सोमवार, 30 जनवरी 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 31 Jan 2017

👉 आज का सद्चिंतन 31 Jan 2017


👉 जीवन देवता की साधना-आराधना (भाग 24) 31 Jan

🌹 व्यावहारिक साधना के चार पक्ष   

🔴 मृत्यु अवश्यम्भावी है। लोग उसे भूल जाते हैं और बाल क्रीड़ा की तरह महत्त्वहीन कार्यों में जीवन बिता देते हैं। यदि यह ध्यान रखा जाये कि चौरासी लाख योनियों में भ्रमण करने के उपरान्त जो अलभ्य हस्तगत हुआ है, उसे इस प्रकार व्यतीत किया जाये जिससे भविष्य उज्ज्वल बने। देवमानव स्तर तक पहुँचाने की आशा बँधे। दूसरों को अनुकरण की प्रेरणा मिले। स्रष्टा को, दायित्व निर्वाह की प्रामाणिकता का परिचय पाकर प्रसन्नता हो। पदोन्नति का सुयोग इस आधार पर उपलब्ध हो।                

🔵 रात्रि को जिस प्रकार निश्चिंततापूर्वक सोया जाता है, उसी प्रकार मरणोत्तर काल से लेकर पुनर्जन्म की मध्यावधि में भी ऐसी ही शान्ति रह सकती है। इसकी तैयारी इन्हीं दिनों करनी चाहिये। हँसी-खुशी से दिन बीतता हो तो रात्रि को गहरी नींद आती है। दिन यदि शान्तिपूर्वक गुजारा जाये-श्रेष्ठता के साथ जुड़ा रहे तो मरणोत्तर विश्राम काल में नरक नहीं भुगतान पड़ेगा। स्वर्ग जैसी शान्ति का रसास्वादन मिलता रहेगा। इस प्रक्रिया को तत्त्व बोध कहा गया है।  

🔴 प्रज्ञायोग के दो और चरण हैं जिनको दिन में पूरा किया जाता है। इनमें एक है-भजन दूसरा-मनन भजन के लिये नित्य कर्म से निवृत्त होकर नियत पूजा स्थान पर पालथी मारकर बैठा जाता है। शरीर, मन और वाणी की शुद्धि के लिये जल द्वारा पवित्रीकरण, सिंचन, आचमन किया जाता है। देव प्रतिमा के रूप में गायत्री की छवि अथवा धूप, दीप में से कोई प्रतीक स्थापित करके इसे इष्ट, आराध्य माना जाता है। धूप, दीप, नैवेद्य, जल, अक्षत, पुष्प में से जो उपलब्ध हो उससे उसका पूजन किया जाता है। 

🔵 पूजन में प्रयुक्त वस्तुओं की तरह अपने जीवन में उन विशेषताओं को उत्पन्न करने की भावना की जाती है जो इन उपचार, साधनों में पाई जाती है। चन्दन समीपवर्तियों में सुगन्ध भरता है। दीपक अपने प्रभाव क्षेत्र में ज्ञानरूपी प्रकाश फैलाता है। पुष्प हँसता है और खिलता रहता है। जल शीतलता का प्रतीक बनकर रहता है। अक्षत, नैवेद्य के पीछे समयदान, अंशदान परमार्थ प्रयोजन के लिये निकाले जाने की भावना है। इष्टदेव को सत्प्रवृत्ति का समुच्चय माना जाये। इन मान्यताओं के आधार पर देव पूजन समग्र बन पड़ता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 कर्त्तव्य का पाठ

🔴 तपस्वी जाजलि श्रद्धापूर्वक वानप्रस्थ धर्म का पालन करने के बाद खडे़ होकर कठोर तपस्या करने लगे।उन्हें गतिहीन देखकर पक्षियों ने उन्हें कोई वृक्ष समझ लिया और उनकी जटाओं में घोंसले बनाकर अंडे दे दिए।

🔵 अंडे बढे़ और फूटे, उनसे बच्चे निकले। बच्चे बड़े हुए और उड़ने भी लगे। एक बार जब बच्चे उड़कर पूरे एक महीने तक अपने घोंसले में नहीं लौटे, तब जाजलि हिले।

🔴 वह स्वयं अपनी तपस्या पर आश्चर्य करने लगे और अपने को सिद्ध समझने लगे। उसी समय आकाशवाणी हुई, 'जाजलि, गर्व मत करो। काशी में रहने वाले व्यापारी तुलाधार के समान तुम धार्मिक नहीं हो।'

🔵 आकाशवाणी सुनकर जाजलि को बड़ा आश्चर्य हुआ। वह उसी समय काशी चल पड़े। उन्होंने देखा कि तुलाधार तो एक अत्यंत साधारण दुकानदार हैं। वह अपनी दुकान पर बैठकर ग्राहकों को तौल-तौलकर सौदा दे रहे थे।

🔴 जाजलि को तब और भी आश्चर्य हुआ जब तुलाधार ने उन्हें उठकर प्रणाम किया, उनकी तपस्या, उनके गर्व तथा आकाशवाणी की बात भी बता दी। जाजलि ने पूछा, 'तुम्हें यह सब कैसे मालूम?' तुलाधार ने विनम्रतापूर्वक कहा, 'सब प्रभु की कृपा है। मैं अपने कर्त्तव्य का सावधानी से पालन करता हूं। न मद्य बेचता हूं, न और कोई निंदित पदार्थ। अपने ग्राहकों को मैं तौल में कभी ठगता नहीं। ग्राहक बूढ़ा हो या बच्चा, वह भाव जानता हो या न जानता हो, मैं उसे उचित मूल्य पर उचित वस्तु ही देता हूं। किसी पदार्थ में दूसरा कोई दूषित पदार्थ नहीं मिलाता। ग्राहक की कठिनाई का लाभ उठाकर मैं अनुचित लाभ भी उससे नहीं लेता हूं। ग्राहक की सेवा करना मेरा कर्त्तव्य है, यह बात मैं सदा स्मरण रखता हूं। मैं राग-द्वेष और लोभ से दूर रहता हूं। यथाशक्ति दान करता हूं और अतिथियों की सेवा करता हूं। हिंसारहित कर्म ही मुझे प्रिय है। कामना का त्याग करके संतोषपूर्वक जीता हूं।'

🔵 जाजलि समझ गए कि आखिर क्यों उन्हें तुलाधार के पास भेजा गया। उन्होंने तुलाधार की बातों को अपने जीवन में उतारने का संकल्प किया।

👉 दोष-दृष्टि को सुधारना ही चाहिए (भाग 1)


🔵 क्या कभी अपने यह सोचा कि आप पग-पग पर खिन्न, असंतुष्ट, उद्विग्न अथवा उत्तेजित क्यों रहते हैं? क्यों आपको समाज, संसार मनुष्यों, मित्रों, वस्तुओं, परिस्थितियों यहाँ तक अपने से भी शिकायत रहती है? आप सब कुछ करते, बरतते और भोगते हुए भी वह मजा, आनन्द और प्रसन्नता नहीं पाते, जो मिलनी चाहिये और संसार के अन्य असंख्यों लोग पा रहे हैं। आप विचारक, आलोचक, शिक्षित, और सभ्य भी हैं, किन्तु आपकी यह विशेषता भी आपको प्रसन्न नहीं कर पाती। स्त्री-बच्चे, घर, मकान सब कुछ आपको उपलब्ध है। फिर भी आप अपने अन्दर एक अभाव और एक असंतोष अनुभव ही करते रहते हैं। घर, बाहर, मेले-ठेले, सफर, यात्रा, सभा-समितियों, भाषणों, वक्तव्यों- किसी में भी कुछ मजा ही नहीं आता। हर समय एक नाराजी, नापसन्दी एवं नकारात्मक ध्वनि परेशान ही रखती है। संसार की किसी भी बात, वस्तु और व्यक्ति से आपका तादात्म्य ही स्थापित हो पाता है।

🔴 साथ ही आप पूर्ण स्वस्थ हैं। मस्तिष्क का कोई विकार आपमें नहीं है। आपका अन्तःकरण भी सामान्य दशा में है और आस-पास में ऐसी कोई घटना भी नहीं घटी है, जिससे आपकी अभिरुचिता एवं प्रसादत्व विक्षत हो गया हो। ऐसा भी नहीं हुआ कि विगत दिनों में ही किसी ऐसे अप्रिय संयोग से सामंजस्य स्थापित करना है, जिसकी अनुभूति आज भी आपको विषाण बनाये हुए हैं।

🔵 वास्तव में बात बड़ी ही विचित्र और अबूझ-सी मालूम होती है। जब प्रत्यक्ष में इस स्थायी अप्रियता का कोई कारण नहीं दिख पड़ा, फिर ऐसा कौन-सा चोर, कौन-सा ठग आपके पीछे अप्रत्यक्ष रूप से लगा हुआ है, जो हर बात के आनन्द से आपको वंचित किए हुये आपके जन्म-सिद्ध अधिकार प्रसन्नता का अपहरण कर लिया करता है। इसको खोजिये, गिरफ्तार करिये और अपने पास से मार भगाइये। जीवन में सदा दुःखी और खिन्नावस्था में रहने का पाप न केवल वर्तमान ही बल्कि आगामी शत-शत जीवनों तक को प्रभावित कर डालता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति मई 1968 पृष्ठ 22  

👉 आत्मचिंतन के क्षण 31 Jan 2017

🔴 स्त्रियों को स्वतंत्रता देने का अर्थ यह नहीं है कि उनको कुछ भी करते रहने की छूट मिले और उनके उचित-अनुचित कार्यों की कोई आलोचना या टिप्पणी न की जाय। यह व्यवस्था-मर्यादा तो पुरुष के लिए भी लागू है। कोई व्यक्ति यदि अनुचित कार्य करता है तो आलोचना और निन्दा-भर्त्सना उसकी भी होती है। स्त्रियों को स्वतंत्रता देने का अर्थ यह है कि उन्हें भी अपनी क्षमताओं के विकास की छूट  दी जाय तथा उन पर दासी-बाँदी जैसे बंधन न कसे जायँ।

🔵 आत्म विकास और पारिवारिक जीवन की सुख-शान्ति के लिए स्त्री की ही तरह पुरुष में चारित्रिक दृढ़ता की आवश्यकता है। प्रेम तथी स्थायी रह सकता है, जब दोनों का अंतःकरण शुद्ध हो और कोई भी नाटक न करता हो। घर में पत्नी से निष्ठा की आकांक्षा रखना और बाहर स्वेच्छाचार के फेर में रहना प्रेम को वास्तविक नहीं रहने दे सकता। जहाँ ऐसी दोहरी मानसिकता और बनावटीपन है, वहाँ आत्मीयता का सूत्र निश्चय ही खण्डित होता रहेगा।

🔴 वस्तुतः पति-पत्नी दो इकाई मिलकर एक सम्मिलित व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं और जीवन यात्रा का उत्तरदायित्व इस सामूहिक व्यक्तित्व पर ही निर्भर करता है। दोनों का एक-दूसरे के काम में सहयोग आवश्यक अनिवार्य है। पति-पत्नी के कार्यों का विभाजन, उसकी सीमा रेखा कभी निश्चित नहीं की जा सकती। दाम्पत्य जीवन का सार इसी में है कि एक दूसरे के कामों में मदद करें, योग दें, चाहे वह काम घर के अन्दर का हो या बाहर का।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 गायत्री विषयक शंका समाधान (भाग 40) 31 Jan

🌹 साधना की पूर्णाहुति

🔴 गायत्री और यज्ञ का अनिवार्य सम्बन्ध है। यज्ञ भारतीय संस्कृति का आदि प्रतीक है। गायत्री को भारतीय संस्कृति की जननी कहा गया है तो यज्ञ को संस्कृति का पिता। भारतीय धर्मानुयायियों के जीवन में यज्ञ का बड़ा महत्व है। कोई भी कार्यक्रम बिना यज्ञ के पूरा नहीं होता। साधनाओं में तो हवन और भी अनिवार्य है। जितने भी पाठ, पुरश्चरण, जप, साधन किये जाते हैं वे चाहे वेदोक्त हों चाहे तांत्रिक उनमें किसी न किसी रूप में यज्ञ, हवन अवश्य करना पड़ता है। प्रत्येक कथा, कीर्तन, व्रत, उपवास, पर्व, त्यौहार, उत्सव, उद्यापन सभी में यज्ञ अवश्य करना पड़ता है।

🔵 इस प्रकार गायत्री उपासना में भी हवन आवश्यक है। अनुष्ठान या पुरश्चरण में जप से दसवां भाग हवन करने का विधान है। यदि इतना न बन पड़े तो शतांश [सौवां भाग] हवन करना चाहिए। गायत्री उपासना के साथ यज्ञ का युग्म बनता है। गायत्री को माता और यज्ञ को पिता माना गया है। इन्हीं दोनों के संयोग से मनुष्य का आध्यात्मिक जन्म होता है, जिसे द्विजत्व कहते हैं। द्विज का अर्थ है दूसरा जन्म। जैसे अपने शरीर को जन्म देने वाले माता, पिता की सेवा पूजा करना मनुष्य का कर्तव्य है, उसी प्रकार गायत्री माता और यज्ञ पिता की पूजा भी प्रत्येक द्विज का आवश्यक धर्म कर्तव्य है।

🔴 यह नहीं सोचना चाहिए कि सामान्य और नियमित उपासना क्रम में यज्ञ की कोई आवश्यकता नहीं है। यज्ञ को प्रत्येक व्यक्ति का आवश्यक नित्य कर्म माना गया है। यह बात अलग है कि लोग उसका महत्व एवं विधान भूल गये हैं और केवल चिन्ह पूजा करके काम चला लेते हैं। घरों में स्त्रियां किसी रूप में यज्ञ की चिन्ह पूजा करती हैं। त्यौहारों या पर्वों पर अग्नि को जिमाने या अज्ञारी करने का कृत्य प्रचलित है। थोड़ी-सी अग्नि को लेकर, घी डालकर उसे प्रज्वलित करना और उस पर पकवान के छोटे-छोटे ग्रास चढ़ाना तथा फिर अग्नि से जल की परिक्रमा करा देना, यही प्रक्रिया प्रत्येक घर में पर्व एवं त्यौहारों पर सम्पन्न होते देखी जा सकती है। शास्त्रों में बलिवैश्व का नित्य विधान है। प्रतिदिन भोजन बनने के बाद बलिवैश्व के लिए अग्नि में आहुति देनी होती है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 मन: स्थिति बदले तो परिस्थिति बदले (भाग 3)

🌹 युगधर्म का परिपालन अनिवार्य

🔵 समय पीछे नहीं लौटता, वह निरन्तर आगे ही बढ़ता है। उसके बाद ही मान्यताओं में, प्रचलनों में भी परिवर्तन होता चलता है। ऐसा आग्रह कोई कदाचित् ही करता हो, कि जो पहले दिनों माना या किया जाता रहा है, वही पत्थर की तरह सदा सर्वदा जारी रहना चाहिये। ऐसे दुराग्रही तो शायद बिजली का प्रयोग करने और नल का पानी पीने से भी ऐतराज कर सकते हैं? उन्हें शायद गुफा बनाकर रहने का भी आग्रह हो, क्योंकि पूर्व पुरुषों ने निवास के लिए उसी प्रक्रिया को सरल समझा था।

🔴 कभी मिट्टी के खपरों पर लेखन का काम लिया जाता था। बाद में चमड़े, भोजपत्र, ताड़पत्र आदि पर लेखन कार्य चलने लगा। कुछ दिनों हाथ का बना कागज भी चला, पर अब तो सर्वत्र मिलों का बना कागज ही काम में आता है। हाथ से ग्रन्थों की नकल करने का उपक्रम लम्बे समय तक चलता रहा है, पर अब तो छपाई की सरल और सस्ती सुविधायें छोड़ने के लिये कोई तैयार नहीं। तब रेल मोटर आदि की आवश्यकता न थी, पर अब तो उनके बिना परिवहन और यातायात का काम नहीं चलता। डाक से पत्र व्यवहार करने की अपेक्षा घोड़ों पर लम्बी दूरी पर सन्देश भेजने की प्रथा अब एक प्रकार से समाप्त ही हो गयी है।

🔵 परिवर्तन के साथ जुड़े हुये नये आयाम विकसित करने की आवश्यकता अब इतनी अनिवार्य हो गई है कि उसे अपनाने से कदाचित् ही कोई इन्कार करता हो? घड़ी का उपयोग करने से अब कदाचित् ही कहीं एतराज किया जाता हो? समय हर किसी को बाधित करता है कि युग धर्म पहचाना जाये और उसे अपनाने में आनाकानी न की जाये। नीति-निष्ठा एवं समाज-निष्ठा के सम्बन्ध में शाश्वत हो सकता है, पर रीति रिवाजों, क्रिया-कलापों उपकरणों आदि प्रचलित नियम अनुशासन के सम्बन्ध में पुरातन परिपाटी के भक्त तो कहे जा सकते हैं, पर अपने अतिरिक्त और किसी को इसके लिए सहमत नहीं कर सकते कि लकीर के फकीर बने रहने में ही धर्म का पालन सन्निहित है। जो पुरातन काल में चलता रहा है, उसमें हेर-फेर करने की बात किसी को सोचनी ही नहीं चाहिए, ऐसा करने को अधर्म कहा जायेगा और उसे करने वाले पर पाप चढ़ेगा।

🔴 किसी भी भली-बुरी प्रथा को अपनी और पूर्वजों की प्रतिष्ठा का प्रश्न बना कर उस पर अड़ा और डटा तो रहा जा सकता है, पर उसमें बुद्धिमानी का समावेश तनिक भी नहीं है। मनुष्य प्रगतिशील रहा है और रहेगा। वह सृष्टि के आदि से लेकर अनेक परिवर्तनों के बीच से गुजरता हुआ आज की स्थिति तक पहुँचा है। यह क्रम आगे भी चलता ही रहने वाला है। पुरातन के लिए हठवादी बने रहना किसी भी प्रकार किसी के लिए भी हितकारी नहीं हो सकता । युग धर्म को अपनाकर ही मनुष्य आगे बढ़ा है और भी उसके लिए तैयार रहेगा। समय का यह ऐसा तकाजा है, जिससे इन्कार नहीं किया जा सकता।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 आप अपने आपको पहचान लीजिये (भाग 10)

👉 युग ऋषि की अमृतवाणी

🔴 अच्छा हमारे हजार कुण्ड वाले यज्ञ की बात आपको याद है आपने हमारे अनुष्ठान तो तो देखे नहीं है आप हमारे संग रहे नहीं है आप हमारे संग बैठे नहीं हैं। उसकी तो हम नहीं कह सकते लेकिन अभी भी लाखों आदमी जिंदा हैं जिन्होंने हमारा सन् ५८ का यज्ञ देखा है हजार कुण्डीय और जिसको देखकर लोग अचम्भे में पड़ गये थे कि जिस आदमी की जेब खाली हों दोनों जेब खाली हों जिस आदमी ने यह कसम खायी हो हमको किसी आदमी के सामने हाथ नहीं पसारना है और हमको किसी आदमी से यह नहीं कहना है कि हमें एक पैसे की जरूरत है लेकिन तो भी हमने इतना बड़ा आयोजन किया था आयोजन पूरा हुआ कि नहीं हुआ था न एक आदमी का एक्सीडेंट हुआ न एक आदमी की चोरी हुई न कोई बीमार पड़ा और न कोई घटना हुई सारी की सारी चीजों का उसमें पचासों लाख खर्चा हुआ था तो पूरा हो गया आपको नहीं याद है।

🔵  मैं आपको इसलिए कहता हूँ हमारी बातें हमारे जीवन का अनुभव इस लायक है कि आप हमको प्रामाणिक आदमी मान ले और यह मानकर चले कि कोई कहने वाला सामान्य आदमी नहीं है कोई बाजारू आदमी नहीं है कोई यार बाज़ आदमी नहीं है। निरर्थक आदमी नहीं है आवारागर्दी में घूमने वाला आदमी नहीं है। कोई वजनदार और भारी भरकम आदमी है और भारी भरकम आदमी ने भारी भरकम काम किया है उसके लिए जरूरत पड़ी है जरूरत नहीं भी पड़ती तो आपको नहीं भी कहता चलिये। लेकिन जरूरत पड़ी है। हजार कुण्ड का यज्ञ किया था तो हमको जरूरत पड़ी थी क्योंकि हजार कुण्डीय यज्ञ में एक एक कुण्ड में पाँच पाँच आदमी बिठाये गये और एक बार में ५ हजार आदमी बैठे और दस बार बैठाया तो पचास हजार आदमी बैठे ऐसे पाँच दिन तक यज्ञ चला उसमें कितने लाखों आदमी की जरूरत पड़ गयी।

🔴 जरूरत पड़ी इसलिये बुलाया जरूरत नहीं पड़ी होती तो हम नहीं भी बुलाते। अब हमने नये कदम उठाये हैं और उनको सुनकर के कोई आदमी भरोसा नहीं करेगा पर मैं आपसे कहता हूँ कि आप भरोसा कर लीजिये हमारा। कोई आदमी से हम कहेंगे कि हम एक लाख कुण्ड का यज्ञ करने वाले हैं यह बात आपकी समझ में आयेगी नहीं आपकी समझ में नहीं आयेगी। बड़े से बड़े यज्ञ कहीं हुये हैं अभी भोपाल में एक आदमी ने यज्ञ किया था इससे पहले एक सज्जन ने दिल्ली में किया था १००-१०० कुण्ड के थे बस और कोई बड़े यज्ञ थे बड़े यज्ञ नहीं थे हजार कुण्डीय यज्ञ किये थे उन्होंने हजार कुण्डीय तो हमने किये हैं बस और हमने अकेले एक मथुरा में नहीं किये थे फिर हमने हमारा कार्यक्षेत्र सात प्रान्तों में है जिनको हम हिन्दी भाषी प्रान्त कहते हैं उनमें कार्यक्षेत्र था तो सातों के सातों में उसी प्रकार के एक- एक हजार कुण्डीय यज्ञ किये थे।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/lectures_gurudev/31.4

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 91)

🌹 आदर्श विवाहों का प्रचलन कैसे हो?

🔴 आदर्श विवाहों का प्रचलन हिन्दू समाज की आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। इसे युग की महत्वपूर्ण मांग कहना चाहिए। नव-निर्माण के लिए कुप्रथाओं को हटाकर उनके स्थान पर स्वस्थ परम्पराओं को जन्म दिया जाना आवश्यक है। ऐसे प्रयत्नों से ही सामाजिक क्रान्ति का उद्देश्य पूर्ण होगा।

🔵 आदर्श विवाहों की 24 सूत्री रूपरेखा मूर्त रूप कैसे धारण करे इसके लिए नीचे आठ उपाय प्रस्तुत किये जा रहे हैं। इनको अपनाने से ही यह महान विचारधारा कार्यान्वित हो सकेगी।

🔴 (1) समान विचार वालों की तलाश— आदर्श विवाह तभी संभव, सफल और सार्थक हो सकते हैं जब दोनों पक्ष समान विचार के हों। एक पक्ष आदर्शवादी हो और दूसरा रूढ़िवादी तो ‘आधा तीतर आधा बटेर’ कहावत के अनुसार वह विवाह भी आधा सुधरा, आधा प्रतिक्रियावादी रहेगा। कभी-कभी तो यह मतभेद उग्र होकर संघर्ष और द्वेष का रूप भी धारण कर लेता है। जो बेमन से ठोक-पीटकर आदर्शवादी बनते हैं वे गुप्त रूप से दहेज आदि मांगते हैं और इच्छानुसार न मिलने पर किसी अन्य बहाने अपना रोष प्रकट करते हैं।

🔵 आवश्यकता इस बात की है कि दोनों ही पक्ष आदर्शवादी विचारों के मिलें। यह खोज काफी कठिन होती है। धन, शिक्षा, स्वास्थ्य की दृष्टि से तो अच्छे लड़के मिल जाते हैं पर विचारों के साथ ताल-मेल न बैठने से उनको नीलामी बोली पर ही खरीदना संभव होता है। अस्तु हमें वह माध्यम ढूंढ़ निकालना पड़ेगा जिसके अनुसार परस्पर विवाह संबंध करने वाली इकाइयों में जो भी प्रगतिशील विचारों के हों वे एक संगठन सूत्र में बंधे हों और उनका परस्पर परिचय सुलभ हो सके। इस वर्ग में से अपनी-अपनी स्थिति के अनुकूल जोड़े ढूंढ़ लिये जाया करें, तब आदर्श विवाहों की परम्परा सरल हो जायगी।

🔴 कई जातीय पत्रों में वर कन्या का परिचय, विवरण छपता रहता है, उससे कुछ विशेष प्रयोजन सिद्ध नहीं होता। ऐसी जानकारी तो किसी भी कालेज में जाकर आसानी से प्राप्त की जा सकती है। जब तक लड़का और उसके घर वाले आदर्श रीति से विवाह करने के लिए प्रतिज्ञाबद्ध न हों, तब तक लड़कों की सूची छपना कुछ महत्व नहीं रखता। हमें उन जातीय इकाइयों को संघबद्ध करना पड़ेगा जो परस्पर विवाह शादी करती हैं। इसके लिए दो उपाय हो सकते हैं (1) प्रगतिशील जातीय सभाओं का संगठन। (2) उन संगठनों द्वारा आयोजित वार्षिकोत्सव या जातीय मेले। दोनों की रूपरेखा आगे प्रस्तुत की जाती है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 38)

🌹  गुरुदेव का प्रथम बुलावा-पग-पग पर परीक्षा

🔴  इस यात्रा से गुरुदेव एक ही परीक्षा चाहते थे कि विपरीत परिस्थितियों से जूझने लायक मनःस्थिति पकी या नहीं। सो यात्रा अपेक्षाकृत कठिन ही होती गई। दूसरा कोई होता, तो घबरा गया होता, वापस लौट पड़ता या हैरानी में बीमार पड़ गया होता, पर गुरुदेव यह जीवन सूत्र व्यवहार में सिखाना चाहते थे कि मनःस्थिति मजबूत हो, तो परिस्थितियों का सामना किया जा सकता है, उन्हें अनुकूल बनाया या सहा जा सकता है। महत्त्वपूर्ण सफलताओं के लिए आदमी को इतना ही मजबूत होना चाहिए।

🔵 ऐसा बताया जाता है कि जब धरती का स्वर्ग या हृदय कहा जाने वाला भाग देवताओं का निवास था, तब ऋषि गोमुख से नीचे और ऋषिकेश से ऊपर रहते थे, पर हिमयुग के बाद परिस्थितियाँ एकदम बदल गईं। देवताओं ने कारण शरीर धारण कर लिए और अंतरिक्ष में विचरण करने लगे। पुरातन काल के ऋषि गोमुख से ऊपर चले गए। नीचे वाला भाग हिमालय और सैलानियों के लिए रह गया है। वहाँ कहीं-कहीं साधु बाबाजी की कुटियाँ तो मिलती हैं, पर जिन्हें ऋषि कहा जा सके, ऐसों का मिलना कठिन है।

🔴  हमने भी सुन रखा था कि हिमालय की यात्रा में मार्ग में आने वाली गुफाओं में सिद्धयोगी रहते हैं। वैसा कुछ नहीं मिला। पाया कि निर्वाह एवं आजीविका की दृष्टि से वह कठिनाइयों से भरा क्षेत्र है। इसलिए वहाँ मनमौजी लोग आते-जाते तो हैं, पर ठहरते नहीं। जो साधु-संत मिले, उनसे भेंट वार्ता होने पर विदित हुआ कि वे भी कौतूहलवश या किसी से कुछ मिल जाने की आशा में ही आते थे। न उनका तत्त्वज्ञान बढ़ा-चढ़ा था, न तपस्वियों जैसी दिनचर्या थी। थोड़ी देर पास बैठने पर वे अपनी आवश्यकता व्यक्त करते थे। ऐसे लोग दूसरों को क्या देंगे, यह सोचकर सिद्ध पुरुषों की तलाश में अन्यों द्वारा जब-तब की गई यात्राएँ मजे की यात्राएँ भर रहीं, यही मानकर अपने कदम आगे बढ़ाते गए। यात्रियों को आध्यात्मिक संतोष समाधान तनिक भी नहीं होता होगा, यही सोचकर मन दुःखी रहा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/hari/gur

👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 38)

🌞 हिमालय में प्रवेश (संभल कर चलने वाले खच्चर)

🔵 पहाड़ों पर बकरी के अतिरिक्त खच्चर ही भारवाहन का काम करते हैं। सवारी के लिए भी उधर वे ही उपलब्ध हैं। जिस प्रकार अपने नगरों की सड़कों पर गाड़ी, ठेले, तांगे, रिक्शे चलते हैं उसी तरह चढ़ाव उतार की विषम और खतरनाक पगडंडियों पर यह खच्चर ही निरापद रूप से चलते फिरते नजर आते हैं।

🔴 देखा कि जिस सावधानी से ठोकर और खतरा बचाते हुए इन पगडंडियों पर हम लोग चलते हैं। उसी सावधानी से यह खच्चर भी चल रहे हैं हमारे सिर की बनावट ऐसी है कि पैरों के नीचे की जमीन को देखते हुए, खतरों को बचाते हुए आसानी से चल सकते हैं, पर खच्चरों के बारे में ऐसी बात नहीं है, उनकी आंखें ऐसी जगह लगी हैं और गरदन का मुड़ाव ऐसा है जिससे सामने देखा जा सकता है पर पैरों के नीचे देख सकना कठिन है। इतने पर भी खच्चर का हर कदम बड़ी सावधानी से और सही-सही रखा जा रहा था जरा सी चूक होने पर वह भी उसी तरह लुढ़क कर मर सकता है जैसे कल एक बछड़ा गंगोत्री की सड़क पर चूर-चूर हुआ मरा पड़ा देखा था। बेचारे का पैर जरा सी असावधानी से गलत जगह पड़ा कि अस्सी फुट की ऊंचाई से आ गिरा और उसकी हड्डी-पसली चकना चूर हो गई। ऐसा कभी-कभी ही होता है, खच्चरों के बारे में तो ऐसी घटना कभी नहीं सुनी गई।

🔵 लादने वालों से पूछा तो उनने बताया कि खच्चर रास्ता चलने के बारे में बहुत ही सावधानी और बुद्धिमता से काम लेता है। तेज चलता है पर हर कदम को थाह-थाह कर चलता है। ठोकर या खतरा हो तो तुरन्त संभल जाता है, बढ़े हुए कदम को पीछे हटा लेता है और दूसरी ठीक जगह पैर के सहारे तलाश कर वहीं कदम रखता है। चलने में उसका ध्यान अपने पैरों और जमीन की स्थिति के संतुलन में ही लगा रहता है। यदि वह ऐसा न कर सका होता तो इस विषम भूमि में उसकी कुछ उपयोगिता ही न होती।

🔴 खच्चर की बुद्धिमत्ता प्रशंसनीय है। मनुष्य जब कि बिना आगा-पीछा सोचे गलत दिशा में कदम उठाता रहता है और एक के बाद एक ठोकर खाते हुए भी संभलता नहीं, पर इन खच्चरों को तो देखें। कि हर कदम का संतुलन बनाये रखने से जरा भी नहीं चूकते। यदि इस ऊबड़-खाबड़ दुरंगी दुनिया से जीवन मार्ग पर चलते हुए यदि इन पहाड़ी खच्चरों की भांति अपना हर कदम सावधानी के साथ उठा सकने में समर्थ हो सके तो हमारी स्थिति वैसी ही प्रशंसनीय होती जैसी इस पहाड़ी प्रदेश में खच्चरों की है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आत्मचिंतन के क्षण 30 Jan 2017

🔴 जिन लोगों को सामाजिक नव निर्माण की इच्छा है, उन्हें अपने परिवार में सादगी को सर्वप्रथम प्रतिष्ठित करना चाहिए। परिवार के सदस्यों को डण्डे और डाँट के बल पर नहीं, अपितु तथ्यों और सच्चाइयों से अवगत कराकर देश, समाज की वास्तविकताओं से परिचित कराकर सादगी भरे जीवनक्रम को अपनाने की प्रेरणा देनी चाहिए। प्रबुद्ध जनों का यही सर्वोपरि दायित्व है और ऐसा करना स्वयं अपना उदाहरण उपस्थित करके ही संभव है, मात्र उपदेश द्वारा नहीं।

🔵 जातीय पतन के दौर में उच्च आदर्शों को विकृत रूप दे दिया गया। समर्पण की व्याख्या स्वार्थी मनुष्यों ने इस प्रकार की कि भारतीय नारी के इस उच्च आदर्श को चरणदासी बनने के रूप में ढाल दिया, पर अब ऐसी धूर्ततापूर्ण चालबाजियों और शाब्दिक मायाजाल का युग नहीं रहा। अतः अब यह स्पष्ट हो जाना चाहिए कि पुरुष के प्रति नारी का समर्पण अंधा और अविवेकपूर्ण नहीं होना चाहिए। प्रत्येक पुरुष न तो ईश्वर है और न देवदूत। श्रेष्ठता के लिए उसे प्रयास करना होगा। समर्पण कोई विवेशता नहीं, व्यक्तित्व की उत्कृष्टता है। अतः वह पुरुष के लिए भी साध्य और इष्ट होनी चाहिए।

🔴 मांसलता के उभार-अश्लील अभि-व्यंजनाएँ और सम्मोहक विन्यास में ही नारी जीवन की कृतकृत्यता बताने वाला एक वातावरण मानव द्रोही बधिकों द्वारा तैयार किया जा रहा है। प्रत्यक्ष नारी निन्दा से उसे शिक्षा की अपात्र तथा अवगुणों की खान बताने से जब दानवी भोग-लालसा अधिक समय तक तृप्त होने की आशा नहीं रही तो पशुता की उसी पतित प्रवृत्ति ने नये पैतरे बदल लिए हैं। नारी देह के भोग्या स्वरूप की प्रतिष्ठा को ही नारी जीवन की सार्थकता के रूप में प्रचारित किया जा रहा है। जाग्रत् नारी को इस नये षड्यंत्र का निरीह शिकार बनना अस्वीकार करना होगा।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 गायत्री विषयक शंका समाधान (भाग 39) 30 Jan

🌹 अभियान साधना और संयम

🔴 इन्द्रिय संयम तपश्चर्या का आरम्भ है, अन्त नहीं। अपनी शक्तियों के अपव्यय को रोककर उन्हें आत्मिक विकास की दिशा में नियोजित करना ही तपश्चर्या का मूल उद्देश्य है और स्मरण रखा जाना चाहिए कि रसना, बकवाद यथा यौन-लिप्सा के कारण जीवनी-शक्ति का अस्सी प्रतिशत भाग नष्ट होता है। यदि इन छिद्रों को बन्द कर दिया जाय तो जीवन की प्रवृति स्वतः ही शुभ से अशुभ की ओर अग्रसर होने लगेगी। इन तीन मुख्य छिद्रों को बन्द कर देने पर अशुभ दृष्टि, विलासी जीवन तथा अन्य इन्द्रिय लिप्साओं को नियन्त्रित कर पाना अपेक्षाकृत बहुत आसान हो जायगा।

🔵 फिर भी यह नहीं समझ लेना चाहिए कि संयम से तात्पर्य उपवास, मौन और ब्रह्मचर्य भर ही है। उसकी परिधि और साधना क्षेत्र बहुत व्यापक है तथा उसमें सभी प्रकार के अपव्ययों को रोकने की आवश्यकता पर जोर दिया गया है, इन्द्रिय संयम उनमें से एक है। मनोनिग्रह उसका दूसरा पक्ष है। मनोनिग्रह अर्थात् चिन्तन को अभीष्ट प्रयोजनों में नियोजित करना और अवांछनीय विचारों को आते ही भगा देना।

🔴 अभियान साधना में सभी स्तर के संयम पर जोर दिया गया है। जैसे समय संयम अर्थात् सोने से लेकर जागने तक एक भी क्षण आलस्य या प्रमाद में बर्बाद न करना। रम सन्तुलन को बुद्धिमता पूर्वक बनाये रहना। न का संयम अर्थात् उचित और न्याय, नीति पूर्वक उपार्जन करना तथा कमाई को आवश्यक प्रयोजनों में ही व्यय करना। यही चारों संयम मिलकर जीवन साधना को तपश्चर्या का समग्र रूप बनाते हैं। इन्द्रिय संयम उनमें प्रथम है। अभियान साधना में निरत साधकों का लक्ष्य प्रथम चरण की चिन्ह पूजा को ही सब कुछ नहीं मान बैठना चाहिए वरन् समग्र संयम की तपश्चर्या को साधना का आवश्यक अंग मानकर चलना चाहिए तथा इन उपचारों के सहारे संयम शीलता अपनाने की व्यावहारिक रूपरेखा निर्मित की जाय।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 मन: स्थिति बदले तो परिस्थिति बदले (भाग 2)

🌹 युगधर्म का परिपालन अनिवार्य

🔵 विकास क्रम में ऐसे बदलाव अनायास ही प्रस्तुत कर दिए गए हैं। इस परिवर्तन क्रम को रोका नहीं जा सकता। जो पुरानी प्रथाओं पर ही अड़ा रहेगा, उसे न केवल घाटा ही घाटा उठाना पड़ेगा, वरन् उपहासास्पद भी बनना पड़ेगा।

🔴 मान्यताएँ, विचारणाएँ, निर्धारण और क्रियाकलाप आदि भी समय के परिवर्तन से प्रभावित हुए बिना रहते नहीं। उनकी सर्वथा उपेक्षा नहीं की जा सकती। धर्मशास्त्र भी समय की मर्यादाओं में बँधे रहे हैं और उनमें प्रस्तुत बदलाव के आधार पर परिवर्तन होते रहे हैं। स्मृतियाँ और सूत्र ग्रन्थ भी भिन्न-भिन्न ऋषियों ने अपने अपने समय के अनुसार, नए सिरे से लिखने की आवश्यकता समझी और वह सुधार ही जनजीवन में मान्यता प्राप्त करता रहा। इसका कारण उन निर्माताओं में परस्पर विवाद या विग्रह होना नहीं है, वरन् यह है कि बदलती परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए धर्म प्रचलन के स्वरूप में भी भारी हेर फेर किया गया।

🔵 प्राचीनकाल में जमीन में गड्ढा खोदकर गुफायें विनिर्मित कर ली जाती थीं, बाद में कुटिया बनाना अधिक सरल और सुविधाजनक लगा। इसके बाद अब तो भूमि सम्बन्धी कठिनाई को देखते हुए, आगे बढ़कर सीमेंट और लोहे के सहारे भवन निर्माण का प्रयोग निरन्तर बढ़ता जा रहा है। लकड़ी और गोबर से ईंधन की आवश्यकता पूरी करने की प्रथा पिछले दिनों रही है, पर उनका पर्याप्त मात्रा में न मिलना, इस प्रयास को तेजी से कार्यान्वित कर रहा है कि गोबर गैस या खनिज गैस से काम लिया जाये। जहाँ इफरात है, वहाँ बिजली से भी ईंधन का काम लिया जा रहा है। खनिज तेल भी किसी प्रकार उस आवश्यकता की पूर्ति कर रहे हैं। अब तो सूर्य की धूप भी ईंधन की जगह प्रयुक्त होने लगी है। इन परिवर्तनों में आवश्यकता के अनुरूप अविष्कार होते चलने की उक्ति ही सार्थक सिद्ध होती है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 आप अपने आपको पहचान लीजिये (भाग 10)

👉 युग ऋषि की अमृतवाणी

🔴 विश्वामित्र को जरूरत पड़ी थी तो उन्होंने दशरथ जी के बच्चे थोड़े समय के लिए माँगे थे कि भाई थोड़े समय के लिए दे दो हमें क्यों? क्योंकि हमें यज्ञ की रक्षा करनी है। कितने दिन में कर दोगे वापिस अरे यही कोई साल छ: महीने में आ जायेंगे। लेकिन साल छ: महीने में कहाँ आये वह तो भगवान् हो गये। घर- घर में पहुँच गये। जन- जन की जिव्हा पर पहुँच गये। तुलसीदास के राम बन गये। बाल्मीकि के राम बन गये और सारे संसार के राम बन गये। कहाँ आये। खैर ठीक है अभी तो हम आपसे कोई बात नहीं कहते थोड़े समय की बात कहते हैं कि आप एक साल का समय निकाल सके तो अच्छी बात है।

🔵 किसके लिए हमने भी विश्वामित्र की तरीके से यज्ञ किये हैं और हमारे यज्ञ सामान्य नहीं होते हमने असामान्य काम किये हैं हमें आप सामान्य आदमियों में गिनना और सामान्य आदमी एक दूसरे से जैसे माँगते जाँचते रहते हैं और सलाह देते रहते हैं आप सामान्य मत मानना हमारी सलाह को भी असामान्य मानना और हमारा जो कहना है उसको भी असामान्य मानना। असामान्य बात कह रहे हैं। असामान्य बात कैसे कह रहे हैं हमारी पिछली जिंदगी पर निगाह डाल लीजिये यह सारी की सारी बातें असामान्य हैं। और इससे आगे जिस काम के लिए हमको आपकी जरूरत पड़ी है वह काम भी बहुत असामान्य है।

🔴 उससे भी बड़ा असामान्य है। पहले की बातें मालूम हैं आपको अरे दो पाँच बातें तो मालूम हुई है आपको सारे के सारे ग्रंथ जो ऋषियों के थे वह कहीं दिखाई भी नहीं पड़ते थे। किसी को मालूम भी नहीं था। हमने काश्मीर लाइब्रेरी में से ढूँढ़ कर मंगाये कहीं कोई से मंगाया पता भी नहीं था गायब हो गये थे। लायब्रेरियों में जला दिये गये अरे वेद तो है ही नहीं वेद तो वह उठा ले गया रावण यहाँ है नहीं वह ।। सारी की सारी बातें सामान्य बात थी कि असामान्य बात थी।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/lectures_gurudev/31.4

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 90)

🌹 आदर्श विवाहों के लिए 24 सूत्री योजना

🔴 22. बारात कम समय ठहरे:-- समीप की बारात का एक दिन और दूर की बारात का दो दिन ठहरना पर्याप्त है।

🔵 अधिक दिनों बारात रुकने से सभी की असुविधा होती है और तरह-तरह के खर्च बढ़ते हैं। समय और पैसे की बर्बादी होती है इसलिये कम समय ही बारात का रुकना उचित है।

🔴 23. नेग अपने-अपने चुकायें:-- कहीं-कहीं ऐसे रिवाज अभी भी हैं कि लड़की वाले के ‘काम वालों’ के नेग बेटे वाले को चुकाने पड़ते हैं। कुछ नेग बेटी वाले को बेटे वाले के कर्मचारियों के चुकाने पड़ते हैं। यह झंझट बन्द करके दोनों अपने-अपने कर्मचारियों के खर्चे चुकावें।

🔵 उपरोक्त प्रकार के हेर-फेर से ‘काम वाले’ या तो असन्तुष्ट रहते हैं या अनुचित लाभ लेते हैं। मनोमालिन्य भी बढ़ता है और देखने में भी यह बात भद्दी लगती हैं। उचित यही है कि उनके परिश्रम का ध्यान रखते नेग या वेतन अपने आप ही चुकाया जाय। दूसरे पक्ष पर उसका भार न डाला जाय।

🔴 24. छुट-पुट रस्म रिवाजें संक्षिप्त की जायें:- बार-बार छुट-पुट रस्म रिवाजें चलाने में समय और धन की बर्बादी न की जाय।

🔵 विवाह पक्का होने से लेकर बारात विदाई होने तक ही नहीं वरन् एक साल तक और रिवाज चलाने पड़ते हैं और उनमें बेकार की चीजें खरीद कर इधर से उधर भेजनी पड़ती हैं। इनका खर्च कई बार विवाह जितना ही आ पहुंचता है। इन बेकार बातों को जितना घटाया जा सकता हो तो अवश्य घटाना चाहिये। विवाह के अवसर पर देन-दहेज देने लेने के अनेक ‘ठिक’ बने हुये हैं। इन्हें कम करके (1) पक्की (वर के घर पर) (2) द्वार स्वागत (लड़की के घर) यह दो ही प्रमुख रखें। विदाई, गोद भरना जैसी शुभ समझे जाने वाले रस्म भी स्थानीय लोकाचार के अनुसार की जा सकती हैं।

🔴 हर प्रान्त के सब क्षेत्रों में अपने-अपने ढंग की अगणित प्रकार के अनेकों छुट-पुट रस्म रिवाज हैं। उनमें से कौन-कौन पूरी तरह तुरन्त ही छोड़ देने चाहिये और कौन-कौन किस तरह घटाई जानी चाहिये यह स्थानीय परिस्थितियों को देखकर किया जाय। दृष्टिकोण यही रहे कि जो रूढ़ियां अनावश्यक है उन्हें घटाकर समय और धन की बर्बादी रोकी जाय।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 37)

🌹  गुरुदेव का प्रथम बुलावा-पग-पग पर परीक्षा

🔴 पूरा एक वर्ष होने भी न पाया था कि बेतार का तार हमारे अंतराल में हिमालय का निमंत्रण ले आया। चल पड़ने का बुलावा आ गया। उत्सुकता तो रहती थी, पर जल्दी नहीं थी। जो देखा है, उसे देखने की उत्कंठा एवं जो अनुभव हस्तगत नहीं हुआ है, उसे उपलब्ध करने की आकाँक्षा ही थी। साथ ही ऐसे मौसम में जिसमें दूसरे लोग उधर जाते नहीं, ठंड, आहार, सुनसान, हिंस्र जंतुओं का सामना पड़ने जैसे कई भय भी मन में उपज उठते, पर अंततः विजय प्रगति की हुई। साहस जीता। संचित कुसंस्कारों में से एक अनजाना डर भी था। यह भी था कि सुरक्षित रहा जाए और सुविधापूर्वक जिया जाए। जबकि घर की परिस्थितियाँ ऐसी ही थीं दोनों के बीच कौरव पाँण्डवों की लड़ाई जैसा महाभारत चला, पर यह सब २४ घण्टे से अधिक न टिका। दूसरे दिन हम यात्रा के लिए चल दिए। परिवार को प्रयोजन की सूचना दे दी। विपरीत सलाह देने वाले भी चुप रहे। वे जानते थे कि इसके निश्चय बदलते नहीं।

🔵 कड़ी परीक्षा देना और बढ़िया वाला पुरस्कार पाना, यही सिलसिला हमारे जीवन में चलता रहा है। पुरस्कार के साथ अगला बड़ा कदम बढ़ाने का प्रोत्साहन भी। हमारे मत्स्यावतार का यही क्रम चलता आया है।

🔴  प्रथम बार हिमालय जाना हुआ, तो वह प्रथम सत्संग था। हिमालय दूर से तो पहले भी देखा था, पर वहाँ रहने पर किन परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है, इसकी पूर्व जानकारी कुछ भी नहीं थी। वह अनुभव प्रथम बार ही हुआ। संदेश आने पर चलने की तैयारी की। मात्र देवप्रयाग से उत्तरकाशी तक उन दिनों सड़क और मोटर की व्यवस्था थी। इसके बाद तो पूरा रास्ता पैदल का ही था, ऋषिकेश से देव प्रयाग भी पैदल यात्रा करनी होती थी। सामान कितना लेकर चलना चाहिए जो कंधे और पीठ पर लादा जा सके, इसका अनुभव न था। सो कुछ ज्यादा ही ले लिया। लादकर चलना पड़ा, तो प्रतीत हुआ कि यह भारी है। उतना हमारे जैसा पैदल यात्री लेकर न चल सकेगा। सो सामर्थ्य से बाहर की वस्तुएँ रास्ते में अन्य यात्रियों को बाँटते हुए केवल उतना रहने दिया, जो अपने से चल सकता था एवं उपयोगी था।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/hari/gur

👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 37)

🌞 हिमालय में प्रवेश (जंगली सेब)

🔵 मैं भी साथ था। इस सब माजरे के आदि से अन्त तक साथ था। दूसरे और यात्री उन यात्रियों की भूल पर मुस्करा रहे थे; कनखियां ले रहे थे, आपस में उन फलों का नाम ले लेकर हंसी कर रहे थे। उन्हें हंसने का एक प्रसंग मिल गया था, दूसरों की भूल और असफलता पर आमतौर से लोगों को हंसी आती ही है। केवल पीला रंग और बढ़िया रूप देखकर उनमें पका मीठा और स्वादिष्ट फल होने की कल्पना करनी यह उनकी भूल थी। रूप से सुन्दर दीखने वाली सभी चीजें मधुर कहां होती हैं, यह उन्हें जानना चाहिए था। न जानने पर शर्मिंदगी उठानी पड़ी और परेशानी भी हुई। आपस में लड़ाई झगड़ा होता रहा सो व्यर्थ ही।

🔴 सोचता हूं बेचारी इन स्त्रियों की ही हंसी हो रही है और सारा समाज रंग रूप पर मुग्ध होकर पतंगे की तरह जल रहा है, उस पर कोई नहीं हंसता। रूप की दुनिया में सौंदर्य का देवता पूजता है। तड़क-भड़क, चमक-दमक सबको अपनी ओर आकर्षित करती है और उस प्रलोभन से लोग बेकार चीजों पर लट्टू हो जाते हैं। अपनी राह खोटी करते हैं और अन्त में उनकी व्यर्थता पर इस तरह पछताते हैं जैसे यह स्त्रियां बिन्नी के कड़ुवे फलों को समेट कर पछता रही हैं। रूप पर मरने वाले यदि अपनी भूल समझें तो उन्हें गुणों का पारखी बनना चाहिये। पर यह तो तभी सम्भव है जब रूप के आकर्षण से अपनी विवेक बुद्धि को नष्ट होने से बचा सकें।

🔵 बिन्नी के फल किसी ने नहीं खाये। वे फेंकने पड़े। खाने योग्य वे थे भी नहीं। धन, दौलत, रूप, यौवन, राग-रंग, विषय-वासना, मौज-मजा जैसी अगणित चीजें ऐसी हैं जिन्हें देखते ही मन मचलता है किन्तु दुनिया में चमकीली दीखने वाली चीजों में से अधिकांश ऐसी ही होती हैं जिन्हें पाकर पछताना और अन्त में उन्हें आज के जाली सेबों की तरह फेंकना ही पड़ता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

रविवार, 29 जनवरी 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 30 Jan 2017


👉 आज का सद्चिंतन 30 Jan 2017


👉 जीवन देवता की साधना-आराधना (भाग 23) 30 Jan

🌹 व्यावहारिक साधना के चार पक्ष   

🔴 प्रज्ञायोग की प्रथम साधना को आत्मबोध कहते हैं। आँख खुलते ही यह भावना करनी चाहिये कि आज अपना नया जन्म हुआ। एक दिन ही जीना है। रात्रि को मरण की गोद में चले जाना है। इस अवधि का सर्वोत्तम उपयोग करना ही जीवन साधना का महान लक्ष्य है। यही अपना परीक्षा क्रम है और उसी में भविष्य की सारी सम्भावना सन्निहित है।               

🔵 मनुष्य जन्म जीवधारी के लिये सबसे बड़ा सौभाग्य है। इसका सदुपयोग बन पड़ना ही किसी की उच्चस्तरीय बुद्धिमत्ता का प्रमाण-परिचय है। उठते ही यह विचार करना चाहिये कि आज के एक दिन को सम्पूर्ण जीवन माना जाये जिनके लिये इसे दिया गया है। इस आधार पर दिनभर की दिनचर्या इसी समय निर्धारित की जाये। चिन्तन, चरित्र, और व्यवहार की वह रूपरेखा विनिर्मित की जाये जिसे सतर्कतापूर्वक पूरी करने पर यह माना जा सके कि आज का दिन एक बहुमूल्य जन्म पूरी तरह सार्थक हुआ। इस चिन्तन के सभी पक्षों पर विचार करने में जितना अधिक समय लगे उतना कम है, पर इसे नित्यप्रति, नियमित रूप से करते रहने पर पन्द्रह मिनट भी पर्याप्त हो सकते हैं। एक दिन की छूटी बात को अगले दिन पूरा किया जा सकता है।  

🔴 दूसरी संध्या रात को सोते समय पूरी की जाती है, उसमें यह माना जाना चाहिये कि अब मृत्यु की गोद में जाया जा रहा है। भगवान् के दरबार में जवाब देना होगा कि आज के समय का, एक दिन के जीवन का किस प्रकार सदुपयोग बन पड़ा? इसके लिये दिनभर के समययापनपरक क्रिया-कलापों और विचारों के उतार-चढ़ावों की समीक्षा की जानी चाहिये। उसके उद्देश्य और स्तर को निष्पक्ष होकर परखना चाहिये तथा देखना चाहिये कि कितना उचित बन पड़ा और कितना उसमें भूल या विकृति होती रही।

🔵 जो सही हुआ उसके लिये अपनी प्रशंसा की जाये और जहाँ जो भूल हुई हो उसकी भरपाई अगले दिन करने की बात सोची जाये। पाप का प्रायश्चित शास्त्रकारों ने यही माना है कि उसकी क्षतिपूर्ति की जाये। आज का दिन जो गुजर गया, उसे लौटाया तो नहीं जा सकता, पर यह हो सकता है कि उसका प्रायश्चित अगले दिन किया जाये। अगले दिन के क्रिया कलाप में आज की कमी को पूरा करने की बात भी जोड़ ली जाये। इस प्रकार कुछ भार तो अवश्य बढ़ेगा, पर उसके परिमार्जन का और कोई उपाय भी तो नहीं है। 

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हम अभागे नहीं हैं

🔵 अपने से बढ़ी चढ़ी स्थिति के मनुष्यों को देखकर हम अपने प्रति गिरावट के-तुच्छता के भाव लावें यह उचित नहीं। क्योंकि असंख्यों ऐसे भी मनुष्य हैं जो हमारी स्थिति के लिए तरसते होंगे और अपने मन में हमें ही बहुत बड़ा भाग्यवान् मानते होंगे।

🔴 उन खानाबदोश गरीबों को देखिए जिनके पास रहने को घर नहीं, बैठने की जगह नहीं, बंधी हुई तिजारत या जीविका नहीं आज यहाँ हैं तो कल वहाँ दिखाई देंगे। रोज कुंआ खोदना रोज पानी पीना। क्या इनकी अपेक्षा हम अच्छे नहीं है?

🔵 अज्ञान और भ्रम के कारण कितने ही लोगों का जीवन कंटकाकीर्ण हो रहा है, कुसंस्कार, दुर्भावना, कुविचार, बुरी आदत, मूर्खता, नीचवृत्ति, पाप, वासना, तृष्णा, ईर्ष्या, घृणा, अहंकार व्यसन, क्रोध, लोभ, मोह आदि आन्तरिक शत्रुओं के आक्रमण से जिन्हें पग-पग पर परास्त एवं पीड़ित होना पड़ता है, उनकी अशान्ति की तुलना में हम अधिक अशान्त नहीं हैं।

🔴 जिन्हें हम अधिक सम्पन्न और सुखी समझते हैं वे भी हमारी ही तरह दुखी होंगे और अपने से अधिक सम्पन्नों को देखकर सोचते होंगे कि हम पिछड़े हुए, अभावग्रस्त और दुखी हैं। दूसरी ओर जो लोग हमसे पिछड़े हुए हैं वे हमारे भाग्य पर ईर्ष्या करते होंगे। सोचते होंगे अमुक व्यक्ति तो हमारी अपेक्षा बहुत अधिक सुख−साधन सम्पन्न है।

🔵 हम अपने को अभागा क्यों मानें ? दीन, दुखी, अभाव ग्रस्त या पिछड़ा हुआ क्यों समझें ? जब अनेकों से अनेक अंश में हम सुसम्पन्न और आगे बढ़े हुए हैं तो अकारण दुख न होने पर भी दुखी होने का कोई कारण नहीं। हमें तृष्णा का हड़कम्प उठा कर शान्तिमय जीवन को अशान्त बनाने की कोई आवश्यकता नहीं। हमें चाहिए कि जो प्राप्त है उसमें संतुष्ट रहें और अधिक प्राप्त करने को अपना स्वाभाविक कर्तव्य समझ कर उसके लिए प्रयत्न करें।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति-मार्च 1948 पृष्ठ 15 
http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1948/March.15

👉 काबिलियत की पहचान

🔴 किसी जंगल में एक बहुत बड़ा तालाब था . तालाब के  पास एक बागीचा था, जिसमे अनेक प्रकार के पेड़ पौधे लगे थे दूर- दूर से लोग वहाँ आते और बागीचे की तारीफ करते।

🔵 गुलाब के पेड़ पर  लगा पत्ता हर रोज लोगों को आते-जाते और फूलों की तारीफ करते देखता, उसे लगता की हो सकता है एक दिन कोई उसकी भी तारीफ करे. पर जब काफी दिन बीत जाने के बाद भी किसी ने उसकी तारीफ नहीं की तो वो काफी हीन महसूस करने लगा उसके अन्दर तरह-तरह के विचार आने लगे— सभी लोग गुलाब और अन्य फूलों की तारीफ करते नहीं थकते पर मुझे कोई देखता तक नहीं, शायद मेरा जीवन किसी काम का नहीं …कहाँ ये खूबसूरत फूल और कहाँ मैं… और ऐसे विचार सोच कर वो पत्ता काफी उदास रहने लगा।

🔴 दिन यूँ ही बीत रहे थे कि एक दिन जंगल में बड़ी जोर-जोर से हवा चलने लगी और देखते-देखते उसने आंधी का रूप ले लिया. बागीचे के पेड़-पौधे तहस-नहस होने लगे, देखते-देखते सभी फूल ज़मीन पर गिर कर निढाल हो गए, पत्ता भी अपनी शाखा से अलग हो गया और उड़ते-उड़ते तालाब में जा गिरा।

🔵 पत्ते ने देखा कि उससे कुछ ही दूर पर कहीं से एक चींटी हवा के झोंको की वजह से तालाब में आ गिरी थी और अपनी जान बचाने के लिए संघर्ष कर रही थी।

🔴 चींटी प्रयास करते-करते काफी थक चुकी थी और उसे अपनी मृत्यु तय लग रही थी कि तभी पत्ते ने उसे आवाज़ दी, घबराओ नहीं, आओ, मैं तुम्हारी मदद कर देता हूँ। और ऐसा कहते हुए अपनी उपर बैठा लिया. आंधी रुकते-रुकते पत्ता तालाब के एक छोर पर पहुँच गया; चींटी किनारे पर पहुँच कर बहुत खुश हो गयी और बोली,  आपने आज मेरी जान बचा कर बहुत बड़ा उपकार किया है, सचमुच आप महान हैं, आपका बहुत-बहुत धन्यवाद!

🔵 यह सुनकर पत्ता भावुक हो गया और बोला, धन्यवाद तो मुझे करना चाहिए, क्योंकि तुम्हारी वजह से आज पहली बार मेरा सामना मेरी काबिलियत से हुआ, जिससे मैं आज तक अनजान था. आज पहली बार मैंने अपने जीवन के मकसद और अपनी ताकत को पहचान पाया हूँ…

🔴 मित्रों, ईश्वर ने हम सभी को अनोखी शक्तियां दी हैं; कई बार हम खुद अपनी काबिलियत से अनजान होते हैं और समय आने पर हमें इसका पता चलता है, हमें इस बात को समझना चाहिए कि किसी एक काम में असफल होने का मतलब हमेशा के लिए अयोग्य होना नही है. खुद की काबिलियत को पहचान कर आप वह काम  कर सकते हैं, जो आज तक किसी ने नही किया है!

👉 मन: स्थिति बदले तो परिस्थिति बदले (भाग 1)

🌹 युगधर्म का परिपालन अनिवार्य
🔵 छोटे बच्चों के कपड़े किशोरों के लिए फिट नहीं बैठते और किशोरों के लिए सिलवाए गये कपड़ों से प्रौढ़ों का काम नहीं चलता। आयु वृद्धि के साथ-साथ परिवर्तन आवश्यक हो जाता है। भोजन ताजा बनाने से ही काम चलता है। विद्यार्थी जैसे-तैसे कक्षा चढ़ते जाते हैं, वैसे ही वैसे उन्हें अगले पाठ्यक्रम की पुस्तकें खरीदनी पड़ती हैं। सर्दी और गर्मी के कपड़े अलग तरह के होते हैं। परिवर्तन होते चलने के साथ, तदनुकूल व्यवस्था बनाते रहना भी एक प्रकार से अनिवार्य है।

🔴 समय सदा एक जैसा नहीं रहता। वह बदलता एवं आगे बढ़ता जाता है, तो उसके अनुसार नए नियम-निर्धारण भी करने पड़ते हैं। आदिम काल में मनुष्य बिना वस्त्रों के ही रहता था। मध्यकाल में धोती और दुपट्टा दो ही, बिना सिले वस्त्र काम आने लगे थे। प्रारम्भ में अनगढ़ औजारों-हथियारों से ही काम चल जाता था। मध्यकाल में भी धनुष-बाण और ढाल-तलवार ही युद्ध के प्रमुख उपकरण थे, अब आग्नेयास्त्रों के बिना काम चल ही नहीं सकता। समय के साथ परिस्थितियाँ बदलती हैं और फिर उनके समाधान खोजने पड़ते हैं।

🔵 प्राचीनकाल के वर्णाश्रम पर आधारित प्राय: सभी विभाजन बदल गये। अब उसका स्थान नई व्यवस्था ने ले लिया है। दो सौ वर्ष पुराने समय में काम आने वाली पोशाकों का अब कहीं-कहीं प्रदर्शनियों के रूप में ही अस्तित्व दीख पड़ता है। जब साइकिलें चली थीं तब अगला पहिया बहुत बड़ा और पिछला बहुत छोटा था। अब उनका दर्शन किन्हीं पुरातन प्रदर्शनियों में ही दीख पड़ता है। कुदाली से जमीन खोद कर खेती करना किसी समय खेती का प्रमुख आधार रहा होगा, पर अब तो सुधरे हुए हल ही काम आते हैं। उन्हें जानवरों या मशीनों द्वारा चलाया जाता है। लकड़ियाँ घिसकर आग पैदा करने की प्रथा मध्यकाल में थी, पर अब तो माचिस का प्रचलन हो जाने पर कोई भी उस कष्टसाध्य प्रक्रिया को अपनाने के लिए तैयार न होगा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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शनिवार, 28 जनवरी 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 29 Jan 2017


👉 आज का सद्चिंतन 29 Jan 2017


👉 जीवन देवता की साधना-आराधना (भाग 22) 29 Jan

🌹 व्यावहारिक साधना के चार पक्ष 

🔴 ज्ञान और कर्म के संयोग से ही प्रगतिपथ पर चल सकना, सफलता वरण करने की स्थिति तक पहुँचना सम्भव होता है। अध्यात्म विज्ञान में भी तत्त्वदर्शन का सही स्वरूप समझने के उपरान्त दूसरा चरण यही रहता है कि उसे क्रियान्वित करने की, पूजा-अर्चना की विधि व्यवस्था ठीक बने। अध्यात्म का तत्त्वदर्शन, आत्मपरिष्कार और आत्मविकास को दो शब्दों में सन्निहित समझा जा सकता है। उपासना पक्ष की प्रतीक पूजा का तात्पर्य है-क्रिया एवं साधनों के सहारे आत्मशिक्षण की आवश्यकता पूरी करना। कोई भी कर्मकाण्ड उसकी भावनाओं को हृदयंगम किये बिना पूर्ण नहीं हो सकता। मात्र कर्मकाण्ड को जादू का खेल समझते हुए बड़ी सफलता की आशा नहीं की जा सकती। क्रियायें जब जिसको जिस मात्रा में प्रभावित करेंगी, वह उसी मात्रा में सत्परिणाम प्राप्त कर सकने में सफल होगा।               

🔵 सर्वजनीन सुलभ साधना का स्वरूप प्रस्तुत करते हुए इन पृष्ठों पर प्रज्ञायोग नाम से वह विधान प्रस्तुत किया जा रहा है, जिसके सहारे अभीष्ट उद्देश्य की पूर्ति में अन्यान्य उपाय-उपचारों की अपेक्षा अधिक सरलतापूर्वक कम समय में अधिक सफलता मिल सकती है।  

🔴 प्रज्ञायोग की दो संध्यायें अत्यधिक सरल और अत्यधिक महत्त्वपूर्ण हैं। एक सबेरे आँख खुलते ही बिस्तर पर पड़े-पड़े पन्द्रह मिनट ‘‘हर दिन नया जन्म’’ की भावना करने का उपक्रम है। दूसरा रात्रि को सोते समय यह अनुभव करना कि शयन एक प्रकार का दैनिक मरण है। जन्म और मरण यही दो जीवन सत्ता के ओर-छोर हैं। इन्हें सही रखा जाये तो मध्यवर्ती भाग सरलतापूर्वक सम्पन्न हो जाता है। बीजारोपण और फसल काटना, यही दो कृषि कार्य के प्रमुख अंग हैं। शेष तो लम्बे समय तक चलने वाली किसान की सामान्य क्रिया-प्रक्रिया है। उसे तो सामान्य बुद्धि और सामान्य अभ्यास से भी चलाया जा सकता है। जाग्रति को प्रात:काल की संध्या और शयन को रात्रि की संध्या कहा जा सकता है। दो बार संध्यायें सूर्योदय और सूर्यास्त के समय वाली मानी जाती हैं। पर उसके साथ जुड़ी आध्यात्मिक साधना प्रात:काल आँख खुलते समय और रात्रि को सोने, आँख बन्द होने के समय की जा सकती है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 तीन मछलियां

🔴 एक सरोवर मे तीन दिव्य मछलिया रहती थी। वहाँ की तमाम मछलिया उन तीनो के प्रति ही श्रध्दा मे बटी हुई थी।

🔵 एक मछली का नाम व्यावहारिक बुद्धि था, दुसरी का नाम मध्यम बुद्धि और तीसरी का नाम अति बुद्धि था।

🔴 अति बुद्धि के पास ज्ञान का असीम भंडार था। वह सभी प्रकार के शास्त्रो का ज्ञान रखती थी। मध्यम बुद्धि को उतनी ही दुर तक सोचने की आदत थी, जिससे उसका वास्ता पड़ता था। वह सोचती कम थी, परंपरागत ढंग से अपना काम किया करती थी। व्यवहारिक बुद्धि न परंपरा पर ध्यान देती थी और न ही शास्त्र पर। उसे जब जैसी आवश्यकता होती थी निर्णय लिया करती थी और आवश्यकता न पड़नेँ पर किसी शास्त्र के पन्ने तक नही उलटती थी।

🔵 एक दिन कुछ मछुआरे सरोवर के तट पर आये और मछलियो की बहुतायत देखकर बाते करनेँ लगे कि यहाँ काफी मछलियाँ है, सुबह आकर हम इसमे जाल डालेगे।

🔴 उनकी बाते मछलियो ने सुनी।

🔵 व्यवहारिक बुद्धि ने कहा-” हमे फौरन यह तालाब छोड़ देना चाहिए। पतले सोतो का मार्ग पकड़कर उधर जंगली घास से ढके हुए जंगली सरोवर मे चले जाना चाहिये।”

🔴 मध्यम बुद्धि ने कहा- ” प्राचीन काल से हमारे पूर्वज ठण्ड के दिनो मे ही वहा जाते है और अभी तो वो मौसम ही नही आया है, हम हमारे वर्षो से चली आ रही इस परंपरा को नही तोड़ सकते। मछुआरो का खतरा हो या न हो, हमे इस परंपरा का ध्यान रखना है।”

🔵 अति बुद्धि ने गर्व से हँसते हुए कहा-” तुम लोग अज्ञानी हो, तुम्हे शास्त्रो का ज्ञान नही है। जो बादल गरजते है वे बरसते नही है। फिर हम लोग एक हजार तरीको से तैरना जानते है, पानी के तल मे जाकर बैठने की सामर्थ्यता है, हमारे पूंछ मे इतनी शक्ति है कि हम जालो को फाड़ सकती है। वैसे भी कहा गया है कि सकटो से घिरे हुए हो तो भी अपने घर को छोड़कर परदेश चले जाना अच्छी बात नही है। अव्वल तो वे मछुआरे आयेगे नही, आयेगे तो हम तैरकर नीचे बैठ जायेगी उनके जाल मे आयेगे ही नही, एक दो फस भी गई तो पुँछ से जाल फाड़कर निकल जायेंगे। भाई! शास्त्रो और ज्ञानियो के वचनो के विरुद्ध मै तो नही जाऊँगी।”

🔴 व्यवहारिक बुद्धि ने कहा-” मै शास्त्रो के बारे मे नही जानती, मगर मेरी बुद्धि कहती है कि मनुष्य जैसे ताकतवर और भयानक शत्रु की आशंका सिर पर हो, तो भागकर कही छुप जाओ।” ऐसा कहते हुए वह अपने अनुयायिओं को लेकर चल पड़ी।

🔵 मध्यम बुद्धि और अति बुद्धि अपने परपरा और शास्त्र ज्ञान को लेकर वही रूक गयीं। अगले दिन मछुआरो ने पुरी तैयारी के साथ आकर वहाँ जाल डाला और उन दोनोँ की एक न चली। जब मछुआरे उनके विशाल शरीर को टांग रहे थे तब व्यवहारिक बुद्धि ने गहरी साँस लेकर कहा-” इनके शास्त्र ज्ञान ने ही धोखा दिया। काश! इनमे थोड़ी व्यवहारिक बुद्धि भी होती।”

🔴 व्यवहारिक बुद्धि से हमारा आशय है कि किस समय हमे क्या करना चाहिए और जो हम कर रहे है उस कार्य का परिणाम निकलने पर क्या समस्याये आ सकती है, यह सोचना ही व्यवहारिक बुद्धि है। बोलचाल की भाषा में हम इसे सामान्य ज्ञान (कॉमन सेंस) भी कहते हैं, और भले ही हम बड़े ज्ञानी ना हों मोटी-मोटी किताबें ना पढ़ीं हों लेकिन हम अपनी व्य्वयहारिक बुद्धि से किसी परिस्थिति का सामना आसानी से कर सकते हैं।

 

👉 हरि कीर्तन

 🔴 ‘कीर्तन’ शब्द को यदि उलटा कर दिया जाय तो वह शब्द ‘नर्तकी’ बन जाता है। इस जमाने में हर जगह उलटा चलने ही अधिक देखा जाता है। कीर्तन का वास्तविक तात्पर्य न समझ कर लोग उसका उलटा अर्थ करते हैं और नर्तकी की तरह नाच कूद कर अपनी उचंग पूरी करते हैं। ईश्वर कोई मनचला नवाब नहीं है, जिसे नाच रंग में मस्त रहने की सनक हो। वह अपने प्रिय पुत्रों को नर्तक नहीं, धर्म प्रवर्तक बनाना चाहता है।

🔵 कीर्तन का तात्पर्य उन कर्मों के करने से है, जिससे प्रभु की कारीगरी की कीर्ति फलती है, प्रशंसा होती है। हम किसी सुन्दर खिलौने को देखकर उसकी प्रशंसा करते हैं, वास्तव में वह प्रशंसा जड़ खिलौने की नहीं वरन् उस कुम्हार की है जिसने उसे बनाया है। विद्वान्, धर्मात्मा, तपस्वी, उद्धारक, धर्म प्रवर्तक, अक्सर अवतार कहे जाते हैं, उनमें ईश्वरीय अंश बताया जाता है।

🔴 वैसे तो हर मनुष्य में ईश्वरीय अंश है और आत्मा-परमात्मा का अवतार है। पर किसी विशेष व्यक्ति को अवतारी पुरुष करने का तात्पर्य उसके सद्गुणों के निमित्त कर्ता की प्रशंसा करना है। किसी भले आदमी को देखकर उसे अनायास ही ‘ईश्वर का प्यारा’, ‘ईश्वर की पुण्य कृति’, ‘ईश्वर का कृपा भाजन’ आदि शब्द कहते हैं। इन शब्दों का मर्म अर्थ ईश्वर की प्रशंसा करना, उसकी कीर्ति बढ़ाना है।

🔵 हमें अपना आचरण, विचार, कर्म, व्यवहार एवं स्वभाव इस प्रकार का बनाना चाहिए, जिससे सर्वत्र हमारी प्रशंसा हो। हमारी भलमनसाहत, नेकी, ईमानदारी, सेवा वृत्ति, नम्रता, परमार्थ प्रियता, त्याग भावना की सुगन्ध चारों ओर उड़ती फिरे। वह कीर्ति असल में हमारे जड़ शरीर की नहीं वरन् उसके कर्ता आत्मा की, परमात्मा की है। यही सच्चा कीर्तन है। इस उलटे जमाने में ‘नर्तकी’ बनने वाले बहुत हैं पर ‘कीर्तन’ करने वाले विरले ही दिखाई पड़ते हैं।

🌹 अखण्ड ज्योति फरवरी 1943 पृष्ठ 15
http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1943/February.15

👉 आत्मचिंतन के क्षण 29 Jan 2017

🔴 परिवार परमात्मा की ओर से स्थापित एक ऐसा साधन  है, जिसके द्वारा हम अपना आत्म-विकास सहज ही में कर सकते हैं और आत्मा में सतोगुण को परिपुष्ट कर सुखी, समृद्ध जीवन व्यतीत कर सकते हैं। मानव जीवन की सर्वांगपूर्ण सुव्यवस्था के लिए पारिवारिक जीवन प्रथम सोपान है, क्योंकि मनुष्य केवल कर्म, सेवा-साधना द्वारा ही अपना पूर्ण विकास कर सकता है।

🔵 मातृत्व पर-नारीत्व पर सर्वाधिक लानत फेंकने का काम दहेज के राक्षस ने किया है। इसे समझा भी गया तथा उसके निवारण के प्रयास भी बहुत हुए,सामाजिक भर्त्सनाएँ की गई, कानून भी बना। दहेज के प्रतिरोध में सैकड़ों विचारशील व्यक्तियों ने लिखा, भाषण किया, पर पुरानी पीढ़ी अपने स्थान से तिल भर हटने की तैयारी नहीं। दहेज के दानव ने हर किसी का अहित किया है, पर अपनी बाजी से कोई नहीं चूकता। जब कोई साहसपूर्वक प्रतिरोध, संघर्ष एवं आदर्श उपस्थित करने को तैयार होगा, तभी कुछ समस्या हल होगी। यह आशा अब नये रक्त से हीस शेष है।

🔴 शिक्षित नारी को छिछली चमक-दमक की नई पराधीनता से स्वयं मुक्त होकर देवी-देवताओं, भूत-पलीतों, महन्तों, मठाधीशों, रूढ़ियों-कुरीतियों, अंध परम्पराओं, पूर्वाग्रहों-दुराग्रहों की पुरानी पराधीनता से जकड़ी नारी के उद्धार के लिए आगे आना ही चाहिए। यह उसकी सामाजिक, नैतिक तथा मानवीय जिम्मेदारी है। अपनी इस जिम्मेदारी को निभाने की इच्छा तथा संकल्प जिस शिक्षित नारी में जाग्रत् हो उठे वह नई तथा पुरानी दोनों पराधीनताओं से सामूहिक मुक्ति के लिए सक्रिय हो उठेगी।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 गायत्री विषयक शंका समाधान (भाग 38) 29 Jan

🌹 अभियान साधना के नियम
🔴 अभियान साधकों को गुरुवार के दिन प्रमुखतः तीन नियमों का पालन करना होता है उपवास, मौन और ब्रह्मचर्य। इन तीनों का जितनी ही कड़ाई के साथ पालन किया जाय उतना ही उत्तम है। उपवास में हो सके तो दूध, छाछ, रस जैसे पेय पदार्थ ही लिए जाएं तो सर्वोत्तम है। किन्तु इससे काम न चले तो शाकाहार भी लिया जा सकता है। इतना भी कठिन पड़े तो एक समय भोजन किया जा सकता है। उस एक समय के भोजन में अस्वाद व्रत का पालन अनिवार्य रूप से करना चाहिए। नमक और शक्कर दोनों में से एक भी न लिया जाय।

🔵 यह स्वाद संयम जिव्हा संयम का एक पक्ष है। इसका दूसरा पक्ष है—संतुलित और सुसंस्कृत भाषण। इसके लिए पुराने अभ्यास को रोकने और नया अभ्यास आरम्भ करने का मध्यम उपाय मौन है। पूरे दिन मौन रखना तो कामकाजी व्यक्ति के लिए कठिन पड़ता है पर प्रातःकाल अथवा जब भी सुविधा हो दो घण्टे की मौन साधना बिना किसी अड़चन के की जा सकती है। जितने समय मौन रहा जाय, वह समय मनन, चिन्तन में लगाया जाय। मनन का अर्थ है—आत्मचिन्तन, अपनी वर्तमान स्थिति का आलोचक की दृष्टि से विवेचन।

🔴 इस विवेचन से अपने भीतर जो दोष, दुर्गुण दिखाई दें, जो आदतें अनुपयुक्त जान पड़े, उनके निराकरण की योजना बनाना तथा जिन सत्प्रवृत्तियों का अपने में अभाव है, उनके अभिवर्धन की योजना बनाना, इसी का नाम चिन्तन है। अपना आत्म-विवेचन मनन है और त्रुटियों के निराकरण तथा सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्धन की योजना बनाना चिन्तन कहा जा सकता है। इन्हीं दो कार्यों में चित्त को मौन की अवधि में व्यस्त रहना चाहिए। स्मरण रखा जाय कि मौन का अर्थ मात्र चुपचाप बैठे रहना नहीं है। इस अवधि को एकांत में बिताना चाहिए। मुंह से कुछ न बोलकर जबान बन्द रखकर भी इशारेबाजी की जाती है तो उससे मौन का प्रयोजन पूरा नहीं होता। यह आत्मश्लाघा तो मौन न रखने से भी बुरी है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 गायत्री विषयक शंका समाधान (भाग 37) 28 Jan

🌹 अभियान साधना के नियम

🔴 कहा जा चुका है कि अभियान उन साधकों के लिए है जो अपने सामान्य उपासना क्रम का स्तर बढ़ाकर, उसे ऊंचा उठाकर और अधिक लाभ प्राप्त करना चाहते हों। एक-दो, तीन माला का जप और ध्यान आरम्भिक कक्षा है। यह उपासना आरम्भ करते समय साधक से कहा जाता है कि मन लगने न लगने पर भी ज्यों-त्यों इस अभ्यास को जारी रखा जाए, समय न मिले तो मानसिक जप किसी भी समय किया जा सकता है। लेकिन इतना ध्यान रखना चाहिए कि वह सब नियमित हो। यदि प्रयत्न किया जाय तो ऐसा समय आसानी से निश्चित किया जा सकता है कि उस समय अवकाश रहे और उपासना नियमित रूप से चल सके।

🔵 आरम्भिक कक्षा से आगे बढ़कर उच्च कक्षा में प्रवेश के लिए ही अभियान साधना का उपक्रम है। तितिक्षा, तप आदि नियमानुशासनों का नियमित रूप से पालन हो सके तो अच्छा ही है। पर जिन नियमों का अभ्यास ही नहीं है, उसके लिए आरम्भ छोटे रूप में किया जाना चाहिए और इसी के लिए सप्ताह में एक दिन इन व्रत-नियमों के पालन की बात कही गई है। पूरी दिनचर्या ही अनुशासित नियमबद्ध और तप परायण बन सके तो कहना ही क्या? लक्ष्य वही रखना चाहिए। गुरुवार को अनुष्ठान नियमों का पालन करना इसीलिए आवश्यक रखा गया है कि साधक ये नियमादि याद रखे तथा उनकी प्रेरणा, दिशा निरन्तर नियमित रूप से प्राप्त करता रहे। इन्हें सदैव पालन करना निषिद्ध नहीं है। सप्ताह में एक दिन इस चर्या का पालन न्यूनतम को आवश्यक समझते हुए निर्धारित किया है।

🔴 सर्वविदित है कि अनुष्ठानों में आहार-विहार के दोनों पक्षों पर नियन्त्रण, संयम करना पड़ता है। भोजन में पूरे या अधूरे उपवास की रीति-नीति का यथासम्भव समावेश, ब्रह्मचर्य का पालन, अपनी सेवाएं आप करने का प्राविधान है। तितिक्षा का अभ्यास करने के लिए भूमिशयन जैसी कठोरताएं अपनानी पड़ती हैं। इस तरह के और भी कितने ही तप-साधना, व्रत अनुशासन है जो जप-ध्यान जैसे सामान्य उपासनाक्रम को सशक्त एवं प्रभावोत्मक बनाने में समर्थ है। अभियान-साधना में भी इस प्रकार की कठोरताओं का यथासम्भव पालन करना चाहिए। इसी उद्देश्य से गुरुवार का दिन संयम साधना के लिए निर्धारित है ताकि साधक को अपनी जीवन-नीति का स्मरण ही नहीं अभ्यास भी बना रहे।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 पराक्रम और पुरुषार्थ (अन्तिम भाग) 28 Jan

🌹 साहस का शिक्षण—संकटों की पाठशाला में

🔵 यों तो कुछ असामान्य कर जाने की ललक अधिकांश व्यक्तियों में होती है पर विरले होते हैं जो अपनी विशिष्टता का प्रमाण दे पाते हैं। अन्यथा बहुतेरे मात्र काल्पनिक उड़ानें भरते हैं। अभीष्ट स्तर का साहस न जुटा पाने, पुरुषार्थ का परिचय न दे पाने के कारण कुछ दिखाने की मुराद उनकी कभी पूरी नहीं हो पाती। जैसे तैसे वे जीवन के दिन गुजारते और अतृप्त इच्छा लिए हुए इस दुनिया से चल देते हैं।

🔴 कुछ ऐसे भी होते हैं जिन्हें खाने कमाने के ढर्रे का जीवन नहीं रुचता। बिना कुछ असाधारण काम किये चैन नहीं पड़ता। भीतर का जीवन विशेषकर गुजरने के लिए उछाल मारता है। साधनों की प्रतिकूलता में भी वे चल पड़ते हैं, अपने एकाकी बलबूते भी चमत्कारी स्तर की सफलताएं अर्जित कर लेती हैं। उनके प्रचण्ड पुरुषार्थ के समक्ष प्रतिकूलताओं को भी नत मस्तक होना पड़ता हे। उनका प्रयास उस मछली की तरह होता है जो नदी की प्रचण्ड धारा को उल्टी दिशा में चीरती हुई चली जाती है। रोमांचिक साहसिक अभियान ऐसे ही पुरुषार्थी पूरा कर पाने में सफल होते हैं।

🔵 जैकी टेरी नामक एक व्यक्ति ने इंग्लिश चैनल को साइकिल द्वारा पार करने का निश्चय किया। अनेकों व्यक्तियों ने तैरकर तो चैनल का पार किया था, पर साइकिल से पार करना संकटों से भरा हुआ था। थोड़ा भी सन्तुलन गड़बड़ा जाने पर मृत्यु की गोद में जा पहुंचने का खतरा था। उसने विशेष प्रकार की साइकिल बनवाई जिसके पहिये रबर टायर के थे। साइकिल के डूबने का खतरा तो नहीं था सन्तुलन बनाये रखना अत्यन्त कठिन कार्य था। टेरी को डोवर (यू.के.) नामक स्थान से कैलाइस (फ्रांस) तक पहुंचना था। साइकिल लेकर वह चल पड़ा। तीव्र प्रवाह में वह इतनी बार गिरते-गिरते बचा पर उसने हिम्मत नहीं हारी मात्र आठ घण्टे में चैनल के दूसरे किनारे पहुंचकर एक नया और अद्भुत कीर्तिमान स्थापित किया।

🌹 समाप्त
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 आप अपने आपको पहचान लीजिये (भाग 9)

👉 युग ऋषि की अमृतवाणी
🔴 रीछ बंदरों का जीवन धन्य हो गया। लंका की पराजय हो गई और रामराज्य स्थापित हो गया। यदि रामराज्य स्थापित न हुआ होता तब रावण की पराजय न हुई होती तब और सीता को वापस नहीं लाया गया होता तब तो जो हम और आप राम नाम लेते हैं कहाँ लेते राम नाम। यो कहते कि उसकी बीबी को तो रावण चुरा ले गया इतनी हिम्मत तो थी नहीं कि बीबी को छुड़ा लाता राम काहे का भगवान् काहे बात का। उन्होंने रीछ बंदरों ने भगवान् बना दिया राम को। रीछ बंदरों ने रामराज्य की स्थापना कर दी। किसने स्थापना की मनुष्यों ने स्थापना की। चेतन में सामर्थ्य होती है जड़ में सामर्थ्य नहीं होती। बन्दूकों में सामर्थ्य नहीं होती तोपों में सामर्थ्य नहीं होती परमाणु बमों में सामर्थ्य नहीं होती मनुष्यों की जीवात्माओं में और मनुष्यों के भीतर जो चेतना समाई हुई है उसमें शक्ति होती है।

🔵 आपके भीतर बहुत शक्ति है और उस शक्ति का ठीक इस्तेमाल इस समय करें और आप सोये नहीं। यह न तो इस बात का समय है कि आप अपने आपको भूल जाये कि आप कौन हैं और न यह इस बात का समय है कि आप यह देखें कि सारी दुनिया का भाग्य लिखा जा रहा है यह ऐसा वक्त है जैसा कि संविधान किसी जमाने में लिखा गया था हिन्दुस्तान का संविधान यह है इसी तरीके से मानव जाति का भविष्य और भाग्य अभी लिखा जा रहा है और उस लिखे हुये भाग्य और भविष्य में आपका कोई योगदान होना चाहिये कि नहीं। होना चाहिये। मेरा ख्याल है कि आपका योगदान जरूर होना चाहिये। और आप योगदान करेंगे तो कोई अच्छी बात है। नहीं साहब तो हम आपका कहना क्यों माने।

🔴 तो आप हमारा कहना इसलिये मानिए कि हम जिम्मेदार आदमी हैं। और हम अपने जीवन में सफल आदमी हैं। जो बात हम कहते हैं जानबूझकर कहते हैं समझ बूझकर कहते हैं अपनी जबान का ख्याल रखते हुए कहते हैं आपकी भलाई का ध्यान रखते हुए कहते हैं और ५०० करोड़ मनुष्य हमारे दिमाग के आसपास घूमते हैं उनके जीवन मरण का प्रश्न देखकर आपसे कहते हैं। कि आप थोड़ा सा समय निकाल दीजिये हमारे लिए हमें बहुत सख्त जरूरत है। काहे की हमें भी साहब बहुत जरूरत है। आपको भी होगी मैं यह थोड़े कहता हूँ कि आपको खेती नहीं करनी मैं यह थोड़े कहता हूँ कि आपके पास दुकान नहीं है। मैं यह थोड़े कहता हूँ कि आप एक साल फैल हो जायेंगे इम्तहान में तो कोई बहुत बड़ी मुसीबत आ जायेगी। नहीं मैं कहा कह रहा हूँ आपसे थोड़ा यह कह रहा हूँ कि आप इस समय के लिए निकाल लीजिये।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/lectures_gurudev/31.4

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 89)

🌹 आदर्श विवाहों के लिए 24 सूत्री योजना

🔴 20. दावत में अधिक संख्या में मिठाइयां न हों?:-- खाद्य संकट और चीनी की कमी का ध्यान रखते हुये मिठाइयां न बनाई जांय और बनानी भी हों तो इनकी संख्या दो तीन से अधिक न हो।

🔵 अधिक संख्या में मिष्ठान्न पकवान बनाने से उनकी तादाद इतनी हो जाती है कि उन सबको खा सकना सम्भव नहीं होता। फलस्वरूप वे बचती और बर्बाद होती हैं। आज ऐसी बर्बादी का समय नहीं। खाने वालों से अनुरोध किया जाय कि वे उतनी वस्तुयें लें जो खा सकें। परोसने वालों से कहा जाय कि वे प्रेम और आतिथ्य तो दिखाएं पर बर्बादी जरा भी न हो इस कला से परसें। अन्न की बर्बादी को देश-द्रोह समझा जाय। अन्न देवता को जूठन के रूप में तिरस्कृत करना धार्मिक दृष्टि से भी अवांछनीय है। मेहतर को जूठन देने की ‘उदारता’ दर्शाने के स्थान पर उसे और भी अधिक उदारता के साथ अच्छा शुद्ध भोजन देना चाहिये।

🔴 उच्छृंखलता एवं अशिष्टता न बरती जाय—हल्दी के थापे लगाना, रंग फेंक कर कपड़े खराब करना, भद्दे मजाक करना जैसे उच्छृंखल अशिष्ट व्यवहार न हों।

🔵 देखा जाता है कि विवाहों के अवसर पर उच्छृंखलता और गन्दे मजाकों का वातावरण बन जाता है। यह अवांछनीय है। इस महंगाई के जमाने में कपड़े खराब कर देना, कहीं पर गुलाल, बूरा आदि वस्तुयें मल कर आंखों को हानि पहुंचाने का खतरा उत्पन्न कर देना अनुचित है। महिलायें अश्लील गीत गाकर अपना गौरव ही घटाती हैं और आगन्तुक अतिथियों का मजाक उड़ना धृष्टता है। ऐसी ओछी बातें सभ्य लोगों के लिये अशोभनीय है, जहां ऐसा कुछ प्रचलित हो उसे रोका जाय।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 36)

🌹  गुरुदेव का प्रथम बुलावा-पग-पग पर परीक्षा

🔴  गुरुदेव द्वारा हमारी हिमालय बुलावे की बात मत्स्यावतार जैसी बढ़ती चली गयी। पुराण की कथा है कि ब्रह्माजी के कमण्डलु में कहीं से एक मछली का बच्चा आ गया। हथेली में आचमन के लिए कमण्डलु लिया तो वह देखते-देखते हथेली भर लम्बी हो गयी। ब्रह्माजी ने उसे घड़े में डाल दिया क्षण भर में वह उससे भी दूनी हो गयी तो ब्रह्माजी ने उसे पास के तालाब में डाल दिया, उसमें भी वह समाई नहीं तब उसे समुद्र तक पहुंचाया गया। देखते-देखते उसने पूरे समुद्र का आच्छादित कर लिया। तब ब्रह्माजी को बोध हुआ। उस छोटी सी मछली में अवतार होने की बात जानी, स्तुति की और आदेश मांगा, बात पूरी होने पर मत्स्यावतार अन्तर्ध्यान हो गये और जिस कार्य के लिए वे प्रकट हुए थे वह कार्य सुचारु रूप से सम्पन्न हो गया।

🔵  हमारे साथ भी घटना क्रम ठीक इसी प्रकार चले हैं। आध्यात्मिक जीवन वहां से आरम्भ हुआ था जहां कि गुरुदेव ने परोक्ष रूप महामना जी से गुरु दीक्षा दिलवायी थी। यज्ञोपवीत पहनाया था और गायत्री मन्त्र की नियमित उपासना करने का विधि-विधान बताया था। छोटी उम्र थी पर उसे पत्थर की लकीर की तरह माना और विधिवत् निबाहा। कोई दिन ऐसा नहीं बीता जिसमें नागा हुई हो। साधना नहीं तो भोजन नहीं। इस सिद्धान्त को अपनाया। वह आज तक ठीक चला है और विश्वास है कि जीवन के अन्तिम दिन तक यह निश्चित रूप से निभेगा।

🔴  इसके बाद गुरुदेव का प्रकाश रूप में साक्षात्कार हुआ। उनने आत्मा को ब्राह्मण बनाने के निमित्त 24 वर्ष की गायत्री पुरश्चरण साधना बताई। वह भी ठीक समय पर पूरी हुई। इस बीच में बैटरी चार्ज कराने के लिए- परीक्षा देने के लिए बार-बार हिमालय आने का आदेश मिला। साथ ही हर यात्रा में एक-एक वर्ष या उससे कम दुर्गम हिमालय में ही रहने के निर्देश भी। वह क्रम भी ठीक प्रकार चला और परीक्षा में उत्तीर्ण होने पर नया उत्तरदायित्व भी कन्धे पर लदा। इतना ही नहीं उसका निर्वाह करने के लिए अनुदान भी मिला, ताकि दुबला बच्चा लड़खड़ा न जाय। जहां गड़बड़ाने की स्थिति आई वहीं मार्गदर्शक ने गोदी में उठा लिया।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/hari/gur

👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 36)

🌞 हिमालय में प्रवेश (जंगली सेब)

🔵 आज रास्ते में और भी कितने ही यात्रियों का साथ था। उनमें कुछ स्त्रियां भी थीं। रास्तों में बिन्नी के पेड़ों पर लगे हुए सुन्दर फल दीखे। स्त्रियां आपस में पूछने लगीं यह किस-किस के फल हैं। उन्हीं में से एक ने कहा यह जंगली सेब हैं। न मालूम उसने जंगली सेब की बात कहां से सुन रखी थी। निदान यही तय हुआ कि यह जंगली सेब के फल हैं। फल खूब लदे हुए था। देखने में पीले और लाल रंग मिले हुए बहुत सुन्दर लगते थे और प्रतीत होता था यह खूब पके हैं।

🔴 वह झुण्ड रुक गया। सयानी सी लड़की पेड़ पर चढ़ गई, लगता था उसे अपने ग्रामीण जीवन में पेड़ों पर चढ़ने का अभ्यास रहा है। उसने 40-40 फल नीचे गिराये। नीचे खड़ी स्त्रियों ने उन्हें आपा-धापी के साथ बीना। किसी के हाथ ज्यादा लगे किसी के कम। जिसके हाथ कम लगे थे वह उससे लड़ रही थी जिसने ज्यादा बीने थे। लड़ती जाती थी और कहती जाती थी तूने रास्ता रोक कर झपट कर अधिक बीन लिए, मुझे नहीं बीनने दिए। जिसके पास अधिक थे वह कह रही थी मैंने भाग दौड़ कर अपने पुरुषार्थ पर बीने हैं जिसके हाथ पैर चलेंगे वही तो नफे में रहेगा। तुम्हारे हाथ-पैर चलते तो तुम भी अधिक बीनती।

🔵 इन फलों को अगली चट्टी पर भोजन के साथ खायेंगे, बड़े मीठे और सुन्दर यह होते हैं। रोटी के साथ खाने में अच्छे लगेंगे। धोती के पल्लू में बांधकर वे प्रसन्न होती हुईं चल रही थीं कि कीमती फल, इतनी तादाद में उनने अनायास ही पा लिये। लड़ाई झगड़ा तो शान्त हो गया था पर ज्यादा कम बीनने की बात पर मनोमालिन्य जो उत्पन्न हुआ था वह बना हुआ था। एक दूसरे की नाराजी के साथ घूर-घूर का देखती चलती थीं।

🔴 चट्टी आई। सब लोग ठहरे। भोजन बना। फल निकाले गये। जिसने चखे उसी ने थू-थू किया। वे कड़वे थे। इतनी मेहनत से लड़ झगड़ कर लाये हुए सुन्दर दीखने वाले जंगली सेब कड़वे और बेस्वाद थे उसे देखकर उन्हें बड़ी निराशा हुई। सामने खड़ा हुआ पहाड़ी कुली हंस रहा था। उसने कहा ‘‘यह तो विन्नी का फल है। उसे कोई नहीं खाता। इसकी गुठली का तेल भर निकालते हैं।’’ वे समझे बूझे इन्हें बीनने, लाने और खाने की मूर्खता पर वे सभी स्त्रियां संकुचा रही थीं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

शुक्रवार, 27 जनवरी 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 28 Jan 2017


👉 आज का सद्चिंतन 28 Jan 2017


👉 जीवन देवता की साधना-आराधना (भाग 21) 28 Jan

🌹 सार्थक, सुलभ एव समग्र साधना  
🔴 आत्मिक प्रगति का महत्त्व समझा जाना चाहिये। व्यक्ति या राष्ट्र की उन्नति उसकी सम्पदा, शिक्षा, कुशलता आदि तक ही सीमित नहीं होती। शालीनता सम्पन्न व्यक्तित्त्व ही वह उद्गम है जिसके आधार पर अन्यान्य प्रकार की प्रगतियाँ तथा व्यवस्थाएँ अग्रणी बनती हैं, समर्थता का केन्द्र बिन्दु यही है। इस एकाकी विभूति के बल पर किसी भी उपयोगी दिशा में अग्रसर हुआ जा सकता है। किन्तु यदि आत्मबल का अभाव रहा तो संकीर्ण स्वार्थपरता ही छाई रहेगी और उसके रहते कोई ऐसा प्रयोजन सध न सकेगा जिसे आदर्शवादी एवं लोकोपयोगी भी कहा जा सके। यहाँ वह उक्ति पूरी तरह फिट बैठती है, जिसमें कहा गया है कि ‘‘एकै साधे सब सधे, सब साधे सब जाय’’              

🔵 अनेक प्रकार की समृद्धियों और विशेषताओं से लदा हुआ व्यक्ति अपने कौशल के बलबूते सम्पदा बटोर सकता है। सस्ती वाहवाही भी लूट सकता है। पर जब कभी मानवी गरिमा की कसौटी पर कसा जायेगा तो वह खोटा ही सिद्ध होगा। खोटा सिक्का अपने अस्तित्त्व से किसी को भ्रम में डाले रह सकता है, पर उस सुनिश्चित प्रगति का अधिकारी नहीं बन सकता जिसे ‘महामानव’ के नाम से जाना जाता है। जिसके लिये सभ्य, सुसंस्कृत, सज्जन, समुन्नत जैसे शब्दों का प्रयोग होता है।  

🔴 सन्त परम्परा के अनेकानेक महान ऋषियों, लोकसेवियों एवं युगनिर्र्माताओं से जो प्रबल पुरुषार्थ बन पड़े, उनमें आन्तरिक उत्कृष्टता ही प्रमुख कारण रही। उसी के आधार पर वे निजी जीवन में आत्मसन्तोष, लोक सम्मान और दैवी अनुग्रह की निरन्तर वर्षा होती अनुभव करते हैं। अपने व्यक्तित्त्व, कर्तृत्त्व के रूप में ऐसा अनुकरणीय उदाहरण पीछे वालों के लिये छोड़ जाते हैं, जिनका अनुकरण करते हुए गिरों को उठाने और उठों को उछालने जैसे अवसर हस्तगत होते रहें। यही है जीवन की लक्ष्यपूर्ति एवं एकमात्र सार्थकता। प्रज्ञायोग की जीवन साधना इसी महती प्रयोजन की पूर्ति करती है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आत्म निर्माण की ओर (अंतिम भाग)

🔵 यदि तुम्हारे बच्चे से, तुम्हारी स्त्री से, तुम्हारे नौकर से अमुक काम नहीं बनता, वरन् इन्होंने कोई काम बिगाड़ दिया और नुकसान हो गया हो तो क्रोध करने, तिरस्कार और निकृष्ट आलोचना करने से सबके मन में हीनता और पश्चाताप के भाव पैदा होगा। काम बिगड़ जाने से उन्हें पश्चाताप तो है ही, परन्तु तुम्हारे शब्दों से उन्हें बहुत ही चोट पहुँचेगी, इससे वे भयभीत और संकुचित होंगे, आगे वैसा कोई काम करने की उन्हें हिम्मत न होगी-कह देंगे- हमसे न होगा - बिगड़ जायगा, टूट जायगा- इत्यादि।

🔴 उनका छिद्रान्वेषण करने, उनका तिरस्कार करने, हीन, निर्बुद्धि और निकृष्ट बनाने में तुम्हारे मन में भी संताप से कितना विष उत्पन्न होकर रक्त को विषाक्त करेगा - इसकी कल्पना तुम्हें नहीं है। अस्तु, दूसरों का तिरस्कार करने की अपेक्षा उक्त घटना को यह समझ कर क्षमा कर देना चाहिए कि क्रोध और तिरस्कार से कुछ तो बनेगा नहीं, भविष्य में सुधार के लिए उन्हें शिक्षा दे देनी चाहिए। हंसकर उन्हें अमुक काम ठीक प्रकार से करना सिखला दो तो वे तुम्हें महान समझेंगे, तुमसे प्रेम करेंगे और सावधानी तथा प्रेमपूर्वक हरेक काम करेंगे।

🔵 दूसरे लोग जैसा सोचते हैं जो बोलते या करते हैं-उसकी जिम्मेदारी उन पर है, तुम्हें क्या चिन्ता? परन्तु तुम जैसा सोचते हो, जो बोलते या करते हो उसकी जिम्मेदारी तुम पर है-उसकी चिन्ता तुम्हें होनी चाहिए।

🔴 किसी घटना से उतनी हानि नहीं होती, वरन् उस घटना से हम स्वयं अपने विचारों द्वारा अपनी हानि अधिक कर लेते हैं। कोई विपत्ति आने और घटना होने पर कोई रोता बिलखता है, दूसरा व्यक्ति उसे छोड़कर निर्माण में लग जाता है। हुआ सो हुआ, अब आगे सुधारो। इन दोनों व्यक्तियों में कितना अन्तर है?

🔵 तुम किसी योजना में लगे हो, तो धैर्यपूर्वक प्रयत्नशील रहो, यह मत सोचो, और मत कहो अरे इतने दिन तो हो गये, न जाने कब यह पूरा होगा। वरन् ऐसा विचार करो-प्रतिदिन यह धीरे-धीरे अब पूरा हो रहा है।

🔴 तुम दूसरों को कैसा समझते हो दूसरे लोग तुम्हें क्या समझते हैं- यह अपनी-2 मनोवृत्ति विकास और दृष्टिकोण का प्रतिबिम्ब है। परन्तु तुम वास्तव में क्या हो, इसका विचार करो अपना सुधार और निर्माण करते रहो, संसार के लोग कुछ भी कहें।

🌹 समाप्त
🌹 अखण्ड ज्योति -अगस्त 1948 पृष्ठ 24
http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1948/August.25

👉 आत्मचिंतन के क्षण 28 Jan 2017

🔴 आज भड़कीला शृंगार फैशन कहा जाता है और उसे कला, सुरुचि एवं सभ्यता का चिह्न कहकर पुकारा जाता है। कहा और माना जो कुछ भी जाय वास्तविकता ज्यों की त्यों रहेगी। हमारे उठती उम्र के बच्चे और बच्ची इस पतन पथ पर कदम न बढ़ाएँ इसका ख्याल रखा जाना चाहिए। उत्तेजक शृंगार की जड़ में वासना का विकार स्पष्ट है इससे देखने वालों के मन में विक्षोभ उत्पन्न होता है। इसलिए हम सफाई से रहें, स्वच्छता पसंद करें, सादगी से रहें और सभ्य वेशभूषा धारण करें।

🔵 वर्तमान परिस्थितियों में प्रजनन कर्म में प्रवृत्त होने से पूर्व हर विवेकशील नर-नारी को हजार बार विचार करना चाहिए कि क्या वह सचमुच समुन्नत स्तर की संतान का निर्माण करने की मनःस्थिति और परिस्थिति में है? यदि नहीं, तो बुद्धिमत्ता इसी में है कि अपनी आर्थिक जननी की शारीरिक स्थिति को, बच्चों के भविष्य और देश की प्रगति को बर्बादी से बचाने के लिए संतानोत्पादन पर विराम लगाकर ही रखा जाय।

🔴 आज उस समय की उन मान्यताओं का समर्थन नहीं किया जा सकता जिनमें संतान वालों को सौभाग्यवान और संतानरहित को अभागी कहा जाता था। आज तो ठीक उलटी परिभाषा करनी पड़ेगी। जो जितने अधिक बच्चे उत्पन्न् करता है, वह संसार में उतनी ही अधिक कठिनाई उत्पन्न करता है और समाज का उसी अनुपात से भार बढ़ाता है, जबकि करोड़ों लोगों को आधे पेट सोना पड़ता है, तब नई आबादी बढ़ाना उन विभूतियों के ग्रास छीनने वाली नई भीड़ खड़ी कर देना है। आज के स्थित में संतानोत्पादन को दूसरे शब्दों में समाज द्रोह का पाप कहा जाय तो तनिक भी अत्युक्ति नहीं होगी।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 खरा सौदा

🔴 किसी गांव में एक साहूकार रहता था। उसके तीन बेटे थे-रामलाल, श्यामलाल, मोहन कुमार। साहूकार के पास रुपए पैसे की कमी न थीं। किंतु अब उसकी उम्र बढ़ रही थी। वह अधिक मेहनत नहीं कर पाता था। इसलिए उसने सोचा कि चलो अपना व्यापार बेटों को सौंप दूं।

🔵 साहूकार चाहता था कि उसका धन गलत हाथों में पड़कर बर्बाद न हो जाए। इसलिए उसने अपने बेटों की परीक्षा लेने का मन बनाया। उसने बातों-बातों में कहा-‘ईश्वर तो सब जगह रहता है। वह तुम्हारी रक्षा करेगा। तुम लोग मुझे ऐसी जगह से एक-एक अशर्फी लाकर दो, जहां कोई देख न रहा हो।’

🔴 तीनों बेटे पिता की बात सुनकर चल पड़े। रामलाल को पता था के पिता जी पैसा कहां रखते हैं? जब साहूकार सो रहा था तो उसने एक अशर्फी चुपके से उठा ली। इसी तरह श्यामलाल ने मां की संदूकची में से अशर्फी चुराई। लेकिन मोहन को पिता की बात भूली न थी।

🔵 उसने सोचा-‘पिता जी ने कहा था कि ईश्वर सब जगह रहता है फिर तो वह मेरी चोरी देख लेगा?’ उसने कहीं से भी अशर्फी नहीं ली। दोनों भाइयों ने बड़ी शान से अपनी अक्लमंदी पिता को बताई। जब मोहन ने अपनी बात बताई तो साहूकार ने उसे गले से लगा लिया। मोहन पिता जी की परीक्षा में खरा उतरा।

🔴 फिर साहूकार ने तीनों बेटों को एक-एक रुपया देकर कहा, ‘जाओ, ऐसा खरा सौदा करना कि माल से कमरा भर जाए?’ पहला बेटा रामलाल बाजार गया। बहुत दिमाग लड़ाने के बाद उसने एक रुपये का भूसा खरीद लिया। भूसे को फैलाकर कमरे में बिखेर दिया। कमरा भर गया। अपने उत्साह में उसने राह में बैठे भूखे भिखारी को लात मार दी।

🔵 श्यामलाल को भी राह में वही भिखारी मिला। उसे भी खरा सौदा करने की जल्दी थी। उसने भिखारी को दुत्कार दिया। एक रुपए की रुई खरीदी और बैलगाड़ी में लदवाकर घर ले गया। कमरे में रूई ठूंस दी उसका कमरा भी लद गया।

🔴 मोहन ने पहले भिखारी को खाना खिलाया और फिर  मोहन ने बचे हुए पैसों से एक माचिस व मोमबत्ती खरीद ली। जब साहूकार देखने आया तो उसने वही मोमबत्ती अपने कमरे में जला दी। सारा कमरा रोशनी से जगमगा उठा। दरअसल, साहूकार ही भिखारी बनकर राह में बैठा, बेटों की परीक्षा ले रहा था।

🔵 उसे बड़े दो बेटों से बहुत निराशा हुई। वह मोहन से बोला-‘वाह बेटा! तुमने किया है खरा सौदा।’

🔴 इंसान वही है, जो दूसरों के दुख पहले दूर करे और बाद में अपने लिए सोचे। साहूकार ने मोहन को अपनी सारी संपत्ति सौंप दी।

🔵 मोहन ने कहा-‘पिता जी, हम तीनों भाई मिलकर आपके काम ही देख-रेख करेंगे।’ साहूकार की आंखें खुशी से भर आईं। बड़े भाइयों ने भी मोहन से मानवता की सीख ली और सब मिल-जुलकर रहने लगे।

गुरुवार, 26 जनवरी 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 27 Jan 2017


👉 आज का सद्चिंतन 27 Jan 2017


👉 जीवन देवता की साधना-आराधना (भाग 20) 27 Jan

🌹 सार्थक, सुलभ एव समग्र साधना

🔴 प्रज्ञायोग एक ऐसी ही विधा है। इसे बोलचाल की भाषा में जीवन साधना भी कहा जा सकता है। इसमें जप, ध्यान, प्राणायाम, संयम जैसे विधानों की व्यवस्था है। पर सब कुछ उतने तक ही सीमित नहीं है। उपासना में ध्यान धारणा स्तर के सभी कर्मकाण्ड आ जाते हैं। इसके साथ ही जीवन के हर क्षेत्र में मानवी गरिमा को उभारने और रुकावटें हटाने जैसे सभी पक्षों को जोड़कर रखा गया है। शरीरसंयम, समयसंयम, अर्थसंयम, विचारसंयम इस धारा के अलग न हो सकने वाले अंग हैं।               

🔵 दुर्गुणों के, कुसंस्कारों के निराकरण पर जहाँ जोर दिया गया है, वहाँ यह भी अनिवार्य माना गया है कि अब की अपेक्षा अगले दिनों अधिक विवेकवान, चरित्रवान और पुरुषार्थ परायण बनने के लिये चिन्तन तथा अभ्यास जारी रखा जाये। वास्तव में यह समग्रता ही जीवन साधना की विशेषता है। साधक को कर्तव्य क्षेत्र में धार्मिकता, मान्यता क्षेत्र में आत्मपरायणता और अध्यात्म क्षेत्र में दूरदर्शी विवेकशीलता उत्कृष्ट आदर्शवाद को अपनाने के लिये कहा जाता है। इन सर्वतोमुखी दिशाधाराओं में समुचित जागरूकता बरतने पर ही वह लाभ मिलता है, जिसे आत्म परिष्कार के नाम से जाना जाता है। यह हर किसी के लिये सरल, सम्भव और स्वाभाविक भी है। 

🔴 आत्मपरिष्कार के अन्य उपाय भी हो सकते हैं। पर जहाँ तक प्रज्ञा परिवार के प्रयोगों का सम्बन्ध है, वहाँ यह कहा जा सकता है कि वह अपेक्षाकृत अधिक सरल, तर्कसंगत और व्यवस्थित हैं। इस सन्दर्भ में अनेक अभ्यासरत अनुभवियों की साक्षी भी सम्मिलित है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 46)

🌹  दूसरों के साथ वह व्यवहार न करेंगे, जो हमें अपने लिए पसंद नहीं। 🔴 हम चाहते हैं कि दूसरे लोग हमारे साथ सज्जनता का उदार और मधुर व्यवहा...