मंगलवार, 3 जनवरी 2017

👉 पराक्रम और पुरुषार्थ (भाग 7) 4 Jan

🌹 प्रतिकूलताएं वस्तुतः विकास में सहायक

🔵 कार्लमार्क्स का जन्म गरीबी में हुआ। मरते दम तक विपन्नताओं ने उसका पीछा नहीं छोड़ा। पर घोर गरीबी में भी वह वैचारिक साधना करता रहा। एक दिन वह समाज की नई व्यवस्था ‘साम्यवाद’ का प्रणेता बना। जीवन भर संघर्षरत रहते हुए भी उसने ‘कैपिटल’ जैसे विश्व विख्यात ग्रन्थ की रचना की। समानता एवं न्याय के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाले अब्राहम लिंकन को अनेकों बार असफलताओं का मुंह देखना पड़ा। एक दुकान खोली तो उसका दिवाला निकल गया। किसी मित्र के साथ साझेदारी में व्यापार प्रारम्भ किया पर उसमें घाटा उठाना पड़ा।

🔴 जैसे-तैसे वकालत पास की पर वकालत चल नहीं सकी। पत्नी जीवन भर उनकी विरोधी बनी रही। चार बार चुनाव में हारे पर हर असफलता को शिरोधार्य करते हुए वे मानवता की सेवा में लगे रहे। उनकी लगन निष्ठा एवं त्याग ने चमत्कार दिखाया और वे अमेरिका के राष्ट्रपति चुने गये। उनके विषय में यह कहा जाता है कि यदि लिंकन संयुक्त राष्ट्र अमेरिका के राष्ट्रपति नहीं चुने गये होते तो अमेरिका में अमानवीय दास प्रथा का अन्त नहीं होता और बढ़ते हुए विद्रोह के कारण एक न एक दिन देश दो भागों में विभक्त हो जाता।

🔵 प्रसिद्ध कवि मार्कट्वेन जिस घर में रहता था वह वस्तुतः गायों एवं घोड़ों के लिए बनायी गयी कोठरी थी, माता-पिता सहित वह उसी में रहता था। अर्थाभाव के कारण उसके पिता ऊंची शिक्षा दिलाने की व्यवस्था न जुटा सके। स्कूली पढ़ाई छूट जाने पर भी ट्वेन ने अध्ययन बन्द नहीं किया। साहित्य अभिरुचि से उसकी प्रतिभा निखरती गई और वह विश्व विख्यात साहित्यकार बना उसकी रचनाओं के लिए अनेकों विश्वविद्यालयों ने उसे डॉक्टर की उपाधि से विभूषित किया। दार्शनिक कन्फ्यूशियस जब तीन वर्ष का था तभी पितृ स्नेह से उसे वंचित हो जाना पड़ा। अल्पायु में ही उसे जीविकोपार्जन जैसे कठोर कामों में लगना पड़ा। गरीबी और तंगी की स्थिति में बड़े परिवार का भार ढोते हुए भी उसने अपनी ज्ञान साधना जारी रखी। दर्शन शास्त्र के प्रकाण्ड विद्वानों में आज भी कन्फ्यूशियस का नाम विश्व भर में श्रद्धापूर्वक लिया जाता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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