सोमवार, 2 जनवरी 2017

👉 सतयुग की वापसी (भाग 27) 2 Jan

🌹 दानव का नहीं देव का वरण करें

🔴 सृजन और विनाश की, उत्थान और पतन की शक्तियाँ इस संसार में निरन्तर अपने-अपने काम कराती रहती हैं। इन्हीं को देव और दानव के नाम से जाना और उनकी प्रतिक्रियाओं को स्वर्ग-नरक भी कहा जाता है। मनुष्य को यह छूट है कि दोनों में से किसी का भी वरण अपनी समझदारी के आधार पर कर ले और तदनुरूप उत्पन्न होने वाली सुख-शान्ति अथवा पतन-पराभव की प्रतिक्रिया सहन करे। उठने या गिरने का निश्चय कर लेने पर तदनुरूप सहायता-सुविधा भी इसी संसार में यत्र-तत्र बिखरी मिल जाती है, इच्छानुसार उन्हें बीना-बटोरा अथवा धकेला-भगाया भी जा सकता है। इसी विभूति के कारण मनुष्य को अपने भाग्य का निर्माता एवं भविष्य का अधिष्ठाता भी कहा जाता है। अपने या अपने समुदाय, संसार के लिए विपन्नता अथवा सुसम्पन्नता अर्जित कर लेना उसकी अपनी इच्छा-आकांक्षा पर निर्भर है।       

🔵 आम आदत पाई जाती है कि मनुष्य सफलताओं का श्रेय स्वयं ले, किन्तु हानि या अपयश का दोषारोपण किन्हीं दूसरों पर मढ़ दे। इतने पर भी यथार्थता तो अपनी जगह पर अटल ही रहती है। यह आत्म प्रवंचना भर कहला सकती है, पर सुधार-परिवर्तन कर सकने जैसी क्षमता उसमें है नहीं। 

🔴 प्रसंग इन दिनों की परिस्थितियों के सन्दर्भ में उनका कारण जानना और समाधान निकालने का है। गहरी खोजबीन इसी निष्कर्ष पर पहुँचाती है कि जनमानस ही है जो अपने लिए इच्छित स्तर की परिस्थितियाँ न्यौत बुलाता है। कोई क्या कर सकता है, यदि हानि को लाभ और लाभ को हानि समझ बैठने की मान्यता बना ली जाए? कुरूप चेहरा दर्शाने के लिए दर्पण को आक्रोश का भाजन बनाया जा सकता है, पर इससे चेहरे पर छाई कुरूपता या कालिख को भगाया नहीं जा सकता। अच्छा हो, हम कठिनाइयों के कारण-समाधान अपने भीतर खोजें और यदि उत्कर्ष अभीष्ट हो, तो इसकी तैयारी के रूप में आत्मसत्ता को तदनुरूप बनाने के लिए अपने पुरुषार्थ नियोजित करें।  

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें