मंगलवार, 3 जनवरी 2017

👉 सतयुग की वापसी (भाग 28) 4 Jan

🌹 दानव का नहीं देव का वरण करें  

🔴 क्रियाएँ, शरीर के माध्यम से बन पड़ती हैं। उनके सम्बन्ध में सोचने की खिचड़ी मस्तिष्क में पकती है किन्तु इन दोनों को आवश्यक प्रेरणा देने, ऊर्जा प्रदान करने की प्रक्रिया अन्तराल की गहराई से आरम्भ होती है। ज्वालामुखी फूटने, धरती हिलने जैसी घटनाओं का उद्गम स्रोत वस्तुत: भूगर्भ की गहराई में ही कहीं होता है। बादल बरसते तो अपने खेत या आँगन में ही हैं, पर वस्तुत: उनका उद्गम समुद्र से उठने वाली भाप है।         

🔵 भली-बुरी परिस्थितियों के सम्बन्ध में भी ऐसा ही सोचा जा सकता है। क्रिया करने और योजना बनाने में शरीर एवं मस्तिष्क को बहुत कुछ करते देखा जा सकता है, पर यह सारा तन्त्र कहाँ से खड़ा हुआ, यह जानने की उत्कण्ठा हो तो अन्त:चेतना में अवस्थित आकांक्षाओं को ही सूत्रधार मानना पड़ेगा।  

🔴 विज्ञान ने प्रदूषण उगलने वाले विशालतम कारखाने बनाए सो ठीक है, पर उसके द्वारा उत्पन्न होने वाली विषाक्तता और बेरोजगारी के सम्बन्ध में भी तो विचार किया जाना चाहिए था। यह प्रश्न उभरा न हो, सो बात नहीं, पर उस योजना को कार्यान्वित करने वालों के अन्तराल में अधिक कमाने की ललक ही प्रधान रही होगी। हानिकारक प्रतिक्रिया के विचार उठने पर उन्हें यह कहकर दुत्कार दिया गया होगा कि सर्वसाधारण से हमें क्या लेना-देना अपने लाभ को ही सब कुछ मान लेने में ही भलाई है।

🔵 जिन्होंने साहित्य सृजा और फिल्में बनाईं, उनको अपना लाभ प्रधान दीखा होगा अन्यथा प्रचार साधनों में अवांछनीयता का समावेश करते समय हजार बार विचार करना पड़ता है कि निजी लाभ कमाने के अत्युत्साह से लोकमानस को विकृत करने का खतरा उत्पन्न नहीं किया जाना चाहिए।  

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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