मंगलवार, 3 जनवरी 2017

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 61)

🌹 राजनीति और सच्चरित्रता
🔴 93. अधिकारियों की प्रामाणिकता— अपराधों को रोकने वाले शासनाधिकारियों को उनकी ईमानदारी और विश्वस्तता की लम्बी अवधि तक परख होते रहने के बाद नियुक्त किया जाय। उन्हें विभागों में से लिया जाय और यह देखा जाय कि अपराधों को रोकने में इनकी भावना एवं प्रतिभा कैसी रही है। अनुभवहीन लड़कों को एक दम अपराध निरोधक पदों पर नियुक्ति कर दिया जाना और उनके चरित्र की गुप्त जांच न होते रहना शासन में भ्रष्टाचार उत्पन्न करता है। जिन पदों पर भ्रष्टाचार की सम्भावना है उन पर नियुक्तियां शिक्षा एवं योग्यता के अतिरिक्त अनुभव एवं चरित्र को प्रधानता देते हुए की जाया करें। अपराधी अधिकारियों का जन-दण्ड की अपेक्षा दस-बीस गुना दण्ड मिलने की व्यवस्था कानून में रहे। अधिकारियों को भ्रष्टाचार मिटे बिना जनता की अनैतिकता का मिट सकना कठिन है।

🔵 94. आर्थिक विषमता घटे— आर्थिक विषमता और फिजूल खर्ची पर नियन्त्रण रहे। आर्थिक कारणों से अधिकतर अपराध बढ़ते हैं। इसलिए उपलब्धि के साधन हर व्यक्ति को इतने मिलें जिससे उसकी ठीक गुजर हो सके। यह तभी सम्भव है जब अधिक उपभोग एवं संग्रह की सीमा पर भी नियन्त्रण हो। मिलों में कपड़ा की डिजाइनें कम बनें तो कपड़े का खर्च बहुत घट जाय। इसी प्रकार उपयोगी वस्तुओं की संख्या एवं भिन्नता सीमित करदी जाय। राष्ट्रीय शासन का एक स्तर कायम हो जिसमें थोड़ा अन्तर तो रह सकता है पर जमीन-आसमान जैसा अन्तर न हो। सामूहिकता और समता के आधार पर समाज का पुनर्गठन किया जाय तो उसमें अपराधों की गुंजाइश सहज ही बहुत घट जायगी।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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