मंगलवार, 3 जनवरी 2017

👉 आत्मचिंतन के क्षण 4 Jan 2017

 🔴 जो अपने को हमारे सम्मुख अपने लौकिक व्यवहार से प्रियजन सिद्ध करना चाहते हैं, वे हमें निरर्थक लगते हैं, किन्तु जो कभी मिलते भी नहीं, पत्र भी नहीं लिखते, प्रशंसा-पूजा का हलका सा भी प्रयत्न नहीं करते, पर मिशन के लिए समर्पित होकर काम कर रहे हैं वे प्राणप्रिय और अति समीप लगते हैं।

🔵 आत्म-निरीक्षण और आत्म-सुधार की दिशा में जिनकी रुचि नहीं बढ़ी और लोकमंगल के लिए त्याग, बलिदान करने के लिए जिनमें कोई उत्साह पैदा नहीं हुआ मात्र पूजा-पाठ, तिलक-छापे और कर्मकाण्ड तक सीमित रह जाये ऐसे निर्जीव आध्यात्मिकता को देखते हैं तो इतना ही सोचते हैं बेचारा कुमार्गगामी कार्यों से बचकर इस गोरखधंधे में लग गया तो कुछ अच्छा ही है। अच्छाई का नाटक भी अच्छा, पर काम तो इतने मात्र से चलता नहीं। प्रखर और सजीव आध्यात्मिकता तो वह है जिसमें अपने आपका निर्माण दुनिया वालों की अँधी भेड़चाल के अनुकरण से नहीं, वरन् स्वतंत्र विवेक के आधार पर कर सकना संभव हो सके।

🔴 उत्कृष्टता और आदर्शवादिता की गतिविधियों को अपनाना किसी प्रकार भी घाटे का सौदा नहीं है। यह प्रक्रिया स्वास्थ्य सुधारती है, दीर्घजीवन प्रदान करती है, दाम्पत्य प्रेम में भारी उल्लास भर देती है, बच्चे सुसंस्कृत बनते हैं, पैसे की तंगीनहीं रहती, मनोविकारों और उद्वेगों में नहीं जलना पड़ता, यश मिलता है, सच्चे और सज्जन मित्र मिलते हैं, प्रगति का पथ प्रशस्त होता है, असफलताएँ क्षुब्ध नहीं करती, चित्त में प्रसन्नता उमड़ती रहती है, आत्म संतोष मिलता है और ईश्वर के अनुग्रह एवं सान्निध्य का हर घड़ी अनुभव होता है।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 धैर्य से काम

🔶 बात उस समय की है जब महात्मा बुद्ध विश्व भर में भ्रमण करते हुए बौद्ध धर्म का प्रचार कर रहे थे और लोगों को ज्ञान दे रहे थे। 🔷 एक ब...