ऊटपटाँग गड़बड़ करते रहे हैं वे भूले हुए, पथभ्रष्ट तो अवश्य हैं पर इस गणन प्रक्रिया द्वारा भी उन्होंने अपनी चैतन्यता बुद्धिमत्ता, जागरुकता और क्रियाशीलता को बढ़ाया है। यह बढ़ोतरी एक अच्छी पूँजी है। पथ भ्रष्टता के कारण जो पाप उनसे बन पड़े हैं वे पश्चाताप और दुःख के हेतु अवश्य हैं पर संतोष की बात इतनी है कि इस कँटीले, पथरीले, लहू-लुहान करने वाले, ऊबड़-खाबड़ दुखदायी मार्ग में भटकते हुए भी मंजिल की दिशा में ही यात्रा की है। यदि अब संभल जाया जाय और सीधे राजमार्ग से, सतोगुणी आधार से आगे बढ़ा जाय तो पिछला ऊल-जलूल कार्यक्रम भी सहायक ही सिद्ध होगा।

पिछले पाप नष्ट हो सकते हैं, कुमार्ग पर चलने से जो घाव हो गये हैं वे थोड़ा दुख देकर शीघ्र अच्छे हो सकते हैं। उनके लिए चिंता एवं निराशा की कोई बात नहीं। केवल अपनी रुचि और क्रिया को बदल देना है। यह परिवर्तन होते ही बड़ी तेजी से सीधे मार्ग पर प्रगति होने लगेगी। दूरदर्शी तत्वज्ञों का मत है कि जब बुरे आचरणों वाले व्यक्ति बदलते हैं तो आश्चर्य जनक गति से सन्मार्ग में प्रगति करते हैं और स्वल्प काल में ही सच्चे महात्मा बन जाते हैं। जिन विशेषताओं के कारण वे सफल बदमाश थे वे ही विशेषताएं उन्हें सफल संत बना देती है।

समाप्त
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति सितम्बर 1949 पृष्ठ 7
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