शुक्रवार, 1 जुलाई 2016

👉 हमारी चेतावनी को अनदेखा न करें


🔴 भले ही लोग सफल नहीं हो पा रहे हैं पर सोच और कर यही रहे हैं कि वे किसी प्रकार अपनी वर्तमान सम्पत्ति को जितना अधिक बढ़ा सकें, दिखा सकें उसकी उधेड़ बुन में जुटे रहें। यह मार्ग निरर्थक है। आज की सबसे बड़ी बुद्धिमानी यह है कि किसी प्रकार गुजारे की बात सोची जाए। परिवार के भरण-पोषण भर के साधन जुटाये जायें और जो जमा पूँजी पास है उसे लोकोपयोगी कार्य में लगा दिया जाए। जिनके पास नहीं है वे इस तरह की निरर्थक मूर्खता में अपनी शक्ति नष्ट न करें। जिनके पास गुजारे भर के लिए पैतृक साधन मौजूद हैं, जो उसी पूँजी के बल पर अपने वर्तमान परिवार को जीवित रख सकते हैं वे वैसी व्यवस्था बना कर निश्चित हो जायें और अपना मस्तिष्क तथा समय उस कार्य में लगायें, जिसमें संलग्न होना परमात्मा को सबसे अधिक प्रिय लग सकता है।

🔵 जो जितना समय बचा सकता है वह उसका अधिकाधिक भाग नव-निर्माण जैसे इस समय के सर्वोपरि पुण्य परमार्थ में लगाने के लिये तैयार हो जाए। समय ही मनुष्य की व्यक्तिगत पूँजी है, श्रम ही उसका सच्चा धर्म है। इसी धन को परमार्थ में लगाने से मनुष्य के अन्तःकरण में उत्कृष्टता के संस्कार परिपक्व होते हैं। धन वस्तुतः समाज एवं राष्ट्र की सम्पत्ति है। उसे व्यक्तिगत समझना एक पाप एवं अपराध है। जमा पूँजी में से जितना अधिक दान किया जाए वह तो प्रायश्चित मात्र है। सौ रुपये की चोरी करके कोई पाँच रुपये दान कर दें तो वह तो एक हल्का सा प्रायश्चित ही हुआ। मनुष्य को अपरिग्रही होना चाहिए। इधर कमाता और उधर अच्छे कर्मों में खर्च करता रहे यही भलमनसाहत का तरीका है। जिसने जमा कर लिया उसने बच्चों को दुर्गुणी बनाने का पथ प्रशस्त किया और अपने को लोभ-मोह के माया बंधनों में बाँधा। इस भूल का जो जितना प्रायश्चित कर ले, जमा पूँजी को सत्कार्य में लगा दे उतना उत्तम है। प्रायश्चित से पाप का कुछ तो भार हल्का होता ही है। पुण्य परमार्थ तो निजी पूँजी से होता है। वह निजी पूँजी है- समय और श्रम। जिसका व्यक्तिगत श्रम और समय परमार्थ कार्यों में लगा समझना चाहिए कि उसने उतना ही अपना अन्तरात्मा निर्मल एवं सशक्त बनाने का लाभ ले लिया।

🔴 परमार्थ प्रयोजनों के लिये समय का अभाव केवल एक ही कारण से रहता है कि मनुष्य तुच्छ स्वार्थों को सर्वोत्तम समझता है और उन्हीं की पूर्ति को प्रमुखता देता है। जो कार्य बेकार लगेगा उसी के लिये समय न बचेगा। परमार्थ को बेकार की बात माना जायेगा तो उसके लिये समय कहाँ से बचेगा? भगवान की युग की पुकार को उपेक्षणीय माना जायेगा तो उसके लिए श्रम या धन खर्च करने की सुविधा कहाँ रह जायेगी? अपनी आत्मा को मिथ्या प्रवंचनाओं से नहीं ठगना चाहिए। समय,श्रम या धन न बचने का बहाना नहीं बनाना चाहिए। प्रबुद्ध, विवेकशील एवं जागृत आत्माओं से परमेश्वर कुछ बड़ी आशा करता है। उसी के अनुरूप हमें अपनी गतिविधियों को मोड़ना चाहिए।

🌹 पूज्य पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी
🌹 अखण्ड ज्योति, मार्च 1967 पृष्ठ 34,35 


Karishye Vachanam Tav- Pandit Shriram Sharma Acharya- Lecture 1985
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👉 आत्मचिंतन के क्षण 1 July 2016


🔴 कठिनाइयों को उनसे दूर भाग कर, घबराकर दूर नहीं किया जा सकता। उनका खुलकर सामना करना ही बचने का सरल रास्ता है। प्रसन्नता के साथ कठिनाइयों का वरण करना आंतरिक मानसिक शक्तियों के विकसित होने का राजमार्ग है। संसार के अधिकांश महापुरुषों ने कठिनाइयों का स्वागत करके ही जीवन में महानता प्राप्त की है।

🔵 धैर्य का मंत्र उनके लिए लाभदायक है, जिनके कार्यों में विघ्न-बाधाएँ उपस्थित होती हैं और वे निराश होकर अपने विचार को ही बदल डालते हैं। यह निराशा तो मनुष्य के लिए मृत्यु के समान है। इससे जीवन की धारा का प्रवाह मंद पड़ जाता है और वह किसी काम का नहीं रहता। यदि निराशा को त्यागकर विघ्नों का धैर्यपूर्वक सामना किया जाय, तो असफलता का मुख नहीं देखना पड़े।

🔵 जो लोग प्रत्यक्ष में पुण्यात्मा दिखाई देते हैं, वे भी बड़ी-बड़ी विपत्तियों में फँसते देखे गये हैं। सतयुग में भी विपत्ति के अवसर आते रहते थे। यह कौन जानता है कि किस मनुष्य पर किस समय कौन विपत्ति आ पड़े। इसलिए दूसरों की विपत्ति में सहायक होना ही कर्त्तव्य है। यदि कोई सहायता करने में किसी कारणवश समर्थ न हो तो भी विपत्तिग्रस्त के प्रति सहानुभूति तो होनी ही चाहिए।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी
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👉 हमारे विचारों और अद्भुत प्रभाव (अन्तिम भाग)



🔴 इसके विपरीत हम जितना अधिक स्वार्थ त्याग और पर उपकार के विचारों का केन्द्र अपने अन्दर बनाते जायेंगे, उतना ही अधिक हम आनन्द और शाँति को प्राप्त होंगे। जो लोग हमसे किसी प्रकार का फायदा उठाते हैं वह ही गुप्त और प्रकट रूप से हमारा कल्याण करने वाले होते हैं। हमें ऐसी तैयारी कर लेनी चाहिये कि हम मन, कर्म, वचन से हर समय दूसरों का भला ही सोचते रहें-ऐसा करने से निश्चय हमारे बुरा चाहने वालों की संख्या कम होकर हमारा भला चाहने वालों की संख्या अधिक हो जाएगी और हम अपने चारों ओर सुखद और शान्तिपूर्ण वातावरण बना सकेंगे। जब मनुष्य का मन क्रोध ईर्ष्यादि बुरे विचारों से रहित हो जाता है तो वह असीम दैवी शक्ति को धारण कर लेता है- उस समय अनेक शत्रु होने पर भी वे उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकते।

🔵 इस प्रकार का अद्भुत शान्तिपूर्ण जीवन बनाने में हमें उन घड़ियों में विशेष सतर्कता पूर्वक धैर्य से काम लेने की जरूरत है। जब कि किसी प्राणी द्वारा हमें हानि पहुँचाई जा रही हो। आध्यात्मिक जीवन में यह समय ही-परीक्षा का समय होता है। भरपूर साहस और दृढ़ता से हमें-ऐसे विचारों को हटाने में असीम शक्ति से काम लेना चाहिये जो उस समय में दूसरों का अकल्याण चाहने को हमारे मन में आते हैं। ऐसे समय में हम मन से उनका अकल्याण न चाहें, पर हाँ! कर्तव्य द्वारा उसका उत्तर देना कोई बुरा नहीं है।

🔴 वास्तव में निष्कपट और सरल हृदय वाले व्यक्ति उत्तम लौकिक और पारलौकिक सुखों के स्वामी होते हैं। दगा फरेब, झूठ, ईर्ष्यादि बुरे विचारों से काम चलाने वाले अल्पकालीन तुच्छ सुखों को प्राप्त होते हैं।

🔵 अतएव मन, कार्य, वाणी से सदैव दूसरों का हित ही विचारना और करना चाहिये और प्रातःकाल बिस्तर त्यागते समय प्रभु का नाम स्मरण करने के बाद इस मन्त्र को भी एक बार अवश्य उच्चारण कीजिये कि- “हे प्रभु! संसार के सभी प्राणियों का कल्याण हो।”

🌹 समाप्त
🌹 अखण्ड ज्योति फरवरी 1943 पृष्ठ ८
http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1943/February.8
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कैसे मज़बूत बनें (भाग 3)


🌹 7 काम और मनोरंजन, आराम और काम में समन्वय बिठाएँ:

🔵 यह काम तो कर सकते हैं न आप? लोग इसकी ओर ध्यान नहीं देते क्योंकि उनको यह भ्रम रहता है कि यह बहुत मुश्किल काम है। या तो हम इतना काम करते हैं कि उसके बोझ तले ही दब जाते हैं, या फिर आराम से, हिप्पो के अंदाज में, बेकार बैठे रह कर अवसर का इंतजार करते रहते हैं। काम और मनोरंजन, आराम और काम में अच्छा समन्वय बैठाने से आपको इन सबका महत्त्व समझ में आएगा। आपको नदी के दूसरे तरफ की घास ज्यादा हरी है, ऐसा दिखना बंद हो जायेगा।

🌹 8 आपके पास जो है उसके लिए शुक्रगुजार बनें, कृतज्ञ रहें: 
 
🔴 जिंदगी कठिन है, परंतु यदि आप जिंदगी को नजदीक से देखेंगे तो पाएंगे कि आपके पास ऐसी अनगिनत चीजें हैं जिनके लिए आपको शुक्रगुजार होना चाहिए। वह बातें जो बीते समय में आपको खुश रखती थीं, उनको याद करने से आपको वर्तमान समय में भी अच्छी अनुभूति होगी। अपने इर्द-गिर्द की दुनिया से आनंद आप प्राप्त करते हैं, वही आपको वो शक्ति प्रदान करती है जिससे कि मुश्किल हालातों का सामना कर लेते हैं। इसलिए, आपके पास जो है, उसपर ध्यान दीजिये और उसका भरपूर आनंद उठाईये। हो सकता है आपके पास आपकी पसंद का वह नया शर्ट नहीं हो, या ऐसा और भी कुछ हो सकता जिसकी आप इच्छा रखते हैं, परंतु वह आपके पास नहीं है, तो कम से कम यह कंप्यूटर तो है जो इंटरनेट से जुड़ा है और जिसका उपयोग करना आप जानते हैं। कुछ लोगों के पास घर नहीं, कंप्यूटर नहीं, शिक्षा-दीक्षा नहीं। उनके विषय में सोचिये।

🌹 9 बातों को दिल से न लगायें: 
 
🔴 चार्ली चैपलिन को कॉमेडी के बारे बहुत कुछ पता था। उनका यह कथन मशहूर हैं- "नजदीक से देखने पर जिंदगी त्रासदी है, परंतु यदि इसको समझने की कोशिश करें तो यह कॉमेडी है।" अपनी छोटी-छोटी परेशानियों से बुरी तरह प्रभावित हो जाना आसान है। यह परिस्थिति हमारी हर क्रिया-प्रतिक्रिया को सूक्ष्म रूप से प्रभावित करती है। इसलिए जरा सोचिये और जीवन को थोड़ा शांतचित्त होकर, आनंदभाव और थोड़ा ज्यादा प्यार से देखिये। जीवन की अनूठी विविधताओं, अपार संभावनाओं, के साथ-साथ इसकी इसकी विसंगतियां भी आपके चेहरे पर मुस्कान बिखेरने के लिए और आपको यह अहसास कराने के लिए कि आप कितने भाग्यशाली हैं, काफी हैं।

इस बात को स्वीकार करें की जीवन को अगर जरूरत से ज्यादा गंभीरता से नहीं लिया जाए तो इसमें आनंद ज्यादा है। हाँ, सिर्फ हँसते रहना और आनंद उठाते रहने का नाम जीवन नहीं है, पर जीवन में इनका स्थान निश्चित रूप से बहुत महत्वपूर्ण है।

🌹 10 हमेशा याद रखें- 
 
🔴 कुछ भी स्थायी नहीं है: अगर आप किसी ऐसे संकट या दुख से घिरे है जिससे आप उबर नहीं पा रहे हैं, तो बस शांतचित्त हो जाइये और जो हो रहा है, उसको होने दीजिये। अगर आपकी तकलीफ कुछ ज्यादा ही लंबी खिच रही है, तभी भी याद रखिये जैसे सब कुछ गुजर जाता है, वैसे यह भी गुजर जायेगा।


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