मंगलवार, 1 मार्च 2016

👉 शिष्य संजीवनी (भाग 15)

देकर भी करता मन, दे दें कुछ और अभी

शिष्य संजीवनी के नियमित सेवन से शिष्यों को नव स्फूॢत मिल रही है। वे अपने अन्तःकरण में सद्गुरु प्रेम के ज्वार को अनुभव करने लगे हैं। उनकी अन्तर्चेतना में नित्य-नवीन दिव्य अनुभूतियों के अंकुरण यह जता रहे हैं कि उन्हें उपयुक्त औषधि मिल गयी है। अपने देव परिवार के परिजनों में यह चाहत सदा से थी कि सद्गुरु के सच्चे शिष्य बने। पर कैसे? यही महाप्रश्र उन्हें हैरानी में डाले था। हृदय की विकलता, अन्तर्भावनाओं की तड़प के बीच वे जिस समाधान सूत्र की खोज कर रहे थे, वह अब मिल गया है। शिष्य संजीवनी के द्वारा शिष्यों को, उनके शिष्यत्व को नव प्राण मिल रहे हैं।

इसके प्रत्येक सूत्र में सारगॢभत निर्देश हैं। इन सूत्रों में शिष्यत्व की महासाधना में पारंगत सिद्ध जनों की अनुभूति संजोयी है। इन सूत्रों में जो कुछ भी कहा जा रहा है, उसके प्रत्येक अक्षर में एक गहरी सार्थकता है। सार्थक निर्देश के यही स्वर चौथे सूत्र में भी ध्वनित हैं। इसमें कहा गया है- उत्तेजना की इच्छा को दूर करो। इसके लिए इन्द्रियजन्य अनुभवों से शिक्षा लो और उसका निरीक्षण करो, क्योंकि आत्मविद्या का पाठ इसी तरह शुरु किया जाता है और इसी तरह तुम इस पथ की पहली सीढ़ी पर अपना पाँव जमा सकते हो।

उन्नति की आकाँक्षा को भी पूरी तरह से दूर करो। तुम फूल के समान खिलो और विकसित होओ। फूल को अपने खिलने का भान नहीं रहता। किन्तु वह अपनी आत्मा को वायु के समक्ष उन्मुक्त करने को उत्सुक रहता है। तुम भी उसी प्रकार अपनी आत्मा को शाश्वत के प्रति खोल देने के लिए उत्सुक रहो, परन्तु उन्नति की किसी महत्त्वाकाँक्षा से नहीं। शाश्वत ही तुम्हारी शक्ति और तुम्हारे सौन्दर्य को आकृष्ट करे, क्योंकि शाश्वत के आकर्षण से तो तुम पवित्रता के साथ आगे बढ़ोगे, पनपोगे, किन्तु व्यक्तिगत उन्नति की बलवती कामना तुम्हें केवल जड़, कठोर, संवदेनहीन व आध्यात्मिक अनुभवों से शून्य बना देगी।

क्रमशः जारी
- डॉ. प्रणव पण्डया
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/Devo/bhi
अहंकार छोड़ें अहंभाव अपनाएं (भाग 6)
 आज कल सन्त महन्त, योगी, यती, गद्दी धारी, अखाड़े बाज किसी भी तथाकथित धर्म नेता या अध्यात्म वेत्ता के पास जाइये उनके यहाँ यही अशिष्ट व्यवस्था मिलेगी कोई चरण स्पर्श न करे तो मुँह से भले ही कुछ न कहें, भीतर ही भीतर बेतरह कुढ़ेंगे।

एक सन्त दूसरे सन्त के यहाँ जाने में अपनी हेठी समझाता है। मैं क्यों उसके यहाँ जाऊँ- वह मेरे यहाँ क्यों नहीं आये? उसके आश्रम में मेरा आश्रम क्यों छोटा रहे? जैसी अहंमन्यता की अति वहाँ भी कम नहीं होती है दूर से देखने पर जो सन्त योगी दीखते थे, पास जाने और बारीकी से देखने पर वे भी अहंकार से बेतरह ग्रस्त रोगी की तरह ही दीखते हैं।

यह अहंकार ओछेपन का चिह्न है। अन्न हजम न होने पर मुँह से खट्टी डकारें बार-बार निकलती हैं और सड़ा हुआ बदबूदार अपान वायु शब्द करता हुआ निकलता है। ठीक इसी प्रकार वाणी से आत्म प्रशंसा-शेखीखोरी अपना बखान करने की भरमार यह बताती है कि पेट में अपच है और यह खट्टी डकारें मुँह से निकल रही हैं।

चकाचौंध उत्पन्न करने वाला ठाट-बाट जमाने में कितना समय, श्रम और धन नष्ट होता है, अपनी महत्ता का ढोल पीटने के लिये कितना निरर्थक सरंजाम इकट्ठा किया जाता है इसे देखकर यह समझा जा सकता है कि अपच अपान वायु के रूप में ढोल पीटने और ढिंढोरा करने की विडम्बना रच रहा है।  विभिन्न वर्ग और विभिन्न स्तर के लोग अपनी भौतिक सम्पदाओं का भौंड़ा प्रदर्शन अपने-अपने ढंग से करते रहते हैं उसमें उनकी आन्तरिक तुच्छता आत्मश्लाघा की खिड़की में से झाँकती दीखती है। श्रेष्ठ व्यक्ति सम्पदा को पचा जाते हैं हजम किया हुआ अन्न रक्त बन जाता है।

क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति जुलाई 1972 पृष्ठ 17
http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1972/July.17