बुधवार, 1 जून 2016

👉 आत्मचिंतन के क्षण 2 June 2016


🔵 हमें सफलता के लिए शक्ति भर प्रयत्न करना चाहिए, पर असफलता के लिए जी में गुंजाइया रखनी चाहिए। प्रगति के पथ पर चलने वाले हर व्यक्ति को इस धूप-छाँव का सामना करना पड़ा है। हर कदम सफलता से ही भरा मिले ऐसी आशा केवल बाल बुद्धि वालों को शोभा देती है, विवेकशीलों को नहीं।  जीवन विद्या का एक महत्त्वपूर्ण पाठ यह है कि हम न छोटी-मोटी सफलताओं से हर्षोन्मत्त हों और न असफलताओं को देखकर हिम्मत हारें।

🔴 हर आदमी की अपनी मनोभूमि, रुचि, भावना और परिस्थिति होती है। यह उसी आधार पर सोचता, चाहता और करता है। हमें इतनी उदारता रखनी ही चाहिए कि दूसरों की भावनाओं का आदर न कर सकें तो कम से कम उसे सहन कर ही लें। असहिष्णुता मनुष्य का एक नैतिक दुर्गुण है। जिसमें अहंकार की गंध आती है।  हर किसी को अपनी मर्जी का बनाना-चलाना चाहें तो यह एक मूर्खता भरी बात ही होगी।

🔵 जैसे को तैसा-यह नीति अपना लेने पर तो बड़ा भी छोटा हो जाता है। गाली का जवाब गाली से और घूँसे का जवाब घूँसे से देने में कोई बड़ी बात नहीं है। ऐसा तो पशु भी आपस में लड़कर द्वंद्वयुद्ध कर लेते हैं। क्षमा और सहनशीलता हर किसी का काम नहीं है। उसे बड़े आदमियों में ही देखा जा सकता है। वे नेकी कर कुएँ में डाल की नीति अपनाते हैं।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 ज्योति फिर भी बुझेगी नहीं (भाग 4)


🔴 जहाँ तक हम दोनों की भावी नियति के बारे में भविष्य बोध कराया गया है, वह सन्तोषजनक और उत्साहवर्धक है। कहा गया है कि पिछले पचास वर्ष से हम दोनों “दो शरीर-एक प्राण” बनकर नहीं, वरन एक ही सिक्के के दो पहलू बनकर रहे है। शरीरों का अन्त तो सभी का होता है; पर हम लोग वर्तमान वस्त्रों को उतार देने के उपरान्त भी अपनी सत्ता में यथावत बने रहेंगे और जो कार्य सौंपा गया है, से तब तक पूरा करने में लगे रहेंगे, जब तक कि लक्ष्य की प्राप्ति नहीं हो जाती। युग परिवर्तन एक लक्ष्य है जनमानस की परिष्कार और सत्प्रवृत्ति सम्वर्धन उसके दो कार्यक्रम।

🔵 अगली शताब्दी इक्कीसवीं सदी अपने गर्भ में उन महती सम्भावनाओं को संजोये हुए है, जिनके आधार पर मानवी गरिमा को पुनर्जीवित करने की बात सोची जा सकती है। दूसरे शब्दों में इसे वर्तमान विभीषिकाओं का आत्यंतिक समापन कर देने वाला सार्वभौम कायाकल्प भी कह सकते है। इस प्रयोजन के लिए हम दोनों की साधना स्वयंभू मनु और शतरूपा जैसी वशिष्ठ-अरुन्धती स्तर की .... जिसका इन दिनों शुभारम्भ किया गया हैं पौधा लगाने के बाद माली अपने उद्यान को छोड़कर भाग नहीं जाता। फिर हमीं क्यों यात्रा छोड़कर पलायन करने की बात सोचेंगे और क्यों उस के लिए उत्सुकता प्रदर्शित करेंगे?

🔴 इस बीच छोटे से व्यवधान की आशंका रहती है, जो यथार्थ भी है। प्रकृति के नियम नहीं बदले जा सकते। पदार्थों का उद्भव, अभिवर्धन और परिवर्तन होते रहना एक शाश्वत क्रम है। इस नियति चक्र से हम लोगों के शरीर भी नहीं बच सकते। बदन बदलने के समय में अब बहुत देर नहीं है। पर वस्तुतः यह कोई बड़ी घटना नहीं है। अविनाशी चेतना के रूप में आत्मा सदा अजर-अमर है।

🌹 अगले अंक में समाप्त
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति जनवरी पृष्ठ 29
http://literature.awgp.in/magazine/AkhandjyotiHindi/1988/January.29


Gayatri Pariwar Magazines for May 2016

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👉 आत्मचिंतन के क्षण 1 June 2016


🔵 अपव्ययी अपनी ही बुरी आदतों से अपनी संपत्ति गँवा बैठता है और फिर दर-दर का भिखारी बना ठोकरें खाता फिरता है। व्यसनी अपना सारा समय निरर्थक के शौक पूरे करने में बर्बाद करता रहता है। जिस बहुमूल्य समय में वह कुछ कहने लायक काम कर सकता था, वह तो व्यसन पूरे करने में ही चला जाता है।

🔴 यह मान्यता है कि भाग्य की कर्म रेखाएँ मस्तक की खोपड़ी के भीतर लिखी होती हैं। जो कुछ उसमें लिखा हुआ है वही होकर रहता है-यह मान्यता इस अर्थ में तो सर्वथा सत्य मालूम पड़ती है कि खोपड़ी के भीतर रहने वाले मस्तिष्क में जिस तरह की भावना, विचारधारा, मान्यता तथा अभिरुचि जम गई होगी उसी दिशा में उसका जीवन मुड़ेगा और वैसी ही परिस्थितियाँ उसे उपलब्ध हो जायेंगी।

🔵 आनंद का सबसे बड़ा शत्रु है-असंतोष। हम प्रगति के पथ पर उत्साहपूर्वक बढ़ें, परिपूर्ण पुरुषार्थ करें। आशापूर्ण सुंदर भविष्य की रचना के लिए संलग्न रहें, पर साथ ही यह भी ध्यान रखें कि असंतोष की आग में जलना छोड़ें। इस दावानल में आनंद ही नहीं, मानसिक संतुलन और सामर्थ का स्रोत भी समाप्त हो जाता है। असंतोष से प्रगति का पथ प्रशस्त नहीं, अवरुद्ध ही होता है।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य