मंगलवार, 3 जनवरी 2017

👉 गायत्री विषयक शंका समाधान (भाग 13) 4 Jan

 🌹गायत्री का जातिगत अधिकार

🔴 केवल पुरुष ही गायत्री-उपासना के अधिकारी हैं, स्त्रियां नहीं—ऐसा कई व्यक्ति कहते सुने जाते हैं। इसके समर्थन में वे जहां-तहां के कुछ श्लोक भी प्रस्तुत करते हैं।

🔵  इन भ्रान्तियों का निराकरण करते हुए हमें भारतीय संस्कृति के मूल स्वरूप को समझना होगा। वह विश्वधर्म—मानवधर्म है। जाति और लिंग की अनीतिमूलक असमानता का उसके महान सिद्धान्तों में कहीं भी समर्थन, प्रतिपादन नहीं है। समता, एकता, आत्मीयता के आदर्शों के अनुरूप ही उसकी समस्त विधि व्यवस्था विनिर्मित हुई है। ऐसी दशा में स्त्रियों के मानवोचित नागरिक एवं धार्मिक अधिकारों पर किसी प्रकार का प्रतिबन्ध लगाने जैसी कहीं कोई बात नहीं है। नारी को नर से कनिष्ठ नहीं वरिष्ठ माना गया है। इसे हेय ठहराने और आत्मकल्याण की महत्वपूर्ण साधना न करने जैसा प्रतिबन्ध लगाने की बात तो तत्त्वदर्शी ऋषि सोच भी नहीं सकते थे। भारतीय दर्शन की आत्मा ऐसे भेदभाव को सहन नहीं कर सकती। इसलिए धर्मधारण के किसी भी पक्ष से गायत्री उपासना जैसे अनुशीलन से उसे रोका गया है, ऐसी भ्रान्ति न तो किसी को फैलानी और न किसी को ऐसा कुछ कहने वालों की बात पर ध्यान देना चाहिए।

🔴 मध्यकाल के अन्धकार-युग में सामन्ती व्यवस्थाओं का बोलबाला था। वे सामर्थ्यहीन दुर्बलों का हर दृष्टि से शोषण-दोहन करने पर तुले हुए थे। उनका वैभव, वर्चस्व, विलास एवं अहंकार इसी आधार पर पुष्ट होता था कि दुर्बलों को सता सकने की आतंक-क्षमता का उद्धत प्रदर्शन करके अपनी बलिष्ठता का परिचय देते रहें। उन्हीं दिनों दास-प्रथा पनपी, रखैलों से, अन्तःपुर सजे—अपहरण हुए—युद्ध ठने—कत्ले-आम हुए। और न जाने कितने कुकृत्यों की बाढ़ आई। इन कुकृत्यों के समर्थन में आश्रित पंडितों से कितने ही श्लोक लिखाये और प्राचीन ग्रन्थों में ठुसवाये गये। नारी भी इस कुचक्र में पिसने से न बची।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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