मंगलवार, 3 जनवरी 2017

👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 13)

🌞  हिमालय में प्रवेश

चाँदी के पहाड़

🔵 आज सुक्की चट्टी पर धर्मशाला के ऊपर की मंजिल की कोठरी में ठहरे थे, सामने ही बर्फ से ढकी पर्वत की चोटी दिखाई पड़ रही थी। बर्फ पिघल कर धोरे- धीरे पानी का रूप धारण कर रही थी, वह झरने के रूप में नीचे की तरफ बह रही थी। कुछ बर्फ पूरी तरह गलने से पहले ही पानी के साथ मिलकर बहने लगती थी, इसलिए दूर से झरना ऐसा लगता था, मानो फेनदार दूध ऊपर बढ़ता चला आ रहा हो। दृश्य बहुत ही शोभायमान था, देखकर आँखे? ठण्डी हो रही थीं।

🔴 जिस कोठरी में अपना ठहरना था, उससे तीसरी कोठी में अन्य यात्री ठहरे हुए थे, उनमें दो बच्चे भी थे। एक लड़की- दूसरा लड़का दोनों की उम्र ११ १२ वर्ष के लगभग रही होगी, उनके माता- पिता यात्रा पर थे। इन बच्चों को कुलियों की पीठ पर इस प्रान्त में चलने वाली '' कन्द्री '' सवारी में बिठाकर लाये थे, बच्चे हंसमुख और बातूनी थे।  

🔵 दोनों में बहस हो रही थी कि यह सफेद चमकता हुआ पहाड़ किस चीज का है। उनने कहीं सुन रखा था धातुओं की खाने पहाड़ों में होती है। बच्चों ने संगति मिलाई कि पहाड़ चाँदी का है। लड़की को इसमें सन्देह हुआ, वह यह तो न सोच सकी कि चाँदी का न होगा तो और किस चीज का होगा पर यह जरूर सोचा कि इतनी चाँदी इस प्रकार खुली पड़ी होती तो कोई न कोई उसे उठा ले जाने की कोशिश जरूर करता। वह लड़के की बात से सहमत नहीं हुई और जिद्दा- जिद्दी चल पड़ा।

🔴 मुझे विवाद मनोरंजक लगा, बच्चे भी प्यारे लगे। दोनों को बुलाया और समझाया कि यह पहाड़ तो पत्थर का है; पर ऊँचा होने के कारण बर्फ जम गई है। गर्मी पड़ने पर यह बर्फ पिघल जाती है और सर्दी पड़ने पर जमने लगती है, वह बर्फ ही चमकने पर चाँदी जैसी लगती है। बच्चों का एक समाधान तो हो गया; पर वे उसी सिलसिले में ढेरों प्रश्न पूछते गये, मैं भी उनके ज्ञान- वृद्धि की दृष्टि से पर्वतीय जानकारी से सम्बन्धित बहुत- सी बातें उन्हें बताता रहा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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